bagdadi

जब 8 अप्रैल 2013 में आई.एस.आई.एस. (इस्लामिक स्टेट आफ सीरिया एंड इराक) के गठन का एलान हुआ तो दुनिया ने इसे भी पिछले 12 सालों से उस क्षेत्र में छोटे बड़े प्रतिक्रियावादी सशस्त्र संगठनों की तरह ही देखा, लेकिन जैसे ही 29 जून 2014 को आई.एस.आई.एस. प्रमुख अबू बकर अलबगदादी ने अपने को मुसलमानों का खलीफा घोषित किया तो अमरीका और उसके अरब मित्रों समेत पश्चिमी दुनिया की जैसे आँखों की नींद ही गायब हो गई। इसके साथ ही अलबगदादी ने वह सब कुछ किया जिसकी अपेक्षा एक अति महत्वाकांक्षी और विस्तारवादी लड़ाका नेता से की जा सकती है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उसने खिलाफत की घोषणा करने से पहले ऐसा कुछ नहीं किया था जिस पर उस क्षेत्र के सबसे बड़े खिलाड़ी अमरीका समेत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सतर्क नहीं हो जाना चाहिए था। दस हजार लड़ाकों के साथ सीरिया और इराक को फतह करने के लिए युद्ध कर रहे बगदादी की सैन्य तैयारियों के बारे में अमरीका को कोई जानकारी इतनी देर से प्राप्त हुई इस पर विश्वास कर पाना मुश्किल है। इस मामले में अमरीका की भूमिका इसलिए भी संदिग्ध हो जाती है कि इराक में उसका प्रत्यक्ष दखल है। सीरिया में असद सरकार को उखाड़ फेकने के लिए वह बागियों को खुफिया जानकारियों के अलावा सामरिक सहायता भी करता रहा है। सवाल यह भी है कि जिस स्तर पर आईएसआईएस अपनी सैन्य गतिविधियाँ चला रहा है और अपने कब्जा वाले क्षेत्र में लोगों को सुविधाएँ दे रहा है उसके लिए हथियार और वित्तीय संसाधन कहाँ से प्राप्त होता है।

इस्लामिक स्टडीज में पी.एच.डी. अबू बकर अलबगदादी एक मस्जिद में इमामत करता था और उसी से जुड़े हुए एक छोटे से मकान में रहता था। 2003 में इराक पर अमरीकी हमले के बाद उसने जमात सुन्नह वल जमाअह नामक एक छोटा संगठन बनाया जिसका वह स्वंय मुखिया था। अमरीकी रक्षा विभाग के अनुसार उसे वर्ष 2004 में फरवरी से दिसम्बर तक इराक के बुक्का कैम्प में नजरबंद रखा गया था। उसकी नजरबंदी सैन्य नहीं बल्कि नागरिक नजरबंदी थी। इसका मतलब यह कि उस समय तक उसकी कोई हथियारबंद सरगरमी नहीं थी। लेकिन बुक्का कैम्प के अमरीकी कमांडर केनिथ किंग के अनुसार अलबगदादी की नजरबंदी की अवधि 2005 से 2009 तक थी। यह बात संदेह पैदा करने वाली है कि नजरबंदी से पहले जिस व्यक्ति की कोई हथियारबंद सरगरमी नहीं थी वह नजरबंदी के तुरंत बाद 2010 में अलकायदा जैसे संगठन में इराक के प्रमुख के पद पर कैसे पहुँच गया? क्या उसकी नजरबंदी और आतंकी संगठन अलकायदा के इराक के प्रमुख बनने में कोई सम्बंध है?

इराकी अलकायदा का प्रमुख बनते ही 2011 में उसने उम्मुलकरा मस्जिद पर हमला किया। उसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद उसकी मौत का बदला लेने के लिए इराक में कई आतंकी हमले किए। अमरीकी सैनिकों की वापसी के बाद इराक के रेडिकल शिया नेता मुक्तदा असद की मेंहदी आर्मी पर हमले किए। यह सब कार्रवाइयाँ अलकायदा के तौर तरीकों से मेल नहीं खातीं। अलकायदा का मस्जिदों पर हमले का कोई रिकार्ड नहीं है। मुक्तदा असद की अमरीका विरोधी नेता की छवि है। उसकी मेंहदी आर्मी अमरीका विरोधी कार्रवाइयों में शामिल रही है और अलकायदा की बुनियाद ही अमरीका विरोध पर है। ऐसे में जाहिरी तौर पर बगदादी और अमरीका के बीच जो कुछ दिखाई देता है और अमरीका जो कुछ प्रचारित कर रहा है उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यदि यह मान भी लिया जाए कि बगदादी ने मस्जिद पर हमला अपने विरोधियों पर निशाना साधने के लिए किया था या मेंहदी आर्मी पर हमले का कारण उसकी शिया दुश्मनी थी या कट्टर सुन्नी छवि बनाने के लिए उसने यह हमले किए थे तो भी बाद की घटनाएँ इस धारणा को पुष्ट नहीं करतीं। बगदादी की कार्रवाइयाँ अब तक इराक तक सीमित थीं और उसके संगठन का नाम इस्लामिक स्टेट आफ इराक था।

अप्रैल 2013 में बगदादी ने इस्लामिक स्टेट आफ इराक का विस्तार करके इसमें सीरिया को भी जोड़ दिया। अब यह संगठन इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया ;प्ैप्ैद्ध बन गया। सीरिया में अलकायदा समर्थित संगठन अन्नुसरा पहले से ही काम कर रहा था। पहले बगदादी ने अन्नुसरा के आई.एस.आई.एस. में विलय की बात कही लेकिन अन्नुसरा प्रमुख मुहम्मद अलजवलानी ने उसका सख्त विरोध करते हुए अलकायदा प्रमुख अलजवाहिरी से आई.एस.आई.एस. की शिकायत की। अलजवाहिरी ने बगदादी को आई.एस.आई.एस. को खत्म करने का फरमान जारी किया लेकिन बगदादी ने उसे मानने से इनकार कर दिया। उसने सीरिया के शहर अल रकाह से अन्नुसरा को बाहर कर दिया। 2014 के शुरू में ही अलकायदा ने आई.एस.आई.एस. से अपने सम्बंध तोड़ लिए। इस तरह जाहिरी तौर पर एक ही दुश्मन के खिलाफ एक ही मकसद के लिए लड़ने वाले एक दूसरे के अस्तित्व के दुश्मन हो गए। अपने मिशन में सफलता का आभास हो जाने के बाद किसी अति महत्वाकांक्षी नेता से इस प्रकार के व्यवहार से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब बगदादी ने अलकायदा के खिलाफ टकराव का रास्ता चुना था उस समय तक परिस्थितियाँ उसके लिए बहुत अनुकूल नहीं थीं।

बगदादी जब अलकायदा जैसे संगठन के खिलाफ बल प्रयोग करता है और उनके प्रभाव क्षेत्र पर कब्जा करता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह एक महत्वाकांक्षी लड़ाका नेता है जो धर्म को अपने मकसद के लिए इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन जब वह अपने आपको मुसलमानों का खलीफा घोषित करता है तो उसकी तस्वीर एक कट्टर धार्मिक नेता के तौर पर उभरती है जो धार्मिक वर्चस्व के लए रण में कूद गया है, लेकिन दोनों ही हालत में जिन आर्थिक और सामरिक संसाधनों की जरूरत होती है उसकी आपूर्ति के स्रोतों को देखते हैं तो एक तीसरी चीज सामने आती है और वह है साम्राज्यवाद का क्रूर चेहरा। आई.एस.आई.एस. का आर्थिक स्रोत है तेल जो वह अपने कब्जा क्षेत्र के कुओं से निकाल कर बेचता है। यदि उसकी आमदनी का यह स्रोत बंद हो जाए तो बिना युद्ध के ही उसे परास्त किया जा सकता है, लेकिन पूरी दुनिया में पाबंदियाँ लगाने और उसकी पहरेदारी करने वाले अमरीका और यूरोप के देशों की कंपनियाँ ही आई.एस.आई.एस. द्वारा बेचे जाने वाले सस्ते तेल की सबसे बड़ी खरीदार है। इसी तेल की आमदनी पर ही उसका अस्तित्व टिका हुआ है। आई.एस.आई.एस. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्य से बहुत कम कीमत पर तेल बेच कर प्रतिदिन एक से तीन मिलियन डालर अर्जित करता है।

यूरोप के कई देश आई.एस.आई.एस. से कच्चा तेल खरीदते हैं अब इस बात में कोई संदेह नहीं है। यह बात स्वयं जना हाइबसकोवा ने स्वीकार किया है जो यूरोपियन यूनियन की इराक में अम्बेसडर हैं। उन्होंने यूरोपियन फारेन अफेयर्स कमेटी के सामने बोलते हुए कहा कि यूरोपियन यूनियन के कुछ सदस्य आई.एस.आई.एस. से तेल खरीदते थे। हालाँकि उन्होंने उन देशों के नाम नहीं बताए। अमरीकी कंपनियाँ भी ब्लैक मार्केट से इस तेल को खरीदने में पीछे नहीं हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि इस प्रकार से बेचा जाने वाला तेल सऊदी अरब और जार्डन के रास्ते गन्तव्य देशों तक पहुँचता है। सऊदी अरब और जार्डन, अमरीका और उसके द्वारा दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध करने वाले मित्र देशों के बहुत करीबी माने जाते हैं। यह किसी पेड़ को सुखाने के लिए उसकी जड़ में पानी देने जैसा है। दूसरी तरफ अमरीकी कंपनियाँ इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र से तेल की कालाबाजारी कर रही हैं। कुर्दिस्तान से कच्चा तेल अमरीका में टेक्सास की गालवेस्टन बंदरगाह पर पहुँचाया जाता है यह जानकारी अमरीकी प्रशासन को भी है। कोस्टगार्ड के एक अधिकारी सैंडी कैड्रिक के अनुसार उसने यूएस नेशनल सेक्योरिटी कौंसिल और होमलैंड सेक्योरिटी डिपार्टमेंट को टेक्सास की गालवेस्टन बंदरगाह पर आने वाले कुर्दिस्तानी कच्चे तेल के बारे में सूचना दी थी। अमरीकी कानून के अनुसार किसी भी स्वायŸा देश की सरकार से इतर किसी भी स्वायत क्षेत्र से या गैर सरकारी प्रतिष्ठान से तेल की खरीदारी गैरकानूनी है। कुर्दिस्तान क्षेत्र से अमरीकी कंपनियों के तेल खरीदने पर अमरीकी सरकार ने चिंता भी जताई लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए उसने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। जबकि बहुत पुरानी बात नहीं है जब अमरीकी नवसेना ने कथित रूप से लीबियाई मिलीशिया द्वारा बेचे गए तेल को ले जा रहे उत्तर कोरियाई जहाज को सीज कर दिया था। यूरोपीय यूनियन के देशों और अमरीकी कंपनियों का आई.एस.आई.एस. और कुर्द लड़ाकों से कच्चा तेल खरीदने और उन देशों की तरफ से इसके खिलाफ कोई सख्त कदम न उठाने से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि परिस्थितियों का लाभ उठाना उनकी प्राथमिक्ता है न कि आई.एस.आई.एस. को खत्म करना जैसा कि वह दावा करते हैं।

इसका एक और महत्वपूर्ण पक्ष है आई.एस.आई.एस. को हथियारों की आपूर्ति। आई.एस.आई.एस. जिन हथियारों से यह युद्ध लड़ रहा है उसका पचासी प्रतिशत हिस्सा अमरीकी और यूरोपीय हथियारों का है। एक तरफ इन देशों की कंपनियाँ आई.एस.आई.एस. से तेल खरीदकर उसे आर्थिक रूप से मजबूत कर रही हैं दूसरी और उन्हीं देशों के हथियार इस कथित आतंकवादी संगठन को उपलब्ध हैं। आई.एस.आई.एस. के खिलाफ लड़ाई में एक अहम और निर्णायक मोड़ उस समय आया था जब उसके लड़ाके बड़ी सख्या में कुर्दों के घेरे में आ गए थे लेकिन अमरीका ने उस नाजुक मोड़ पर कुर्दों को दिए जाने वाले हथियार बगदादी के समर्थकों के क्षेत्र में गिरा दिए जिससे पूरी बाजी पलट गई। इस गलती का सारा ठीकरा अमरीका ने इराकी पाइलटों के सिर फोड़ दिया और कहा गया कि अनुभवहीन इराकी पाइलटों की गलती से ऐसा हुआ। जबकि यह पूरा आपरेशन अमरीका की निगरानी में चल रहा था। अमरीका और उसके मित्र देश इराक सरकार को नजरअंदाज करके कुर्द लड़कों को आई.एस.आई.एस. से लड़ने के लिए हथियार दे रहे हैं। पश्चिम की इस नीति से केवल इराक की सम्प्रभुता ही आहत नहीं होती बल्कि आने वाले समय में उसके अस्तित्व को गम्भीर खतरा हो सकता है। अमरीका की इस रणनीति को विशेषज्ञ भविष्य में अलग कुर्दिस्तान राज्य के लिए सशस्त्र संघर्ष की भूमिका के तौर पर देख रहे हैं जो ईरान और तुर्की जैसे देशों को भी अपनी लपेट में ले लेगी। इस तरह यह पूरा क्षेत्र अशांति की भेंट चढ़ जाएगा। इस तरह देखा जाए तो अमरीका केवल आई.एस.आई.एस. के पैदा करने का ही जिम्मेदार नहीं बल्कि इस बहाने से उसे मध्यपूर्व में एक बार फिर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का मौका मिल गया है जहाँ उसकी कंपनियाँ कच्चे तेल और हथियारों की कालाबाजारी कर रही हैं। दिन के उजाले में वह साँप मारने का नाटक करता है और दुनिया की आँख में धूल झोंककर रात के अंधेरे में उसे दूध भी पिलाता है। जेहादी या आतंकवादी संगठन के तौर पर प्रचारित करके दुनिया को डराना और फिर इस काल्पनिक खतरे से निपटने के नाम पर अपने हित साधने का यह अमरीकी हथकंडा है। अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन से लेकर इराक में आई.एस.आई.एस. और अलबगदादी के उदय तक अमरीकी साम्राज्य का इतिहास गंदगी से भरा हुआ है। यदि दुनिया अब भी न चेती तो भविष्य में भी वह ऐसे खतरों से पाक नहीं हो सकेगी।

जहाँ तक मुस्लिम जगत का सम्बंध है उसने अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है। वह आई.एस.आई.एस. के तौर तरीकों को पहले ही एक स्वर में गैर-इस्लामी करार दे चुका है। जार्डेन के पाइलट को जिस क्रूरता के साथ आई.एस.आई.एस. ने जला कर मारा है उसकी पूरी इस्लामी दुनिया में निंदा हुई है। अमरीका विरोधी माने जाने वाले यूसुफ अल-करजावी ने भी उसकी इस हरकत को इस्लाम मुखालिफ बताते हुए कहा है कि आग से जला कर मारने की सजा की इस्लाम में कोई गुंजाइश नहीं है चाहे वह दुश्मन सेना का हमलावर सिपाही क्यों न हो। आई.एस.आई.एस. इस्लाम और मुसलमानों का शुभचिंतक नहीं दुश्मन है।

sources—-   http://loksangharsha.blogspot.com/2015/03/2.html