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इस्लामी राज्यों के मामलों किस हद तक गिरावट का शिकार हैं! ट्यूनीशिया से लेकर यमन, सीरिया, इराक और अफगानिस्तान तक, सभी इस्लामी दुनिया अशांत है। पाकिस्तान अपने मुद्दों के साथ एक अद्वितीय राज्य है जिसके एक हाथ में सक्रिय परमाणु हथियार तो दूसरे में दुनिया का मजबूत कश्कोल जो तोड़ने से भी न टूटे। यह वह राज्य है जो गाहे बगाहे, जोश और भाव की हालत में खुद को कट्टरता से इस्लाम का किला घोषित कर डालती है, और फिर साथ ही कश्कोल आगे कर दिया जाता है। क्या यह समस्या संस्कृति या फिर हम इतिहास के उत्पीड़न का शिकार हैं?कभी इस्लाम पर स्वर्ण दौरा था, लेकिन फिर बहुत पहले तो मंगोलों, तातारयों, सारयों, मिस्त्रियों और Phoenicians और Huns पर भी चरम का ज़माना था। क्या अतीत की महिमा धीरे के गुण गाते हुए हाल की कमजोरी या विफलता पर पर्दा डाला जा सकता है? इतिहास सभ्यताओं के उत्थान और पतन का रिकॉर्ड रखती है, लेकिन इसके साथ-साथ यह शक्तिहीन संयुक्त और पीढ़ियों के दूसरे पक्षों का समीक्षा करती है । यूरोप में अंधेरी काल ( DARK AGE )ज्ञान नशाۃ सानिया आंदोलन उभरी। ईसाई भी सुधारवादी आन्दोलन (Reformation) प्रक्रिया से बची है, तर्क राष्ट्रवाद ने मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में नई जून बदली, आज का चीन अफीम की युद्ध और Boxer Rebellion युग का चीन नहीं है।

सवाल यह उठता है कि दनियाए इस्लाम में इस तरह की कोई आंदोलन क्यों न उभरी? पिछले पांच या छह सौ वर्षों से इसके फ़िक्री दरीचों में ताजा हवा के किसी झोंके का गुजर क्यों न हुआ? इस्लामी दुनिया ज्ञान और वैज्ञानिक प्रगति के क्षेत्र में सभ्य दुनिया से इतना पीछे क्यों रह गई? इतिहास के दोराहों पर मौजूद होने के कारण इस्लामी क्षेत्र के रूप में मध्य पूर्व, मध्य एशिया और दक्षिण पश्चिम एशिया बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनके महत्व की एक और वजह तेल और उस पर आधारित अर्थव्यवस्था है। तेल की डालरों में होने वाली विश्व व्यापार और उससे कमाए गए डॉलर अमेरिकी टरीژी बांड के मामले में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए आसान ऋण साबित होते हैं। 1973 में किया गया समझौता, जिसके तहत तेल की कीमत अमेरिकी डालरों में होता है जबकि इसके बदले अमरीका सऊदी सरकार को सुरक्षा प्रदान करता है, वह महान विनिमय है जो अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध का आधार बना रहा। महत्वपूर्ण बात यह है कि पीटरोडालर आधारित अर्थव्यवस्था के बिना अमेरिकी अर्थव्यवस्था कठिनाइयों के गरदाब में फंस जाती। सद्दाम हुसैन का पाप उनके ” व्यापक विनाश के हथियारों ” (जो कभी न मिल सके) की उपस्थिति नहीं बल्कि तेल की कीमत डॉलर के बजाय यूरो में करने का संकल्प था।

जरा शर्म अलशीख में अरब लीग की छतरी तले एकत्र अरब नेताओं पर एक नज़र रखना। क्या बैठक में बैठ कर उनके इस तरह विचार चिंता करने से किसी के दिल की धड़कन नाराज़ हो जाएगी? संयुक्त बल बनाने के जनरल नेतृत्व का प्रस्ताव ट्रिगर सब ज्ञान में है क्योंकि उनकी सरकार को खाड़ी देशों से भारी रकम मिल चुकी हैं। आठ वर्षीय ईरान इराक युद्ध, जो दोनों देशों को नष्ट करके रख दिया, के दौरान इन सभी देशों ने सद्दाम हुसैन को रकम दी थी, लेकिन इराकी तानाशाह ने ” धर्म ‘का बदला चुकाने के लिए कुवैत में हमला कर दिया। आधुनिक इस्लामी दुनिया की राजनीति आज भी उन्हीं पदों पर अग्रसर है। आज खाड़ी देश मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव का कारण परेशान हैं। इस क्षेत्र में ईरान के प्रभाव में वृद्धि के कारण इराक पर अमेरिकी हमले था। क्या हमले के समय उनके द्वारा कोई विरोध किया गया? विरोध छोड़, क्या अमेरिका को हल्के चिंता से अवगत कराया गया कि वह गलती करने जा रहा है? लेकिन सद्दाम हुसैन की नफरत ने अरब देशों की आंखों पर पूर्वाग्रह पट्टी बांध दी थी। आज अमेरिकी हमले का खामियाजा सबको भुगतना पड़ रहा है और ईरानी प्रभाव को कम करने के लिए उन्हें यमन में होती विद्रोहियों पर बमबारी करना पड़ रहा है क्योंकि अरब इन विद्रोहियों को ईरान के प्रॉक्सी दस्ते समझते हैं (हालांकि ऐसा नहीं है)।

अब जबकि हमले शुरू हो चुके हैं तो अरब राज्यों की बुद्धिमानी इसी में है कि वह कार्रवाई को हवाई हमले से आगे न बढ़ाएं, लेकिन अगर उन्होंने जमीनी दस्ते भेजने की गलती की तो यमन इन के अफगानिस्तान बनने जा रहा है। पाकिस्तान के लिए भी अच्छा है स्थानों मकदसह सुरक्षा और अरब की धरती पर होती वाली किसी भी आक्रमण को सहन न करने को बयानबाजी, जो हम विशेषज्ञ हैं, तक ही सीमित रखे क्योंकि हालात बताते हैं कि धरती अरब और मुक़द्दस स्थानो को कोई खतरा नहीं है। इस दिक्कत व्यावहारिक स्थिति यह है कि अरब देशों यमन पर हमला कर रहे हीं जब कह होती विद्रोहियों का कोई कदम या बयान प्रकट नहीं कर रहा कि वह हजाज़ धरती द्वारा उन्नत करना चाहते हैं, लेकिन अगर पाकिस्तान की ओर से जारी किए जाने वाले सरकारी बयान, विशेष रूप से विदेश सचिव द्वारा, जाओ तो ऐसा युद्ध समां बंधा हुआ महसूस होता है जैसे पवित्र स्थानों को गंभीर जोखिम पैदा करें और हर पाकिस्तानी सिर कफ़न बांधकर मैदान में कूद पड़ने के लिए बेचैन हो। इसमें कोई हर्ज नहीं, लेकिन बुनियादी सवाल अपनी जगह पर मौजूद है कि पवित्र स्थानों पर हमले की धमकी किसने दी है?

यह अनुमान लगाने के लिए बहुत बुद्धिमान होने की जरूरत नहीं कि पाकिस्तान उचित व्यवहार और अहतयाज की कशमकश का शिकार है। ज्यादातर पाकिस्तानी समझ कोलियत का ाृहार्करते हैं कि हमें यमन के मामलों से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। देशों से यूं युद्ध छेड़ने एक मूर्खता थी तो उसमें भाग लेने के लिए कूद पड़ना पाकिस्तान की महान गलती होगी। हालांकि बेफिक्र रहें, अतीत िनायात और उनका भविष्य में निरंतरता सुनिश्चित करता है कि हम सऊदी अरब का साथ नहीं छोड़ेंगे। केवल इतनी दुआ है कि सऊदी अपनी सैन्य कार्रवाई को हवाई हमले से आगे बढ़ाकर हमें परीक्षण में न डालें क्योंकि हम न अरब भाइयों को नाराज कर सकते हैं और न ही मूर्खता में कोदसकते हैं। अम्मान यमन का पड़ोसी है लेकिन वह खुद को इस दुविधा से दूर रखा हुआ है। इसकी वजह यह है कि अम्मान को पाकिस्तान की तरह सऊदी सहायता पर तकिया की जरूरत नहीं।

अगर इस्लामी दुनिया की समीक्षा तो कुछ राज्यों को छोड़कर सभी देशों बाहरी शक्तियों के हाथों में कठपुतलियों पुतलियों के समान हैं। वह अपने भाग्य के फैसले खुद करने का अधिकार नहीं है। ईरान की परमाणु डील हर किसी के हित में है, लेकिन अरब राज्य खायफ हैं कि इसके जरिए ईरानी प्रभाव में वृद्धि हो जाएगा। कई विरोधियों तोकहते हैं इजरायली परमाणु हथियारों के महीब अंबार से ानहींकोई फर्क नहीं पड़ता लिकन ईरान का परमाणु कार्यक्रम उन्हें ड्रायोने सपने की तरह दिखाई देता है। इसी तरह शाम में होने वाला अनुबंध भी दनियाए इस्लाम के उपयोगी साबित हो सकता है लेकिन इस उद्देश्य के बशर अल असद को पद से हटाए जाने की क्या ज़रूरत है?लेकिन अरब भाई असद को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसी तरह तुर्की के श्री ारदवान हालांकि यह स्पष्ट है कि असद को हटाए जाने से भयानक आतंकवादी समूह के रूप में अल या वैकल्पिक, ालनसरह और दाश, सराठालें करेंगे। हालांकि उस समय अरब और तुर्की के नेताओं के श्री असद को हटाने महत्वपूर्ण कोई काम नहीं, चाहे उसका कितनाही भयानक अंजाम क्यों न हो।

इसलिए बुनियादी सवाल, दनियाए इस्लाम के साथसमस्या क्या है? क्या उनका कल्चर ही इस तरह का है या वह इतिहास की विडंबना का शिकार हैं? दुनिया के अन्य भागों में विज्ञान के विकास और विकास और अन्य संयुक्त खुद को नई चुनौतियों के अनुसार ढाल कर आगे बढ़ रही हैं।मगर इस्लामी देश उस की तरफ कोई क़दम नहीं उठा रहे है . अभी भी हम अलकायदा , जवाहरी, बगदादी , बोको हराम जैसे आतंकवादी संगठनो को हीरो बनाने में तुले हुए है और पश्चिम देश भी उन्हें समर्थन कर आगे बड़ा रहा है और मुस्लिम देशो का एक भयावह चेहरा पीह कर रहा है . इस में पश्चिम देशो की भी कोई गलती नहीं है जब हमारी सोच और मानसिकता ही यही है तो और कोई कर भी क्या सकता है . जब हम खुद अपने हालात नहीं बदले गए तो कोई और कैसे आप का साथ दे सकता है.