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कैसा लगेगा आपको जब कोई एक बेहद सुरक्षित दैवीय शक्ति से लेस और सदा के लिए मजबूत मानी गई छत के निचे होकार या आकर भी अपना छाता खुला ही रखकर खड़ा रहे ?
“क्या बेवकूफ है ये ? एक ऐसी छत के निचे होकर भी छाता खोले खड़ा है !!! ? ” कहोगे न यही आप भी ??
“नहीं इस छत के नीचे रहना हो तो मुझे इस छाते के नीचे ही रहना पड़ेगा ” अगर यह उस बेवकूफ का जवाब हुवा तो ? आप क्या कहेंगे ?
यही न ? भाई ! क्या यह बेहद सुरक्षित ,दैवीय शक्ति से लेस और सदा के लिए मजबूती का दावा करने वाली छत में भी कहीं छेद है ? इसमें लिकेज है ?? जो इसके निचे होने या आ जाने पर भी आपको अपने ऊपर वैसे ही छाता ताने रखना होगा जैसे बिना छत के व्यक्ति को रखना पड़ता है ?? और अगर ऐसा है तो फिर इस छत के होने न होने का क्या मतलब ?

है न यह एक बिलकुल स्वाभाविक सा वार्तालाप ? जो दुनिया के किसी भी जगह के आम बुद्धि भी रखने वाले इंसानों के बिच के वार्तालापों का एक आम उदाहरण है !

.अभी बारिश शुरू होने को है या कई जगह पर हो चुकी होगी ! इससे पहले तेज धुप थी ! और इन दोनों से बचना हो तो छाते की जरुरत सबको होगी ! क्यूँ की कोई सत्ता में है , आमिर है ,धर्मगुरु है , या फिर चमत्कारी जो भी है ,जितना भी ख़ास है ! लेकिन ऐसा कभी नहीं होता की जो बारिश सब पे गिरती है उस पर नहीं गिरती ! जो धुप हम और आप को जलाती है उसे नहीं जलाती ! कोई उसे सहने की शक्ति शायद पा सकता है लेकिन कोई शक्ति बारिश और धुप को उसपर गिरने से ही रोक दे? नहीं हो सकता !!

ऊपर का वार्तालाप और तर्क दोनों को अलग अलग या फिर एक दुसरे से जोड़कर भी समझने में अगर कोई परेशानी या विवाद न हो तो अब बढे ? और जानें की आखिर यह इतनी सी चुटकुलानुमा एक आम बात हमसे क्या कहना चाह रही है जो हम सुन कर भी सुन नहीं पा रहे ! देखकर भी एहसास नहीं कर पा रहे ?
निसंदेह ! सीधी सी बात है की
एक
ऐसे किसी छत के निचे होने के बावजूद हम में से कोई भी बारिश और धुप से बचने का कारण बताकर छाता पकडे नहीं खड़ा रहेगा ! -ठीक ? सही बात है न ये ??
दूसरा
अगर बिना छाते के कोई बारिश में या धुप में रहा तो वो कोई भी हो कितना भी खासम ख़ास हो भीगने से या तपिश से नहीं बच सकता !!
( – भाई ! अब यहाँ छाते की जगह रेन सूट या अन्य किसी साधन का जिक्र मत करना ! छाता इन्ही साधनों का प्रतिनिधित्व और प्रतिक के सर्वाधिक प्रचलित उदाहरण के रूप में यहाँ चर्चित है | मुद्दा है ऊद्देश्य !! )

तो अब बताइये जो चीज जिस उद्देश्य के लिए है अगर उसपर खरा न उतरती हो तो उसे अस्वीकार कर दिया जाएगा या नहीं ? ? छाते में भी बारिश लगने लगे वह छाता नहीं रह जाएगा !! ठीक उसी तरह किसी छत से भी पानी गलने लगे धुप अन्दर आने लगे तो वह छत छत नहीं रह जायेगी ! और कोई ऐसे छाते में रहकर भीगता हुवा भी उसी में रहना चाहे ,गलने वाले घर में चादर ओढ़ सोना चाहे और दुनिया में यह साबित करना चाहे की देखो, यह मेरा छाता है ! यह मेरी छत है !! आप भी इसके नीचे आ जाओ !! तो आप क्या करोगे ? और तो और अगर कोई ये कहे की मैं जिस छत ने नीचे हूँ आप भी उसके नीचे आ जाइए लेकिन फिर भी बारिश और धुप से बचना हो तो जैसे आप इस छत के बाहर छाता पकडे थे वैसे ही इस छत की शरण में आने के बाद भी आपको पकडे रहना पडेगा तब आप क्या कहोगे ??
मेरे ख़याल से इसपर सभी के जवाब स्वाभाविक रूप से सामान होंगे !
लेकिन ….लेकिन ठहरिये ! और जरा अपने आप को और आस पास के लोगों को भी देखकर बताइये की अभी अभी ऊपर के दो सवालों के आपने जो जवाब दिए होंगे वही आप आपके लिए छाता होने का दावा करने वाली हर चीज को भी देते हो या फिर मात्र इसने कहा उसने कहा ,इसने लिखा उसने लिखा कह कर स्वीकार लेते हो ?

बिलकुल हम ऐसा कर रहे हैं ! धर्म को लेकर हम बिलकुल ऐसा कर रहे हैं | धर्म जिस उद्देश्य के लिए है वह उसपर खरा नहीं उतर रहा लेकिन फिर भी हम उसकी मार्केटिंग में लगे हैं !! लोगों को अपनी अपनी छत के नीचे लाने के लिए अपनी छत का हरसंभव हर तरीके से गुणगान कर रहे हैं ! और जब कोई इस गुणगान से आकर्षित हो कसी नई छत के निचे आ जाता है तब उसे पता चल रहा है की इस छत के निचे होने के बावजूद उसे अपने आप को किसी न किसी छाते के निचे ही रखना है ! फिर वह छाता जाती का हो या फिर उंच-नीच ,काले-गोरे ,आमिर- गरीब ,सिया-सुन्नी जैसे भेदों का | एक धर्म की छत के नीचे रहकर भी पुरुषों का काम तो इतने से चल जायेगा लेकिन औरतों को तो इस छाते के निचे भी घूँघट में,परदे में या फिर बुर्के में रहने की अनिर्वार्यता है | मुस्लिमों में तो औरतों के लिए एक विशेष उम्र तक बुर्के की अनिर्वार्यता बुर्के के मकसद को और भी स्पष्ट कर देती है की यह सब औरतों के आबरू की सुरक्षा के लिए है !!

जी बिलकुल ! बहोत नेक इरादा है ,लेकिन क्या इसके पीछे की वजह भी ऐसी ही नहीं है जैसे इस लेख के शुरू के वार्तालाप की है ? एक औरत मुस्लिम होकर ,मुस्लिमों के बिच रहकर भी बुर्का क्यूँ पहने ? अगर मजहबी तहजीब के नाम पर यह उसके आबरू बचाने का उपाय है तो बताइये एक औरत को किस से अपनी आबरू को बचाना होता है ? जाहिर सा जवाब है उससे जो उसे केवल एक भोग की वस्तु समझता हो , अपनी वासनापूर्ति का साधन समझाता हो ! जिसे कुल मिलाकर हम गन्दी नज़रों के लोग कहते हैं | तो… किसी भी औरत को फिर वह हिन्दू हो या मुस्लिम ऐसे गन्दी नजरों से बचना हो तो सबसे पहला और स्वाभाविक उपाय क्या करना होगा ? अपने अंग को हरसंभव तरीके से ढकना होगा !! सही है न ?? तो यह तो वैसे ही हुवा जैसे कोई बारिश से बचने के लिए छाता खोल ले ! इसमे कोई अस्वाभाविक या बहोत रिसर्च से निकले नतीजे या फिर ईश्वरीय जैसी कोई बात नहीं है !! यह तो हुई एक बात जो इस उपाय को एक सामान्य और प्राकुर्तिक होना सिद्ध करती है जिसका वास्तव में धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं लेकिन फिर भी इस आबरू रक्षा के अलग अलग तरीके के बन्धनों की वजह से यह उपाय धर्म से जुड़ जाता है !

अब दूसरी बात धर्म क्या दावा करता है ? क्या यह हमें हमारे जीवन की हर समस्या के उपाय देने वाली एक ऐसी छत का दावा नहीं करता जिसे आजीवन के लिए अपना लेने से आपके दोनों जीवन की सफलता और सुरक्षितता की गारंटी मिलती है ? और जाहिर सी बात है की यही गारंटी फिर औरतों के लिए भी होनी चाहिए ! आधुनिकता के दौर में जहाँ औरत मर्द में फर्क का कोई कारण नहीं बचा , औरतों के लिए भी यह गारंटी बिनाशर्त होनी चाहिए !! लेकिन अपने आप को छत बताने वाले धर्म और धार्मिक भी औरत को अपनी आबरू की सुरक्षा उसके पूर्णत: ढके रहने पर ही निर्भर होने की बात करे तो यह तो छत के निचे भी छाता पकडे रहने वाली बात हुई ! फिर एक औरत के लिए किसी धर्म में होने न होने से क्या फर्क रह जाता है ? जब उसे ढके ही रहना है !

इसका तो यही मतलब हुवा न की उसके जरासा खुलते ही सामने वाला मर्द उसे देखेगा तो गन्दी नजर से ही देखेगा !! चलो यह डर उस मर्दों के लिए लाजमी हो सकता है जो पराये धर्म के हैं | और हो सकता है उनके धर्म में मर्दों द्वारा औरतों को ऐसी नजर से देखने पर शायद कोई पाबंदी कोई कड़ी सजा न हो | लेकिन वास्तव में दुनिया में ऐसा तो कोई धर्म ही नहीं जिसने मर्दों को भेडीया बनने की छुट दे रक्खी हो !! इसका मतलब आज दुनिया का हर धर्म अपने आप को औरतों के लिए एक संमानजनक छत होने का दावा करता है | इसके लिए अपने धर्म के मर्दों को औरतों के सन्मान का सर्वोच्च रक्षक होने का दावा करता है ! इसका मतलब साफ़ है की एक औरत को कम से कम अपने मजहब के मर्दों से तो ऐसा कोई खतरा नहीं होने का भरोसा खुद धर्म ही देता है !

औरतों की सुरक्षा और सन्मान को लेकर अपने अपने मजहब के कसीदें पढ़ने वालों के सामने अब आधुनिक सदी में जन्मी पीढ़ी का यह सवाल भी अटल और जायज है की फिर यही धर्म औरत को और सिर्फ औरत को ही परदे में रहने पर मजबूर क्यूँ करता है ? क्या मर्दों की तरह औरतों में किसी मर्द को देख ठीक वैसा ही आकर्षण पैदा नहीं होता जैसा की मर्दों के लिए आम बात मानी जाती है ?? फिर पुरुषों के लिए ऐसी पाबंदियां क्यूँ नहीं ? या फिर धर्म सिर्फ औरतों पर विश्वास नहीं करता ?? सभी औरतों के लिए सभी मर्द उस रिश्ते का आकर्षण करने लायक नहीं होते ठीक वैसे ही सभी मर्दों के लिए सभी औरतें सिर्फ उस सम्बन्ध के लिए नहीं होती ! फिर भी उन्ही मर्दों के साथ घर में बिना परदे के भी महफूज समझी जाने वाली औरत घर के बाहर निकलते ही पाबंदियों से क्यूँ घिर जाती है ? जब की घर के बाहर भी हर शख्स किसी न किसी मजहब का है और हर मजहब औरतों का हिमायती है ! फिर यह बुरका यह पर्दा ,यह घूँघट औरतों के बदन पर आखिर किस की हार या जीत का झंडा लहराते रहे है ??