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देश का सच यही है कि जो सत्ता में रहता है वह गरीब और किसान विरोधी होता ही है। और जब सत्ता का विरोध करते हुये विरोधियो को सत्ता मिल जाती है तो वह गरीब और किसान विरोधी हो जाता है और फिर कल तक जो सत्ता में थे वह गरीब और किसानो के हक में नारे लगाने लगते हैं। यानी हर दौर में विपक्ष के हाथ में सबसे ताकतवर हथियार किसान मजदूर या कहें हाशिये पर पड़े लोगों के हक में नारा लगाना ही होता है और सत्ता में आने के बाद कारपोरेट और विदेशी निवेश से लेकर उघोगो के लिये खेती की जमीन छिनने के अलावे कोई मॉडल किसी के पास होता नहीं है। नेहरु का विरोध करने वाले लोहिया के चेले किस राह पर है यह देश से छुपा नहीं है। इंदिरा का विरोध करने वाले जेपी के भक्त लत्ता पाने के बाद किस रास्ते चले यह भी किसी से छुपा नहीं है। राजीन गांधी को कटघरे में खडाकर सत्ता पाने वाले वीपी सिंह कहां कैसे फिसले यह सच हर किसी के सामने है। और ताजा यादों में वाजपेयी के दौर की शाइनिग इंडिया की हवा सोनिया गांधी की अगुवाई ने निकाली। और मनमोहन सिंह के विकास की रफ्तार को स्कैम इंडिया बताकर हर चुनावी सभा में नरेन्द्र मोदी ने हवा निकाली। और अब मोदी सत्ता में है तो राहुल गांधी को किसान-मजदूर याद आ रहे हैं।

यानी देश की सबसे बडी त्रासदी यही है कि किसी भी सत्ता के पास देश के गरीब और किसान मजदूर की जिन्दगी पटरी पर लाने के लिये कोई ब्लू प्रिंट तो है ही नहीं। उल्टे विकास की जिन नीतियों को सत्ता अपनाती है उसमें देश की खनिज संपदा की लूट से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार से लेकर पीने के पानी सरीखी न्यूतम जरुरतो को भी कारपोरेट के हवाले कर मुनाफा बनाने के धंधे में तब्दील करती चली जा रही है। असर इसी का है कि राहुल गांधी जब मोदी के आधुनिक मेक इन इंडिया पर यह कहकर चोट करते हैं कि किसान भी तो मेक इन इंडिया है तो देश को अच्छा लगता है। क्योंकि बदलती सत्ता के बीच भी देश कभी नहीं बदला और एक ही देश में दो देश हमेशा नजर आये । मौजूदा वक्त में आलम यह चला है कि एक तरफ खेती पर टिके अस्सी करोड लोगो की दो जून की रोटी से जुडा सरकारी खर्च है तो दूसरी तरफ उससे कही ज्यादा आठ कारपोरेट का टर्न ओवर। इसीलिये प्रधानमंत्री मोदी जब मेक इन इंडिया का जिक्र करते है तो विदेशी निवेश को लेकर सवाल उठते है और जब प्रधानमंत्री भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाने का जिक्र करते हैं तो कारपोरेट के लिये किसानों की जमीन छीनने का सवाल खड़ा हो ताजा है। यानी मेक इन इंडिया के जरीये उत्पादन पैदा करने वाला देश भारत हो सकता है और खेती की जमीन को मेक इन इंडिया से जोडकर किसान की बदहाली खत्म की जा सकती है इसपर देश का भरोसा जागता नहीं है। तो पहला सवाल यही है कि आखिर सरकार पर भरोसा जाग क्यों नहीं रहा है। जरा इस सिलसिले को समझे तो पीएम कहते है विदेशी निवेश के लिये रास्ता बनाना जरुरी है। देशी निवेशक कहते है लालफिताशाही और भ्रष्टाचार तो खत्म कीजिये। पीएम कहते है चीन की तरह भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बनायेगें । तो रिजर्व बैंक के गवर्नर रधुराम राजन कहते है सिर्फ़ मैन्युफ़ैक्चरिंग पर ध्यान देने से बात नहीं बनेगी। अब सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी मेक इन इंडिया कहकर निवेशकों के कान में मिसरी घोल रहे हैं. क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में विकास दर में गिरावट आई । गवर्नेंस चौपट दिखी। सत्ता के दो पावर सेंटर हो गये। घोटालों की बाढ़ आ गई। और मोदी ने आते ही सबसे पहले उन्हीं हालातों पर चोट की जो मनमोहन सरकार की देन थी। और जनता का भरोसा जागा कि शायद इसबार कुछ बदल होगा क्योंकि पीएम की कुर्सी पर बैठने वाला शख्स लुटियन्स की दिल्ली का नहीं है। यानी उस राजनीतिक गलियारे का नहीं है जहां हर पार्टी के राजनेता राजनीतिक धिंगा-कुश्ती करते ज्यादा नजर आते है लेकिन होते सभी एक हैं। इसलिये मोदी जब कहते है कि ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा तो यह अच्छा लगता है। लेकिन बीतते वक्त के साथ फिर वहीं सवाल खड़ा होता है कि सिस्टम बदलेगा कैसे। यानी हाशिये पर पडे तबके की सुध लेगा कौन। क्योंकि देश की मुश्किल तो काम करने वाले युवा हाथों में काम का नहीं होना है। खेती की जमीन खत्म होने पर बेरोजगारी के बढने का है। इन्फ्रास्ट्रक्चर सिर्फ उद्योगों या कारपोरेट के लिये है। यानी किसानी करते देश के सबसे ज्यादा लोगो को उघोग से जुड़ा मानने की हालत में सरकार है नहीं। उल्टे मेक इन इंडिया के बाद बड़े ज़ोर-शोर से ‘ डिज़िटल इंडिया’ और ‘स्किल्ड इंडिया’ का जिक्र किया गया । लेकिन वित्त मंत्री संसद में तर्क देते है कि विकास दर बढेगी तो पूंजी आयेगी और फिर सिचाई पर भी ध्यान दे दिया जायेगा । अब सवाल है कि वित्त मंत्री को अगर सही माना जाये तो फिर मेक इन इंडिया के मातहत जो 25 क्षेत्र चुने गये उनमें ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन और फ़ार्मा जैसे क्षेत्र शामिल हैं.लेकिन खेती तो है ही नहीं । और खुद सरकार मानती है कि
औद्योगिक विकास के लिए ज़मीन चाहिए । यानी सरकार की प्राथमिकता मेक इन इंडिया के जरीये विकास दर बढाने की है । उससे कमाई गई पूंजी को खेती में लगाने का जिक्र हो रहा है । यानी वही रास्ता जिसका जिक्र वित्त मंत्री से लेकर पीएम बनने तक मनमोहन सिंह 1991 से 2014 तक करते रहे । और उससे उपजे असंतोष ने ही मोदी को पीएम बना दिया। लेकिन अब सिर्फ शब्द बदले जा रहे हैं। लेकिन नीतियां जस की तस । तो फिर क्या माना जाये कि पीएम का दांव सिर्फ लुभाने वाला है । क्योंकि कालेधन से लेकर दागी सांसदों तक के सवाल पर तो पीएम ने जो कहा उससे अब साल पूरा होते होते बदल रहे है या कहें फिसल रहे है। गद्दी संभालने का बर पूरा होने का महीना भी शुरु हो चुका है। याद कीजिये जून 2014 में संसद में पीएम मोदी ने ताल ठोंक कर कहा था कि साल भर के भीतर संसद में कोई दागी नहीं बचेगा। सभी की फाइल खुलेंगी। जो दोषी होगा वह जेल जायेगा। जो पाक साफ होगा वह छाती ठोंक कर संसद में बैठेगा। लेकिन सच तो यह है कि मोदी मंत्रिमंडल के 64 मंत्रियो में 20 दागी हैं। संसद के भीतर 543 सांसदों में से 185 सांसद दागी हैं। इनमें सबसे ज्यादा बीजेपी के 281 सांसदो में से 97 दागी हैं।

असल में सत्ता दागदार होकर भी दागी नहीं होती । नैतिकता हर बार नेता से हार जाती है। क्योंकि संसद ही नही देश के कमोवेश हर विधानसभा की हालत यही है कि वहा दागियों की भरमार है। लेकिन कोई कहता है उसे राजनीतिक तौर पर फंसाया गया तो कोई कहता है मुकदमा ही फर्जी है । अब कहे कोई कुछ भी लेकिन
देश का सच है कितना खतरनाक यह भी देख लिजिये। नेशनल इलेक्शव वाच के मातहत एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक। मौजूदा संसद में अगर 34 फिसदी सांसदो के खिलाफ आपराधिक या भ्रषटाचार के मामले हैं। तो इसी तरह राज्यसभा के 232 सांसदो में से 40 दागी हैं। और तो और 13 राज्यों की सरकार के 194 मंत्रियों में से 44 दागी हैं। और देश के तमाम विधायको का जिक्र करें तो कुल 4032 विधायको 1258 विधायक दागी हैं। यानी देश के 36 फिसदी विधायकों के खिलाफ आपराधिक और भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हैं। तो सवाल यह हो चला है कि सुप्रीम कोर्ट ने आठ महीने पहले ही प्रधानमंत्री समेत देश के तमाम मुख्यमंत्रियों को यह सुझाव भी दिया था कि वह अपने मंत्रिमंडल में तो कम से कम दागियो को ना रखे। लेकिन जब तेरह सीएम और पीएम तक इस हालत में नहीं है कि वह दागियों को अपने मंत्रिमंडल में ना रखें तो फिर किसान-मजदूर के सवाल सिवाय सियासत के कहा मायने रखेंगे। और अगर कोई यह सोच रहा है कि सियासी हंगामे से ही सही किसानों की हालत कुछ तो सुधर सकती है। तो जमीनी सच यही है कि बीते 25 बरस में पहली बार किसानों की आत्महत्या की रफ्तार सबसे तेज है। 2006 में हर सात घंटे एक किसान खुदकुशी करता था आज की तारिख में हर 5 घंटे में एक किसान की आत्महत्या की खबर आ रही है। इस बरस पहले 120 दिनों में ही छह सौ किसानों खुदकुशी कर चुके है।