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बर्मा में रोहिंगिया मुसलमानों के कत्लेआम की चर्चाएं सोशल नेटवर्किगं और समाचार वेब साइटों पर तो दिखी मगर अफसोस !!!! इतने बड़े हादसे की सच्चाई या इस पर से पर्दा उठाने की ज़हमत ना तो भारत के किसी ख़बरिया चैनल ने की और ना ही दुनियां भर के किसी मीडिया हाउस की नज़र इधर गई। ये अलग बात है जब जब इंसानी खून धरती पर बहा है तब तब दुनियां ने इसका असर महसूस ज़रूर किया है। भले ही पूरी दुनिया का मीडिया इतनी बड़े नरसंहार को दबाने या इसको अपने अंदाज़ से सुलझाने की जुगत में हो, लेकिन ये हादसा इतिहास और दुनियां के बदलाव का एक बड़ा अध्याय बन जाए तो कोई ताज्जुब नहीं…। हो सकता है कि ईराक़, अफगानिस्तान समेत दूसरे कई मुस्लिम देशों की तरह हज़ारों मुसलमानों की हत्या होते देख चुके मीडिया के लिए बर्मा का नरसहांर कुछ नई सनसनी ना ला सका हो। या हो सकता है कि सनी लियोन और पूनम पांडे जैसे घृणित व्यक्तित्व को परोसने के नाम पर कोरोड़ों की डील कर चुके मीडिया के लिए कुछ हजार गरीब और बेबस मुसलमानों की जघन्य हत्या टीआरपी के पैमानों पर खरा ना उतरने वाला मसाला हो।

खैर बर्मा में मुसलमानों के नरसंहार के बाद बुद्धिस्टों का भी चरित्र सामने आ चुका है।
साथ ही पहली बार डेमोक्रेसी का मज़ा चख रहे बर्मा का भविष्य, दिशा और दशा भी सबके सामने आ चुकी है। लेकिन सबसे ख़ास और ज़रूरी बात यह है इस मौक़े पर दुनियां भर के मुसलमानों को भी अपने गिरेबान में झांक कर देखना होगा कि आख़िर गड़बड़ कहां है। क्या वजह है कि नागरिक हो या शासक, देश हो या बस्ती जिस भी संस्था के साथ मुस्लिम नाम जुड़ गया वो सरेआम अपमानित और किसी ना किसी रूप में पीड़ित ही नज़र आता है।
ईमानदार होना और इस्लाम का परचम लहरना एक बात मगर दुनिया मे रहकर दुनियादारी सीखना और तब ज़िंदगी जीना एक अहम बात है । अफ्रीका महाद्वीप मे एक देश है “गाम्बिया” जिसका शायद अक्सर लोगो ने नाम भी नही सुना होगा जिसकी आबादी केवल 19 लाख है जिसमे 90% मुस्लिम है और इस देश का ज़िक्र तभी आता है जब कोई ग़रीबी और भुखमरी पे अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट आई हो क्यूंकी ये देश दुनिया के टॉप 10 ग़रीब देशो मे आता है और देश की पहचान ग़रीबी, भुखमरी,कूपोषण व आकाल है ये देश अफ्रीका महाद्वीप मे बसा सबसे छोटा मुल्क है यानी इस मुल्क की हैसियत दुनिया की ताक़तो के सामने उतनी भी नही जितनी की एक कुन्तल आटे मे चुटकी भर नमक की । लेकिन आपको ये जान कर हैरानी होगी की इस इंतेहाई ग़रीब देश ने रोहिंगिया मुसलमानो को अपने देश मे बसाने व उनकी देख भाल की पेशकश की है और दुनिया के ठीक्केदारो से सिर्फ़ इतनी सी अपील की है की इन मज़लुमो को बस उनके देश मे पहुँचा दिया जाय अब देखना दिलचस्प होगा की क्या इन देशो मे इतनी भी गैरत व इंसानियत बाकी है की वो कम से कम इस अपील पे ध्यान दे सके….???

इस समय कोई मुस्लिम देश आलम-ए-इस्लाम की लीडरशिप करने की सलाहियत रखता है और उसे खोलुस के साथ करने की कोशिश कर रहा है तो वो है तुर्कीव उसके राष्ट्रपति रजब ताएब उर्दगान…….इस पूरे मामले के बाद तुर्की के राष्ट्रपति रजब ताएब उर्दगान ने तुरंत 1 मिलियन डालर की सहायता का एलान किया और अपना मिलेट्री जहाज़ भी भेजा|
दरअसल इसे विस्तार से जानना जरूरी है कि असल मसला क्या है । रोहिंग्या मुसलमानों का मामला जून में नृशंस जनसंहार और लूटपाट की एक कार्यवाही के बाद दुनिया के ध्यान का केन्द्र बना किन्तू यह कोई अस्थाई विषय नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से विश्व के सबसे अत्याचारग्रस्त अल्पसंख्यक बताए जाने वाले रोहिग्या मुसलमानों के अतिरिक्त शायद दुनिया का कोई भी अल्पसंख्यक इस विषम स्थिति का शिकार नहीं हुआ। जिस देश में वह शताब्दियों से आबाद हैं वह उन्हें अपना नागरिक स्वीकार करने और मूलभूत अधिकार देने को तैयार नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से जातीय सफाए के प्रयास में है। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन का आदेश कि हम अपनी ही जाति के लोगों की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं किन्तु अपने देश में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रविष्ट होने वाले रोहिग्या मुसलमानों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करना हमारे लिए असंभव है जो हमारी जाती से संबंध नहीं रखते। यह बयान उन्होंने कुछ दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ली के उस बयान के उत्तर में दिया जो उन्होंने रख़ाइन में बहुसंख्यक आबादी के हाथों जनसंहार और लूटपाट का निशाना बनने वाले रोहिग्या मुसलमानों की स्थिति की समीक्षा लेने के बाद किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार आयुक्त की आशंकाओं के उत्तर में राष्ट्रपति थीन सेन ने आठ लाख मुसलमानों के विषय का “समाधान” यह पेश किया कि यदि कोई तीसरा देश उन्हें स्वीकार करे तो मैं उन्हें वहां भेज दूंगा, यह है वह चीज़ जो हमारी नज़र में विषय का समाधान है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या लाखों रोहिग्या मुसलमान राष्ट्रपति थीन सेन के क्षेत्र में रातों रात प्रविष्ट हो गये हैं जिन्हें देश से निकाल बाहर करना ही उनके अनुसार विषय का एकमात्र समाधान है या इन लोगों का कोई इतिहास या अतीत भी था या है? उनका अतीत क्या है और उनके पूर्वज कौन थे और अराकान में यह लोग कब से आबाद हैं। इन प्रश्नों का प्रमाणित उत्तर के समीषा करना या , इस विषय को समझने के लिए अतिआवश्यक है। रोहिग्या शब्द कहां से निकला? इस बारे में रोहिग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं।मगर कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में ब्यापार के सिलसिले मे आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है। इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका उद्देश्य वह बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए। राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं किन्तु यह दावा सही नहीं है।

रोहिग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के प्रविष्ट होने और रहने पर सभी एकमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है। अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया। जनवरी वर्ष 1948 में बर्मा स्वतंत्र हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ किया। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली। उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया। मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं। बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ी । वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों से पूर्ण रूप से विरोधाभास रखता है। अब भी विश्व जनमत के मन में यह प्रश्न उठता है कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के बाद क्या रोहिंग्या मुसलमानों का उनका अधिकार मिल पायेगा? …… अल-अजहर विश्वविधालयकाहिरा मिस्र से अन्श लिया गया ।