Religion

by – Rakesh Kumar singh

आज दुनिया भर में मानव धर्म की ओर लौट रहा है. धर्मनिरपेक्षता और नास्तिकता के विचार दम तोड़ रहे हैं. बतौर सामूहिक आंदोलन अभी भी धर्मनिरपेक्षता मौजूद है लेकिन व्यक्तिगत और व्यक्तिगत जीवन, चिंता और प्रक्रिया और जुनून और भावना के स्तर पर दम तोड़ रहा है. अब केवल राष्ट्रीय विदेशी दमन, राजनीतिक प्रणाली या सामाजिक संस्था के रूप में धर्मनिरपेक्ष अवधारणाओं के साथ एक तरह की औपचारिक, बाहरी, सतही और उपस्थिति प्रतिबद्धता स्थापित है. भावनात्मक, बौद्धिक और व्यक्ति के आंतरिक भावनाओं के स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के साथ इंसानों की प्रतिबद्धता समाप्त हो रही है. इस समय दुनिया में हर जगह आदमी फिर से धर्म की पवित्रता की पहचान से बहरा वर हो रहा है. रसेल और पत्रिकाओं के सूत्रों विश्व मेल, ातसाल व करब और सांस्कृतिक संपर्क अनुशासन धार्मिक चेतना को पवित्रता के सार्वभौमिक रंग दे दिया है. इंसान यूं भी किसी चीज़ की पवित्रता का हर युग और हर वातावरण में मनाने है. दुनिया के सभी देशों और मलल अपने दायरहٔ जीवन किसी बात माोराई पवित्रता से जोड़े हुए हैं. हद यह कि धर्मनिरपेक्षता मानने वाले भी खुद धर्मनिरपेक्षता को पवित्रता का रूप देकर ही मानते हैं क्योंकि कुछ भी जब तक पवित्रता के हाले में न लपेट लिया जाए उसे स्वीकार करने और उसके विस्तार और प्रकाशन की संभावना नहीं उभरता.

धर्म का अस्तित्व तो वैसे भी और कहीं भी खत्म नहीं हुआ. नास्तिक और धर्मनिरपेक्ष समाज धर्म के अस्तित्व हमेशा से कायल थे. इसलिए अपने अंदर धर्म को मानने वाले वर्गों, समूहों का अस्तित्व और अधिकार भी स्वीकार करते थे, मगर अपने लिए धर्म की पवित्रता को पसंद नहीं करते थे, लेकिन धीरे धीरे धर्मनिरपेक्ष दुनिया में बदलाव आया और अब यह हाल है कि धर्म पवित्रता फिर व्यक्तिगत स्रोतों से लोगों के दिलों में स्वतः बढ़ता जा रहा है और क्यों न हो कि धर्म प्रति वाक़ेआ मानव प्रकृति का सबसे पहला और सबसे बड़ा निहित है. इस धरती के सीने पर मनुष्य ने जिस पल कदम रखा, धार्मिक चेतना पूरी शक्ति और ताबानी के साथ प्रकृति के सभी दिशाओं और पहनाए अस्तित्व सब परतों में जगमगा रहा था और जब तक मनुष्य करहٔ धरती की फज़ाईों में सांस ले रहा है धार्मिक चेतना उसके जीवन के हर क्षितिज पर रोशनी बिखेर रहेगा.

दुनिया में इससे पहले धर्म इनकार जितनी भी कारण थे, चाहे उसे आलहٔ शोषण समझ या ठहराव और गतिरोध स्रोत गरदान हुए या गीरिमली व अवैज्ञानिक पौराणिक कल्पना करार देकर इनकार किया, फिर आईना अब इनकार धर्म सब कारणों खत्म हो रही हैं. बात दरअसल यह है कि धर्म के इनकार के बाद जीवन की सच्चाई, मनुष्य के अस्तित्व, ब्रह्मांड के निर्माण, प्रणाली प्रकृति और मोजूदात आलम की जितनी भी पबईरात, तोजीहात और अभिव्यक्ति अपनाई गई, जितने भी प्रणाली, संस्कृति, कृरेये, दर्शन, जांच और सांस्कृतिक आवरण तैयार किए गए, जितने भी नैतिक मानकों अपनाए गए, जितनी भी मूल्यों अस्तित्व में आई, वह सब एक समय तक व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से अंततः नाकाम साबित हो गईं. इन सब से धर्म कबूल कहीं अधिक आसान, अधिक सुबोध और अधिक स्वीकार्य दिखने लगा. धर्म के इनकार से समझ और ज्ञान के लिए जो समस्याएं पैदा हुए उनका समाधान मानव मन, दर्शन, कविता और सांस्कृतिक विचारों सब मिलकर भी प्रदान करने में असमर्थ रहे. इसके विपरीत तथ्य यह है कि धर्म के मान से मानव मुद्दों और जीवन और ब्रह्मांड के सभी प्रश्न बहुत हल्के और सक्षम समाधान दिखने लगते हैं. बिना बरें धर्म चाहे कितना ही दकियानूसी, प्राचीन और बेकार समझा जाए बहरआईना उसे मानना ​​इनकार की तुलना में आसान और अच्छा लगता है. यह वह तथ्य जिसे अब दुनिया अंततः पूरी ताकत के साथ स्वीकार करने लगी है.

वैज्ञानिक जांच और विचारधारा जैसेआधुनिक विचार , मादयत, दृष्टिकोण विकास, हीगल की जददियत मादयत, कांटा के सिद्धांतों आदि जो उन्नीसवीं सदी तक मानव के जीवन की पैदवार था अंततः सब खुद विज्ञान के आधुनिक जांच से गलत साबित हो चुके हैं . आज वैज्ञानिक जांच आध्यात्मिक माोराईत, सार और बा्नयत पूरी तरह साबित कर रही हैं जिससे अंततः धर्म सार्वभौमिक पहचान उभर रहा है. आने वाले समयो में धर्म एक बार पूरी तरह विशव पे राज करे गा और नास्तिकता ख़त्म हो जाए गी .