journalist-jagendra-murder-and-politics-of-clean-chit

न से नेता! जिसे कुछ नहीं होता! इसलिए राममूर्ति वर्मा को भी कुछ नहीं होगा! वह जानते हैं कि नेताओं का अकसर कुछ नहीं बिगड़ता. बाल भी बाँका नहीं होता! लालूप्रसाद यादव और जितेन्द्र तोमर जैसे अपवादों को छोड़ दीजिए. लालू जाने कैसे क़ानून के फंदे से निकल नहीं पाये और तोमर अगर केजरीवाल के मंत्री न होते तो शायद इस तरह क़ानून के फंदे में नहीं फँसते! राममूर्ति वर्मा उत्तर प्रदेश के मंत्री हैं. उत्तर प्रदेश में तो अपराधियों को ही क़ानून का कोई डर नहीं! तो फिर मंत्री जी क्यों डरें? क़ानून तो उनका चाकर है!

निर्लज्ज मुस्कान के मायने!
पत्रकार जगेन्द्र सिंह लगातार मंत्री के ख़िलाफ़ लिख रहे थे. एक दिन उन्हें जला कर मार डाला गया. सीधा आरोप मंत्री, उनके गुरगों और पुलिस पर है. दिल दहला देनेवाली इस घटना पर भी उत्तर प्रदेश सरकार की बेशर्मी से शायद शर्म को भी शर्म आ जाय. पहले तो सरकार ने कोई नोटिस ही नहीं लिया. जैसे कुछ हुआ ही न हो. जब जनता का ग़ुस्सा भड़का तो बड़ी हील-हुज्जत के बाद मंत्री के ख़िलाफ़ मामला दर्ज हो गया. अब जाँच हो रही है. लेकिन जाँच का नतीजा क्या होगा, वह सरकार के बड़े कर्ता-धर्ता शिवगोपाल यादव की निर्लज्ज मुस्कान ने बता दिया और डीजीपी के इस बयान ने कि मंत्री जी की लोकेशन देखी जायेगी!
मतलब? जाँच चलेगी. अपनी रफ़्तार से चलेगी. देखा जायेगा. मंत्री जी मंत्री बने रहेंगे! ठाठ करते रहेंगे! अगर तब तक मीडिया में, और जनता में बात ठंडी पड़ गयी, तो धीरे-से मंत्री जी को क्लीन चिट मिल जायेगी! मामला ख़त्म! वैसे इसके आसार तो बिलकुल नहीं लगते, लेकिन अगर राजनीति ने कोई उलटी करवट ले ली और बेहद मजबूरी में मामले को अदालत का मुँह देखना भी पड़ गया, तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता है? अदालत में मामला बरसों चलेगा, गवाह तोड़े जायेंगे, सबूत इधर-उधर किये जायेंगे ताकि मामला साबित ही नहीं हो पाये! तो आज नहीं, कुछ बरस बाद सही, क्लीन चिट तो मिल ही जायेगी! नेताओं के मामलों में तो यही होता है! लम्बा इतिहास है!

ले क्लीन चिट, दे क्लीन चिट!
एक पत्रकार की इस तरह हत्या और एक सरकार का उस हत्या के आरोपी मंत्री को पूरी शानो-शौक़त के साथ मंत्री बनाये रखने का मतलब क्या है? बहुत गहरा है. बरसों से इस पर चर्चा हो रही है. टोपी, सदरी पहना कर अपराधियों को जिस तरह तमाम राजनीतिक पार्टियाँ अपने शो-केस में सजाती रही हैं, उसके नतीजे इसके सिवा और क्या हो सकते हैं? इसीलिए राजनीति में आज या तो खुर्राट अपराधी भरे पड़े हैं या फिर बहुत-से ऐसे राजनेता, जो माफ़ियाओं के ज़रिए काले धन्धों, ज़मीन क़ब्ज़े, अवैध खनन जैसी तमाम नयी कलाओं में पारंगत हैं! जिन पर आज कहीं कोई सवाल नहीं उठता क्योंकि वे हर पार्टी में हैं! क्यों हर पार्टी में हैं? इसलिए हैं कि वह अपने बाहुबल और धनबल से चुनाव जिता सकते हैं! और फिर वही क्यों? जब पार्टी के मुखियाओं और बड़े नेताओं पर भी बड़े-बड़े गम्भीर आरोप गाहे-बगाहे लगते रहें, तो दूसरी, तीसरी, चौथी क़तार के नेता भी बेखटके वही सब तो करेंगे! और फिर कौन किसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगा? आज मेरी सरकार, कल तेरी सरकार! तू मेरी पीठ सहला, मैं तेरी पीठ सहलाता हूँ! बस हो गया काम! इसलिए नेता बड़ा हो या छोटा, किसी को क्या डर? ले क्लीन चिट, दे क्लीन चिट! बरसों से इस क्लीन चिट का खेल यत्र तत्र सर्वत्र हम देखते रहे, और चुप रहे, तो नतीजा यही होना था, जो एक पत्रकार की हत्या के रूप में उत्तर प्रदेश में हुआ.

ऐसे मिलती है क्लीन चिट!
यह क्लीन चिट कैसे मिलती है? कुछ छोटे-बड़े नमूने देख लीजिए. बात कुछ समय पहले की, इसी उत्तर प्रदेश की है. वरुण गाँधी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज हुआ था. घटना जनता के बीच खुल्लमखुल्ला हुई थी. साम्प्रदायिक घृणा फैलानेवाला भाषण देने का आरोप लगा था. हज़ारों लोगों ने भाषण सुना था. टीवी पर पूरे देश ने देखा था. उसकी सीडी थी. सैंकड़ों गवाह थे. सारे गवाह पलट गये. सीडी लापता हो गयी. मामला साबित नहीं हुआ. क्लीन चिट मिल गयी! एक और मामला जम्मू-कश्मीर का है. एक सेक्स स्कैंडल में कुछ राजनेताओं के फँसे होने का मामला उछला. कई सीडी पकड़ी गयीं. फ़ोरेन्सिक प्रयोगशाला में पहुँची तो पता चला कि किसी सीडी में तो कुछ है नहीं. सीडी रास्ते में बदल गयीं. असली सीडी कहाँ गयीं, किसी को पता नहीं!

बोफ़ोर्स से व्यापम तक, सर्वव्यापी क्लीन चिट
अब एक बहुत बड़ा मामला लीजिए. बोफ़ोर्स दलाली का. कैसे जाँच हुई, कैसे विन चड्ढा और क्वात्रोची हाथ से फिसल गये या फिसल जाने दिये गये, कैसे सबूत आख़िर तक नहीं मिले और करोड़ों रुपये फूँक चुकने के बाद कैसे केस बन्द करना पड़ा, सबको पता है. अभी-अभी जयललिता को क्लीन चिट मिल ही चुकी है. बरसों पहले उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज हुआ था. तब लग रहा था कि सबूत इतने पक्के हैं कि वह बच नहीं पायेंगी. लेकिन हाइकोर्ट से बच गयीं. सुनते हैं कि हिसाब-किताब में कोई ग़लती हो गयी थी! और सरकारी वक़ील को तो अपनी बहस का मौक़ा ही नहीं मिला! तरह-तरह की तरकीबें हैं क्लीन चिट मिलने की! मुलायम सिंह यादव और मायावती के ख़िलाफ़ मामले भी बड़े ज़ोर-शोर से उछले थे. सब में क्लीन चिट मिल गयी. अभी ममता बनर्जी के चेले-चपाटे क्लीन चिट की लाइन में हैं, क्योंकि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को फ़िलहाल ममता की मदद की ज़रूरत है! इसके पहले येदियुरप्पा राजनीति से बाहर हो कर सम्मानपूर्वक अन्दर लौट चुके हैं! पीवी नरसिंहराव के यहाँ सूटकेस पहुँचने की चर्चाओं से लेकर जेएमएम सांसद घूसकांड (घूस देनेवाले कौन थे), लखूभाई पाठक केस, सेंट किट्स केस, जैन हवाला कांड तक तमाम मामले उछले, लेकिन कहीं कुछ साबित नहीं हो पाया. गुजरात में फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के जितने मामले थे, सबमें क्लीन चिट मिलनी ही थी, मिल गयी! अभी मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला हुआ, उसकी जाँच के दौरान ही मामले से जुड़े 41 लोगों की संदिग्ध मौत हो चुकी है. ज़ाहिर है कि यह मौतें क्लीन चिट के लिए ही हो रही है!

क्लीन चिट आज की राजनीति का परम सत्य है! सब तरफ़ सब क्लीन ही क्लीन है! अब यह अलग बात है कि देश के मौजूदा सांसदों में से क़रीब 21फ़ीसदी के ख़िलाफ़ हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, साम्प्रदायिक हिंसा, बलात्कार जैसे गम्भीर अपराध दर्ज हैं. विधानसभाओं का हाल भी यही है. वैसे याद दिला दें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनाव सभाओं में वादा किया था कि 2015 तक संसद को अपराधियों से मुक्त कर देंगे. साल बीतने में अभी साढ़े छह महीने बाक़ी हैं. देखते हैं कि क्या होता है!

केजरीवाल भी उसी दलदल में
आपको उम्मीद हो तो हो, मुझे तो कोई आसार नहीं दिखता कि नरेन्द्र मोदी 2019 तक भी संसद को अपराधियों से मुक्त कर पायेंगे या करना भी चाहेंगे! जनता में जब तक इच्छा शक्ति और संकल्प नहीं होगा, तब तक कुछ नहीं हो सकता. वरना राजनीति को साफ़ करने आये अरविन्द केजरीवाल भी क्लीन चिट के दलदल में न फँस गये होते! जितेन्द्र तोमर के ख़िलाफ़ मामला चुनाव से पहले उछला था. जाँच में उनके बेदाग़ साबित होने तक केजरीवाल उन्हें मंत्री न बनाते तो इतनी फ़ज़ीहत से बच जाते! पिछले चुनाव के पहले तोमर समेत आम आदमी पार्टी के कई टिकटार्थियों पर पार्टी के भीतर ही गम्भीर सवाल उठे थे. लेकिन ईमानदार राजनीति का दावा करनेवाली पार्टी ने ज़्यादातर आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया. चुनावी जीत का लालच किसी को भी डिगा सकता है!
पत्रकार जगेन्द्र की हत्या के अर्थ बड़े गहरे हैं! तरह- तरह के उद्देश्यों को लेकर मीडिया के ‘धन्धे’ में उतरे लोग, ऊपर से बाज़ार का दबाव, मुनाफ़े की मारामारी, पेड न्यूज़, कारपोरेट की बढ़ती घुसपैठ और मालिकों-पत्रकारों की राजनीतिक गलबहियों ने मीडिया की काफ़ी धार वैसे ही कुन्द कर रखी है. और अगर ऐसी ही राजनीति चलती रही तो कौन पत्रकार कुछ लिखने का साहस कर पायेगा? पानी अब नाक तक आ गया है. अगर राजनीति की सफ़ाई के लिए हम अब भी न चेते तो आगे अँधेरा ही अँधेरा है!
http://raagdesh.com