Nagalandlynching

कल की मेरी प्रातः की पोस्ट ” दीमापुर” के बाद लगातार कुछ नये तथ्य मिलते रहे और शाम को वहां रहने वाले मेरे एक फेसबुक मित्र के अनुसार “””घटना के दिन सभी बाजार बंद हो गए और इस घटना के बाद से दीमापुर में “नगा स्टूडेंट फेडरेशन” ने छात्रा के समर्थन में मार्च निकाला और “वी वॉन्ट जस्टिस” के नारे के साथ धीरे-धीरे ये प्रदर्शन तेज होता गया और इसने उग्र रूप धारण कर लिया भीड़ दीमापुर सेंट्रल जेल की तरफ बढ़ने लगी। शाम 4 बजे के करीब भीड़ ने सेंट्रल जेल पर कब्जा कर लिया और आरोपी को वहां से निकाल लिया 7 किमी तक नग्न कर के घुमाते हुए 10 हजार की भीड़ ने पीट पीट कर पहले तो उसकी हत्या कर दी इसके बाद उसे चौराहे पर ले जाकर फांसी पर लटका दिया।””रेप का आरोप 35 वर्षीय फरीद खान पर था। पीड़ित लड़की दीमापुर के एक कॉलेज की नागा छात्रा है।

यह तो घटना का एक सच था परंतु फेसबुक के साथ साथ समाज में इस घटना का दूसरा रूप प्रस्तुत किया गया ।मेरे मुस्लिम मित्र कल दिन भर नाक फुला फुला कर फेसबुक पर गुस्से वाले पोस्ट करते रहे और घटना में मृत फरीद खान के मुस्लिम होने के कारण इस घटना की निंदा करते रहे और कुछ मित्र समाज तोड़क घृणित पोस्ट करते रहे।दरअसल घटना निंदनीय थी और नहीं होनी चाहिए थी क्युँकि कानून टूटा संविधान खंडित हुआ ।

एक सच यह भी है कि तथाकथित राष्ट्रवादियों की दृष्टि कृपा से दूर नागालैंड,मेघालय,त्रिपुरा और आसाम के सीमावर्ती इलाकों में भारतीय कानून और संविधान का इतना असर है भी नहीं है जितना देश के अन्य हिस्सों में है बल्कि सच कहूँ तो काश्मीर से भी बुरी स्थिति है, और इसी की जड़ में छुपी है इस घटना की पृष्ठभूमि जो कि विभत्सकारी है ।

दरअसल जिस घटना को मुस्लिम विरोध का नाम दे दिया गया वह इस रूप में थी ही नहीं ।सच यह है कि 1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में बंगलादेश से बहुत से विस्थापित भाग कर आसाम त्रिपुरा मिजोरम नागालैंड और मेघालय आ गये और यहीं रह गये , यह उस तत्कालीन इन्दिरा गांधी सरकार का निकम्मापन था कि पूर्वी पाकिस्तान जीत लेने के बाद उसे भारत में क्यों नहीं शामिल किया गया ? क्या मजबूरी थी कि बंगलादेश के नाम का अलग राष्ट्र बनाकर मान्यता दी गई जो आज तक उस क्षेत्र की मूसीबत का जड़ बना हुआ है ।सच यह है कि जिस जंग जीतने पर देश ने इन्दिरा गांधी को “दुर्गा” की उपाधि दी थी वही बंगलादेश आज भारत का कोढ़ बन गया है तो सोचना पड़ा कि क्या पूर्वी पाकिस्तान को भारत में विलय नहीं कर लेना चाहिए था ? और नहीं किया तो क्या कारण थे ? और जिस भी कारण से नहीं किया तो युध्द खत्म होने के बाद सीमा पार करके आ गये इन विस्थापितो को वापस क्युँ नहीं भेजा गया ? यही विस्थापित आज उस क्षेत्र की समस्याओं की जड़ हैं ।फरीद खान भी उसी विस्थापित परिवार के इस जनरेशन का एक व्यक्ति था ।उस पूरे क्षेत्र में यदि सेना हटा ली जाए तो कितनी अव्यवस्था फैल जाए कोई सोच भी नहीं सकता क्योंकि पूरा क्षेत्र कबीलाई सिस्टम की गिरफ्त में है और छोटे छोटे तमाम संगठनो का अलग अलग क्षेत्रों में दबदबा है जिनसे सेना सामंजस्य स्थापित करके मदद करके स्थिति को नियंत्रण में किये हुए है ।दीमापुर है तो नागालैंड की औद्योगिक राजधानी परन्तु कबीलाई संस्कृति से ही चलती है जहाँ 6 बजे शाम होने के बाद कानून व्यवस्था कबीलाई लोगों के हाथो में चली जाती है और इस पूरे क्षेत्र के मूल निवासी बाहरी लोगों से नफरत करते हैं और शाम होते यदि उस क्षेत्र से बाहर के लोग धोखे से दिख जाएं तो उससे लूटपाट और अपहरण कर लेते हैं ।बंगलादेश के यह विस्थापित भी रह तो 44 वर्ष से रहे हैं और भारतीय नागरिक हो चुके हैं परन्तु वहां के लोगों ने इन्हे मानसिक और सामाजिक रूप से उस क्षेत्र का आज तक स्विकार नही किया बल्कि घृणा ही करते हैं ।

बलात्कार का आरोप लगाने वाली छात्रा उस क्षेत्र के एक दबंग नागा कबीले से है और इनका धर्म अधिकतर इसाई है और मिशनरीज द्वारा कनवर्जन कराए गये हैं ।चुकि मामला कबीलाई प्रतिष्ठा से जुड गया था और आरोपी नागाओं के लिए बाहरी व्यक्ति था तो घृणा ने अपना रूप दिखाया और यह घटना घट गयी ।एक तथ्य यह भी है कि पुलिस रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई और मृतक के भाईयों ने कारगिल युद्ध में देश के लिए लड़ाई लड़ी थी और एक भाई शहीद भी हुआ था तथा पिता स्वयं फौज में थे , हिन्दू भाई बिना समझे बूझे फरीद खान के बंगलादेशी होने पर चिल्ल पों कर रहे हैं जबकि यहाँ इस संदर्भ में यह घटना घटी ही नहीं यह घटना तो मात्र क्षेत्रीय और बाहरी व्यक्तियों तथा कबीलाई प्रतिष्ठा से जुड़ी थी और जिसे बिला वजह हिन्दू – मुसलमान का रूप दिया गया,स्पष्ट कहूँ तो फरीद खान और उस नागा छात्रा मित्रता थी और बाद में कुछ आपसी विवाद हो गया और छात्रा ने बलात्कार का आरोप लगा दिया और देश के सख्त हो गये इस कानून ने फरीद खान को गिरफ्त में ले लिया ।
मेरे मुस्लिम मित्र स्पष्ट हो जाएं कि इस घटना का मुसलमान या इस्लाम के नाम से कोई मतलब नहीं और ना ही मारने वाली भीड़ हिन्दू भाईयों की थी , सच यह है कि समाज में फैल गये विष के कारण हम हर ऐसी घटना को हिन्दू – मुस्लिम के दृष्टि से ही देखने लगते हैं जबकि उस पूरे क्षेत्र में हिन्दू – मुस्लिम की समस्या है ही नहीं बल्कि उससे भी विकट और विभत्स समस्या है “बाहरी और स्थानीय” ।वहां के लोग वहाँ का कबीलाई समाज अपने अतिरिक्त किसी बाहरी को सहन कर ही नहीं सकता ।

इसलिये मेरे मुस्लिम मित्रों से अपील है कि तीन दिन से फेसबुक और समाज में अनाप शनाप बेतरतीब तरीके से किये जा रहे व्यवहार को बन्द कर दें और तथ्यों को परख लिया करें सुनी सुनाई बातों को लेकर अपना थुथुना ना फुलाया करें ये जाहीलियत है। और आप लोगों को तो उस आरोपी मृतक का नाम ही सही से नहीं पता और सैय्यद शरीफुद्दीन खान के नाम से पोस्ट किये जा रहे हैं जब कि सही नाम फरीद खान है तो हकीकत पता होना तो दूर की बात है।और दूसरी बात यह कि वहाँ यदि फरीद खान की जगह कोई सुरेश चंद्र भी होता तो यही होता ।
मेरे सवालों का जवाब अवश्य मित्र दे कि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान का विलय भारत में क्यों नहीं किया गया और जंग जीत लेने के बाद भी काश्मीर पर पूरा कब्जा कर के भारत में शामिल क्युँ नहीं किया गया ? भारत के आज की सारी समस्याओं की जड़ मेरे ख्याल से यही दो मुद्दे मुख्य हैं ।तो क्या ये इन्दिरा गांधी की गलती थी या अन्तरराष्ट्रीय दबाव ? और दबाव तो युद्ध ना करने का भी रहा होगा जो हुआ तो पूरा काम क्यों नहीं हुआ ?