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( माफ़ी चाहेंगे यहाँ बनिये शब्द से से हमारा आशय किसी धर्म जाती वर्ग विशेष से बिलकुल नहीं हे बल्कि एक साइकि से हे ये साइकि कही भी हो सकती हे किसी जाती विशेष में नहीं ) शायद ही किसी और खेल का विश्वकप इतना नीरस और बेरंग और बेमज़ा हुआ हो जितना इस बार का ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड में हुआ क्रिकेट वर्ल्ड कप इत्तफ़ाक़ देखिये की इसी ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड में पिछला वर्ल्ड ( 92 ) कप क्रिकेट इतिहास में सबसे अधिक रोमांचक और उत्तर चढ़ाव वाला हुआ था आखिर तक नहीं पता चल रहा था की कौन सी टीमें सेमीफाइनल फ़ाइनल खेलेगी और अंत में हुआ ये की जो पाकिस्तान की टीम सेमीफाइनल की दौड़ से बहुत पहले बाहर लग रही थी वो कई रोमांचक मैच खेलते हुए कूप ले गयी थी तब जीतने की सबसे बड़ी दावेदार ऑस्ट्रेलिया पहले दिन से ही संघर्ष करती दिखी और सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो गयी थी जबकि इस बार सबसे बड़ी दावेदार ऑस्ट्रेलिया ही बड़ी आसानी से वर्ल्ड कप जीत गयी देखा जाए तब उस वर्ल्ड कप के अधभुत रोमांच का राज़ था उसमे सिर्फ टेस्ट टीमों का खेलना वो भी राउंड रोबिन ( सभी टीमों के आपस में एक एक मैच ) उस वर्ल्ड कप में भारत की टीम बुरी तरह हारी थी हालांकि उसके भी मैच बेहद रोमांचक ही हुए थे गौर करे तो उसी वर्ल्ड कप के बाद से क्रिकेट पर भारत का वर्चस्व बढ़ता गया ये वर्चस्व अगर अच्छे खेल का और खेल को समझने प्यार करने वालो का होता तो कोई इतना हर्ज़ नहीं था मगर ये वर्चस्व भारत के बनियो का था जो पैसे के सिवा कुछ और नहीं पहचानते खेल और उसकी कला कलातमकता उसका रोमांच उसकी सवस्थ प्रतिस्पर्धा इनके लिए पेसो के सामने सब बेमानी हे और बिलकुल बेमतलब हे ईन्ही लोगो ने धीरे धीरे पैसे के लिए गेम की ही हत्या करनी शुरू कर दी और इसी की पराकाष्ठा इस बार के क्रिकेट वर्ल्ड कप में दिखी की पुरे कप में कोई रोमांच और रोमांचक मैचों का नामोनिशान तक ना दिखा ऐसा लग रहा था की खिलाड़ियों में वर्ल्ड कप को लेकर कोई जोश ही ना था सबसे पहले तो देखे की भारत के वर्चस्व बढ़ने पर क्या किया गया की ज़बदस्ती फ़ालतू टीमों को वर्ल्ड कप में खिलाया जाने लगा एक तरफ फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप होता हे जिसमे 2006 में सेमीफाइनल तक खेलने वाली तुर्की जैसी टीम अगले लगातार सभी वर्ल्ड कपो से नदारद रहती हे और इधर क्रिकेट वर्ल्ड कप में फालतू टीमों की भीड़ बढ़ाई जाती रही हे ये मक्कारी ये कह कर की जाती हे की इससे क्रिकेट की लोकप्रियता नए नए देशो में बढ़ेगी और गौर करे तो ये प्रयोग 1996 से चला आ रहा हे और इन 18 सालो में क्रिकेट की नए इलाको में लोकप्रियता में ज़रा भी इजाफा नहीं हुआ हे असल में क्रिकेट ऐसा खेल ही नहीं हे जिसे पूरी दुनिया में कोई खास लोकप्रियता मिल सके इसी कारण ये ओलम्पिक एशियाड आदि बड़े खेल मेलो में कभी नहीं रहा मगर ये जरूर हे की क्रिकेट में ताकत कम मगर इस खेल की अपनी ही एक अलग कलाकारी और सुंदरता थी भले ही टाइम बर्बाद हो मगर क्रिकेट की जैसी कलातमकता अप्रत्याशित परिणाम दुनिया के किसी और खेल में नहीं हो सकते हे मगर क्रिकेट की सुंदरता रोमांच और खूबसूरती से भारत के क्रिकेट साहूकारों ने अपनी पेसो की हवस मिटाने के लिए —– सा कर डाला हे . अब इस खेल में सांस रोक देने वाले पल नहीं आते हे आते हे तो सिर्फ बल्ले के नए नए रिकॉर्ड और कुछ नहीं .

बात करे बेमज़ा वर्ल्ड कप की तो इसमें फालतू टीमों को असल में इसलिए घुसाया गया ताकि भारत की टीम के 92 99 और 2007 की तरह बाहर होने का खतरा ना रहे क्योकि क्रिकेट अब भारत के धन और दर्शको से ही चलता हे मक्कारी की ये कलाकारी सफल भी रही और भारत की टीम इस बेहद बकवास और बेहूदा फॉर्मेट के साथ तीनो बार 92 99 और 2007 की तरह बाहर नहीं हुई बल्कि सेमीफाइनल तक पहुचने में सफल रही ( 1996- 2011 – 2015 ) मगर इस कारण क्रिकेट वर्ल्ड कप का रोमांच एकदम गायब सा हो गया हे क्योकि सभी जानते ही हे की की ग्रुप मैचों का तो लगभग कोई महत्व ही नहीं हे जब तीन चौथाई मैचों का कोई महत्व ही नहीं बचा तो कैसा रोमांच ? बात इतनी बड़ी की बहुत से लोग यहाँ तक अपुष्ट आरोप लगा रहे की पिछले वर्ल्ड कप में भारत की जीत और इस बार क्वाटरफाइनल में भारत की बांलादेश पर जीत ये भारत के क्रिकेट पर छाय आर्थिक वर्चस्व के कारण ही संभव हुआ हे !

भारत में क्रिकेट का दोहन करने वालो ने धीरे धीरे इस खेल पर पूरा वर्चस्व पाकर इस खेल की सारी कलातमकता को खत्म सा कर दिया हे क्रिकेट खेल कहलाता गेंद और बल्ले की कड़ी टक्कर का लेकिन जैसे जैसे इस खेल पर भारत के बनियो का वर्चस्व बढ़ा उन्होंने धीरे धीरे इस खेल को बल्ले बल्ले की टक्कर का खेल बना दिया इन पेसो के पीरो को गेंदबाज़ो का वर्चस्व बिलकुल पसंद नहीं हे क्योकि इससे मैच के जल्दी खत्म होने के आसार बनते हे और मैच जल्दी खत्म होने पर टीवी एड से आने वाली कमाई काम हो जाने का खतरा रहता हे इसलिए खासकर तेज गेंदबाज़ो को तो बधिया सा कर दिया गया अब शायद ही हमें कभी वासिम अकरम एम्ब्रोस वाल्श जैसा खूंखार और खूबसूरत बॉलिंग करने वाला खिलाडी देखने को मिले शायद कभी नहीं ऐसा जानबूझ कर इसलिए कर किया गया क्योकि इस खेल में लगभग सारा पैसा भारत के बाजार के दोहन से आना था इसके लिए ये जरुरी था की भारत कुछ बेहतर तो खेले ही साथ ही भारत में इस खेल के बड़े सारे हीरो पैदा हो अब क्योकि भारत में शुरू से ही फ़ास्ट बोलेरो का अभाव रहा हे हालात ये रहे की कहते हे की भारत के पहले टेस्ट में खेले निसार मोहम्मद ही भारत के एकमात्र शुद्ध तेज़ गेंदबाज हुए हे यहाँ पर तेज़ गेंदबाज़ो का अभाव सबसे अधिक हमारी सामाजिक संरचना के कारण भी रहा हे यहाँ क्योकि मेहनत करने वालो को खून पसीना बहाने वालो को छोटा समझा जाता हे !

और खड़े खड़े बल्ला घुमाने वालो को ऊँचाऊँची जात समझा जाता हे और क्रिकेट एक ऐसा खेल हे जिसमे ले देकर फ़ास्ट बोलर ही फुटबॉल हॉकी टेनिस आदि खेलो के खिलाड़िया की तरह से कड़ी मेहनत करता हे इसी कारण भारत में खूंखार फ़ास्ट बोलेरो की परंपरा नहीं रही हे जब फ़ास्ट बोलर नहीं हुए तो नतीजा ये हुआ की अभ्यास की कमी से भारत के बेट्समेन हमेशा ही एक तेज़ पिच पर एक शुद्ध तेज़ गेंदबाज को खेलने में कभी भी सहज नहीं रहे हे आज भी ऊपर से लेकर नीचे तक सुरक्षा उपकरण होने पर भी भारतीय टीम विदेशी तेज़ पिचों पर हमेशा सरेंडर सा कर देती हे तब जब नब्बे के दशक में क्रिकेट पर भारत का प्रभाव बढ़ता गया तो ऐसा अंदाज़ा होता हे की तभी सोच समझ कर योजना बनाकर अपने फायदे के लिए धीरे धीरे इस खेल को बल्लेबाज़ों का खेल बना दिया गया जिस खेल में कभी सेंचुरी लगना तीनसो रन बनना बहुत ही बड़ी बात होती था वही भारत यानी बी सी सी आई के वर्चस्व बढ़ने के बाद के बाद इस खेल में चारो तरफ रनों के पहाड़ बनने लगे और जैसा की योजना थी ही की सब से ऊँचे पहाड़ खड़े किये भारत के बल्लेबाज़ों ने जिन्हे फायदा पहुचने वाले बहुत से काम किये गए पिचों को हमेशा ढका गया उस पर घास को जिन्दा नहीं छोड़ा गया कही बाउंसरों को बिलकुल बेन सा किया गया तो कही बल्ले में परिवर्तन किये गए कही ऊपर से नीचे तक बल्लेबाज़ों को सुरक्षित करने वाले उपकरण दे दिए गए यहाँ तक शायद ये भी किया गया की मैदान तक छोटे कर दिए गए ताकि खूब रन बने खूब चोक छक्के लगे जिन पर भारत के दर्शक अफ़ीमचियो की तरह झूमे लेकिन इसका नुकसान ये हुआ की कलाई से दिखाई जाने वाले सुन्दर बेटिंग खूबसूरत शॉट ( अज़हर विश्वनाथ ) बिलकुल खत्म हो गए उनकी जगह भरी बल्ले के आसानी से लगने वाले चोको छक्कों ने ले ली और रोज ही बल्लेबाज़ी के नए रिकॉर्ड बनने लगे ये सब हुआ होगा वर्ना कोई कारण नहीं हे की अब इस खेल में भागकर तीन रन लेना बहुत ही कम दिखाई देता हे सभी देशो में फ्लेट पिचे बनने लगी हे टेस्ट मैच में तो थोड़ा बहुत गेंदबाज़ो को माहोल मिला मगर वनडे और टी 20 में तो गेंदबाज़ो को विकेट के लिए सिर्फ किस्मत के भरोसे छोड़ दिया गया इससे ही ये हुआ की भारत के बल्लेबाज़ बेशनल हीरो बनकर रनों के पहाड़ बनाने लगे और भारतीय टीम का खेल और जीत का रेशो पहले से बेहतर हुआ लेकिन ये भी सच हे की देश की जनता की जेब से क्रिकेट के नाम पर अरबो रुपया खिलाड़ियों और बोर्ड की झोली में तो गया मगर तब भी ना तो भारत की टीम को विदेशो में कोई खास कामयाबी मिली और ना ऑस्ट्रेलिया की तरह कपो का कोई अम्बार लग पाया इस तरह से क्रिकेट की हत्या कर दी गयी हे और ऐसा नहीं था की भारत के पुराने खिलाडी खेल की खूबसूरती के साथ होने वाले इस ——- के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते थे मगर ये सब चुप रहे कारण जैसा की कुछ समय पहले खबर आई थी की ये पुराने खिलाडी बोर्ड के साथ अनुबंध करते हे जिसके तहत ये भी जम कर पैसा पीटते हे और इन्ही अनुबंधों में ये भी शर्त होती हे की ये लोग बोर्ड की नीतियों के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलेंगे ना लिखेंगे.

भारत के बनियो के लगातार बढ़ते वर्चस्व से दुनिया के बाकी क्रिकेट खेलने वाले देश भी दुखी और अपमानित फील करते हे मगर सब चुप ही रहने में भलाई समझते हे वजह वही हे की इस खेल में अब पैसा कमाने के सभी रास्ते भी बी सी सी आई के थ्रू ही जाते हे पाकिस्तान जैसा क्रिकेट का समृद्ध देश का बोर्ड भारत के साथ ना खेलने के कारण बेहद पिछड़ और दिवालिया सा हो गया इसकी खिलाडी आई पी एल में पैसा न कमा पाने की कुंठा में आसानी से सट्टेबाज़ों की भेंट चढ़ने लगे पाकिस्तान का ये हाल देख कर बाकी बोर्ड खुद ही सबक लेते हे और जैसा की हमने देखा की किस तरह से खुलेआम बांग्लादेशी आई सी सी चीफ को अपमानित किया गया और किसी ने उनके लिए आवाज़ नहीं उठाई बेहतर यही होगा की हम भारतीय ही बी सी सी आई की बदमिजाजी के खिलाफ आवाज़ उठाय