piku

शूजित सरकार की ‘पीकू’ साल की शायद सबसे ख़ूबसूरत फिल्मों मे गिनी जाए. इसके किरदार, उनके जज्बात, इंसानी रिश्ते का अनोखापन आपका दिल जीत लेगा. आप बासु या ऋषि दा के ज़माने किस्म की हल्की फुल्की लाईट कामेडी मिस कर रहें तो पीकू देख आएं।

दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहने वाले एक बंगभाषी परिवार भास्कर बनर्जी उर्फ दादू (अमिताभ बच्चन) और उनकी बेटी पीकू (दीपिका पादुकोण) की यह थोड़ी अलग है । सत्तर के हो चुके बुजुर्ग भास्कर को कब्ज की शिकायत है। कब्ज दूर करने के लिए कितने उपाय कर चुके, लेकिन मर्ज है कि जाता ही नहीं था ।

अब बुजुर्ग पिता को एक बीमारी हो तो बेटी पीकू संभाल भी ले, लेकिन यहां तो बीमारियों का पूरा पिटारा,एक उम्रदराज आदमी को सेहत लेकर बहुत शिकायतें रहती हैं । हालांकि दादू की मेडिकल रिपोर्ट सामान्य आती है, लेकिन वो हमेशा इस डर में हैं कि उन्हें कुछ हो न जाए. शायद एक वृद्ध आदमी जीवन को लेकर बहुत अधिक चिंतित रहने लगता है ।

रिटायर्ड भास्कर दादू का का वक़्त को गुजरते देखें तो समझ समझ लेंगे कि उनका ज्यादा वक्त घर में ही गुजरता था.घर पे वो कुछ अजीबोगरीब टॉपिक पर बहस करने में बिजी हो जाते। बाहर में पास-पड़ोस में रहने वालों के साथ बेवजह की गप। उनकी जिंदगी में डॉक्टर दोस्त एवम सलाहकार श्रीवास्तव का भी अपना मूल्य था।

उम्र के इस पड़ाव पर आदमी चिडचिड़ा भी हो जाया करता है.कब्ज की शिकायत किसी बात को लेकर ज्यादा चिंता लेने से भी होती है.दूसरी वजह बेटी पीकू को लेकर कि वो नहीं होगी तो उनकी देखभाल करेगा कौन? पुरानी बातों में पुरखों के मकान को लेकर भी भास्कर थोड़े फिक्रमंद थे। उम्र का तकाजा था सो अलग। भास्कर दादू से मिलकर सभी बुजुर्गो का ख़याल आ जाता है, उनकी जिंदगी की तस्वीर को लेकर हम विचार करने लगेंगे। बुजुर्गो के रोज़मर्रा की जिंदगी पर पीकू एक सार्थक कोशिश है। बुढे परेशान की जिन्दगी को किसी फिल्म के बहाने अवगत कराने की,उस ओर ध्यान खीचने की अच्छी पहल।

तीस पार कर रही पीकू के रिश्ते की जहां-जहां बात चलती है, पिता …यह कहकर उसे रोक देते हैं कि पीकू शादी करके क्या करेगी! आत्म संशय से पीडित बुजुर्ग पिता पीकू की खुद की जिंदगी को नज़र अंदाज़ कर रहें। कह रहें कि शादी के लिए कोई वजह तो होनी चाहिए, जो पीकू पास नहीं है। हमेशा चिडचिड़ा करने वाले दादू एक दिन कोलकाता जाने की ठान लेते हैं और वो भी कार से। काफी ना-नुकुर के बाद पीकू को इस सफर के लिए राजी होना पड़ता है।

राणा चौधरी (इरफान) की टैक्सी लेकर दादू, पीकू और उनका सेवक बुधन कोलकाएता रवाना होते हैं। यह फ़िल्म का बहुत ही दिलचस्प हिस्सा बन के उभरा है।कब्ज की शिकायत से परेशान बुजुर्ग भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) अपने भावनात्मक उतार चढ़ाव से जूझता दिखता है। अपने घर के जुदा होने के गम में भास्कर दोबारा अपने घर जाना चाहते हैं, जहां उनका बचपन गुजरा था।

ऐसे में दिल्ली से कोलकाता सड़क मार्ग से जाने के दौरान उन्हें अलग मुश्किलों से दो चार होना पड़ता है। टैक्सी सर्विस का मालिक राणा चौधरी (इरफान खान) चिड़चिड़े बनर्जी की सनक से झुंझला उठता है, लेकिन विकल्प नहीं होने पर इन दोनों को खुद ही कोलकाता ले जाने का फैसला करता है। सफर के दौरान भास्कर दादू के मर्ज का भी इलाज करता है।

बेटी पीकू की दुनिया अपने पिता के आस-पास घूमती है क्योंकि पिता को ना सिर्फ़ क़ब्ज़ की शिकायत है बल्कि वो हमेशा सिर्फ इसी के बारे में बात करते हैं. सुबह का नाश्ता हो या फिर डिनर टेबल, बातचीत का विषय हमेशा पेट, क़ब्ज़ और मोशन ही था। रिटायर्ड भास्कर दादू का का वक़्त को गुजरते देखें तो समझ समझ लेंगे कि उनका ज्यादा वक्त घर में ही गुजरता था। घर पे वो कुछ अजीबोगरीब टॉपिक पर बहस करने में बिजी हो जाते। बाहर में पास-पड़ोस में रहने वालों के साथ बेवजह की गप.उनकी जिंदगी में डॉक्टर दोस्त एवम सलाहकार श्रीवास्तव का भी अपना मूल्य था।

शूजित की यह फिल्म आपको पसंद आएगी । आ भी रही, वजह है सहज हास्य, जो बिना किसी सतहीपन के लगभग हर सीन में दिखता है।हालात से बने हास्य में हमारी-आपकी रोजमर्रा की जिंदगी से प्रेरित है, बनावटीपन की गुंजाइश न के बराबर रखी गयी । एक बुजुर्ग की जिंदगी और उसे होने वाले कब्ज में किसी को क्या दिलचस्पी होगी! लेकिन फ़िल्म का कामयाब होना यह कह रहा कि बड़े-बुढ़े के मर्जों को लेकर हम फिक्र करते हैं। बुजुर्ग भास्कर के स्थान यदि कोई दूसरा रहा होता फिर भी कहानी मे हमारी रुचि वही होती।

पीकू यह भी देखा रही कि एक लड़की किस तरह अपने पिता की सेवा करती है। वह खुशी से जी रही है।क्या भास्कर दादू का बेटा वो कर सकता? पीकू को जीवन से कोई शिकायत नहीं और ऐसा भी नहीं कि आज की स्थिति को उसने नियति मान लिया है।

पीकू सरीखा फिल्मों को देखकर ऋषिकेश मुखर्जी का याद आना स्वभाविक होगा । ऋषि दा की फिल्मों की तरह ये फिल्म ऊपर से सरल है। लेकिन इसमें इंसानी रिश्तों में लिपटी हुई परतो को जूही चतुर्वेदी और शूजित सरकार ने बंगाली परिवार सेटअप एवं उसके मुखिया भास्कर बनर्जी संदर्भ में तलाश किया है।

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों इस तरह के रोल करने में उत्पल दत्त को महारत हासिल थी लेकिन अमिताभ बच्चन ने इसे अपना आयाम देने की कोशिश की है। बेशक आप उत्पल दा के कामेडी की तुलना उनसे नहीँ करे. बुजुर्ग भास्कर महिलाओं को लेकर एक अलग और बेहतर नज़रिया रखता है। लेकिन अखबार में पुराने टेलीग्राफ़ को ही पढता है।

फिल्म केवल एक बुजुर्ग को हुए कब्ज की कहानी भर नहीं। इससे उपजा हास्य- आनंद इस फिल्म का एक अहम पहलू रहा जो साथ आपके घर तक आ जाता है। हम जानते कि यह केवल भास्कर बनर्जी की कहानी होती, तो शायद महत्व नही देते..लेकिन यह किसी भी परेशान उम्रदराज इंसान की कहानी लगी इसलिए।

पेट की शिकायत जैसे निजी मसले किसी भी फिल्म का हिस्सा हों, ऐसा कम होता है। इस तरह की कामेडी अक्सर सतही की तरफ़ मुड़ जाया करती है। लेकिन पीकू में सस्ता हास्य नहीं।साइकिल पर कलकत्ता घूमते हुए भास्कर दादू का चेहरा ही देखें।एक गम्भीर कथन मे उस किस्म के आव-भाव मुम्किन नही हो पाते । अमिताभ ने भावों को मुख पर बेहतर ढंग से लाया है। वो हर सीन में बुजुर्ग भास्कर लगे हैं। क्या इसी विषय पर एक सिरियस मूवी बनाई जा सकती थी ?

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