Madni-Rahman

by- नास्तिक दुर्रानी

इस्लाम धर्म कभी भी इतना लाभदायक व्यापार नहीं रहा जितना कि आज है। इस्लाम के मौलवियों ने धर्म के नाम पर कभी इतनी दौलत नहीं कमाई जितनी कि आज कमा रहे हैं। मौलवियों के फतवो की कभी इतनी सख़्त ज़रूरत नहीं थी जितनी कि आजकल है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जामिया अज़हर ने फतवा देने के लिए एक हॉटलाइन बना रखी है। इस्लाम में कभी इतने फतवे जारी नहीं हुए जितने कि अब हो रहे हैं। इस्लामी दुनिया में दीनी मदरसों का फैलाव पहले कभी इतना नहीं था जितना कि आज है। इस्लामी देशों की युनिवर्सिटियों से इस्लामिक स्टडीज़ पर एमए, मास्टर और पीएचडी करने वालों की संख्या पिछले की तुलना में कई सौ गुना अधिक है। धर्म का प्रचार भी अतीत के मुकाबले में जोरों पर है।

इतिहास में कभी भी इस्लामी दुनिया को सेकुलर, अर्द्ध सेकुलर ताक़ते इस्लाम के मौलवी वर्ग से इतना कभी नहीं डरती थीं जितनी आज डरती हैं। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, धार्मिक शिक्षाओं के लिए कई कई पेज और टीवी कार्यक्रमों के कई कई घंटे जिस तरह आज समर्पित किए जा रहे हैं, इसकी कहीं मिसाल नहीं मिलती। और जितना आज मौलवी वर्ग आतंकवाद का खुले तौर पर समर्थन कर रहा है बल्कि आतंकवादी पैदा भी कर रहा है, धर्म के नाम पर इस नियोजित अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की तारीख में कोई मिसाल नहीं मिलती, बल्कि ऐसे ‘जिहाद’ करने वाले को ‘शेख़ुल इस्लाम’, ‘मुजाहिदे अकबर’ और ‘शेख़ुल मुजाहिदीन” जैसे उपनामों से नवाज़ा जाता है। और खुले तौर पर इनके जैसों के पक्ष में दुआएं की जाती हैं, क्योंकि ऐसे लोगों ने हज़ारों मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों, हिंदुओं और इस धरती पर दूसरे धर्म के मानने वाले मासूम लोगों का खून बहाने का नेक काम किया होता है। ऐसे अनैतिक धार्मिकता की भी इतिहास में शायद ही कोई मिसाल मिलती हो।

ऐसे में हम ये कहने में सही नहीं होंगे कि मुसलमानों का दिमाग़ ख़राब हो गया है?

आज की इस्लामी दुनिया में मौलवी को ‘फर्स्ट मेन’ की हैसियत हासिल हो गयी है। उसका स्थान ऊंचा है। उसकी बात निर्णायक है। और उसका ख़ुत्बा (भाषण) और मिम्बर दोनों प्रमुख स्थिति रखते हैं। मौलवी के मुंह से निकले एक शब्द पर कोई सड़क ब्लॉक कर दी जाती है और कोई खोल दी जाती है। कोई अख़बार बंद हो जाता है और कोई एडिटर ‘निकाल’ दिया जाता है। किसी लेखक और कवि की किताबें जला दी जाती हैं। किसी को देश से निकाल दिया जाता है तो किसी को तौहीने रिसालत की आड़ में नामालूम अंजाम की तरफ धकेल दिया जाता है। आज मौलवी टीवी पर बैठ कर धमकी देता, जिहाद का ऐलान करता और कुफ्र के फतवे देता है मगर किसी में हिम्मत नहीं कि उसके खिलाफ एक शब्द भी बोल सके।

मौलवी लोगों के निजी जीवन की हर एक बात में हस्तक्षेप करता है। वो ज़बरदस्ती घरों में घुस सकता है। जबरन तलाशी ले सकता है। घर के मालिक को ज़बरदस्ती जेल भिजवा सकता है। उस पर ज़बरदस्ती कुफ्र का फतवा लगा सकता है। औरतों के मुंह पर ज़बरदस्ती थूक सकता है। उन पर ज़बरदस्ती अश्लीलता का आरोप लगा सकता है, और ये सब करने के लिए उसे किसी से किसी भी तरह की कोई भी इजाज़त लेने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।

मुसलमानों की तार्किक अपरिपक्वता और अज्ञानता के कारण मौलवी को ‘फर्स्ट पालिटीशियन’ की हैसियत हासिल हो गयी है। क्योंकि जैसे ही क़ुरान को ऊपर उठाया जाता है, दूसरी सभी किताबें ज़मीन पर गिरा दी जाती हैं और उन्हें पैरों तले रौंद दिया जाता है, जैसे ही ‘इस्लाम ही समाधान है’ का नारा बुलंद होता है तो दूसरे सभी ज्ञान, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नारों का गला घोंट दिया जाता है।

हज़ारों साल पहले जब मज़हब आए, तो इंसान अपनी अज्ञानता और समझ की कमी की वजह से लाखों सवालों के जवाब की तलाश में जुटा था मगर उसे जवाब नहीं मिल पाता था इसलिए वो अस्पष्ट कारणों को किसी अदृश्य शक्ति की ओर मोड़ देता था।

ज्ञान के विकास और सदी दर सदी मानव बुद्धि के विकास के साथ साथ अनसुलझे सवालों की संख्या कम होने लगी और तादाद लाखों से हज़ारों में सिमट आई। आज के विकसित दौर में जहां ज्ञान का विकास और मानव बुद्धि का विकास अपने चरम पर है, ये हज़ारों सवाल अब सैकड़ों में सिमट आये हैं। वो प्राकृतिक घटनाएं भी अब सिकुड़ती चली जा रही हैं जिनकी अतीत में इंसानों के पास कोई उचित तर्क नहीं होता था। ज्ञान और मानव बुद्धि का विकास अब भी जारी है और आगे चलकर हमें शेष सवालों के जवाब भी मिल जाएंगे।

आधुनिक युग में मानव बुद्धि- खासकर पश्चिमी ज्ञान- का कमाल ये है कि उसने अप्रत्यक्ष पर अधिक महत्व नहीं दिया, बल्कि सोच, शोध, आविष्कार और हर उस चीज़ पर ध्यान केंद्रित किया जो मानव जीवन को आसान बनाती हो और उसकी मुश्किलें आसान करती हो। मिसाल के तौर पर उच्च मानव मस्तिष्क ने आस्मानों की संख्या की कोई फिक्र नहीं की, कि ये सात हैं, आठ हैं या छः, इसके बजाय उसने उड़ने की टेक्नालोजी (एयरोनाटिकल्स) पर ध्यान दी और अधिक से अधिक सुरक्षित और विशालकाय जहाज तैयार किए।

उच्च मानव मस्तिष्क ने जिन्नों के मामलों को कोई महत्व नहीं दी कि ये मौजूद हैं या नहीं? और क्या इनके मर्दों या औरतों से शादी की जा सकती है? संपत्ति कैसे बाँटी जायेगी? आदि, ऐसी खुराफात के बजाए जो फुज़ूल और कुछ न हासिल होनवे वाली बहस पर खात्मा होता है और मानव ऊर्जा और संसाधन को बर्बाद करते हैं। उच्च दिमागों ने आदमी के जीवन को आसान बनाने पर ध्यान दिया और इस मकसद को पाने के लिए खास ध्यान दिया। ऐसे महान मस्तिष्क महिलाओं के रूप और उनकी विशेषताओं की फालतू बहस में नहीं पड़े कि उसे क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं, और उसके शरीर का कौन सा हिस्सा दिखान चाहिए और कौन सा नहीं, उसे मर्दों से किस तरह बात करनी चाहिए और किन चीजों से उसे बचना चाहिए, न ही औरत पर सदियों पुराने सामाजिक और नैतिक मूल्यों थोपने की कोशिश की जो आज पूरी तरह पलट गये हैं।

ऐसी फ़लतू चीज़ों के बजाय उच्च दिमागों ने औऱती की शिक्षा और ट्रेनिंग और उसकी तरक्की के बारे में सोचा ताकि वो समाज में एक उच्च स्थान प्राप्त कर सके। उसे उसके शरीर और मामलों दोनों की आज़ादी दी कि ये दोनों ही उसकी मिल्कियत हैं और सिर्फ और सिर्फ वही उनके बारे में बेहतर फैसला कर सकती है और किसी को ये अधिकार नहीं होता कि वो उसे इन मामलों में डिक्टेट करे जो विशुद्ध रूप से उसके निजी मामले हैं। इसके विपरीत इस्लाम के मौलवियों ने महिला नामक इस अजीबो ग़रीब और नापाक प्राणी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं और इस सोच में हलकान हैं कि ऐसा कोई तरीका ईजाद किया जाए जिसे खुदा को भी ये पता न चल सके कि इस्लामी समाज में औरत नाम का कोई प्राणी भी पाई जाती है …

कभी उससे हिजाब और नक़ाब की मांग करते हैं, कभी उसे घर में कैद करने की कोशिश करते हैं, कभी कहते हैं कि व्यभिचार से बचने के लिए किसी गैर महरम को अपना दूध पिलाए। यानि कि इस बारे में रोज़ाना की बुनियाद पर फतवे जारी किए जाते हैं जिनके सवाल अपनी अज्ञानता की वजह से ख़ुद मुसलमान औरत ही पूछ रही होती है जिनका सम्बंध उसके जीवन के सबसे व्यर्थ विवरणों से होता है। उससे अगर कोई बात सामने आती है तो वो ये है कि मुसलमान मर्द और औरत अब भी जाहिल हैं और उन्हें अपनी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए मौलवियों के मार्गदर्शन और फतवों की सख्त ज़रूरत है। इस्लामी समाज में धार्मिक फतवे एक ज़रूरत बन गए हैं जिनके बिना समाज बिखर जाएगा। जीवन गुज़ारना मुश्किल हो जाएगा और सब बर्बाद हो जाएंगे। यही कारण है कि टीवी चैनलों के विभिन्न और लंबे धार्मिक कार्यक्रमों में हमें महिलाओं की माहवारी, हिजाब, मेकअप, कपड़े, शादी, खतना जैसे मुद्दे छाए हुए नज़र आते हैं, और मौलवी हज़रात ऐसे घटिया फतवा देकर माल बनाते हैं। औरते के खतना की समस्या तो इस्लाम के धर्मशास्त्रियों के विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा और आज भी ऐसा लगता है जैसे इस्लामी दुनिया में औरत के खतना से बड़ी समस्या शायद है ही नहीं।

यूं इस्लामी समाज में ‘औरत फ़ोबिया’ नामक रोग ने जन्म लिया यानी महिला का डर इसलिए नहीं कि वो कोई मांसाहारी जानवर है जो अपने पास आने वाले किसी भी आदमी के चीथड़े उड़ा देगी, बल्कि इसलिए कि इस्लाम के मौलवियों की संरक्षण में उसके पास चेतावनियों की एक लम्बी श्रृंखला घूमती रहती है और ‘औरत की बुराई’ से बचने की प्रेरणा देता है। कोई उसे अशुद्ध जीव घोषित करता है इसलिए उसके पास जाने और उससे बात करने से मना करता है, उसके अस्तित्व, उसकी बुद्धि और समाज में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रद्द किया जाता है, इसका तार्किक परिणाम मुसलमान मर्दों में एक मनोवैज्ञानिक उन्माद की स्थिति में सामने आया और ‘सेक्स का उन्माद” और उससे वंचित होना- सिवाय विशिष्ट सामाजिक फ्रेम के- एक ऐसा रोग बन गया जिसका हर मुसलमान मर्द शिकार नज़र आता है, क्योंकि अगर मर्द व औरत मिल जाएं तो महिला सिवाय एक त्वरित यौन लक्ष्य के और कुछ हो ही नहीं सकती क्योंकि उनके बीच तीसरा शैतान आ जाता है।

इस तरह मुसलमान मर्द इतनी सारी लैंगिक रूप से वंचित होने के बाद भी महिला को देखता है तो उसके शर्मगाह के बारे में सोचता है, चाहे वो स्कूल हो, विश्वविद्यालय हो, फैक्ट्री हो, दफ्तर हो, खेत हो, ट्रेन या सड़क हो , मुसलमान मर्द को औरत में हमेशा एक शर्मगाह ही नज़र आती है और वो इससे ज़्यादा सोच ही नहीं सकता। वह उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सेक्स की खातिर औरत का पीछा करता रहता है, उसके जीवन का ज्यादातर हिस्सा इसी पीछा करने में गुज़र जाता है। सेक्स की इस महरूमी ने मुस्लिम पुरुषों में यौन प्रबलता को जन्म दिया, यही वजह है कि मुस्लिम देशों में बलात्कार और यौन उत्पीड़न की घटनाएं आकाश को छूती नज़र आती हैं। विभिन्न सर्वेक्षण भी यही बताते हैं कि इंटरनेट पर ज्यादातर मुसलमान हसीनाओं, यौन मामलों और लैंगिक रूप से वंचित जैसे विषयों को ही तलाशते नज़र देते हैं। इंटरनेट पर पोर्न की तलाश में पाकिस्तान शीर्ष देशों में शामिल है जबकि यौन उत्पीड़न में खाड़ी देशों और मिस्र का कोई मुकाबला नहीं। इस सारी नैतिक गिरावट का कारण सेक्स के मामलों पर धर्म का वर्चस्व है।

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