bhagatsingh

By मीरा विश्‍वनाथन

भगत सिंह को फांसी देने वाले साम्राज्य का सूरज कब का डूब चुका है, लेकिन भगत सिंह की विरासत आज भी जिंदा है। हम आज जिस तरह की दुनिया में रह रहे हैं, जिस तरह के सवालों से जूझ रहे हैं, उसमें उनका काम और उनके विचार और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।

पिछले कुछ सालों में आश्चर्यजनक रूप से भगतसिंह के प्रति लोगों का नए किस्‍म का रूझान देखने को मिल रहा है। संसद ने उन्हें एक मूर्ति के जरिए ‘अमर’ करने की कोशिश की है, जिसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं। संघ परिवार उन्हें आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि मानता है, ओपीनियन पोल वाले उन्हें गांधी से भी अधिक महान बता रहे हैं। और भला फिल्मों की भरमार को कैसे भूला जा सकता है- कुल पांच फिल्में बनीं। ये सभी फिल्‍में भगतसिंह के जीवन और उनकी शहादत के प्रति समर्पित थीं, जिनमें बॉबी देओल और सनी देओल जैसे अभिनेता व्यर्थ ही अपने शरीर का प्रदर्शन करते हुए देखे गए।

यह पूरा उद्योग भगतसिंह की छवि को भुनाने के लिए आगे आ गया है। कुछ वैसे ही जैसे कि चे ग्वेरा पैकेज करके बेचे जाने वाले उत्पाद में बदल दिए गए। एक तरह का राजनीतिक स्मृति-भ्रंश है जो इस तरह की पैकेजिंग का साथ देता है । भगत सिंह के विचारों को तिरोहित कर उनकी राजनीति को महज एक प्रतीक में बदला जा रहा है। यहां भगतसिंह की शहादत ‘सर्वोच्च बलिदान’ के मूर्त रूप के बतौर मानी जाती है, लेकिन उनके जीवन संघर्ष और उनकी राजनीति को महज एक टोकन के रूप में सीमित किया जा रहा है। इन फिल्‍मों से भगतसिंह की छवि एक ऐसे बॉलीवुड अभिनेता की बनती है जो सरसों के खेतों में ‘रंग दे बसंती’ गा रहा है, फिर पिस्तौल लेकर एक अंग्रेज को मार देता है और ‘भारत माता’ की सेवा में स्वयं फांसी पर लटक जाता है। एक क्रांतिकारी जीवन का महान संघर्ष, उसका साहस और बलिदान, राजनीतिक शिक्षा की कष्ट-साध्य प्रक्रिया सब कुछ मीडिया द्वारा बनायी सिनेमाई छवि में धुल जाता है।

सिनेमा के जरिए भगत सिंह के जो पाठ प्रस्तुत किए गए उनमें सबसे ज्यादा अपढ़ (सबसे ज्यादा सफल होने के बावजूद) पाठ शायद राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का था। संक्षेप में कहें तो फिल्म की कहानी इस तरह है- एक संघर्षशील ब्रिटिश फिल्म निर्माता को अपने दादा की डायरी मिलती है, जिसमें भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, अशपफाकउल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन, उनके साहसिक कारनामों और उनकी शहादतों का ब्यौरा है। वह इन क्रांतिकारियों पर फिल्म बनाने के निश्चय के साथ भारत आती है। यहां आकर वह पांच नौजवानों के एक ग्रुप से मिलती है, जो एकदम ही बेपरवाह किस्म के हैं। अपनी फिल्म में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने के क्रम में वह डायरी में उल्‍लेखित क्रांतिकारियों के जीवन से उनका परिचय कराती है। इसी दौरान उनके एक दोस्त की मिग हादसे में मौत हो जाती है। इस प्रकिय्रा से गुजरते हुए नौजवान इस समझ पर पहुंचते हैं कि सरकार और भ्रष्‍ट नेता भारत की सभी समस्‍याओं की जड् हैं।

परिणामस्वरूप अपने दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए वे रक्षा मंत्री की हत्या कर देते हैं। साथ ही एक रक्षा-उपकरणों के एक भ्रष्‍ट डीलर की भी हत्या कर देते हैं, जो इन पांचों में से ही एक का पिता है। इन हत्याओं का औचित्य बताने के लिए वे ऑल इण्डिया रेडियो के स्टेशन पर कब्जा कर लेते हैं, लेकिन कमांडो उन्हें मार गिराते हैं। वैसे इससे पहले वे सच से पर्दा उठा देते हैं। इन पांचों ‘शहीदों’ की मृत्यु को मीडिया मुद्दा बनाता है और आखिरी दृश्य में एक ‘युवा भारत’ दिखाया गया है, जो इन मौतों के चलते गुस्से में है और कुछ करना चाहता है।

रंग दे बसंती की तारीफ इसके ताजे लुक और ‘युवा अपील’ के चलते हुई। फिल्म के रिलीज होने के महीनों पहले इसका प्रचार हुआ और बहुत से ब्रांड इसके साथ जुड़े, साथ ही इसे गणतंत्र दिवस के दिन रिलीज किया गया था। फिल्म के रिलीज के बाद विभिन्न पुरस्कारों और उनके लिए नामित किए जाने का सिलसिला चला, जिसमें इस फिल्म को आधिकारिक रूप से भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए नामित किया जाना भी शामिल था। जिस चीज ने और भी ध्यान खींचा, वह थी मिडिया द्वारा पैदा की गई बहस कि इस फिल्म ने युवा सक्रियता के नए द्वार खोल दिए हैं। चाहे जेसिका लाल या प्रियदर्शिनी मट्टू के लिए न्याय की मांग करते हुए निकलने वाले मोमबत्ती जुलूस हों या फिर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे मेडिकल कॉलेजों के छात्रा, इन सबको मीडिया ने ‘आर.डी.बी. इफेक्ट’ के रूप में दिखाने की कोशिश की। रंग दे बसंती को इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि मानों इसने जनपहलकदमी का नया द्वारा खेला दिया हो।

लेकिन इस फिल्म या इस तरह की अन्य फिल्मों की समस्या यह है कि ये भगतसिंह और उनके साथियों के बारे में जितना बताती हैं, उससे अधिक छिपाती हैं। ये उनकी राजनीति के बारे में कुछ नहीं कहती, सिर्फ उन्हें राष्ट्रवादी के रूप में दिखाती है, जो ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने से अधिक कुछ नहीं चाहते थे। ये फिल्‍में मध्यवर्ग के भ्रष्टाचार के बारे में गुस्से को सामने लाते हुए यह सुझाती हैं कि यदि भ्रष्ट नेताओं को मार दिया जाए तो देश में सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा। भूमण्डलीकृत दौर के लिए कॉरपोरेट द्वारा पैकेज किया हुआ ‘विरोध’ इस बात से पूरी तरह इनकार करता है कि किसी तरह के ढांचागत परिवर्तन की आवश्यकता है। भगतसिंह के साम्राज्यवाद या सांप्रदायिक एजेंडे के बारे में क्या विचार थे, जाति आधारित उत्‍पीड्न के बारे में वे क्या सोचते थे, देश के किसानों और मजदूरों को वे कितना महत्व देते थे, यह सब गायब है। उनकी राजनीति के मार्क्सवादी पहलू को सिरे से खामोश कर दिया गया है।

जिस तरह की सामान्य धरणा बनाई गई है, उसमें बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि भगतसिंह की राजनीति कितनी विस्तृत और मुखर थी। उनकी जेल नोटबुक में बहुत से लेखकों के पैराग्रापफ नोट किए गए हैं। इनमें मार्क्स-एंगेल्स से लेकर रूसो, देकार्त, स्पिनोजा, मार्क ट्वेन, रवीन्द्रनाथ, दोस्तोयेव्स्की और अरस्तू जैसे लेखकों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह लिस्ट काफी विस्तृत है। किताबों के लिए उनकी भूख तब और भी बढ़ गई, जब वे जेल में थे और अपनी तयशुदा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। फांसी के लिए ले जाए जाने के कुछ मिनट पहले भी वे लेनिन की किताब पढ़ रहे थे। पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश ने ठीक ही लिखा है कि भगतसिंह ने लेनिन की किताब को जहां पढ़ना छोड़ा था, उसके आगे के पृष्ठों को पढ़ने की जिम्मेदारी आज के भारत के नौजवानों की है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भगत सिंह के राष्ट्रवाद में छात्रों और नौजवानों को केन्द्रीय भूमिका अदा करनी थी। लेकिन हिंसा की अराजक कार्रवाइयों में उतर पड़ने की जगह उन्होंने अपील की कि छात्रा-नौजवान जनता के बीच और गहरे पैठें, वे मजदूरों की कॉलोनियों और ग्रामीण गरीबों की झोपड़ियों में जाएं। यही वह परंपरा थी जिसने जे.एन.यू. छात्रासंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद को क्रांतिकारी जीवन के लिए प्रेरित किया, जो भाकपा (माले) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर अपने घर सिवान वापस लौटे, जहां माफिया डॉन और राजद के सांसद शहाबुद्दीन के लोगों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। (कुछ समय से हम सुन रहे हैं कि महेश भट्ट चंद्रशेखर प्रसाद पर एक फिल्म बनाने वाले हैं। इसका तो सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड उनकी राजनीति में से किस चीज को दिखाना चाहेगा।)

भगतसिंह के शुरुआती लेखन में अराजकता और क्रांतिकारी आतंकवाद की तरफ थोड़ा झुकाव है, लेकिन उन्होंने बहुत जल्दी मार्क्सवाद के क्रांतिकारी सारतत्व को आत्मसात कर लिया। उन्होंने एक संगठित कम्युनिस्ट पार्टी की आवश्यकता पर जोर दिया और स्वतंत्रता व समाजवाद के लिए कम्युनिस्ट राजनीति की केन्द्रीयता पर बल दिया। संघर्ष के सभी रूपों के संयोजन की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा दस्तावेज तैयार किया जिसमें चीजों के प्रति सारगर्भित और तर्कसंगत रुख लिया गया है। गांधीवादी संघर्ष के जरिए जनता की बड़े पैमाने पर गोलबंदी की प्रशंसा करते हुए भी उन्होंने कांग्रेस के वर्ग चरित्र का स्पष्ट किया और मजदूरों के राजनीतिकरण की कोशिश के गांधीवादी विरोध के प्रति आगाह किया था। उन्होंने ‘भूरे साहबों’ के राज्य की स्थापना के खतरे के प्रति सचेत करते हुए कहा कि यह केवल साम्राज्यवादी शासन की, एक चेहरे से दूसरे चेहरे की अदलाबदली होगी, जहां बहुसंख्यक भारतीयों, मजदूरों और किसानों का शोषण जारी रहेगा।

आज के दौर में भगतसिंह का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब हम देखते हैं कि हमारे भारत के शासकों ने खुद को साम्राज्यवादी और नव-उदारवादी राजनीति की सेवा में अर्पित कर दिया है। हमारी संप्रभुता विदेशी हितों के समक्ष गिरवी रख दी गई है, बड़े-बड़े भूखण्ड कर-मुक्त करके कारपोरेट लूट के लिए भेंट कर दिए गए हैं। जब लोग हक मांगते हैं राज्य अपनी आंखें मूंद लेता है, और जब विरोध करते हैं तो राज्‍य द्वारा लोगों पर कहर बरपाया जाता है। युद़ध की सी स्थिति घोषित कर दी गई है जो ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से जारी है, जिसके निशाने पर हमारे देश के सबसे गरीब लोग, दलित और आदिवासी हैं। आज भारतीय राज्य विरोध का झंडा उठाने वालों को उसी निर्ममता से गोलियों का निशाना बना रहा है, जैसे उनके उपनिवेशवादी पूर्वज करते थे। ऐसे में हमें भगतसिंह की बातें याद आती हैं। अपनी फांसी के तीन दिन पहले उन्होंने पंजाब के गवर्नर को पत्रा में लिखा था कि-

हम यह कहना चाहते हैं कि युद़ध छिडा हुआ है और यह लडाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शाक्तिशाली व्‍यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे अंग्रेज पूंजीपति हों… या शुद़ध भारतीय पूंजीपतियों द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो, तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पडता।… परंतु युद़ध चलता रहेगा। हो सकता है कि यह लडाई भिन्‍न–भिन्‍न दशाओं में भिन्‍न–भिन्‍न स्‍वरूप ग्रहण करे। किसी समय यह लडाई प्रकट रूप ले ले, किसी समय गुप्‍त रूप से चलती रहे… । यह आपकी इच्‍छा है कि आप चाहे लडाई के जिस रूप को चुन लें, परंतु यह लडाई जारी रहेगी।… यह युद़ध तब तक समाप्‍त नहीं होगा, जब तक कि समाज का वर्तमान ढांचा समाप्‍त नहीं होता, समाजवादी गणराज्‍य स्‍थापित नहीं होता…। तभी शोषण के सभी रूपों का खात्‍मा होगा और वास्‍तविक और स्‍थाई शांति के युग में मानवता प्रवेश करेगी।

भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में बात करना वस्‍तुत इतिहास पर पुनः दावेदारी और उसे अपना बनाने का मसला है। फिल्मों से परे, संसद में प्रतिमा से परे और भारत के शासक वर्ग द्वारा भगत सिंह की विरासत को हजम कर जाने की कोशिशों से भी परे, भगत सिंह की याद जिंदा है। यह कय़यूर और पुन्नप्रा वायलार में जिंदा है। तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम्, भोजपुर और नंदीग्राम में जिंदा है। भगत सिंह हमारे समय के संघर्षों में जिंदा हैं जहां ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का नारा आज भी गूंजता है।

(जनमत से साभार)