yogaby — ऐमन रियाज़

एक बात जो रूढ़िवादी मुसलमानों को परेशान करती रही है वो ये कि हाल ही में स्वतंत्र विचार वाले मुसलमानों द्वारा योग को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जाना है। योग धीरे धीरे और निश्चित रूप से हमारे घरों में दाखिल हो गया है और हममें से कई इससे फायदा हासिल कर रहे हैं। इसके बावजूद अभी तक मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इसे बिदअत और “सिर्फ हिंदुओं के लिए” मानता है।

में 21 साल का हूँ और मैं पिछले 4-5 सालों से योग कर रहा हूँ। मैंने इससे कई फायदे हासिल किये हैः ध्यान केंद्रित करने की मेरी क्षमता में वृद्धि हुई है, मैं शायद ही कभी गंभीर दबाव का शिकार होता हूँ, मेरा बॉडी मास इंडेक्स 21.7 है, और सबसे महत्वपूर्ण ये है कि मुझे बहुत शांति है। इसके अलावा कई दूसरे छोटे लाभ भी हैं, जैसे शीर्षासन और सरवांगासन से मेरी आंखों की रोशनी बेहतर हुई है, पश्चिमोत्तासन के कारण मेरा पेट काफी मजबूत हो गया है और फेफड़ों के लिए में कपाल भाती और सांस लेने के दूसरे व्यायाम करता हूँ। वास्तव में मुझे योग में इतना मज़ा आता है कि मैं अपनी माँ को योग करने के लिए जोर देता हूँ और अपने बड़े भाई से भी योग करने के लिए कहता हूँ।

हाल ही में एक दिन एक करीबी रिश्तेदार को मुझे योग करते हुए देख कर आश्चर्य हुआ। में पांचों वक्त की नमाज पढ़ता हूँ और उनका मानना ​​था कि जो नमाज़ पढ़ता है उसे योग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसकी बुनियाद हिंदू धर्म में है। मैंने उनके साथ इस पर बहस नहीं की और उस दिन के बाद से मैं उनके सामने योग नहीं करता हूँ। एक और रिश्तेदार ने कहा कि “योग कुछ भी नहीं, जो नमाज़ है उसी की नकल है”। इस बार मैं ये सुनकर हैरान रह गया। इस बार भी मैंने उनसे इस पर कोई बहस नहीं की।

मुझे सबसे पहले इसी बुनियादी बातें बता लेने दीजिए। शब्द योग संस्कृत के शब्द युज से बना है जिसका अर्थ बाँधना और जोड़ना है, अपनी ध्यान को दिशा देना और केंद्रित करने के हैं। इसका अर्थ एकता और सहयोग के भी हैं। ये खुदा की मर्ज़ी के साथ अपनी मर्ज़ी को जोड़ देने की वास्तविक प्रक्रिया है। महादेव देसाई ‘गांधी के अनुसार गीता’ शीर्षक से अपनी किताब में कहते हैं कि “ये शरीर, मन और आत्मा सभी शक्ति को खुदा से मिलाना है…” मुझे लगता है कि ये इस्लाम की परिभाषा है। इस्लाम का अर्थ अपनी मर्ज़ी को खुदा की मर्ज़ी के हवाले कर सुकून हासिल करना है। योग में हम खुद को खुदा के हवाले कर सुकून हासिल करते हैं।

योग के बारे में एक ग़लतफ़हमी है कि ये सिर्फ व्यायाम और कुछ जटिल आसन ही हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। आसन योग की सिर्फ एक स्थिति है। पतांजलि ने आत्मा की खोज के लिए योग के कुल आठ अंगों को बयान किया है। ये निम्नलिखित हैं।

1. यम

2. नियम

3. आसन

4. प्रणायाम

5. प्रत्याहारा

6. धारणा

7. ध्यान

8. समाधि

योग के यह सभी आठ अंग भी इस्लाम और उसकी शिक्षाओं का हिस्सा हैं। यम के बारे में, कुरान की आयात 24: 27-29 और 58:81, नैतिक आदेश देती हैं। जब हम पूरे एक महीने के लिए रोज़ा रखते हैं तो हम संयम के ज़रिये अपनी सभी भावनाओं और इच्छाओं को पाक कर लेते हैं, नमाज़ की बहुत सी स्थितियाँ योग के कई आसनों जैसे वज्रासन और वीरासन से पूरी तरह मेल खाते हैं, जैसे सज्दा की हालत में हम फेफड़ों में बची हुई हवा को बाहर निकालते हैं और ताजी हवा को अंदर लेते हैं, कुरान मजीद ने हमें निर्देश दिया है कि हम अपने नफ़्स से रहनुमाई हासिल न करें बल्कि अपने नफ़्स को काबू में रखें। कुरान की एक आयत में अल्लाह ने मोहम्मद स.अ.व. और हम सब को “अपने पूरे ध्यान” के साथ ग़ौरो-फिक्र और ध्यान लगाने को कहा है, और अंत में हम सभी लोगों को अल्लाह से ताल्लुक पैदा कर उच्च चेतना प्राप्त करने की स्थिति तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।

शब्द ऊँ ‘मुसलमानों को रोकता है; यहां तक ​​कि स्वतंत्र विचार वाले मुसलमान भी आज़ादाना तौर पर इस शब्द को गले नहीं लगा सकते हैं। हर शब्द का एक मतलब है,’ ओम ‘शब्द एक अलग मानसिक छवि पेश करता है जिसे मुसलमान काबिले कुबूल नहीं मानते हैं। मेरा मशविरा ये है किः सीधी साधी है कि ओम ‘न कहें। एक मुसलमान एक अच्छा मुसलमान हो सकता है यहां तक ​​कि अगर वो शाकाहारी है, उसी तरह एक मुसलमान’ ओम ‘का हिस्सा छोड़कर योग का पालन अच्छी तरह कर सकता है। एक शब्द की वजह से पुराने ज़माने की रहमत को रद्द नहीं करना चाहिए। कौन जानता है कि योग के सभी आसन तत्कालीन समय में नमाज़ का एक रूप रहे हों, क्योंकि अल्लाह का फरमान है कि “हमने हर ज़माने में एक नबी भेजा है” और “हमने हर समय में एक डराने वाला भेजा है”। हो सकता है ये खुदा की इबादत का तरीका रहा हो। सज्दे में हमारे जिस्म के आठ हिस्से ज़मीन को छूते हैं, वो हैं: माथा, नाक, दोनों हाथ, दोनों घुटने, दोनों पैर, और साष्टांग में शरीर के आठ भाग भूमि को छूते हैं, वो हैं: दोनों पैर, दोनों घुटने, दो नों हाथ, सीने और ठोड़ी या माथा।

हम सब को अपने विचारों में थोड़ी परिवर्तन लाने की जरूरत है। योग गैर इस्लामी नहीं है, बल्कि ये पूरी तरह से इस्लामी है। अगर हम समग्रता में योग करें, मेरी मुराद सिर्फ योग के आसनों से नहीं है, तो हम ज़्यादा बेहतर मुसलमान बन सकेंगे। योग हमें सकारात्मक दिशा में हमारे मन को ले जाने में मदद कर सकता है; जिन युवाओं में रूढ़िवादिता और आतंकवाद के वायरस दाखिल कराए गए हैं, उनका मुकाबला योग और दिमाग के नियंत्रण की कला के अभ्यास द्वारा किया जा सकता है। हमें पूरे मुस्लिम समाज को योग को अपनाने पर जोर देने की जरूरत है क्योंकि ये नौजवानों के साथ ही बुजुर्गों की भी मदद करता है; ये हिंदुओं के साथ ही मुसलमानों की भी मदद करता है।

आखीर में मैं कहना चाहूंगा “अल्लाह शांति, शांति, शांति”।

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

URL for English article:

http://www.newageislam.com/interfaith-dialogue/is-yoga-un-islamic?/d/7036