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धिकतम सम्पत्ती धारण करने का अधिकार इस देश के लोगों को हैवान बना दिया , अब ये हैवान सुरक्षाकवच में लपटे हुए देश का खून चुष रहा हैं । बड़े पूंजीपतियों के नेतृत्व वाली इस सरकार ने, गरीबों, मेहनतकशों और किसानो के खिलाफ अपना हमला जारी रखते हुए, भूमि-अधिग्रहण कानून में ऐसे बदलावों को योजनाबद्ध किया है, जिससे किसानों की जमीनों को जबरन जब्त करना बहुत आसान हो गया है . इससे पहले कांग्रेस और सपा, राजद, जदयू, जैसी तमाम पूंजीवादी पार्टियां भी यही सब करती रही हैं. पश्चिम बंगाल में स्तालिनवादियों ने भी सिंगूर और नंदीग्राम में इसी तरह निहत्थे किसानों पर दमनचक्र चलाया था.।

रोजगार विहीन विनाश बनाम विकास की पोल आंकड़ों के खेल में उलझता नजर आ रहा हैं ,जीडीपी बढ़ रहा हैं लेकिन रोजगार बुरीतरह प्रभावित हो रहा हैं लेकिन मुट्ठी भर लोगों को अरबपति बनते देखा जा सकता हैं -। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि विकासदर 7 .4 हो सकता हैं !

हमने तो विकास दर 10 से ऊपर देख चूका हैं ,साधारण जनता को इस दर से डर लगता हैं यह एक विकार और विनाश दर हैं !, हरे, नीले, भगवा, लाल झंडों और झूठे नारों के पीछे छिपी ये पार्टियां, नेता और सरकारें, पूंजीपतियों के हित में काम करती हैं। और गरीब, मेहनतकश किसान और जनता को रौंदती हैं.। सत्ता इनके हाथ में रहते, ये गरीब जनता का सब कुछ हड़पकर अमीरों और सेठों की तिजोरी में बंद कर देना चाहती हैं.दिल्ली के मैदान में ऐसा क्या हो गया जिससे किसानों को कोई फायदा हुआ हो ? …केवल भाषण ही पिलाया गया –मोदी और राहुल भाषण ! मुझे तो उबकाई आती हैं……जब कोई राष्ट्रीय नेता भाषण देता हैं तो भाषण की तह में जा कर तथ्यों पर विचार किया जाता हैं ,न कि रटे हुए बातो पर |

भाषण की व्यवहारिक पहलुओं और भूतकाल की चरित्र पर भी जनता को बताना मीडियां का काम हैं .। .लेकिन आज कल अपवाद छोड़ सभी मीडियां चारण और भांट ही नजर आते हैं *।

इतिहास पर नज़र डालें तो ईस्ट इंडिया कम्पनी की ताकात हमने पढ़ा हैं ,। उस जमाने के बहुत बुजुर्ग आज भी साक्षी हैं ,व्यापार के बहाने देश में आकर हमें गुलाम बना लिया ,हम विरोध भर करते रहे लेकिन गुलामी नहीं रोक सके ! आज कार्पोरेट टेक्स में एक साथ 5% की छुट वह भी 4 वर्ष के लिए ! क्या सब यूँ ही हो गया ,क्या कोई लिंक हैं यह जानने के लिए कि देश में जितने कार्पोरेट हैं ……यदि एक कार्पोरेट को औसत 1000 करोड़ में 5 % छूट दिया जाय तो 50 करोड़ होता हैं देश में 10 हजार कार्पोरेट तो होगा ही मेरे पास आंकड़े उपलब्ध नहीं ,कौशिस जारी हैं कि सही आंकड़े मिल जाय ,इस उदहारण में यह 50 हजार करोड़ होता हैं ,4 से गुना कर दे तो ! 2 लाख करोड़ इसे में महाघपला ही कहूँगा *ये किसका पैसा है ??

वर्तमान भारत में ठीक इसी तर्ज पर देश के व्यापारी /कार्पोरेट मिलकर राज सत्ता को पर्दे के पीछे अपने हाथ में ले चूका और उसी के नौकर को गद्दी पर बैठा कर हाथ पैर बाँध दिया है । हम जिसे आज देश के भाग्य विधाता समझते हैं वह रंगे हुए सियार ही तो हैं ,यह समझने में शायद लोग आज भी भूल कर रहे हैं !
जब तक सत्ता पूंजी-परस्त नेताओं और पार्टियों के हाथ में रहेगी, वे इसी तरह गरीब जनता को हड़पते, कुचलते रहेंगे. पुलिस, फ़ौज, कानून, अदालतों की ताकत से लैस इन पूंजीपतियों का निहत्थे मज़दूर-किसान मुकाबला नहीं कर सकते.।

इसलिए सबसे पहले पूंजीपतियों, इनके नेताओं और पार्टियों के कब्जे से सत्ता को छुड़ाना होगा. पूंजीपतियों की सरकार की जगह, ‘मजदूर-किसान सरकार’ बनानी होगा . यह सरकार, गरीबों-मेहनतकशों को लूटने वाले पूंजीपतियों का सब कुछ जब्त कर लेगी.। और अमीरी रेखा तय करनी होगी ।

इसी को भाँप कर पुरे विश्व में धर्म का आविष्कार मानव के हाथों मानव के शोषण के लिए हुआ ।

मनु महाराज ने मनु स्मृति के रचना की तो उस में सभी मूलनिवासियों को शुद्र कहा गया और सभी मूलनिवासियों को 6743 जातियों में बांटा गया ताकि कभी भी मूलनिवासी या शुद्र बमनुवादियों के खिलाफ सर ना उठा सके। उस समय देश में बौद्ध धर्म का बोल बाला था और बहुत से लोग जातिवाद या मनुवाद को नहीं मानते थे। मूलनिवासी समता के साथ जीना सिख रहे थे। जो लोग समता और समानता और न्याय के साथ जी रहे थे उन्ही को शुद्र और अछूत कहा गया।
आज की दुनिया का विकास अगर शहरों की चकाचौंध को देखने के बाद आदिवासियों और किसानो की ज़िंदगी मे झाँके और समझें तो यह स्पस्ट है की हमारा शहर भी कभी वही था । अर्थार्त लोग खानाबदोश थे। शिकार के लिए इधर से उधर भटकते थे तब उन्हें किसी इश्वर अथवा धर्म की आवश्यकता नहीं पड़ी क्यूंकि भोजन और सुरक्षा का निश्चित समाधान नहीं था , पूरा पूरा दिन शिकार खोजने में लगता था और रात अपनी और कबीले की सुरक्षा करने में ! बहुत कठिन समय था वह !
करीब दस हजार साल पहले मानव ने खेती और पशुपालन के तरीके खोजे जिससे एक स्थान पर लम्बे समय तक रहने की संस्कृति जन्मी ,इससे लोगो के समूह बने समूह से समाज बने ! सामाजिक मनुष्य का जीवन खानाबदोश मनुष्य के जीवन से कही सरल था क्यूंकि फसल काट लेने के बाद उसके पास साल भर के भोजन सम्बन्धी समस्याओ का समाधान था और आपातकालीन समय के लिए उसके पास पशुधन तो थे ही ,समाजिकता में सुरक्षा भी थी ,इस तरह उसकी दोनों समस्याये सरल हो गई अब उसके पास अपार समय था जिसका उपयोग उसने संस्कृतियों परम्पराओं रीती रिवाजों और मान्यताओं के सृजन में किया !
मान्यताओं,परंपराओ और रीती-रिवाजो ने कालांतर में धर्म का रूप ले लिया , अलग अलग इलाकों और कबीलों के पृस्थिभूमि के अनुसार संस्कृतियों में धर्म के अलग अलग स्वरुप विकसित हुए ,और शने शने धर्म मनुष्य की आवश्यकता बनने लगा क्यूंकि वह प्रकृति से अनजान था प्राकृतिक शक्तियों के विनाशकारी प्रकोप से वह डरता था , उसकी इसी अज्ञानता का लाभ कुछ चतुर मनुष्यों ने उठाना शुरू किया और उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं ,जीवन मृत्यु बीमारी के प्रति सहज जिज्ञासाओं को इश्वर से जोड़ दिया और एक महत्वपूर्ण बात यह की जब कबीले के सरदार और शक्तिशाली हुवे तो राज गद्दी का सुख भोगने का स्वार्थी लालच । इसे स्थायी स्वरूप देने की कुतसिक मानसिकता का पनपना । इस तरह ईश्वरवादी धार्मिक व्यवसाय का जन्म हुआ !

मानव जैसे जैसे उन्नत करता गया उसकी आवश्यकताएं बढती गई , खानाबदोश जीवन में उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता था परन्तु सामाजिक मनुष्य के पास खोने को बहुत कुछ था , धन संपत्ति मान सम्मान ऐश्वर्य उपाधि भूमि पशुधन इत्यादि ! किसी भी कीमत पर वह इन्हें सहेजना चाहता था क्यूंकि इन तत्वों की अधिकता उसे सामाजिक व्यवस्था के शिखर तक ले जा सकती थी , मनुष्य के इसी स्वाभाविक डर और लालच ने धार्मिक व्यवसाय को गति और व्यापकता प्रदान की !और पूंजीवाद का घिररित चेहरा आज आतंकवाद की पराकाष्ठा ग्लोबल वेल्थ डाटा बैंक की ताजा रिपोर्ट 2014 से कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने आये हैं कि उदारीकरण के बाद भारत में जो अमिरी आई हैं उसके चलते मात्र 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 74 प्रतिशत भाग समेट चूका है और बाकी 90 प्रतिशत लोगों के पास कुल संपत्ति का 0.2 प्रतिशत !

इसका अर्थ यह हुआ कि 0.8 प्रतिशत बढ़ने पर 90 प्रतिशत आबादी के पास 1 प्रतिशत संपत्ति आ सकती हैं ! सन 2000 में 10 प्रतिशत अमीरों के पास कुल संपत्ति का 65.90 प्रतिशत था ,तात्पर्य यह हैं कि 14 वर्षों में अमीरों की संपत्ति 8 प्रतिशत वृद्धि हुई वही देश के 90 प्रतिशत लोगों की संपत्ति लगातार घट रही है | विकास की ऐसी विनाशकारी पहल देश को किस दिशा की और ले जा रही हैं इसकी कल्पना मात्र से हम विचलित हुए बिना नहीं रह सकते ।

स्पेशल इकोनॉमिक जोन जिसे सेज के नाम से जाना जाता हैं ,इस जोन में भारत सरकार की कोई भी कानून लागू नहीं हो सकती , हमने इसे देश के भीतर एक देश कहा हैं ,अभी सेज पर कैग -नियंत्रक व महालेखा परीक्षक द्वारा संसद पटल पर रिपोर्ट रखा गया , जिसमें कहा गया हैं कि 2007 -2013 के बीच सेज के नाम पर देश के औधोगिक घराने सरकार से 83 हजार 104 करोड़ रुपये की सुविधाएँ ले ली इसके बदले काम न के बराबर हुआ !

कार्पोरेट घराने का दावा था कि सेज में माध्यम से लगभग 40 लाख रोजगार सृजित होगी लेकिन हकीकत यह हैं कि मात्र 2 लाख 84 हजार 785 ही नई नौकरी आ पाई हैं जो 8 प्रतिशत के बराबर हैं !यानि कि गुलामी निरंतर बढ़ती रही । गुलामी को खत्म करने के लिए अमेरिका में अब्राहम लिंकन के समय जो गृहयुद्ध हुआ, उसमें श्वेत लोगों ने ही गुलामवादियों को परास्त किया. जो हजारों लोग गुलामी के खिलाफ संघर्ष में शहीद हुए, और वे गोरे ही थे.।

आज से लगभग 50 साल पहले, 28 अगस्त 1963 को, मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने जब वाशिंगटन मार्च निकाला तो उसमें श्वेत भागीदारी, अश्वेतों से कम नहीं थी. ओबामा वहां 14% अश्वेत लोगों के वोट से प्रेसिडेंट नहीं बने हैं.। श्वेत वोट के बिना उनका चुना जाना मुमकिन ही नहीं था.। आज भी वहां नस्लवाद के निशान बाकी हैं, लेकिन अभी जिस अश्वेत बालक की पुलिस फायरिंग में मौत के खिलाफ अमेरिका आंदोलित है, उस आंदोलन में श्वेत लोग भी शामिल हैं.।

क्या भारत में जातिवाद की ऊपरी सीढ़ी पर मौजूद रहे लोग इतने उदार हो सकते हैं?किसानों से जमीन न छिनी जाय ,जो भी बंजर भूमि उपलब्ध हैं उसमें भी पर्यावरण और जनहित को ध्यान में रखकर कोई उद्योग लगे ,हम हमेशा विशालकाय उद्योग का विरोध किया हैं और बड़े उद्योग का खतरनाक नतीजा भी सबके सामने हैं |जमीन का मालिक आज एक झोपड़ी में बदहाली जीवन जीने को मजबूर हैं !

किसान को एक मुस्त मुआवजा मिलने से हम सोचते हैं वह खुश हो जायगा लेकिन अचानक एक मुस्त रकम उसके परिवार में दुःख का पहाड़ लेकर आता हैं ..कम बेशी सभी किसानों का यही स्थिती हैं |

हम भूअधिग्रहण कानून का विरोध केवल दिखावे के लिए नहीं करते ,जमीन किसानों के लिए आजीविका का साधन हैं ,जमीन छीन जाने पर ये बिन जल मछली की तरह तड़पते हुए जान दे देते हैं लेकिन कुछ लोगों को तड़पते हुए किसानों को मछली की तरह खाने में मजा आता हैं !

देश के किसी भी हिस्से में किसानों से जमीन छिनकर या अधिक मुआवजा की लालच देकर उद्योगपतियों को देने की मानसिकता से सरकार को बाहर आना चाहिए,

खेती -किसानी से बढ़कर कोई उद्योग आज तक दुनियां में पैदा नहीं हुआ हैं ..कृषि को लाभदायक बनाकर भी दुनियां में विकसित देश बना जा सकता हैं |