filmसिकंदर हयात

महान लेखक प्रेमचंद भी 1934  – 35  में कुछ समय के लिए  मुंबई की फ़िल्मी दुनिया का हिस्सा रहे थे क्योकि अपने पत्र हंस और जागरण को चलाय रखने के लिए उन्हें पेसो की जरुरत थी . उनका यह भी मानना था की भारत की एक बड़ी  अशिक्षित जनता उनके लेखन को पढ़ नहीं सकती हे सो वे उस तक फिल्मो के दुआरा अपने आदर्श और विचार पहुचना चाहते थे परन्तु जल्दी ही उन्होंने फ़िल्मी दुनिया को नमस्ते कह दिया और वापस  बनारस ही आगये उसके बाद डेढ़ साल ही में उनकी मर्त्यु हो गयी परन्तु इस दौरान ही उन्होंने कहानी कफ़न  लिखी और अपना अमर उपन्यास गोदान पूरा किया था जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता हे की फ़िल्मी दुनिया को छोड़ देने का उनका फैसला सही ही था

प्रेमचंद 4 जून 1934  को बम्बई पहुंचे थे और 8- 9 महीने ही वह रहे थे जहा तक मालूम हुआ हे प्रेमचंद ने दो ही फिल्मो की कहानिया लिखी थी मज़दूरों के जीवन की कठिनाइयों पर मिल मज़दूर तथा नवजीवन या शेर दिल जिसमे प्राचीन राज़पूतो के आदर्श जीवन को प्रस्तुत किया गया था दोनों ही फिल्मो में काटछांट को देख कर प्रेमचंद दुखी हुए और अपने मित्र को लिखते हे की ” कहाँ हम और कहाँ सिनेमा वाले फिल्मो में आना मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी . में जिन  इरादो के साथ आया था उसमे से एक भी पूरा होता नज़र नहीं आ  रहा हे  ये प्रोडूसर जिस ढंग की कहनिया बनाते आये हे उसकी लिक से जो भर भी नहीं हट  सकते हे ,वल्गैरिटी  को ये एंटरटेन मेंट वेल्यु कहते हे . अधभुत  ही इनका विश्वास हे . राजा रानी उनके मंत्रियो के षड़यंत्र नकली लड़ाई शोशेबाजी यही इनके मुख्य साधन हे मेने सामाजिक कहानिया लिखी हे , जिन्हे शिक्षित समाज भी देखना चाहेगा लेकिन उनको फिल्म करते समय इन लोगो को संदेह होता हे की चले या न चले ”

हैदरबाद के एक मित्र को 13  नवंबर 1934  को लिखे पत्र में प्रेमचंद लिखते हे की ” यहाँ इंसान के पवित्र ज़ज़्बात का शोषण होता हे ” एक पत्र में वे कहते हे की यहाँ आदमी भी ऐसे मिलते हे की जो न हिंदी जानते हे न उर्दू  अंग्रेजी में अनुवाद करके उन्हें कथा का मर्म समझाना पड़ता हे

जैनेन्द्र कुमार को पत्र में प्रेमचंद लिखते हे की ” फिल्म में डायरेक्टर ही सब कुछ हे . लेखक कलम का बादशाह ही क्यों न हो , यहाँ डायरेक्टर की अमलदारी हे . वह कहता हे की में जानता हु की जनता क्या चाहती हे . हम यहाँ जनता की सेवा को करने को नहीं आये हे , हमने व्यवसाय खोला हे . धन कमाने हमारी ग़रज़ हे जो चीज़ मांगी जायेगी हम वही देंगे . ” प्रेमचंद लिखते हे की ” में जो प्लाट सोचता हु उसमे आदर्शवाद घुस आता हे और कहा जाता हे की उसमे एंटरटेनमेंट वेल्यु नहीं होता ” सिनेमा के जरिये पश्चिम की सारी  बुराइया हमारे अंदर दाखिल की जा रही हे . आप  अखबारों से कितनी भी फ़रियाद कीजिये वे बेकार हे और अखबारों वाले भी साफगोई से काम नहीं लेते जब हीरो हीरोइन की तस्वीर बराबर छपे और उनके कमाल के कसीदे गाय जाए तो क्यों न हमारे नौजवानो पर इसका असर हो  ?  ” 

फिल्म  संसार के अपने अनुभवों के आधार पर प्रेमचंद ने अपने लेखो में लिखा की ” प्रत्येक राष्ट्र का फ़र्ज़ हो गया हे की वह सिनेमा की प्रगति पर कड़ी निगाह रखे और इसे केवल लुटेरो के हाथ में न छोड़ दे . वयवसाय का नियम हे की जो माल ज़्यादा खपे उसकी तैयारी में लगे . अगर जनता की रूचि ताड़ी शराब  में हे तो वह ताड़ी शराब की दूकान खोलेगा और खूब धन कमायेगा उस इस बात का प्रयोजन नहीं की ताड़ी शराब से जनता का कितनी दैहिक चारित्रिक आर्थिक और पारिवारिक हानि पहुचती हे उनके जीवन का उद्देशय तो बस कमाना हे  , व्यवसाय  तो  व्यवसाय  हे बिज़नेस इज बिज़नेस यही वाक्य सबकी जुबान  पर रहता  हे ”

आगे प्रेमचंद लिखते हे की सवदेशी आंदोलन के समय किसी की हिम्मत नहीं थी की वह बिज़नेस इज़ बिजनेस की दुहाई देता . बिज़नेस से अगर समाज का हित होता तो ठीक हे वर्ना- ऐसे बिज़नेस में आग लगा देनी चाहिए , अगर  सिनेमा हमारे जीवन को सवस्थ आनंद दे सके तो उसे जिन्दा रहने का हक़ हे अगर वह हमारे क्षुद्र मनोवेगों को उकसाता हे हमें निर्लजता धूर्तता कुरुचि को बढ़ाता हे और हमें पशुता की और ले जाता हे उसका निशाँ मिट जाए तभी अच्छा हे    एक और लेख में प्रेमचंद लिखते हे की ” साहित्य जनरुचि का पथ पर्दशक उसका अनुगामी नहीं सिनेमा जनरुचि के पीछे चलता हे जनता जो कुछ मांगे वही देता हे साहित्य हमारी सुन्दर भावनाव को सपर्श करके हमें आनद प्रदान करता हे सिनेमा हमारी कुत्सित भवनव को स्पर्श करके हमें मतवाला बनाता हे में आदर्शो को लेकर वहां गया था लेकिन मुझे मालुम हुआ की सिनेमा वालो के पास बने बनाय नुस्खे और आप इन नुस्खों से बहार नहीं जा  सकते  हे वहां प्रोडूसर ये देखता हे की किस बात पर तालिया बज़ती हे उसी बात को वह अपनी फिल में लाएगा अन्य विचार उसके लिए ढकोसले हे जिन्हे वह सिनेमा के दायरे से बाहर समझता हे   ”