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Shadab Saharai

चाहे कोइ फ़र्द हो या मुआशिरा वह जहां जनम लेता है वहां की आबो हवा , मिट्टी और तहज़ीब व सकाफ़त से मुताअसिर होना उसका फ़ितरी अमल है वह चाहे तो भी इन अवामिल से गुरेज़ उसके लिये नामुमकिन है ! साथ ही इन अवामिल के ज़ेर असर उसकी नफ़सियात या मान्सिक्ता में भी तबदीली का अमल नमू पाता है जो वहां के मखसूस हालात से मुकाबिल होने में कामयाब हो सके ! बाद में यही बातें और खुसूसियात उस मखसूस महौल में उसकी ज़िंदगी का तहफ़्फ़ुज़ और बका का ज़ामिन भी बनती हैं ! भारत का मुस्लिम मुआशिरा को भी फ़ितरत के इस नज़ाम से मुकाबिल होकर अपने आप में कयी सारी तबदीलियों से गुज़र कर अपने देश की आबो हवा नीज़ सकाफ़त ,ज़ुबान और तहज़ीब से हमाअहंग होना पडा ! ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही नही बल्कि हर जगह हुआ यही वजह है कि अकायद , मज़हब और मसलक एक होने के बावजूद भी जहां मुस्लिमों का नाम इस्माइल या सुलैमान होना चाहिये वह रसिया में उसकी ज़ुबान का असर कबूल करते हुये इस्माइलोफ़ तो सुलैमानोफ़ बन कर उभरा साथ ही इन्डोनेशिया में उन्ही मुस्लिमों का नाम शीशवान्टो भारत या इरान में रुस्तम जैसा भी पाया गया या जाता है ! जो किसी भी तरह मुस्लिम नाम नही हैं बल्कि तह्ज़ीब ज़ुबान और आबो हवा के तहत रखे गये नाम हैं इस से किसी को भी इनकार नही हो सकता ! ये एक छोटी सी मिसाल थी की बात को समझने में आसानी हो !
भारत में मुस्लिमों की आमद और सकूनत उसके बाद ब्रहमणों व उंची ज़ाति के ज़ुलम ,सितम और प्रताडना से यहां की एक बडी आबादी का इस्लाम में दाखिल होना जिनकी पहले से ही अपनी तह्ज़ीब सकाफ़त और ज़ुबान और ब्रहमणो के ज़रिये बनाइ गयी जाति भी अलग थी का इस्लाम कबूल करने के बाद मुस्लिम मुआशिरे में उनका दाखिल होना भी एक नये मुस्लिम समाज का अस्तित्व मे आने का कारन बनी और कुछ हद (सीमा) तक ज़िंदगी के हर शोबे (परिवेष) में तबदीली आयी ! जिसमे जहां भारतिय रस्मों रिवाज का दखल था ! वहीं मुस्लिमों के ज़रिये आयी हुयी बाहरी ज़ुबानों जैसे , अरबी .फ़ारसी तुरकी के साथ भारतिय भाषायें प्राक्रित , संस्किर्त ,सिंधी ,पंजाबी, मराठी , भोजपूरी जैसी भाषाओं के आपसी मेल ने एक नयी भाषा का जनम दिया जो उर्दू के नाम से मशहूर हुइ ! जिसने १८५७ से लेकर १९४७ तक की जंग ए आज़ादी में अपनी भूमिका बहुत प्रभावी और सुन्दर अन्दाज़ से निभाइ ये और बात है कि आज उसे मुल्क दुश्मन अनासिर बाहर आयी हुयी और मुस्लिमों की ज़ुबान कहकर उसे निस्तो नाबूद करने के फ़िराक में है मगर उनकी ये कोशिश कभी भी कामयाब नही होसकती क्यों कि आज एक मुस्लिम मुलक पाकिस्तान ने उसे अपनी सरकारी ज़ुबान बनाकर उसकी दायेमी बका (सदा की सुरक्छा) के लिये अपना मुहर लगा दिया है , और आज माहिरीन ए लिसानियात के मुताबिक (भाषाविदों के अनुसार) उसकी ( उर्दू की) साहित्य या लिटरेचर से हमारे अपने देश भारत की सरकारी भाषा हिंदी , का साहित्य सौ साल पीछे है !

भारतिय मुस्लिम मुआशिरे या सामज में तबदीलियां आयीं ज़रूर लेकिन सबल ,अडिग और बदलते हुये हालात व वाकियात नीज़ ज़माने के नये तकाज़ों को पूरा करने में हर प्रकार से सक्छम इस्लाम के स्वर्णिम असूलों व सिद्दंतों से उन तबदीलियों का टकराव कभी भी नही हुआ और यदि कभी हुआ भी तो वो इस्लामी असूलों के सामने रेत की दीवार साबित हुयीं ! यही कारन है कि मुस्लिम समाज में कभी भी जात पात की इस्लामी उसूलों के नज़दीक कोइ अहमियत नही रही ! पैगमबर ए इसलाम मुहम्मद (सलअम) की ये हदीस हमेशा ही जात पात के नज़ाम का बखिया उधेडती रही कि ” तुम में सबसे अफ़ज़ल अर्थात उंचा या बडा वो है जो सबसे ज़्यादा मुत्तकी अर्थात अल्लाह से डरने वाला है ” ………उन्ही की दूसरी हदीस ए मुबारका है कि ” हर मुसलमान आपस में भाइ भाइ है ” इन इस्लमी उसूलों और पैगमबर ए इसलाम मुहम्मद (सलअम) की खुले लफ़्ज़ों तमबीह (सावधान) करती हुइ हदीसों ने मुस्लिम मुआशिरे को हमेशा ही ज़ात पात की लानत से मह्फ़ूज़ रखा ! हां १२८५ में जनम लेने वाला मशहूर इतिहासकार , मुफ़्ती , सियासी माहिर और अपने आप मे एक महान लेखक ज़ियाउद्दीन बरनी ने देहली सलततनत का अज़ीम (महान) फ़रमारवा (शासक) शहंशाह मुहम्मद तुगलक के ज़माने में मुस्लिम समाज या मुआशिरे को, शरयी हदूद (इस्लामी सिद्धंतों की सीमा) का पास व लिहाज़ रखते हुये मुस्लिमों को उनकी आमदनी , दौलत और उनकी भलाइ के लिये तीन भागों में बांटने की बात ज़रूर की थी जिसको उसने ’फ़तवा ए जहांदारी’ का नाम दिया था ! उसने मुस्लिम समाज को तीन तबकों (श्रेणी) में बांटा था !

१ – अशराफ़ – इसमें वो लोग थे जो प्रशासनिक अधिकारी थे या सबसे ज़्यादा अमादनी वाले और दौलतमंद थे !
२ – अजलाफ़ – ये अशराफ़ से कम दौलत मंद और अमदनी वाले लोग थे !
३ – अज़राल – ये सबसे कम दौलत व आमदनी वाले लोग थे जिस्में वो हिन्दू लोग भी शामिल थे जो ब्रहमनों की प्रताडना से अपना सब कुछ गंवाकर खुशी खुशी इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर बाध्य हुये थे !
इस फ़तवे का उद्देश्य था सरकारी खज़ाने के लिये किस से कितना टैक्स लिया जाये या किस के लिये किस तरीके से भलाइ का काम किया जाये ! इसका इस्लामी जीवन पद्धति से कहीं भी कोइ भी संबंध या टकराव नही था यह केवल हुकूमत के कामों में आसानी के लिये ही बनाया गया था इसी लिये इसका नाम भी फ़तवा ए जहांदारी ( हुकूमत करने के लिये फ़तवा ) रखा गया !

कुछ लोगों का ज़ियाउद्दीन बरनी के ज़रिये चुने गये लफ़ज़ों जैसे अशराफ़ .अजलाफ़ या अर्ज़ल पर एतेराज़ वाजिब है मैं खुद उस के इन लफ़्ज़ों का शाकी हूं, उसके इसी कमी के वजह से ही, वह जिस पाये का आलिम था उसके मुताबिक मुस्लिम मुआशिरे ने कभी उसको इज़्ज़त और एह्तेराम नही दिया बल्कि बहुत कम ही लोग उसके नाम से भी वाकिफ़ हैं और जो जानते है उसकी इज़्ज़त नही करते ! बाद में होने वाले मुस्लिम बादशाहों ने उसके फ़तवा जहादारी को दरे खोरे एअतना न समझा !मु० तुगलक या फ़िरोज़ तुगलक ने खुद बहुत अहमियत नही दी ! ये एक फ़र्द या कुछ इफ़राद का ज़ाती अमल है इस से इसलाम को कुछ लेना देना नही है ! कोइ भी जाति पात उंच नींच भेद भाव की बात कर सकता है लेकिन अब भी आप किसी मुल्क में देखिये अरबों की ही बात ले लीजिये ! एक अफ़गानी मोची के पीछे कोइ शेख बिलाझिझक नमाज़ पढता है ! म्युंसिपलटी में गलीज़ काम करने वाले बंगला देशी के पीछे अरबी लोग बिना झिझक नमाज़ पढते हैं और अफ़गानी मोची व गलीज़ काम करने वाले बंगाली के साथ एक बरतन में खाना खाते हैं ! बे झिझक जूठन खाते हैं इस पर भी कोइ उंच नीच छुआ छूत का इस्लाम पर इल्ज़ाम लगाये तो कोइ क्या करेगा ! शादी वगैरह के हवाले भी दिये जाते हैं तो क्या कोइ भी जिस को नही पसन्द करता उसके घर अपनी बेटी देता है ! भाइ ही भाइ के लिये नीच हो जाये तो इसका इल्ज़ाम धर्म पर देना कभी भी जायज़ नही ! इसलाम में मुकद्दस कुरान और हदीस ही हर्फ़ ए आखिर है जिस की तमबीह हिज्जतुलविदा में पैगंबरे इस्लाम ने दी थी ” कुरान की मज़बूत रस्सी को अगर थामे रहो गे तो कभी गुमराह नही होगे” कोइ भी इमाम हो मुफ़्ती हो मौलाना हो इसलाम की नज़र में उसकी कुरान व हदीस के मुकाबिल कोइ वकअत नही ! कुरान और हदीस में कहीं जात पात का कोइ ज़िक्र हो तो कोइ पेश करे ! हम मान जायें गे कि इस्लाम मे जात पात है छुआ छूत है ! हिम्मत है तो कोइ पेश कर के बताये ! मै किसी के साये से भी नफ़रत करूं तो क्या इसका इलज़ाम इस्लिये इसलाम पर चला जाये गा कि मैं अप्ने को मुसल्मान कहता हूं या हूं !

इस्लाम चोरी के लिये मना करता है तो क्या मुसलमान चोर नही हैं और अगर हैं तो क्या इसके लिये इस्लाम ज़िम्मेदार हो गया ? फ़िर चोरी की सज़ा इस्लाम में हाथ काटना क्या मानी रखता है ! एक मुसलमान की कमी को इस्लाम की बताने से वो इस्लाम की कमी नही हो जाये गी !वैसे भी अपने वक्त का अज़िमुलमुर्तबत (महान) और इस्लामी शरीयत का नख सिख पाबंद शहंशाह मुहम्मद तुगलक या हद दर्जा दीनदार शहंशाह फ़िरोज़ तुगलक के अह्द (काल) में किसी की भी हिम्मत नही थी जो पैगमबर ए इसलाम मुहम्मद (सलअम) की हदीसों से टकराता हुआ कोइ फ़तवा दे दे !

दिन गुजरे मुस्लिम शहंशाहों में कमज़ोरी आयी फ़ितरत के असूलों के मुताबिक (प्रकिर्तिक सिद्धांतों के अनुसार) इतिहास बदला उनकी हुकूमत जाती रही ! अंगरेज़ों की हकूमत आयी पहले से दौलतमंद , कुछ शातिर मुस्लिमों ने ज़िउअद्दीन बरनी के फ़तवा ए जहांदारी का झूटा नाम उछाल कर भारतिय ज़ात पात के नज़ाम ( वर्णव्यवस्था) की तकलीद ( अनुशरण) करते हुये अपने आप को उंचा दिखाने की कोशिश की जिसके लिये उन्हे कुछ हद तक माहौल भी साज़गार ( सहायक वातावरण) मिला लेकिन अटल ,अजर, अमर इस्लामी उसूलों को बदलना उनके बस की बात नही थी कि “हर मुसलमान आपस में भाइ भाइ है ! सबसे उचा वह है जो सबसे ज़्यादा मुत्तकी है !” साथ ही मकद्दस कुरान व अहादीस ने , वेद ,स्मिर्ति , रामयण, महाभारत,पुराण या उपनिषदों की तरह कही भी जात पात की कोइ बात नही की ! उसने सिर्फ़ मोमिनीन और मुस्लिमीन कह कर ही मुस्लिमों को मुखातिब (संबोधित) किया !हां मज़हबे इस्लाम की जा ए पैदाइश ( जन्म भूमि) अरब में कबीलों की बात ज़रूर मिलती है तो कबीलों की हकीकत बस इतनी है कि वह किसी नामी गिरामी पुर्वज के वंशज थे जो एक साथ मिलकर रहते थे और अपने नामी गिरामी पुर्वज के नाम पर अपने कबीले का नाम रख लेते थे ! बअलफ़ाज़ दिगर ( दूसरे शबदों में) एक ही खानदान और वंश के लोगों का गिरोह ही कबीला कहलाता था ! कबीलों का ज़ातपात के नज़ाम या वर्ण व्यवस्था से दूर दूर तक कोइ संबंध नही था !

अरबों में एक बात ये भी देखने को मिलती है कि बहुत से अरब अपने पेशे या व्यवसाय के नाम पर भी अपना सरनाम नाम रख लेते थे !मिसाल के तौर पर माहिर ए इल्म हैयत (महान खगोलविद) , रियाज़ी दां (गणितग्य) और अपने दिलकश व लाजवाब रुबाइयों के कारण पूरे विश्व मेम् प्रसिद्ध उमर खैयाम का सरनाम इस्लिये ’खैयाम’ है कि उसका बाप खैमा बनाने का काम करता था ! इसी तरह अरब का एक मशहूर कैपिटलिस्ट ’अपने सरनाम में ’खैयात’ का लफ़्ज़ इस्तेमाल करता है ! जिसका मतलब हुआ कपडे सीने वाला ! यही बात अगर भारत में होती तो उसे एक जाति का रंग सैकडों बरस् पहले दिया जा चुका होता ! लेकिन इस्लाम में जात पात का कोइ वजूद (अस्तित्व) न होने के कारण ये लोग सिर्फ़ मुसलमान हैं कोइ जाति नही एक ही जाति मुस्लिम है ! जबकि हमारे देश भारत में व्यवसाय के आधार पर मुस्लिमों को जात पात के नाम पर ज़रूर संबोधित किया जाता है जैसे अंसारी (जुलाहे/बुनकर), कुरैशी (कसाई) छीपी, मनिहार, बढाई, लुहार, मंसूरी (धुनें) तेली, सक्के, धोबी नाई (सलमानी ), दर्जी (इदरीसी), ठठेरे जूता बनाने वाले और कुम्हार , आतिशबाज़, बावर्ची, भांड, गद्दी, मोमिन, मिरासी, नानबाई, कुंजडा, धुनिया, कबाडी, चिकुवा फ़कीर इत्यादि हैं । ये व्यावसायिक जातियां थी जो पहले हिंदू थी और बाद में मुसलमान में परिवर्तित हो गईं किन्तु इन के व्यवसायिक नाम से जान बूझ कर मनुवाद पर आधारित बहुसंख्यक समुदाय ने इन्हे ब्रहमणों की इख्छानुसार जाति कहकर पुकारना शुरु किया और नतीजतन जैसा कि गालिब ने कहा है ” ज़ुबान ए खलक को नक्कारा ए खुदा कहिये ” या साहिर नए कहा था ” लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगें” और वही हुआ मुस्लिम शासकों के कमज़ोर होते ही अंगरेज़ों की चालाकी व बहुसंखयक शासन प्रशासन इनको जति की मान्यता दिलवाने में काम्याब रहा ! जबकि इस तरह की वर्णव्यवस्था का इस्लाम में न तो कभी कोइ गुंजाइश थी और न है !

जाति का नाम देना भारतिय तह्ज़ीब के परिवेश में यहां के बहुसंख्यक हिन्दू और विशेषतः ब्रहमण समुदाय का काम है ! जनम जनम की वर्ण व्यवस्था का धार्मिक स्वरूप इनकी मानसिक्ता बन चुकी है ! जिस का मूल कारण ब्रह्मणवाद व मनुवादी व्यवस्था है इस से इन को ये लाभ अवश्य मिलता है कि कोइ भी समुदाय आसानी व सरलता से एक जुट न हों सके और इनकी मज़बूत पकड बनी रहे ये शासन करते रहें ! यही कारण है कि पूरे भारत में मूल निवासीयों को लगभग ६०० से ज़्यादा ज़ातियों में इन ब्रहमनों ने बांट रखा है !
मुझे किसी भी तरह विस्वास नही होता जब कुछ लोग कहते हैं कि मुसलमानों में अस्पृश्य जातियां भी है। सच कहता हूं मैने अभी तक न कहीं पढा नही कहीं देखा जब की मेरे तअल्लुक और दोस्तों में नेपाली बंगलादेशी, थाइलैंडी इन्डोनेशी, चाइनीज पाकिस्तानी तुरकी , अफ़गानी , मिसरी , सूडानी , मौज़म्बीकी सोमाली, नाइजेरियन , चाडीयन , सीरियन श्रीलंकाइ , जैसे लोग हैं मैने पूछा भी है किसी ने नही कहा कि ऐसा देखा है अपने देश भारत में भी मैने तमिल केरल , हैदरबादी , महाराष्ट्रियन . पंजाबी ,राजस्थानी , बिहारी . लगभग हर प्रांत के लोगो से पूछा मगर किसी ने ने नही बताया कि मुसलमानों में अस्पृश्य जातियां भी है। जिनको गाजीपुरी, रावत, लाल बेगी, पत्थर फोड, शेख, महतर, बांस फोड और वाल्मीकि इत्यादी के नाम से पुकारा जाता है ! किन्तु अगर कल्पना करते हुये इसे हम सही भी मान लें तो भी ये इसलाम का सिद्धान्त तो नही है ! ये निराधार है क्यों कि जो मुस्लिम अपने मुस्लिम भाइ से ऐसा सलूक या व्यवहार करता है वह इस्लामी उसूलों से मुसलमान होते हुये भी खिलवाड करता है और न चाह्ते हुये भी शायद इस्लाम की सीमा रेखा से बाहर जारहा है ! ये उसकी जाहिलियत और जानकारी की कमी है और ये उस की अपनी घटिया सोच, व नीच व्यवहार है !एक मुस्लिम होने के नाते मै ऐसी सोच वालों के लिये अल्लाह की हिदायत की दुआ करता हूं ! इसलाम का किसी के व्यवहार से लेना देना नही उसके अपने उसूल है जिसमें किसी प्रकार की जात पात , भेद भाव, उंच नींच का तसव्वुर ( परिकलपना ) भी नही है ! किसी भी धरम की कसौटी उस के किताबों में लिखे गये उस के सिद्धांत होते हैं न कि किसी अनुयायी की निजी प्रक्रिया या व्यवहार ! जैसे हिंदू धर्म की कसौटी वेद ,स्मिर्ति , रामयण, महाभारत,पुराण या उपनिषदों में अनुदेशित बातें हैं जिन में जगह जगह वर्ण व्यवस्था की बात की गयी है ! ये अलग बात है कि इस ब्रहमण और मनुवादी वर्ण व्यवस्था में एक ब्रहमणिन सविता यदि एक शुद्र भी से गयी गुज़री अछूत महार जात के भारत रत्न बाबा साहेब से विवाह रचा कर भी ब्रहमण ही रह्ती हैं तो राजनितिक पटल पे देखें तो एक अछूत जाति की महिला की जूती सीधी करने वाला ब्रहमण फ़िर भी ब्रहमण ही रहता है और वो महिला अछूत ही रह्ती है अर्थात ब्रहमण घटिया से घटिया हो तो भी वो ब्रहमण ही और पूजनीय ही रहेगा ! जबकि भारत का संविधान रचयिता जिसे संसार महान मानता है वह इन धर्मग्रंथों के और धर्म के अनुसार अछूत ही रहे गा ! यही बात तुलसी दास ने रामचरित्र मानस में भी कही है !जो भी हो मुझे इतना ही कहना है कि इसलाम में उसके पवित्र कुरान और हदीसों के अनुसार कही भी जातपात की बात है न ही इसे घुसेड्ने की गुंजाइश ! अब अगर कोइ मुसलमान बलात्कार करता है तो ये उसके दोष है इस्लाम का नही बल्कि इस्लाम के अनुसार तो ये हुक्म है कि बलात्कार का अपराध साबित होजाये तो तुरंत उसकी गर्दन उडा दो चाहे वो अपने को भले ही मुसलमान ही क्यों न कहता हो !

ये भी सच है कि चाहे कोइ भी ज़ाति हो अपने बेटे बेटी की शादी अपने से ज़्यादा धनवान के घर करना पसंद करता है और अपने से अनुपात में बहुत निर्धन से तो किसी भी सूरत में नही करता !! …यहां इस्लाम ’कफ़ू’यानी बराबरी की बात करता है लेकिन फ़र्ज़ नही बनाता बहुत ज़ोर नही देता ! मैने लगे हाथों ये बात इस्लिये लिख दी की आप ये बात भी आसानी से समझ लें कि मज़हब ए इस्लाम में कत्तइ या नाम मात्र भी ज़ात पात भेद भाव उंच नीच , छुआ छूत नही है लेकिन इसका मतलब ये भी नही की कोइ अपने पूरे बदन में गंदगी लगाये दुर्गंध से अटा हुआ आये और कहे कि साथ में खायें या गले मिलें या कुरान की कोइ आयत पढावो तो ईसलाम इस की भी इजाज़त नही देता आप को अपने अमल और पाकीज़गी व सफ़ाइ से भी ऐसा होना चाहिये कि किसी को आप से कराहियत न हो ! अब अगर इसे कोइ जाति पात का नाम दे दे तो शौक से दे सकता है इस्लाम से दूर जाना चाहे तो शौक से दूर जा सकता है हमें दुख नही बल्कि खुशी होगी ! मुकम्मल मुसलमान बन ने के लिये कोइ भी इस्लाम के असूलो का अनुशरण करने का मोहताज है ! जबकि इस्लाम किसी मुसलमान का मुहताज नही वह अपनी जगह मुकम्मल और परिपुर्ण है ! पूरे संसार मे इस्लाम ही वह अकेला मज़हब है कि उस के मख्सूस बातों को आपने दिल से नही सवीकार किया तो वह खुद ही अपने से आपको बाहर करदेगा !