gandhi

जब गाँधी और गोडसे मुस्कुराये
दिल्ली-मुम्बई राजधानी एक्प्रेस,
डब्बा, प्रथम श्रेणी
दो अपरचित लोग
एक लड़का, एक लड़की
आमने-सामने की सीट पर
हाथों में किताब लिये बैठे हैं ।

दोनों चोर नजरों से
एक-दूसरे के किताब के कवर को देख रहे हैं
लड़का पढ़ रहा है
“MY EXPERIMENT WITH TRUTH”
लड़की पढ़ रही है
“मी नाथूराम गोडसे बोलतया।”

तलब दोनों में है
बात करने की
किताबों की च्वाईस को लेकर
पर अपरचितों में पहल का इंतेजार रहता है ।

बात लड़का शुरु करता है
जैसा की होता है

बात होती है
तो खूब होती है
पर ये नहीं
कि तब गाँधी सही थे
या गोडसे
न तो गाँधी की महानता पर प्रश्न उठा
न गोडसे की अँधी देशभक्ति पर।

फिर लड़का बोला-
“वह गाँधी को इसलिए पढ़ रहा है
कि गोडसे को समझ सके”
यह सुनकर लड़की मुस्कुराई
सोची-
मैं भी तो गोडसे को इसलिए पढ़ रही हूँ
ताकि गाँधी को समझ सकूँ ।

लड़की मुस्कुराकर बोली-
मैं गाँधी के पोते की पोती हूँ ।

लड़का मुस्कुराया,
मुस्कुराहट में झिझक है
थोड़ा रुककर बोला-
“मैं गोडसे के भाई का पोता हूँ।”

राजधानी एक्प्रेस के उस डब्बे में
इतिहास ठहर गया
उस दुर्लभ संयोग पर
दोनों की मुस्कुराहट देखने ।

दोनों के विचार मुस्कुराये
आँखें मुस्कुराई
एक कसक उभरा
मन और मन के बीच
प्रेम का अंकुर सरसराया
दो दिलों में ।

और वहाँ ऊपर,
गाँधी और गोडसे मुस्कुराये
यह सोचकर,
कि इन दो बच्चों के बहाने
दुनिया में यह संदेश जायेगा
“कि नफरत स्थाई नहीं होता !”