byomkesh-bakshi

सत्य का अन्वेषण करने वाले चरित्रों ने फ़िल्मकारों को सदा आकर्षित किया है। 19वीं सदी के चौथे दशक के शुरुआती वर्षों में अस्तित्व में आए शरलॉक होम्स के देसी अवतार ब्योमकेश बख्शी ने करीब चार दशकों तक भारतीयों, विशेषकर बंगाली समाज के दिलों पर राज किया है।

किरदार की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सत्यजित राय भी इसके सम्मोहन से बच नहीं सके थे। दूरदर्शन पर भी यह धारावाहिक के रूप में आया।इसका प्रसारण दूरदर्शन के विभिन्न चैनल पर आज भी होता है। ब्योमकेश बख्शी के किरदार की वजह से ही रजित कपूर कभी घर-घर में जाना-पहचाना नाम थे।क्या दिबाकर उस नाम की मकबूलियत को दोहरा पाएंगे?

आज के समय में आधी सदी पुराने किरदार एवम कहानी को लेकर फिल्म बनाना चलन में नहीँ। इस नजरिये से फ़िल्म एक जोखिम और चुनौती का काम था। दिबाकर बनर्जी चुनौतीपूर्ण काम करने के कायल रहे हैं और ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ को एक बार फिर पर्दे पर जिंदा कर उन्होंने इस बात को सिद्ध किया कि वह नए निर्देशकों में क्यों अलग खड़े नज़र आते हैं ? लेकिन क्या वह ‘खोसला का घोंसला’ एवम ओय लक्की ओय जैसी हिट फिल्मों की सफलता को रिपीट कर सकेंगे ? जवाब फ़िल्म बेहतर दे सकेगी, आनेवाला समय भी। अपनी हर फिल्म में एक नया संसार रचने की कोशिश करने में वो इस बार भी कामयाब हो सकेंगे ? तीस -चालीस दशक की पीरियड कहानी को बनाने में फिल्मकार की कड़ी परीक्षा देनी पड़ी थी।आगे भी परीक्षा देनी होगी,एक अलग तरह की।

शरदिंदु बनर्जी ने तीस दशक में जासूस ब्योमकेश बक्शी के किरदार को गढ़ा था। उन्होंने तीस से अधिक कहानियां लिखी। इन कहानियों को बांग्ला फिल्मों और धारावाहिकों में ढाला गया। हालिया रितुपर्णो घोष की बंगाली फिल्म ‘सत्यान्वेषी’ मे ब्योमकेश बक्शी की भूमिका में सुजॉय घोष दिखे थे।

‘डिटेक्टिव ब्योकेश बक्शी’ के आरंभ में फिल्म का प्रमुख सहयोगी किरदार अजीत बंद्योपाध्याय का वॉयसओवर सुनाई पड़ता है। सेकेंड वर्ल्ड वॉर जोर पर था। हम सब कलकत्ता वाले अंग्रेजों और जापानियों की इस लड़ाई में घुन की तरह पिस रहे थे।’ पहले ही दृश्य में हम तत्कालीन कलकत्ता के चायना टाउन पहुंच जाते हैं।

डिटेकटव ब्योमकेश बक्शी उस युवक की कहानी है,जो परिवार और प्रेम से बिछुड़ा युवक है। वह सत्यान्वेषी बन जाता है। गांधी जी जेल में रहें या छूटें,इससे उसे फर्क नहीं पड़ता। अजीत बंद्योपाध्याय अपने लापता पिता की तलाश में ब्योमकेश से सलाह मांगता है। ब्योमकेश उसे चार विकल्पों के बारे में बता कर पिता को भूल जाने की राय देता है। बाद में वह अजीत के पिता भुवन की तलाश में रुचि लेता है और इस सिलसिले में डॉ. अनुकूल गुहा से मिलता है। वह उनके लॉज में रहने लगता है।

लापता भुवन की गुत्थी सुलझाने में ब्योमकेश का साबका चीनी माफिया और आजादी के लिए संघर्षरत क्रांतिकारियों से होता है। एक गुत्थी सुलझती है तो दूसरी सामने आ जाती है। हत्याओं का सिलसिला जारी होता है और रहस्य गहरा जाता है। ब्योमकेश अपनी समझ और चालाकी से रहस्यों के सारे पर्दे एक-एक कर हटाता है। आखिर में जो चेहरा सामने आता है,वह चौंकाता है।

अजीत बनर्जी (आनंद तिवारी) के पिता भुवन बनर्जी विगत दो महीने से लापता हैं। इस पहॅली के लिए वो को सुलझाने के लिए वो जासूस ब्योमकेश बख्शी (सुशांत सिंह राजपूत) से मिलकर अपने पिता की तालाश करने के लिए सहायता मांगता है।

पहले तो ब्योमकेश इनकार कर देता, लेकिन बाद में यह केस अपने हाथ में ले लेता है। भुवन बाबू के बारे में छानबीन करने के लिए ब्योमकेश उस बोर्डिंग हाउस में जाता है, जहां, भुवन बाबू रहते थे। उस बोर्डिंग हाउस के मालिक अनुकूल गुहा (नीरज कबी) हैं, जो इस काम में उसकी मदद करते हैं। वहां उसे भुवन बाबू के बारे में कुछ चीजें पता लगती है।

वो पता लगाने में सफल रहता है कि भुवन बाबू की हत्या हो चुकी है जिसका शक उसे गजानन सिकदार पर है। फिर गजानन की भी हत्या हो जाती है। जैसे-जैसे उसे लगता है कि वह सत्य के करीब पहुंच रहा है, वैसे ही कोई ऐसी घटना हो जाती है, जिससे वह उलझन में पड़ जाता है और उसके शक की सुई भी उलझने लगी।

क्या भुवन के लापता होने का रहस्य खुलेगा? या तलाश कोई नया मोड़ ले लेगी? इस तलाश में तत्कालीन कलकत्ता को हम नजदीक से देखते हैं।कलकता ऐसा शहर है,जो वर्तमान में भी अपने अतीत के साथ धड़कता है। दिबाकर को वास्तविक लोकेशन के साथ सेट की भी सुविधा रही है। उनकी टीम की कोशिश पीरियड दिखने से अधिक उस परिवेश को सिरजने की रही है,जिसमें कहानी जी रही । दिबाकर ने परिवेश तो पुराना रखा,लेकिन भाषा आज की रखी। इससे असहमति हो सकती होगी।

ब्योमकेश अंतत: सच का पता लगा ही लेता है। दिबाकर ने फिल्म के परिवेश पर बहुत मेहनत की है । फिल्म में बेहद धीमी गति से चलती ट्राम, हाथ रिक्शे, अंधेरी-संकरी गलियां और बिल्कुल बेफिक्र होकर खुद में मगन लोग । निकोस एंड्रिटसाकीस का कैमरा पुराने कलकत्ता के सेट को प्रभावी तरीके से उकेरता है क्या कहानी से अधिक महत्व परिवेश को नही मिला ?

पर अपनी तमाम खासियतों के प्रकाश में फिल्म में कुछ कमजोरियां हैं. अफसोस फिल्म की कमज़ोर कड़ियों में सुशांत यानी ब्योमकेश खुद भी नज़र आए ।उन्हें देख कर पहली नज़र में उनके ब्योमकेश होने का विश्वास नहीं होता। सीन दर सीन इस पर ध्यान नही मिला। फिल्म में निर्देशक दिखाना चाहें या नहीं लेकिन ब्योमकेश का चरित्र एक जीनियस का है ! यह विश्वास बहुत देरी से बनता है। सुशांत की भाव भंगिमाएं और बॉडी लैंगवेज किरदार से थोड़ा मात खा रही।ब्योमकेश के सहयोगी और लगभग उतने ही प्रसिद्ध चरित्र अजित के किरदार मे जरुरत के हिसाब से गहराई नज़र नहीं आई ।जो एक क्लासिक के लेखक में लोग तलाशा करते हैं । क्या यह मायने नही रखता?

सुशांत के लहजे में बंगालियत की कमी झलकती है। लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने अपने किरदार के साथ न्याय किया है? सुशांत हालांकि उम्दा अभिनेता के तौर पर उभर कर आए हैं।लेकिन सुशांत अधिक ब्योमकेश कम लगे ।नीरज कबी प्रभावशाली लगे हैं। अंगूरी देवी के रूप में स्वस्तिका का अंदाज बहुत मीठा लगता है। हालांकि बेहतर कर सकती थीं।