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हमारे पवित्र देश भारत की महिमा गाते हुए विष्णु पुराण कहता है,

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमि भागे,

स्वार्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषा सुरत्वात !

अर्थात्, “हम देवताओं में भी वो लोग धन्य हैं जो स्वर्ग और अपवर्ग के लिए साधनभूत भारत भूमि में उत्पन्न हुए हैं !”

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “यदि पृथिवी पर कोई ऐसी भूमि है, जिसे मंगलदायनी पुण्यभूमि कहा जा सकता है, जहाँ ईश्वर की ओर अग्रसर होने वाली प्रत्येक आत्मा को अपना अंतिम आश्रयस्थल प्राप्त करने के लिए जाना ही पड़ता है, तो वो भारत है !”

कहते हैं कि एक बार एक जर्मन इस भारत भूमि पर अपनी आध्यात्मिक पिपाषाओं को शांत करने आया था ! उसने इस देश के ऋषि-मुनियों के चरणों में बैठ कर लम्बे समय तक साधनाएं की पर ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पाया ! उसे यही लगा कि उसका शरीर और मन जो बर्षों-बरस तक पश्चिम के तमोगुणी संस्कारों में रहा और पला है इस कारण वह ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पा रहा है ! वह हरिद्वार गया पवित्र गंगा में जल समाधि ले ली ! अपने पीछे वो एक पत्र छोड़ कर गया, जिसमें उसने लिखा, – मैं स्वयं अपने शरीर का त्याग कर रहा हूँ! गंगा के पावन जल में अपने शरीर को अर्पित करने से उस मंगलमय की कृपा से मुझे भारत में पुनर्जन्म का सौभाग्य प्राप्त हो और उस नवीन निर्मल शरीर से मैं ईश्वर का साक्षात्कार करने योग्य हो जाऊं !

इस भूमि की पवित्रता हजरत आदम(अलैहे0) से लेकर तमाम बरगुजीदा पैगम्बर मानते थे ! हजरत आदम (अलैहे0) इसी देश की पवित्र भूमि पर अवतरित हुए थे और आख़िरी पैगंबर हजरत मुहमद मुस्तफ़ा (सल्ल0) इस वतन की तरफ इशारा कर फरमाते थे, “मुझे हिंदुस्तान से मारिफत की भीनी-2 खुशबू आती है।” (सुबहतुल मरजान फी तारीख-ए-हिंदुस्तान, भाग-1)

हजरत ईसा (अलैहे0) और हिन्दुस्तान

इस्लाम धर्म में पैगंबर परंपरा का बहुत महत्व है। पवित्र कुरान में हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के अलावा 24 और पैगंबर का जिक्र है। इन पैगंबर की सूची में हजरत ईसा मसीह (अलैहे0) का नाम सबसे प्रमुखता से आता है। कुरान में कम से कम 25 बार ईसा (अलैहे0) का उनके नाम से वर्णन आता है। एक मुसलमान के लिये यह अनिवार्य है कि वो हजरत ईसा मसीह (अलैहे0) के प्रति पूर्ण श्रद्धाभाव रखे। इसलिये हर मुसलमान हजरत ईसा (अलैहे0) का नाम सम्मानसूचक शब्द अलैहिस्सलाम के बिना लेना पसंद नहीं करता। ईसा मुसलमानों के लिये इसलिये भी श्रद्धा के पात्र है क्योंकि उन्होंने अपने ऊपर अवतरित किताब में हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के आगमन की शुभसूचनायें दी है। इस्लाम के इस बरगुजीदा पैगंबर (सल्ल0) का संबंध भी पवित्र भारतभूमि से रहा है। सैकड़ों अनुसंधानकर्ताओं ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि हजरत ईसा (अलैहे0) के जिंदगी के कई साल भारत में गुजरे थे। और यहां हिमालय की पवित्र कंदराओं में उन्होंनें साधनायें भी की थी ! हजरत ईसा (अलैहे0) का संबंध हिंदुस्तान से रहा होगा इसकी सबसे ठोस वजह यह है कि बाईबिल का उत्तर भाग नया नियम (जिससे हजरत ईसा (अलैहे0) के बारे में जानकारी मिलती है) उनके जिंदगी के 13 वें साल से तीसवें साल तक बीच के बिताये गये दिनों के बारे में पूर्णतया खामोश है। मत्ती रचित सुसमाचार ईसा (अलैहे0) के जन्म विवरण से शुरु होता है और उसके बाद सीधा उनके जीवन के तीसवें बर्ष पर पहुँच जाता है जब वो युहन्ना से दीक्षा ले रहे होतें हैं। इस बीच की अवधि में वो कहाँ रहे, क्या करते रहे इसकी कोई जानकारी बाईबिल से मालूम नहीं होती पर उक्त अवधि के जितने संकेत सूत्र मिलते हैं वो यही इंगित करता है कि हजरत ईसा (अलैहे0) ने अपने गुमनामी के दिन हिंदुस्तान और तिब्बत में बिताये थे और यहां के हिंदू और बौद्ध गुरुओं से तालीम हासिल की थी। विद्वानों की खोज इस बात की पुष्टि भी करती है कि सूलीकरण के बाद भी वो सुरक्षा की दृष्टि से अपनी माँ के साथ हिंदुस्तान आ गये थे और अफगानिस्तान के रास्ते हिंदस्तान आकर कश्मीर को अपना आश्रयगाह बनाया था जिसके बारे में पवित्र कुरआन भी इशारातन जिक्र करते हुये सूरह मोमिनून की 50 वीं आयत में कहता है, “और मरयम के बेटे तथा उसके माता को हमने एक निशानी बनाया तथा उन दोनों को एक ऊँची जगह पर रखा जहाँ ठहराव था और बहता हुआ जलस्तोत्र !

हजरत ईसा (अलैहे0) का जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका धरती के सबसे निचले स्थानों में शामिल है तो निःसंदेह यह इशारा कश्मीर या लद्दाख के बारे में था जो धरती के सबसे ऊंची जगहों में शुमार किये जातें हैं।

हजरत ईसा (अलैहे0) के हिंदुस्तान आगमन की बात सबसे पहले हिंदुओं के 18 पुराणों में एक भबिष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व के द्वितीय अध्याय के श्लोकों में मिलती है जहां उनका शक राजा के साथ उनकी मुलाकात का भी वर्णन है। भबिष्यपुराण की कथा के अनुसार राजा विक्रमादित्य के पश्चात् जब बाहरी आक्रमणकारी हिमालय के रास्ते भारत आकर यहां की आर्य संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे तब विक्रम के पौत्र शालिवाहन ने उनको दंडित किया। साथ ही रोम और कामरुप देशों के दुष्टों को पकड़कर सजा दिया तथा ऐसे दुष्टों को सिंधु के उस पार बस जाने का आदेश दिया। इसी क्रम में उनकी मुलाकात हिमालय पर्वत पर हजरत ईसा (अलैहे0) से होती है ! इसके श्लोकों में आता है,

मलेच्छदेश मसीहो हं समागत !! ईसा मसीह इति च मम नाम प्रतिष्ठितम्।

इस मुलाकात में हजरत ईसा (अलैहे0) ने शकराज को अपना परिचय तथा अपना और अपने धर्म का मंतव्य बताया था !

शोध कहतें हैं कि कश्मीर आने के बाद उनक पहला पड़ाव बना था पहलगाम* (जिसका अर्थ है गड़ेरियों का स्थान, जो बाहर से हिंदुस्तान आने वालों का पहला पड़ाव हुआ करता था इसलिये इसे खानाबदोंशों का गांव भी कहा जाता रहा है) जो श्रीनगर से 96 किलोमीटर कर दूरी पर अवस्थित है। ऊँचाई पर अवस्थित और ऊँचे-ऊँचे बर्फीले श्रृंखलाओं और पहाड़ों से धिरे इस स्थान को प्रकृति ने अपने हाथों से संवारा है। मान्यता ये भी है कि इसी स्थान पर हजरत ईसा ने अपने प्राण त्यागे थे। प्रख्खात दार्शनिक ओशो ने तो अपनी किताब गोल्डन चाइल्डहुड में ये लिखा है कि हजरत ईसा और मूसा दोनों ने ही यहां अपने प्राण त्यागे थे और दोनों की असली कब्र इसी स्थान पर है।

बाद में अहमदिया मत के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद कादियान ने इस बिषय पर विस्तृत शोध कर मसीह के हिंदुस्तान आने और यूज आसफ (शिफा देने वाला) नाम से उनके यहां रहने की पुख्ता दलीलें पेश की और कहा कि कश्मीर के श्रीनगर स्थित रौजाबल में मौजूद एक दरगाह हजरत ईसा (अलैहे0) की कब्र है। अपने तमाम शोधों को पुख्ता प्रमाणों के साथ उन्होंनें ‘मसीह हिंदुस्तान’ में नाम से लिखी अपनी किताब में लिपिबद्ध किया और इस बिषय को केंद्र में ला दिया । इसके बाद दुनिया भर में इस बिषय पर शोध और अनुसंधान शुरु हो गये। इन शोधकर्ताओं में अधिकांश ईसाई थे। सभी ने अपने शोध में मिर्जा गुलाम अहमद के दावों को तस्दीक की।

लोनली प्लैनेट नामक पत्रिका में इस मजार के बारे में छपने पर यह मजार चर्चा में आया। कश्मीरी विद्वानों ने तो यह भी दावा किया है कि 80 ईसा में कश्मीर के कुंडलवन में हुये चतुर्थ बौद्ध संगीति में ईसा ने भी हिस्सा लिया था। (श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार के खंडहर है, मान्यता है कि इसी स्थान पर हुये उक्त बौद्ध महासंगीति में हजरत ईसा ने भाग लिया था )

शोधकर्ताओं की लम्बी सूची-

ईसा (अलैहे0) के द्वारा भारत में रहने की दावों पर कई विद्वानों ने शोध की है, अपने जिन्दगी के बहुमूल्य साल इस शोध में खपायें हैं ! इनमें से कुछ उदाहरण है:-

Ø ईसा के भारत में रहने का प्रथम वर्णन 1894 में रुसी निकोलस लातोविच ने किया है। वो 40 बर्षों तक भारत और तिब्बत में भटकते रहे ! इस दौरान उन्होनें पाली भाषा सीखी और अपने शोध के आधार पर एक किताब लिखी जिसका नाम है “दी अननोन लाइफ ऑफ़ जीसस क्राइस्ट” जिसमें उन्होंने ये प्रमाणित किया कि हजरत ईसा ने अपने गुमनाम दिन लद्दाख और कश्मीर में बिताये थे। इतना ही नहीं अपने शोध में उन्होंने यह भी लिखा कि उन्होंनें उड़ीसा के जगन्नाथपुरी में जाकर भारतीय भाषायें सीखी और मनुस्मृति, वेद और उपनिषदों का अपनी भाषा में अनुवाद किया। लातोविच ने तिब्बत के मठों में ईसा से जुड़ी ताड़ पत्रों पर अंकित दुर्लभ पांडुलिपियों का दुभाषिये की मदद से अनुवाद किया जिसमें लिखा था, ‘सुदूर देश ईजरायल में ईसा मसीह नाम के दिव्य बच्चे का जन्म हुआ। 13-14 बर्ष की आयु में वो व्यापारियों के साथ हिंदुस्तान आ गया तथा सिंध प्रांत में रुककर बुद्ध की शिक्षाओं का अध्ययन किया ! फिर वो पंजाब की यात्रा पर निकल गया और वहां के जैन संतों के साथ समय व्यतीत किया। इसके बाद जगन्नाथपुरी पहुँचा जहां के पुरोहितों ने उसका भव्य स्वागत किया। वह वहां 6 बर्ष रहा । वहां रखकर उसने वेद और मनुस्मृति का अपने भाषा में अनुवाद किया तथा वहां के वंचित और पिछड़ों का प्रशिक्षण करना शुरु कर दिया जिसने वहां के पुरोहितों को आग-बबूला कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि ईसा का ऐसा करना उनक अधिकार और शक्ति के अतिक्रमण की कोशिश है। पुरोहितों के विरोध के बाद उसे यह जगह छोड़नी पड़ी और वहां से निकलकर वो राजगीर, बनारस समेत कई और तीर्थों का भ्रमण करते हुये नेपाल के हिमालय की तराई में चले गया और वहां जाकर बौद्धग्रंथों तथा तंत्रशास्त्र का अध्ययन किया फिर पर्शिया आदि कई मुल्कों की यात्रा करते हुये अपने वतन लौट गया।

Ø लातोविच के बाद रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अभेदानंद ने 1922 में लद्दाख के होमिज मिनिस्ट्री का भ्रमण किया और उन साक्ष्यों का अवलोकन किया जिससें हजरत ईसा के भारत आने का वर्णन मिलता है और इन शास्त्रों के अवलोकन के पश्चात् उन्होंने भी लातोविच की तरह ईसा के भारत आगमन की पुष्टि की और बाद में अपने इस खोज को बांग्ला भाषा में ‘तिब्बत ओ काश्मीर भ्रमण’ नाम से प्रकाशित करवाया।

Ø एक ईसाई विद्वान लुईस जेकोलियत भी ईसा के भारत आने की पुष्टि करते थे, 1869 में उन्होनें जीसस को श्रीकृष्ण का अवतार बताते हुये एक किताब भी लिखी।

Ø 1908 में लेवी एच0 डाव्लिंग ने भी अपने खोज में यही पाया कि जीजस के जीवन के वो भाग जिसका विवरण बाईबिल में नहीं है निःसंदेह भारत में बिताए गये थे।

Ø ईसा के गुमनाम जीवन पर अध्ययन करने वाले जर्मन धर्मशास्त्री राबर्ट क्लाईट के मुताबिक बाईबिल के न्यू टेस्टामेंट में ईसा के 13 वें बर्ष से 30 वें बर्ष के जीवन का कोई वर्णन नहीं मिलता इसका कारण ये है कि अपने जीवन की ये अवधि उन्होनें भारत में बिताए थे और इस दौरान यहां उन्होनें वेद, उपनिषदों और बौद्धधर्मशास्त्रों का अध्ययन किया था तथा फिर 30वें बर्ष में भारत लौट आये थे। वहां लौटकर उन्होनें उन्हीं शिक्षाओं का प्रचार किया जिसका उन्होंने भारत में अध्ययन किया था।

Ø प्रसिद्ध इतिहासकार शैक अल सईद अल सादिक ने अपनी किताब इमकालुद्दीन में उल्लेख किया है कि हजरत ईसा ने दो बार भारत की यात्रा की । उनके अनुसार ईसा ने पहली बार 12-13 बर्ष की आयु में और दूसरी बार सूलीकरण के पश्चात् भारत की यात्रा की थी। अपनी पहली भारत यात्रा के दौरान उन्होंनें यहां 16 बर्ष का समय गुजारा। यहां वो यूज-आसफ नाम से रहे तथा यहीं शरीर का त्याग किया। उन्होंनें अपने शोध में ईसा के भारत भ्रमण को विस्तार से लिखा है, वो लिखतें हैं, ईसा पर वेद और उपनिषदों की शिक्षा का गहरा प्रभाव पड़ा पर जब उन्होंनें हिंदुओं में प्रचलित जाति प्रथा पर चोट की तो यहां के ब्राह्मणों के साथ उनके मतभेद हो गये जिसके बाद वो नेपाल चले गये और वहां जाकर बौद्ध रीति में प्रचलित तंत्र साधनायें सीखी और वापस अपने वतन लौट गये। बाद में मैक्समूलर ने शैक अल सईद अल सादिक के इस ग्रंथ का जर्मन भाषा में अनुवाद किया।

Ø कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर फिदा हुसैन ने फिफ्थ गोस्पेल (पंचम सुसमाचार) नामक अपनी किताब में प्रमाणित किया है कि ईसा भारत आये थे और तिब्बत तथा कश्मीर में बौद्ध रीति से कठोर साधनायें की थी तथा यहां के तीर्थस्थलों का भी भ्रमण किया था। फिदा हुसैन ने ये भी लिखा है कि उस वक्त हिंदुस्तान पर राजा शालिवाहन का शासन था। इनके इस शोधपत्र में ईसा के कश्मीर में नाम बदलकर रहने तथा वहां उनके मकबरे के होने की भी पुष्टि की गई है।

Ø एक ईसाई पादरी एलिजाबेथ कलार ने भी अपने शोधपत्र में हजरत ईसा के हिंदुस्तान आगमन के तमाम दावों की पुष्टि की।

Ø पाश्चात्य विद्वान ब्रायन एल्बर्न ने तो अपने शोध के आधार पर ये तक दावा किया कि ईसा ने हिंदुस्तान आकर आयुर्वेद की शिक्षा भी ग्रहण की थी जिसका इस्तेमाल उन्होंनें अपने सूलीकरण के पश्चात् अपने जख्मों के उपचार हेतू किये थे। अपने दावों की पुष्टि हेतू एल्बर्न ने ईसा के समकालीन विद्वानों की पुस्तकों के हवाले भी प्रस्तुत किये।

Ø अमेरिकी ईसाई विद्वाव लेवी ने अपनी पुस्तक “द एक्वेरियन गास्पेल” में ये वर्णित किया है कि ईसा भारत आये थे और बनारस में भारतीय विद्वानों के साथ समय बिताया था। इस किताब के छठे और सातवें अध्याय में ईसा के भारत भ्रमण का विशद् वर्णन है जिसमें उनके हिमालय के कुमाऊँ क्षेत्र से लेकर तिब्बत और वाराणसी तक की उनकी यात्राओं का वर्णन है। लेवी ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि ल्हासा के बौद्ध मठों में ईसा ने वहां की दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियों का अध्ययन किया और फिर लाहौर और सिंध के रास्ते अपने वतन लौट गये।

Ø 1925 में निकोलस रोरिर ने भी निकोलस लातोविच के दावों की पुष्टि करने के लिये लद्दाख के होमिज मिनिस्ट्री (यह आश्रम लद्दाख के लेह मार्ग पर है, ईसा सिल्क रुट से भारत आये थे और यह आश्रम इसी मार्ग पर है) का भ्रमण किया और पाया कि लातोविच के दावे सत्य थे। अपने अनुभवों को उन्होनें ‘दी हार्ट ऑफ एशिया’ नामक किताब में कलमबद्ध किया।

Ø एक अन्य अमेरिकी विद्वान स्पेंसर ने भी ईसा के गुमनाम जीवन के बारे में यही माना है कि इस अवधि में वो भारत में रहे और साधनायें की। स्पेंसर ने ‘मिस्टीकल लाइफ ऑफ जीसस’ नामक किताब लिखी जिसमें जिसमें ईसा के भारत आने, यहां शिक्षा ग्रहण करने, आध्यात्मिक साधनायें सीखने तथा हिमालय की कंदराओं में साधनायें करने का वर्णन है।

Ø आधुनिक काल के कई विद्वानों में फिदा हसनैन और देहन लैबी ने अपनी किताब में अपने शोधों के आधार पर ईसा के भारत आगमन की पुष्टि की है !

Ø हिंदुओं के नाथ संप्रदाय के संन्यासी ईसा को अपना गुरुभाई मानते है क्योंकि उनकी ये मान्यता है कि ईसा जब भारत आये थे तो उन्होंनें महाचेतना नाथ से नाथ संप्रदाय में दीक्षा ली थी और जब उन्हें सूली पर से उतारा गया था तो उन्होंनें समाधिबल से खुद को इस तरह कर लिया था कि रोमन सैनिकों ने उन्हें मृत समझ लिया था। नाथ संप्रदाय वाले यह भी मानतें हैं कि कश्मीर के पहलगाम में ईसा ने समाधि ली।

Ø जर्मन विद्वान होल्गर कर्सटन ने जीसस लीव्ड इन इंडिया नामक किताब में यही बातें लिखी। यह किताब ईसाई जगत की बेस्ट सेलर किताबों में शामिल है और इसने ईसाई जगत में तहलका मचा था !

Ø परमहंस योगानंद ने अपनी किताब “दी सेकेंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट, रेजरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू” में ये दावा किया था कि प्रभु यीशु ने 13 बर्ष से 30 बर्ष की आयु के अपने गुमनामी के दिन हिंदुस्तान में बिताया था ,यहीं अध्यात्म तथा दर्शन की शिक्षा ग्रहण की था तथा योग का गहण अभ्यास किया था। उन्होंनें ये भी दावा किया कि यीशु के जन्म के पश्चात् सितारों की निशानदेही पर उनके दर्शन को बेथलहम पहुँचने वाले पूरब से आये तीन ज्योतिषी बौद्ध थे जो हिंदुस्तान से आये थे और उन्होंनें ने ही परमेश्वर के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द ईश्वर के नाम पर उनका नाम ईसा रखा था। (एक दूसरी मान्यता ये भी कहता है कि उनका ईसा नाम कश्मीर के बौद्ध गुंफो में रखा गया था) योगानंद जी के उक्त पुस्तक के शोधों को लांस एंजिल्स टाइम्स और द गार्जियन जैसे बड़े पत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित से किया था।

Ø सिंगापुर स्पाइस एसरजेट की एक पत्रिका में भी ईसा के सूलीकरण के बाद उनके कश्मीर आगमन को लेकर एक आलेख प्रकाशित किया गया था जिसपर ‘कैथोलिक सेकुलर फोरम’ नाम की संस्था ने कड़ा विरोध जताया था और भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में इसके विरोध में प्रदर्शन किये गये थे। इस अप्रत्याशित विरोध से धबराकर न सिर्फ इस पत्रिका की सभी 20 हजार प्रतियों को वापस लेना पड़ा था बल्कि इसके डायरेक्टर अजय सिंह को इसके लिये माफी भी मांगनी पड़ी थी।

Ø शाह वलीउल्लाह (रह0) ने अलफुरकान पत्रिका में अपने एक आलेख में लिखा था, मसीह अलै0 अवश्य ऐसे बुजुर्ग थे जिन्होंनें इस शिक्षा को गैर-ईजरायली लोगों में अन्य शब्दों में साबिईन में या आर्य जातियों में पहुँचाने की कोशिश की।

Ø गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार के शोधार्थियों ने भी हजरत ईसा के भारत भ्रमण संबंधी शोधों को “तिब्बति लामाओं के सानिध्य मे ईसा” नाम से प्रकाशित कराया और इसमें ईसा के भारत भ्रमण संबंधी निकोलस नेरोविच के खोजों का उल्लेख किया।

Ø “द सरपेंट ऑफ पाराडाइज” नाम से लिखी गई अपनी किताब में एक फ्रेंच लेखक ने ईसा के कश्मीर भ्रमण के बारे में काफी कुछ लिखा।

Ø “क्राइस्ट इन इस्लाम” के लेखक अजीज कुरैशी ने इजराइल के उन कबीलों का वर्णन किया है जो बुख्तनजर के जमाने में विस्थापित होकर हिंदुस्तान में आ गये थे। हजरत ईसा के बारे में उन्होंनें भी ये लिखा है कि कुछ व्यापारियों के साथ वो हिंदुस्तान आ गये थे।

ईसा के हिन्दुस्तान आने, यहाँ के हिन्दू और बौद्ध गुरुओं से तालीम हासिल करने और कश्मीर में यूज आसफ के नाम से उनके कब्र के मौजूद होने के दावों की पुष्टि के लिए जमात अहमदिया ये मांग करती आई है कि रौजाबल में मौजूद यूज़ आसफ के कब्र की जाँच करवा ली जाये ताकि इस भ्रम का निराकरण हो सके ! वहीँ दूसरी तरफ बाकी मुसलमान हैं, जिनकी मान्यता है कि ईसा को खुदा ने सदेह अपनी तरफ उठा लिया था, इसलिए हिन्दुस्तान में उनका कब्र होना नामुमकिन है ! ईसाईयों की दिक्कत और चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं ईसा का हिंदुस्तान के साथ ताल्लुक साबित हो गया तो चर्च के उनके विशाल साम्राज्य की नींव ढह जाएगी ! उनके लिए ये मानना अपमानजनक है कि जिस ईसा को वो खुदा का बेटा मानते हैं उसने हिन्दुस्तान में आकर तालीम हासिल की !

इन सबकी चिंताओं को परे रखते हुए अब तक के शोधों की माने तो साबित यही होता है कि हजरत ईसा ने अपनी तालीम, आश्रय और मोक्ष के लिए इसी पवन भूमि का चयन किया था जिसका नाम नबी करीम (सल्ल0) के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन (रजि0) की प्यासी जुबान पर आया था जब वो कर्बला के मैदान में ज़ालिम यजीद के सैनिकों से घिरे थे !

इस पवित्र भूमि के लिए हमारी मुहब्बत हमेशा बरक़रार रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना है !

* अपने आश्रयस्थली के रुप में पहलगाम को चुनने की वजह ये थी कि पहलगाम भी इस्त्रायल की तरह शांत वातावरण वाला था और बुख्तनजर के जमाने में विस्थापित हुई बनी-इस्त्रायली के 10 कबीलों में से कई कबीले पहलगाम के इस इलाके में आबाद थे जिसके बारे में हजरत ईसा ने फरमाया था कि मेरी और भी खोई हुई भेड़े हैं जिनके पास मुझे जाना जरुर है , क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोये हुये को ढ़ूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया है। (लूका, 19:10)

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