islam-sikkism

पंजाब में वर्षों तक देश को तोड़ कर दूसरा देश “खालिस्तान” बनाने के नाम पर आतंकवाद चला लाखों गैर सिखों को पंजाब छोड़ कर देश के दूसरे हिस्सों में भागना पड़ा और यह देशद्रोह था क्योंकि देश को तोड़ने के लिए यह सब किया गया ।स्वर्ण मन्दिर जैसा पवित्र स्थान आतंवादियों का हेड आफिस बन गया जिसके कारण भारत सरकार को आपरेशन ब्लू स्टार चलाना पड़ा और तमाम आतंकवादी मारे गये ।इसी क्रम में इस देश की प्रधानमंत्री की सिखों द्वारा उनके आवास पर छलनी करके हत्या कर दी जाती है और पूरे देश में सिख विरोधी दंगों में हज़ारों हज़ार हताहत होते हैं ।कुछ लोगों के घृणित कुकर्म के कारण पूरे सिख समुदाय को इसका भुगतान करना पड़ता है और अपनी पहचान छुपाने के लिए पगड़ी केश दाढ़ी हटानी पड़ती है और पहनावा तक बदलना पड़ता है ।

इन घटनाओं को 32 वर्ष बाद देश लगभग भूल चुका है और कुछ ही नहीं बहुत से राष्ट्रद्रोही सिखों तक को अपना चुका है जिन्होंने हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया ।
परन्तु बहुमत में सिख समुदाय कांग्रेस और इन्दिरा गांधी के प्रति आज भी नफरत रखता है इसके बावजूद भी सिखों की देशभक्ति पर आज तक किसी ने सवाल नहीँ उठाया सभी सिख सुखी हैं और जहाँ भी हैं सबसे समृद्धि हैं ।।।।

अब दूसरा पक्ष देखें कि भारत में सामुहिक रूप से राष्ट्रद्रोह जैसा कृत्य मुसलमानों द्वारा कभी नहीं किया गया ।राष्ट्रद्रोह के इक दो कोई उदाहरण हैं तो वह उनके विदेशी संपर्कों के कारण या उनके अपने व्यक्तिगत कारणों से हैं यह भी ध्यान दें कि इसी भारत में प्रतिष्ठा का विषय बना दी गई एक मस्जिद को ढहा दिया गया , गुजरात मे सरकार द्वारा प्रायोजित कत्लेआम हो या हाशिमपुरा विभिन्न जगहो पर मुसलमानों को बड़े पैमाने पर काटा मारा गया और सरकारी पुलिस तक को इस कार्य मे लगाया गया वीपी सिंह द्वारा मेरठ में मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे लोगों पर फायरिंग कराई गई पर एक दो व्यक्तिगत घटनाओं के अतिरिक्त पूरा मुस्लिम समाज खामोश रहा और बर्दाश्त करता रहा और पंजाब के आतंकवाद की तरह संगठित होकर कभी देश के विरूद्ध सोचे या अलग राष्ट्र की मांग करे ऐसा एक उदाहरण भी नहीं है ना भविष्य में हो सकता है ।देश में अपराध की ऐसी घटनाएं जिनमे मुसलमान या कुछ मुसलमान शामिल होते हैं उसे संप्रदायिक या आतंवादी घटना करार दिया जाता है और पूरे समाज को कटघरे में खड़ा करके पाकिस्तान का रास्ता दिखाया जाता है चाहे वह कितना भी बड़ा देश भक्त ही क्युँ ना हो ।नौकरी से लेकर व्यवसाय तक में इधर कुछ वर्षों में धर्म के कारण भेदभाव स्पष्ट महसूस किया जा सकता है और यदि फेसबुक की बात करूँ तो यहां तो अपशब्दों की कोई सीमा ही नहीं है ।

यह राजनैतिज्ञों का फैलाया हुआ जहर है जो ऐसी स्थिति में धार्मिक ध्रुवीकरण करके अधिक लाभ कमा रहे हैं परन्तु इसका एक पक्ष और भी है कि बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान इसके कारण अधिक उग्र हो रहे हैं और “अकबरुद्दीन ओवैसी” की विचारधारा से जुड़ रहे हैं जो देश के लिए ठीक नहीं है क्योंकि यह टकराव देश के लिए घातक हो सकता है इसे रोकने की आवश्यकता है और सोचने की भी कि हम इतिहास से क्यों नहीं सीखते ।

अब प्रश्न आप से है कि राष्ट्रद्रोह जैसे कृत्य करने वाले और उसका समर्थन करने वाले कुछ सिखों को आज घृणा की दृष्टि से देखा नहीँ जाता तो हम मुसलमानों को क्युँ ? याद रखें कि एक दलित भक्त “केशव आक्रोशित मन ” कल मेरी आरक्षण की पोस्ट पर एक अलग राष्ट्र “दलितस्तान” का राग अलाप चुके हैं पर वह ऐसा करके भी देशभक्त रहेंगे और हमें बिना किसी कारण के पाकिस्तान का रास्ता दिखाया जाता है ।

क्यों ?? सभ्य शब्दों में जवाब दें ।