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by —नास्तिक दुर्रानी

अरब देशों में हुई क्रांतियों के कारण राजनीतिक इस्लामी धाराएं अपनी गुफाओं से निकलकर व्यवहारिक मैदान में उतरीं और मुस्लिम ब्रदरहुड के नेतृत्व में सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हो गईं। सत्ता में आ जाने के बाद इस राजनीतिक इस्लामी धारा की हरकतों की वजह से ये सवाल उठता नज़र आता है कि क्या ये धारा आधुनिक जीवन शैली की आवश्यकताओं से सुसंगत हो सकती है या नहीं?

रूढ़िवादियों ने अपनी राजनीतिक लड़ाईयों में अनैतिक और कभी कभी आपराधिक संसाधनों का इस्तेमाल करने से भी परहेज़ नहीं किया जैसे हिंसा, हत्या, झूठ, तकफ़ीर (काफ़िर करार देना) और फिर इन अपराधों को धार्मिक नारों और लेखों से उचित करार देने की भरपूर कोशिश की। ऐसी अनैतिक और आपराधिक हरकतों की वजह से कुछ लोग ये सवाल उठाते भी नज़र आते हैं कि क्या समस्या मज़हब में है कि यही इन लोगों की शिक्षाओं का स्रोत है? कुछ विश्लेषकों को तो पहले ही ये आशंका थी कि धर्म के नाम पर राजनीतिक इस्लाम को लोगों पर सीधे तौर पर लागू करना विरोधी प्रतिक्रिया के रूप में इल्हाद (नास्तिकता) के फैलने का कारण बनेगा और इस प्रकार लोग एक साथ तलवार और तलवारबाज़ दोनों को खारिज कर देंगे।

फेसबुक पर एक बहस में ज्यादातर लोगों की राय ये थी कि अपने लंबे इतिहास में मानवता ने जो सबसे बुरी वस्तु खोजी है, वो धर्म है, और ये कि इंसानियत धर्म के नाम पर होने वाले अपराधों की रोकथाम मज़हब को खत्म किए बिना नहीं कर सकती क्योंकि ये अंधकार युग के अवशेष हैं। जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना ​​था कि समस्या धर्म में नहीं बल्कि उन लोगों में है जो धर्म के नाम पर सत्ता और संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं। उन्हें आप धर्म के व्यापारी भी कह सकते हैं।

भेदभाव को दरकिनार करते हुए अगर मध्यम मार्ग को अपनाया जाए तो मेरे विचार से मानवता की सबसे बुरी खोज संभवतः धर्म नहीं है। क्योंकि इंसान की ज़िंदगी में इसके कुछ अच्छे प्रभावों से इनकार नहीं किया जा सकता। मेरे विचार से सबसे बुरी चीज़ तकफ़ीर (काफ़िर करार देना) है। ये वो ज़हरीला हत्यारा है जिसे मिस्र के फिरौन ”अख़नातन” ने ईजाद किया था। उसने सिर्फ और सिर्फ ‘आतन’ की इबादत की दावत दी और प्राचीन मिस्र के धर्म ”आमन” की लचीली परम्पराओं का खून कर डाला। ये वो ज़हर है जो बाद में आज के तीनों इब्राहीमी धर्मों में स्थानांतरित हुआ। इस तरह मज़हब के ठेकेदार एक तरफ तो अपने बचाव और मोमिनों की तादाद में इज़ाफ़े के लिए तकफ़ीर (काफिर करार देना) का सहारा लेने लगे तो दूसरी तरफ धार्मिक चिंता में तज्दीद (आधुनिकीकरण) और इज्तेहाद को कुचलने के लिए इसका इस्तेमाल बड़े ज़ोर शोर से किया जाने लगा।

मज़हब इंसानों की एक बड़ी तादाद के मूल विचारों की ज़रूरत को पूरा करता है। ये इंसान को अपने जीवन में अस्तित्व जैसे बड़े दार्शनिक सवालों के तैयार और आसान जवाब देता है और उन्हें खत्म होने से बचाते हुए अनन्त जीवन देता है। लेकिन दूसरी तरफ इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मज़हब इंसानों को एकजुट नहीं करता बल्कि उनमें फूट डालने की प्रमुख वजह है। धर्म मनुष्यों को समुदायों में बांटकर उन्हें आपस में एक हमेशा लड़ी जाने वाली लड़ाई की तरफ धकेल देता है। इतिहास गवाह है कि मानवता चार बुनियादी चीज़ों के लिए हमेशा आपस में संघर्ष करती रही है। धन, सत्ता, लिंग और धर्म, क्योंकि पहले तीन चीजें सापेक्ष और बांटने के लायक़ हैं। इसलिए मानव समाज इन पर अपने मतभेद उन्हीं विवादित पक्षों के बीच बाँट कर के फैसला करने में कामयाब रही। जबकि धार्मिक लड़ाई, चूंकि परम तत्व के इर्द गिर्द घूमती है जो अविभाजित है। इसलिए इस पर लड़ाई हमेशा हमेशा के लिए जारी रहती है और इंसानियत को उसमें अपने खून और तरक्की दोनों की कुर्बानी देनी पड़ती है।

इसके अलावा दया और क्षमा के औज़ारों की वजह से जिनकी शायद ही किसी धर्म में कोई कमी रही हो। ये धर्म लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल तो रहते हैं लेकिन ये बातें लोगों को खतरनाक अपराध को करने से नहीं रोक पातीं। धार्मिक लोग हमेशा धार्मिक लेखन के द्वारा प्रमाण पेश करके ऐसे अमानवीय अपराधों के लिए रास्ता निकाल लेते हैं। बल्कि कभी कभी तो ये अपराध ऐसी इबादत की शक्ल ले लेते हैं जिन से खुदा की नज़दीकी हासिल होती है। अगर इस्लाम की बात की जाए तो राजनीतिक इस्लाम का साहित्य ऐसे प्रमाणों से भरा पड़ा है। मज़हब के इस कातिलाना पहलू की बात करते हुए जान एलिया कहते हैं:

”ये लोग कौन हैं जो एक दूसरे को क़त्ल कर डालते हैं और ये क़त्ल करने वाले हमेशा धर्म ही के क़बीले (गोत्रा) से ​​क्यों उठते हैं? हम देखते हैं कि तर्क और दर्शन के लोग कभी एक दूसरे को क़त्ल नहीं करते। प्लेटो और डिमक्राटीस के समूह कभी एक दूसरे से नहीं टकराये। फाराबी की विचारधारा ने शेख शहाब की खानकाह (मठ) के चिंतकों पर कभी हमला नहीं किया। एथेंस के मन्दिरों के दरवाजे से कभी कोई ऐसी भीड़ नहीं निकली जिसने इंसानों की गर्दनें उड़ा दी हों और शहरों को आग लगा दी हो। लड़ाई झगड़े की आग हमेशा धार्मिक समुदायों के बीच ही क्यों भड़कती है?

इसलिए अपनी (कम उपयोगी) सकारात्मक और (खतरनाक) नकारात्मक पहलुओं सहित धर्म फिलहाल हमारे बीच बाकी रहेगा, क्योंकि ये ऐसी मानव आवश्यकताओं को पूरा करता है जो जब तक इस धरती पर ज्ञान का प्रकाश नहीं छा जाता ये आवश्यकताएं बाक़ी रहेंगी। धर्म की समस्या का समाधान एक ऐसी व्यवस्था में निहित है जो इसके सकारात्मक पहलुओं को उजागर करे और नकारात्मक पहलुओं पर रोक लगाए। एक ऐसी व्यवस्था जो मोमिनों के लिए खुदा के सारे घर खोल दे और धर्म के व्यापारियों को उसका शोषण करने से रोके। ऐसी व्यवस्था जो हमारे दीन और दुनिया दोनों की हिफाज़त की गारण्टी दे सके और हमें इन दोनों में से किसी एक का चयन करने पर मजबूर न करे। इस व्यवस्था का खुलासा सिर्फ एक शब्द में निहित है जिसके प्रकाश ने सिवाय कुछ अंधेरे द्वीपों के सारे ब्रह्मांड को प्रकाशित किया हुआ है, ये व्यवस्था है ”सेकुलरिज़्म”।

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http://www.newageislam.com/ijtihad,-rethinking-islam/nastik-durrani,-new-age-islam/is-religion-itself-a-problem?/d/12086