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नेपाल और भारत में आए भयंकर भुकंप के कारण भयानक तबाही और मृतकों के डरा देने वाले आंकड़े आ रहे हैं ।मेरा मित्र पवन जो काठमांडू का रहने वाला है उसने कल बताया कि मंदिरों का एक पूरा शहर पाटन खंडहर भी ना बन पाया बल्कि मिट्टी का ढेर बन गया है और काठमांडू के काफी हिस्से बुरी तरह बर्बाद हो गए हैं ।मृतकों के आंकड़ों में घाल मेल वहां भी हो रहा है और 2500-3000 का आंकड़ा बताया जा रहा है जबकि केवल पाटन शहर में ही ढह गये सभी मंदिरों के अंदर लगभग 10-15 हजार लोग रहे होंगे और क्योंकि जिस समय 11:41 ए एम पर भुकंप आया वह पर्यटन के लिए सबसे पीक समय होता है ।धरहरा का 9 मंजिला मिनार जो धराशायी हो गई उसमे उस समय लगभग 1000 से अधिक पर्यटक मौजूद थे जो काल को प्राप्त हो गये , मेरे मित्र के आकलन के अनुसार लगभग 20 हजार से अधिक लोगों को इस भुकंप में अपनी जान देनी पड़ी ।

यह दुखद है और मेरी संवेदना पीड़ितों के साथ है ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आगे बढ़ कर नेपाल की मदद के लिए जो भी फौरी मदद हो सकी करना और भविष्य में हर संभव मदद करने की घोषणा करना स्वागत योग्य कदम है मैं उनकी इस बिना समय गवांए उठाए गये त्वरित निर्णय पर उनको साधूवाद देता हूँ ।यदि हम सक्षम हैं तो ऐसी विपदाओं में मदद करनी ही चाहिए चाहे देशवासियों की हो या पड़ोसियों की क्युँकि पड़ोसियों का भी हम पर हक बनता है कि हम उनका ख्याल रखें और उनकी मुसीबत पर हम उनकी मदद करें ।पडोसी घर का हो या देश का बात बराबर है कि यदि पड़ोसी के घर में कोई भूखा है तो हमारी रोटी भी हराम है।इसलिए मोदी जी आपका पुनःआभार।

इस आपदा पर बहुत से मित्र बहस करेंगे जो धार्मिक मित्र होंगे वह इसे ईश्वर का प्रकोप समझेंगे और जो नास्तिक होगें वह इसे भौगोलिक असंतुलन का कारण मानेंगे और मेरे हिसाब से यह दोनो ही कारण हैं ।

विकास की आपाधापी में हम प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं ईश्वर के बनाए प्राकृतिक संतुलन को हम विकास की भेदी पर बलि चढ़ा रहे हैं और ईश्वर द्वारा संचालित प्रकृति ज़रा सा लड़खड़ा जा रही तो 20-25 हज़ार लोग काल को प्राप्त हो जा रहे हैं , याद रखें ज़रा सा लड़खड़ाने से ही , और यदि प्रकृति ने रौद्र रूप धारण कर लिया तो कयामत या प्रलय पूरी दुनिया को तबाह और बर्बाद कर देगी और इसी कयामत या इसी प्रलय का ही तो ईश्वरीय धार्मिक पुस्तकों में वर्णन है कि एक दिन दुनिया ऐसे ही कहर से समाप्त हो जाएगी , तो हम कैसे ना मानें कि यह ईश्वरीय प्रकोप नहीं है ?

पाप की अधिकता पर ही कयामत या प्रलय को आने का बताया गया है और पाप हर तरह का होता है एक होता है मानवीय पाप जो हम मनुष्यों पर अत्याचार करके करते हैं और दूसरा होता है प्राकृतिक पाप जो हम प्रकृति के बनाये संतुलन को बिगाड़ कर करते हैं और इन सबकी अधिकता से ही कयामत आती है और आएगी ।
विकास आवश्यक है परन्तु प्रकृति के विरूद्ध या उसके नियमों के विरूद्ध तो बिल्कुल नहीं अन्यथा ऐसे विकास के लिए हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसी कयामत चुनकर कीमत चुकानी पड़ेगी ।

खाली जमीनें हों पेड़ हों जंगल हों नदियों का प्रवाह हो या पहाड़ हो मानव के विकास की हवस की बलि चढ़ रहे हैं, खाली ज़मीनों पर विकास के नाम पर बिल्डिंगों को बनाया जा रहा है, पहाड़ों के प्राकृतिक सौंदर्य का व्यापारीकरण करके दोहन किया जा रहा है , नदियों का प्रवाह रोका जा रहा है बांध बना कर बिजली के लालच में , हमने अपनी जरूरतों को बढ़ाई है तो यह सब आवश्यक है परन्तु जब आप प्रकृति से लेते हैं तो कुछ देना भी तो पड़ता है और प्रकृति वह वसूल करना जानती है और वसूल करती है ।प्रकृति का संतुलन सर्कस की उस छोटी बच्ची की तरह होता है जो रस्सी पर अपना संतुलन साधती हुई आगे बढ़ती है और जरा सा असंतुलन होने पर लड़खड़ा कर नीचे गिर जाती है , यह भुकंप भी उसी तरह प्रकृति के लड़खड़ाने से आया है आया था और हम ना संभले तो आता रहेगा ।

ईश्वर ने हम सबको एक खूबसूरत धरती दी और जीवन जीने के सिद्धांत बनाकर ईश्वरीय किताबें दी और इतना ही नहीं जीवन जीने के उदाहरण भी पुरूषोत्तम राम , सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हजरत मुहम्मद साहब , इसा मसीह , गौतमबुद्ध , गुरु नानक , महावीर, के रूप में दिये जिन्होने एक जीवन जी कर दिखाया कि परोपकार का जीवन कैसे जिया जा सकता है परंतु हम ईश्वरीय आदेशों के विरूद्ध अपने कुकर्म करते रहे।
ध्यान से देखें कि उपरोक्त उदाहरण ईश्वर ने कैसी कैसी स्थितियों में जीवन जीने के लिए दी है कि एक राजा थे , एक चरवाहे , एक सामान्य से व्यक्ति , और अन्य सन्यासी , मतलब हर परिस्थिति में जीवन जीने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ईश्वर ने दिया पर हम पापी ईश्वरीय आदेशों के विरूद्ध पाप कर रहे हैं अत्याचार कर रहे हैं तो यह प्रलय तो आना ही था और आता रहेगा ।

मैं अपने धर्म में बताई गई कयामत की निशानियों का उल्लेख करूं तो उनमे से बहुत सी दिख रही हैं ।जैसे , सब नाम के इमान वाले होंगे पर सच्चा ईमान वाला कोई ना होगा , हर तरफ मारकाट होगी ज़ुल्म होगा , हर घर से घुंघरुओं की आवाज़ आएंगी , इंसानो का कद छोटा होता जाएगा , लोहे के टुकड़े आसमानों में उड़ेंगे , औरतें मर्दों का लिबास पहनेंगी मर्दों के काम करेंगी और मर्द औरतों का , इत्यादि इत्यादि जिसकी विस्तार से चर्चा फिर कभी ।
कहने का अर्थ केवल और केवल यह है कि संतुलन बिगड़ने से प्रलय आयेगा चाहे वह पाप पुण्य का हो या प्रकृति का इसलिए अपने भविष्य की पीढ़ी के लिए इस संतुलन को बचाए रखने का प्रयास कीजिए और प्रकृति से खिलवाड़ से बचने के साथ साथ अपने धर्म के साथ भी खिलवाड़ ना करें और ना करने दें अथवा कयामत के लिए तैयार रहें ।