aadha-gaun

राही मासूम रज़ा का चर्चित उपन्यास आधा गांव उत्तर प्रदेश के एक नगर गाजीपुर से लगभग ग्यारह मील दूर बसे गांवगंगोली के शिक्षा समाज की कहानी कहता है। राही नें स्वयं अपने इस उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा कि “वहउपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था। मैं गाजीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा। अगरगंगोली की हकीकत पकड़ में आ गयी तो मैं गाजीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा”।

आधा गांव राही जी का सबसे प्रसिद्ध और सबसे श्रेष्ठ उपन्यास माना जाता हैं । इसकी कहानी और इसका अंदर का मर्म इसेएक अलग मुकाम पर ला देता हैं । आज राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि . इस अवसर पर पढ़ें उनके उपन्यास ‘आधा गांव ‘ का अंश।

मेरा गाँव, मेरे लोग

मैं गोरी दादी के आँगन से भागता हुआ दक्खिन वाले तीन-दर्रे में घुस गया। ठोकर लगी, गिर पड़ा। भाई साहब मेरे पीछे-पीछे भागे आ रहे थे।बात यह हुई थी कि बाजी ने धनया बनाकर बक्स में छुपा रखी थी। हमने देख लिया। धनया ख़त्म हो गयी। बाजी ने अम्माँ से शिकायत की।अम्माँ ने हमें दौड़ा लिया— इसलिए हम भाग रहे थे।

भाई साहब ने लपककर मुझे उठाया ही था कि अम्माँ का हाथ सिर पर दिखायी दिया। मैं तो गिरई मछली की तड़पकर उनके हाथों से निकलगया। लेकिन भाई साहब के बाल अम्माँ के हाथों में आ गये। मैं चुपचाप वहाँ से सरक लिया। सामने ही नईमा दादी की ख़लवत का छोटा-सादरवाज़ा था, मैं ख़लवत में घुस गया।

ख़लवत के छोटे-से आँगन में अमरूद के एक पेड़ के बाद कुछ बचता ही नहीं था, मुश्किल से दो खटोले पड़ जाते थे, उनमें से एक खटोले परनइमा दादी लेटी हुई तसबीह फेर रही थी; और उनके सिर के पास से गुज़रनेवाली अलगनी पर दो काले कुरते, दो काले आड़े पाजामे और दो कालेदुपट्टे पड़े हुए सूख रहे थे। एक दुपट्टे के कोने से काला रंग बूँद-बूँद टपक रहा था और खटोले की सुतली को भिगो रहा था।

मुझे नहीं मालूम कि मँझले दादा के अब्बा को इन नइमा दादी में ऐसी कौन-सी बात नज़र आयी थी कि उन्होंने एक अच्छी-खासी गोरी-चिट्टीदादी को छोड़कर करइल मिट्टी की इस पुतली को निक़ाह में ले लिया और फिर उनके लिए उन्होंने यह ख़लवत बनवायी। नईमा दादी बहरहालजुलाहिन थीं और सैदानियों के साथ नहीं रह सकती थीं। पुराने ज़माने के लोग इसका बड़ा ख़याल रखा करते थे कि कौन कहाँ बैठ सकता है औरकहाँ नहीं। मेरी समझ में ये बातें नहीं आतीं, लेकिन मेरी समझ में तो और बहुत-सी बातें भी नहीं आतीं। मेरे समझ में तो यह भी नहीं आता किमँझले दा के एकलौते बेटे गुज्जन मियाँ उर्फ़ सैयद ग़ज़नफ़र हुसैन ज़ैदी यानी छोटे दा ने एक अच्छी-ख़ासी, गोरी-चिट्टी, गोल-मटोल, चिकनी-चुपड़ी हुस्सन दादी को छोड़कर ज़मुर्रुद नामी एक रण्डी को क्यों रख लिया ? मैंने ज़मुर्रुद को नहीं देखा है, लेकिन हुस्सन दादी को मैंने अपनीआँख खोलने से लेकर उसकी आँख बन्द हो जाने तक देखा है। वह बड़ी कंजूस थीं, मगर बड़ी ख़ूबसूरत थीं। ज़मुर्रुद को गंगौली की किसी औरतने नहीं देखा था, मगर सभी का यह ख़याल था कि उसने गुज्जन मियाँ पर कोई टोना-टोटका कर दिया है; इसीलिए गंगौली की तमाम औरतों कोपक्का यक़ीन था कि वह बंगालिन है, हालाँकि वह बाराबंकी की थी।

लेकिन गंगौली की औरतों को गुज्जन मियाँ से यह शिकायत नहीं थी कि उन्होंने कोई रण्डी डाल ली है। रण्डी डाल लेने में कोई बुराई नहीं,लेकिन हुस्सन जैसी खूबसूरत बीवी को छोड़ना अलबत्ता गुनाह है। आख़िर अतहर मियाँ ने कानी दुल्हन यानी राबेया बीवी से निभायी कि नहीं !जबकि अतहर मियाँ की गिनती खूबसूरतों में होती थी। मगर उन्हें खुदा करवट-करवट जन्नत दे, उन्होंने कभी कानी दुल्हन का दिल न मैलाहोने दिया, जबकि उन्हीं दिनों उस खाहुनपीटी जिनती नाइन की जवानी ऐसी फटी पड़ रही थी कि मियाँ लोग पोगल हुए जा रहे थे, और हरब्याहता को