terrorismby — मनोज जोशी

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक समिति ने भारत को आश्वासन दिया है कि वह अपनी अगली बैठक में मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड जकीउर-रहमान लखवी का मुद्दा उठाएगी। इससे पहले, भारत की ओर से सुरक्षा परिषद की तालिबान अल-कायदा प्रतिबंध समिति को एक औपचारिक पत्र लिखा गया था। इसको संज्ञान में लेते हुए समिति के प्रमुख जिम मैक्ले ने चिंता जताई थी, कि पाकिस्तानी जेल से लश्कर ए तैयबा के कमांडर की रिहाई वैश्विक निकाय के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय राजदूत अशोक मुखर्जी के समिति के नाम लिखे पत्र से साफ संकेत मिलता है कि इस मामले में भारत के पास न तो पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय प्रक्रियाओं का, और न ही अमेरिका से इस्लामाबाद पर दबाव बनाने का अनुरोध्‍ा करने का विकल्प बचा था। अपने पत्र में मुखर्जी लिखते हैं कि लखवी न तो धन ले सकता है और न ही दे सकता है, क्योंकि सूचीबद्ध आतंकी होने की वजह से उसकी सारी संपत्ति और वित्तीय खाते जब्त होने चाहिए। इसलिए सूचीबद्ध आतंकी लखवी की रिहाई के लिए जमानत राशि दिया जाना भी प्रतिबंध लगाने वाली समिति के प्रावधानों का उल्लंघन है।

हालांकि लखवी को सजा दिलवाने में यह समिति खास मददगार नहीं होगी। यह लखवी की रिहाई पर सिर्फ निंदा प्रस्ताव ही पारित कर सकती है। पर इससे यह फायदा जरूर होगा कि मुद्दा लगातार ज्वलंत बना रहेगा। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र तभी असरकारी भूमिका निभा सकता है, जब सुरक्षा परिष्‍ाद मुद्दे को प्राथमिकता में लेते हुए पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए। मगर ऐसे कदम पर जब भी वोट देने की बारी आएगी, तो पाकिस्तान का मित्र चीन उस पर वीटो कर देगा।

यह नहीं भूलना चाहिए कि मुंबई हमले के बाद भारत ने जमात उद दावा और लश्कर ए तैय्यबा को आतंकी संगठन घोषित किए जाने का प्रस्ताव लाए जाने के लिए जमकर दबाव बनाया था। हालांकि उस प्रस्ताव के पारित होने के पहले चीन ने तीन बार उसमें अड़चन डालने की कोशिश की। बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र ने जमात उद दावा और लश्कर ए तैय्यबा को आतंकी संगठनों की सूची में शामिल करने के अलावा इसमें लश्कर ए तैय्यबा के प्रमुख के तौर पर हाफिज सईद व आपरेशंस कमांडर जकीउर-रहमान लखवी, संगठन की वित्त व्यवस्‍था देखने वाले हाजी मोहम्मद अशरफ और महमूद मोहम्मद अहमद बहाजिक के नाम का भी उल्लेख किया। बहाजिक सऊदी अरब का है, जो सऊदी में लश्कर ए तैय्यबा का प्रमुख होने के साथ ही वित्तीय मामलों की देखरेख करने वाला एक वरिष्ठ शख्स भी है।

चारों ओर से उठती नाराजगी के बाद पाकिस्तान ने दिसंबर, 2008 में लखवी को, जो हाफिज सईद का रिश्तेदार भी है, गिरफ्तार तो किया, मगर एक वर्ष बाद उसे मुंबई हमले में शामिल रहे अब्दुल वाजिद, मजहर इकबाल, हमद अमीन सादिक, शाहिद जमील रियाज, जमील अहमद और यूनिस अंजुम के साथ आरोपी ठहराया गया। 2009 से यह मामला अदालत में विचाराधीन था, मगर पिछले महीने नौ अप्रैल को लखवी को रिहा कर दिया गया। भारत, अमेरिका और बहुत से यूरोपीय देशों ने इसके लिए पाकिस्तान की भर्त्सना की।

पाकिस्तानी अधिकारियों ने उस वक्त कहा था कि अगर संयुक्त राष्ट्र जमात उद दावा को आतंकी संगठन करार दे, तो वे जमात के खिलाफ कार्रवाई जरूर करेंगे। मगर इसके उलट उन्होंने जमात उद दावा और उसके नेता हाफिज मुहम्मद सईद को पाकिस्तान में खुलेआम काम करने दिया और संगठन की सैन्य शाखा लश्कर ए तैय्यबा की गतिविधियों को भी अनदेखा किया। सूत्रों की मानें, तो जेल में रहते समय भी लखवी अपने कामों को संचालित कर रहा था।

आतंकवाद के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका वैसे भी कोई खास असरकारी नहीं रही है। 9/11 के बाद इसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसका पालन सभी देशों के लिए अनिवार्य था। उस प्रस्ताव में आतंकवाद से लड़ने के लिए सभी देशों से सूचनाएं साझा करने और अपने घरेलू कानूनों में संशोधन करते हुए आतंकवाद को गंभीर अपराध की श्रेणी में शामिल करने का आह्वान किया गया। इसके बाद जारी कुछ प्रस्तावों में आतंकवाद से लड़ाई के दौरान मानवाधिकारों को ध्यान रखने के अलावा आतंकवादी घटनाओं की परिभाषा का भी विस्तार किया गया।

पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद को लेकर कई और प्रस्ताव भी पारित हुए हैं, मगर इस मामले में संयुक्त अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की अब तक झलक नहीं मिल सकी है। सच तो यह है कि आतंकवाद के खतरों से निपटने में अब तक इस वैश्विक निकाय का महत्व प्रतीकात्मक ही रहा है। इसकी वजह यह है कि ‘आतंकवाद’ की सभी परिभाषाएं विभिन्न देश अलग-अलग तरह से लेते हैं। मसलन, कश्मीर में उपद्रव मचाने वाले आतंकियों को पाकिस्तान ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहता है। दिक्कत यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवाद की जो परिभाषा दी है, वह सभी देशों को एक अंतरराष्ट्रीय कानून की छतरी के तले लाने में अपर्याप्‍त साबित हुई है। यह तभी मुमकिन है, जब इस मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा एक अंतरराष्ट्रीय संधि को अनुमोदित करें।

1996 से भारत संयुक्त राष्ट्र के सामने कांप्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (सीसीआईटी) की जरूरत की गुहार लगाता आया है। इस वर्ष फरवरी में बीजिंग में संपन्न रूस-भारत-चीन की त्रिपक्षीय बैठक में भी रूस और चीन ने इस प्रस्ताव को समर्थन देने की बात कही थी। देखने वाली बात होगी कि क्या संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद से निपटने के लिए इस विचार को अमल में लाते हुए किसी असरकारी वैश्विक समझौते पर मोहर लगाता है?

Sources : http://newageislam.com/hindi-section/manoj-joshi/let-us-define-terrorism–तय-हो-आतंकवाद-की-परिभाषा/d/102848