Rape
नहीं स्तन रेप का कारण नहीं ही सकते. जिन छोटी छोटी बच्चियों के स्तन नहीं होते उनका भी रेप ही जाता है.
फिर तो इस वेजाइना के कारण ही रेप होते है. नहीं! child abuse के कितने केस हैं जहा लड़को(baby boy) के रेप होते है। वहा कोई वेजाइना नहीं होती.
यानि रेप पेनिस के कारण होते है.
लेकिन कई हॉस्टलस् और जेल के कितने किस्से सुने है जहा लड़को के रेप होते है। यानि जिनके पास पेनिस है उनका भी रेप होता है। और अगर रेप सिर्फ पेनिस के कारण होते तो गैंग रेप/ रेप के बाद लड़की के शरीर में सरिये कंकर कांच(दिल्ली/रोहतक की घटना,और ऐसी हज़ारो न रिपोर्ट होने वाली घटनाएं) क्यों डालते.
यानि रेप पेनिस वेजाइना (शरीर की संरचना) के कारण नहीं होते।
रेप उस मानसिकता के कारण होता है जो लड़की की शर्ट के दो बटनों के बीच के गैप से स्तन झाँकने की कोशिस करते है. जो सूट के कोने से दिख रही ब्रा की स्ट्रिप को घूरते रहते है. और औरत की स्तन का इमैजिनेशन करते है. जो स्कर्ट पहनी लड़की की टाँगे घूरते रहते है। कब थोड़ी सी स्कर्ट खिसके कब पेंटी का कलर देख सके। पेंटी न तो कुछ तो दिखे।

जो पार्क में बैठे कपल्स को देखकर सोचते है काश ये लड़की मुझे मिल जाये तो पता नहीं मैं ये करदु मैं वो करदु…

वो मानसिकता जब एक दोस्त दूसरे से कहता है – क्या तू अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ रात में रुका और तूने कुछ नहीं किया, नामर्द है क्या.?!
रेप सिर्फ गन्दी मानसिकता के कारण होता है. जहाँ औरत सिर्फ इस्तेमाल का सामान है. इंसान कतई नहीं.

  • मैं और मेरी बे-शर्म बातें”
  • हर महीने मेफ्टल्सपास लू ये पॉसिबल नहीं. दर्द सहने की हिम्मत रखनी पड़ती है. वरना हर महीने पेन किलर खाने से आदत पड जाती है… लेकिन जब बहुत जरुरत पड़ती है तो टेबलेट खा लेती हूँ. पिरिड्स का पहला दिन. लोअर एब्डोमेन ,बैक पेन और पैर जैसे अकड़ने लगते है. मेट्रो में घुसी. सेंट्रल सेक्रिटेरिएट पर इतनी भीड़. सीट मिलने का कोई चांस ही नहीं. ऊपर से लेडिज कोच में भी नहीं चढ़ पायी. स्टेशन पर आते ही ट्रेन आगयी. एक लड़के को बोला एक्सक्यूज्मी प्लीज़ आप उठ जायेंगे, मेरी तबियत ठीक नहीं है. … वो साइड में बैठे दुसरे लड़के की तरफ देखने लगा.., फिर बोला मैं भी अभी बैठा हू। कई लोग सोचते है सीट लेने के लिए लडकिया बहाने बनाती है. और सीट देना कोई आसान बात नहीं है न, चाहे सत्ता की हो या मेट्रो की….फिर मैं बेशर्मी (लोगो की नज़रो में) पर उतर ही आई… भैया पीरियड्स है प्लीज़ ये सीट मुझे दे दीजिये.. इतना सा बोलते ही दोनों लड़के खड़े हो गए.. पूरे सफ़र में सीट पर बैठे दूसरे लोग मुझे घूरते रहे… जैसे जैसे स्टेशन गुजरे कुछ लोग उतरते रहे और इस तरह घूरने वाली आँखे कम होती गयी. और मेरी असहजता भी.मैं सोच रही थी जीवन भी ऐसी ही थ्योरी पर चलता है.. वक्त के साथ असहज लगने वाली सारी सही और नेचुरल बाते सहज सी लगने लगती है….कई सोच रहे होंगे कितनी बद्तमीज है, कुछ ने सोचा होगा बेशर्म है, किसी ने सोचा होगा कुछ और ही कह देती.. अब तक जब भी कॉलेज, ऑफिस, घर के मेल मेंबर, कलीग को अगर कुछ कहना होता था तो पिरिड्स की जगह बोलती थी फीवर है… अब फीवर तब ही बोलती हूँ जब फीवर होता है… अब हर महीने फीवर नहीं पीरियड्स होते है….!!!
  • रेप का सीधा सम्बन्ध अगर कपड़ो से है तो मानव इस दुनिया में वस्त्रो से बहुत पहले आये थे. शरीर को ढंकना है इस बात को समझने के लिए मनुष्य का दिमाग विकसित होने में कई हजारो साल लगे थे. वस्त्रो से पहले तो पेड़ो के पत्ते और जानवरों की खाल भी मनुष्य के शरीर पर कई शताब्दियों तक विराजमान रही. उस समय प्राइवेट पार्ट्स को ढकना जरुरी नहीं था. शरीर को ढकना जरुरी था. शरीर का मतलब तो समझते होंगे ही न आप?!!! जिस हिसाब से लोग ये कहते है के छोटे कपडे रेप का कारण है उस हिसाब से उस समय हर आदमी सिर्फ रेप करने में ही व्यस्त रहता होगा. क्योकि तब न औरत के शरीर कपडे थे न आदमी के…!!!!!!
  • BBC की India’s Daughter डॉक्युमेंट्री देखने के बाद सबसे ज्यादा हैरानी इस बात से हुई कि रेपिस्ट और एक वकील की सोच एकदम एक जैसी थी। रेपिस्ट जो समाज के सबसे निचले तबके से था जहा शिक्षा नाम की कोई चीज़ ही नहीं है और दूसरा वकील साहेब जो अच्छे भले पढ़े लिखे समाज से ताल्लुक रखते है। यानि एक बात तो निश्चित है हमारी शिक्षा प्रणाली में भारी दोष है जो पढ़े लिखे लोग भी वोही मानसिकता रखते है जो अनपढ़ गवार लोग। यही नहीं पिछले कुछ समय में रेप की घटनाओ पर इन एक वकील साहेब ही नहीं संसद में बैठे कई नेताओ व यूपी में ऊँचे ओहदों पर बैठे कई पुलिस अफसरों के बयान भी इसी तरह के आये थे…