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एक और पत्रकार कि सहारनपुर मे जिंदा जलाकर हत्या कर दी गयी । बताया जा रहा है की उनकी हत्या उत्तर प्रदेश सरकार मे मंत्री राम मूर्ति सिंह के गुंडो ने की है । इस हत्या के पीछे कारण क्या है अभी जांच चल रही है । यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण , अमानवीय और शर्मनाक है , इस घटना का भारत मे होना बहुत ही निराशा जनक है । क्यूंकी पत्रकारिता समाज का दर्पण है और लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ है । ऐसी घटनाए लोकतन्त्र और समाज के लिए घातक हैं।

लेकिन सवाल ये है की क्या आज पत्रकारिता ईमानदार है ? क्या पत्रकार अपना कर्तव्य ठीक से निभा रहे हैं ? क्या पत्रकारिता का जो स्तर आज हमारे देश मे है क्या वो ऐसा है की वो भारतीय कहला सके ? शायद आपकी नज़र मे इन सभी सवालो के जवाब ना मे ही होंगे । पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या स्थानीय स्तर पर बड़ी मायने रखती है , उनकी मौत कई तरह के सवाल खड़ी करती है वो क्या कारण हो सकता है जिसकी वजह से यह जघन्य वारदात हुई । और जब सवाल उठेंगे तो उन सवालो के घेरे मे जगेंद्र सिंह भी आयेंगे और किसी को भी इससे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए । खैर इस मामले की जांच हो रही है इसीलिए इस विषय मे कुछ भी कहना जल्दीबाजी होगी।

दोस्तों, आज हमारे देश मे पत्रकारिता रसातल मे जा पहुंची है। चाहे वो एलेक्ट्रोनिक मीडिया हो , चाहे प्रिंट मेडिया हो , चाहे सोशल मीडिया , हर तरफ मीडिया का स्तर नीचे गिर गया है । मई जनरल वी के सिंह के उस कथन से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ जिसमे उन्होने मीडिया को वेश्या कहा था , मीडिया और पत्रकार आज उस वेश्या से भी नीचे गिर गए हैं। एक वेश्या का अपना ईमान होता है, वो अपना जिस्म सरे बाज़ार बेच देती है लेकिन ईमान नहीं । लेकिन आज के पत्रकारो मे ईमान बचा ही नहीं है उन्होने अपना ईमान बेच दिया है और भरे चौराहे नंगे होकर खड़े हैं । पत्रकार आज पूरी तरह से नीचे गिर चुके हैं चाहे वो मानवीय मूल्यों के आधार पर हो या चाहे किसी के सम्मान के आधार चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक । एक बहुत बड़ी महिला पत्रकार और न्यूज़ ऐंकर ने एक दफ़े कहा था की महिला पत्रकारो के लिए न्यूज़ रूम का रास्ता एडिटर के नीचे से हो कर जाता है । ये एक वाक्य अपने मे ही एक कहानी समेटे हुए है ।

आज का ये भांड मीडिया और पत्रकार पत्रकारो पर हमला होते ही दुम कटे साँप से बिलबिला जाते है यही पत्रकार कई मुद्दो पर शरीर के सारे छेद बंद कर बिलुक्के मे ढुक जाते है ताकि कहीं से भी कोई कुछ ना कहे । भारत का मीडिया 178 देशों की मीडिया की लिस्ट मे 138 वें पर है ऐसी हालत हमारे देश के महान पत्रकारो के नाते हो रही है । ये पत्रकार इतने महान है की इन्हे साहित्य मे पद्मश्री भी दिया गया है ये कोई और नहीं इंडिया टीवी के रजत शर्मा हैं जिनहोने पिछले एक साल से बीजेपी और मोदी के प्रचार का ठेका ले रखा है । बड़े अचरज की बात है की इनहोने ऐसा क्या कर दिया ऐसा क्या लिख दिया की साहित्य मे की इन्हे पद्मश्री दे दिया । शायद इनहोने प्रधानमंत्री मोदी जी और उनके मंत्रियों के लिए ऐसा दुर्लभ साहित्य लिख दिया जिसे पढ़कर वो इतने भाव विभोर हो गए की पद्मश्री से नवाज दिया । इसके बाद नंबर आता है ज़ी न्यूज़ के बहादुर संपादकों का जिनहोने कांग्रेस के राज मे कोयला घोटाले का कथित पर्दाफाश किया था और इनपर पैसा लेकर न्यूज़ रोकने के आरोप भी लगे थे जिसमे डीएनए प्रोग्राम करने वाले ऐंकर और संपादक महोदय भी फंस गए थे और इन्हे जेल मे डाल दिया गया था । ज्ञात हो के की ये मुकदमा अब भी कोर्ट मे चल रहा है । सरकार बदलने के बाद ये भी एका एक वर्तमान सरकार के प्रतिनिधि बन गए । मोदी साहब की हर ट्रिप से पहले इनके कुछ पत्रकार उन जगहो पर जा कर सब खोद डालते हैं यहा तक की मोदी साहब की गाड़ी मे कितने पहिये होंगे । उस समय अगर इस देश मे प्राक्रातिक आपदा भी आ जाएगी तो ये मोदी जी की ही पुंछ पकड़े घूमते रहेंगे ।

अपने देश के पत्रकारो की संवेदन शीलता नेपाल के भूकंप के दौरान हमने देखी है की किस तरह से अंजना ॐ कश्यप जैसी पत्रकारो ने लाली लिपिष्टिक लगा कर और मेक अप कर के रेपोर्टिंग की । उनके चेहरो से लगा ही नहीं की वो इतनी बड़ी आपदा से ग्रस्त देश मे रेपोर्टिंग कर रही थी । इतनी ज्यादा सवेदन हीनता की एक माँ से ये पूछा गया की वो कैसा महसूस कर रही है जिसका बेटा बहू और पोता भूकंप मे मारे गए । और बाद मे नेपाल के लोगो ने इनके मुह पर थूक कर और लतिया के नेपाल से बाहर भगाया । इन नीच पत्रकारो ने उन लोगों के आँसू , उनकी पीड़ा तक को बेच दिया । अगर वही किसी पत्रकार की हत्या होती है तो इन पत्रकारों की कजरारी आंखो से ऐसे आँसू गिरते हैं जैसे इनका कोई सगा मर गया हो । ऐसे चिल्ला चिल्ला के डिबेट होती है की डिबेट करने वालो से ज्यादा पत्रकार चिल्लाते हैं।

ऐसी पत्रकारिता ना तो कभी हुई और ना ही कभी होगी क्यूंकी इससे नीचे की पत्रकारिता को पतराकारिता नहीं गूँ खाना कहा जाएगा । पत्रकारो की ये स्थिति सिर्फ भारत ही नहीं हर जगह है चाहे वो शार्ली अब्दो हो ,चाहे बीबीसी , चाहे सीएनएन आईबीएन सभी के पत्रकार मुह मांगी कीमत पर बिकते हैं सभी को अपना पेट भरना है भले ही इंसानियत मर जाये । 2003 इराक युद्ध से पहले बीबीसी और सीएनएन लगातार यही चिल्लाते रहे की वहा खतरनाक हथियार हैं । युद्ध हुआ इराक बर्बाद हो गया लेकिन कुछ नहीं मिला । सब बिक गए और एक धर्मनिरपेक्ष देश बर्बाद हो गया । जो सीएनएन और बीबीसी युद्ध से पहले इराक मे हो रही ज़्यादतियों को दिखाते नहीं थका वही सीएनएन और बीबीसी आज आइसिस की ज़्यादतियों को क्यू नहीं दिखा रहा ?

सच तो ये है इन पत्रकारो के आगे हम आम नागरिक गलियों के आवारा कुत्तों के समान है जिसे ये जब चाहे रोटी दिखा के ललचा लेते हैं तो कभी लात लगाकर भगा देते हैं क्यूंकी हम इनकी तरह एसी के कमरो मे नही रहते हमारे बसेरे गजालत और नालियों मे है । इन पत्रकारों को प;आता है की आम जनता जब बिगड़ती है तो क्या करना चाहिए , ये हमे एक रोटी का टुकड़ा दिखाते हैं और हम उन कुत्तों की तरह लड़ पड़ते हैं ।

अगर पत्रकार अब नहीं सुधरे तो बहुत देर हो जाएगी और जब ये आम जनता जिसे ये गली के कुत्ते के समान मानते है अगर इसने सर उठा लिया तो ये पत्रकार सरकशी भूल जाएंगे , ये इनकी हड्डियाँ तक चबा देंगे बस कोई इस आम जनता को एहसासे जिल्लत करा दे तब इन बीके हुए पत्रकारों को खोजे रास्ता नहीं मिलेगा ।

धीरे धीरे पत्रकारो के प्रति लोगो की संवेदना कम हो रही है और अगर ये पत्रकार बिकना न बंद हुए तो एक दिन ऐसा आएगा इनके लिए रोने वाला कोई ना होगा और जिस आम जनता को ये गली का कुत्ता मानते है उसी के सामने कुत्ते की मौत मरेंगे और कोई सूघने भी नहीं जाएगा । और अगर पत्रकार मरेंगे तो पत्रकारीता मरेगी यानि लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ टूट जाएगा और लोकतन्त्र भरभरा कर गिर जाएगा । इसे रोक सकते हैं तो सिर्फ पत्रकार और कोई नहीं इसीलिए अगर ये अभी जाग गए तो बहुत अच्छा होगा नहीं तो वही होगा जो मंजूरे खुदा होगा ।