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एक ही दिन में दो राज्य में हुई 25 लोगों की मौत ने पुलिस को एक बार फिर कठघरे में लाकर खड़ा करा दिया है। खाकी पर खून के छींटे पहले भी लगते रहे हैं मगर इस ओर कभी गंभीरता से ध्यान ही नहीं दिया गया। तेलंगाना के वारंगल में जिस तरह पांच ‘आतंकवादियों’ को मारकर पुलिस ने ‘वीरता’ की पटकथा तैयार की है वह शुरु से ही शक के दायरे को तोड़ने में नाकाम हो रही है। अब इस मुठभेड़ की सीबीआई से जांच कराने की मांग भी की जा रही है। जांच होती रहेगी मगर असल सवाल यह है कि इस तरह फर्जी मुठभेड़ में लोगों को मारकर आखिर कौनसी बहादुरी का परिचय दिया जाता है ?

पुलिस के अनुसार इन पांचों विचाराधीन कैदियों को पेशी पर लाया जा रहा था रास्ते में इनमें से एक विकारुद्दीन ने लघु शंका जाने के लिये गाड़ी रुकवाई और इसी दौरान उन्होंने पुलिस की रायफल छीनकर उन पर गोलियां चलानी चाहीं मगर पुलिस ने जवाबी फायरिंग में उनको वहीं मार डाला। यह तर्क बड़ा ही अजीब है अगर यह मान भी लिया जाये कि गाड़ी रुकवाई गई होगी तो क्या हथकड़ी में जकड़े हाथ पुलिसकर्मी से उसकी रायफल छीनने में सक्षम हैं ? जो तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल हो रही हैं उन्हें देखकर कहीं से नहीं लगता कि इन लोगों ने भागने की या पुलिस पर फायरिंग करने की कोशिश की होगी। इन तस्वीरों को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह मुठभेड़ नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से की गई हत्याऐं हैं जिन्हें मुठभेड़ का नाम दिया जा रहा है। जब उन पांचों आतंकवादियों ने पुलिसकर्मियों के हाथों से रायफलें छीन लीं थीं तो फिर वे उन्हें चला क्यों नहीं पाये ? क्या वे इस इंतजार में बैठे रहे होंगे कि पुलिस उन पर आकर गोलियां चलाये और यूं ही फोटो शूट कराया जाये ? एसा तो नहीं हो सकता जब मुठभेड़ हुई है तो इसमें एक ही पक्ष के लोग मारे गये और दूसरा (पुलिस पक्ष) पर खरौंच तक नहीं आई क्या यह अपने आपमें सवाल पैदा नहीं करता ?

दो अप्रैल को तेलंगाना के सूर्यापेट तीन पुलिस वालों को कथित तौर पर सिमी के आतंकवादियों ने मार दिया था क्या यह मुठभेड़ उस घटना का प्रतिशोध तो नहीं थी ? 17 पुलिसकर्मी पांच विचाराधीन कैदियों में से एक को जिंदा नहीं पकड़ पाये यह कैसे संभव है ? अगर वे अपराधी थे तो उनका सजा इस देश की न्यायपालिका देती या फिर प्रतिशोध की आग में जल रहे वे पुलिसकर्मी जिन्होंने वारंगल में ले जाकर उनको गोलियों से भून डाला ? और पटकथा लिख दी कि ये भागने की कोशिश कर रहे थे क्या वे तस्वीरें झूठ बोल रही हैं जो सोशल मीडिया और तेलंगाना के स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई हैं जिनमें साफ दिख रहा है कि मृतकों के हाथ हथकड़ी से बंधे हुए हैं और उनके ऊपर रायफल पड़ी जिससे साफ जाहिर होता है कि ये उन्हें मार देने के बाद उनके हाथ में थमाई गई हैं। पुलिस का इस तरह बर्बरियत पर उतारू हो जाना विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिये ठीक नहीं है। यह देश कानून से चलता है प्रतिशोध की ज्वाला से नहीं।

जिन सत्रह पुलिस कर्मियों ने इस कथित मुठभेड़ को अंजाम दिया है क्या उन्हें अपना फर्ज जरा भी याद न आया होगा या फिर ‘बहादुरी’ का खिताब पाने के लिये इन विचाराधीन कैदियों की ‘बली’ ली गई है ? इस घटना में मीडिया का रवैय्या भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नजर आया है समाचार पत्रों और टीवी चैनलों ने जिस तरह से इस घटना में शब्दावली इस्तेमाल की है वह एक बार फिर मीडिया की नहीं बल्कि न्यायधीश की भाषा लगती है। मीडिया ने पांचों मृतकों को आतंकवादी कहकर संबोधित किया है यह जानते हुए भी अभी उन पर आरोप तक तय नहीं हो पाया फिर यह गैर जिम्मेदारी का काम ठिटाईपूर्वक किया गया। मीडिया ने पुलिस की थ्योरी को ही ‘सच’ मान लिया और कहीं भी सवाल उठाने की जहमत तक नहीं की। कुछ एसी भूमिका मीडिया ने इशरत जहां और सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में निभाई थी मगर नतीजा क्या निकला वह सबके सामने है। खाकी का इस तरह इंसानों के खून से रंग जाना देश के लिये ठीक नहीं है। जनता में खाकी का सम्मान होना चाहिये खौफ नहीं।