religion
by –अफज़ल खान

एक सवाल बहुत लोग खुद से और विद्वानों से पूछते हैं कि आखिर मुसलमान शिक्षा क्षेत्र में इतने पिछड़े क्यों हैं, अंत सभी ज्ञान साइंसी तथ्यों पश्चिम द्वारा ही क्यों आते हैं, क्यों हम सदियों से अज्ञान के अंधेरे में डुबे हुए हैं, हमारे हां ज्ञान विकास के बजाय मृत अनुकरण और अपने पंथ चिंता की है। अनुकरण और रूढ़िवादिता केवल सांसारिक ज्ञान तक ही सीमित नहीं बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान के मामले में भी मुसलमानों का दामन खाली है। हुसैन बिन मंसूर हलाज हमारी आध्यात्मिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण नाम है, उनके जीवन और रचनाओं पर एकमात्र आलोचनात्मक और ज्ञान काम फ्रांस में हुआ है और एक ज़खीम पुस्तक के रूप में छप चुका है इसके विपरीत हमारे हां उनके जीवन पर “दश्त सोस” जैसे भावनात्मक उपन्यास लिखे गए हैं। मुसलमानों का धार्मिक पुस्तक कुरान की ओर रवैया गैर ज्ञान है, मुस्लिम दुनिया में इस्लाम के समझ खज़पर काम ताबेईन के बाद से रुक चुका है परंतु अमेरिका की मैक गिल विश्वविद्यालय विभाग दीनियात में ऐसे गैर मुस्लिम विद्वान हैं जो पिछले तीस साल से कुरान की भाषा ज्ञान काम कर रहे हैं और अपने शोध गाहे गाहे प्रकाशित होती रहती है। इसी तरह न्यायशास्त्र और हदीस के ज्ञान को भी महज परंपराओं की ज़हननशीं तक सीमित कर दिया गया है।

हमारे हां जो भी वैज्ञानिक लेख पढ़ता या पढ़ा है उसकी कोशिश होती है कि यह साबित करे कि सारी विज्ञान कुरान से ही निकली है और पश्चिमी विज्ञान दान केवल कुरान में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों की पुष्टि कर रहे हैं।मुसलमानों के शैक्षिक पिछड़ेपन नवीनतम उदाहरण प्रसिद्ध सऊदी आलिमे दीन शेख़ खीबारी जमीन को रुका हुआ बताया है , यह आलिमे दीन अकेले नहीं हैं उनसे पहले सउदिया के प्रमुख मुफ़्ती आज़म शेख अल बाज एक पूरी किताब इस विषय पर लिख चुके हैं जिसमें उन्होंने कुरान व हदीस की रोशनी में साबित किया है कि पृथ्वी गोल नहीं बल्कि चपटी है और सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमती है उसी तरह तुर्की के प्रसिद्ध आलिमे दीन हारून याहया ने हाल ही में सिद्धांत विकास के अस्वीकार में एक पूरी किताब लिखी है (2)। हमारे हां जो भी वैज्ञानिक लेख पढ़ता या पढ़ा है उसकी दिल्ली कोशिश होती है कि यह साबित करे कि सारी विज्ञान कुरान से ही निकली है और पश्चिमी विज्ञान दान केवल कुरान में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों की पुष्टि कर रहे हैं। यह प्रयास हालांकि बहुत प्रेम और धार्मिक भावना से किया जाता है लेकिन इस प्रयास के पीछे एक तरह का ज्ञान भावना और स्ट्रीमिंग का एहसास मौजूद है जिसे छुपाने के लिए कुरान का सहारा लिया जाता है और एक सतही और कृत्रिम एहसास बढ़त बनाया जाता है। ऐसी कोशिशों से न तो इस्लाम को फायदा होता है और न ही विज्ञान, क्योंकि यह प्रयास वैज्ञानिक व्यवहार और अनुसंधान निषेध करती हैं, और हमारे ऐसे ही गैर तर्कसंगत व्यवहार हमें वैज्ञानिक अध्ययन में पिछड़े रखे हुए हैं।

धार्मिक पुस्तकों से विज्ञान साबित करने केिमल में हम अकेले नहीं हैं, मुसलमानों से पहले हिंदू, ईसाई और यहूदी भी ऐसे प्रयास कर चुके हैं और कर रहे हीं.पछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री ने एक भाषण में कहा कि भारत में हजारों साल पहले प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक मौजूद थी जो एक उदाहरण हिंदू भगवान गणेश को मनुष्य के बजाय हाथी का सिर लगाया जाना है। इंडियन विज्ञान सम्मेलन में यह खुलासा किया गया कि भारत में जेट प्रौद्योगिकी हजारों साल पहले भी मौजूद थी और इसी जेट पर बैठ कर राम ने लंका पर हमला किया था, सम्मेलन के दौरान प्राचीन ज्ञान को भुनाने करने पर जोर दिया गया। इससे पहले ईसाई विद्वानों भी बाइबिल से वैज्ञानिक तथ्यों साबित करते रहे हैं। एक ज़माने तक चर्च के दबाव में पृथ्वी की उम्र सवा चार हजार साल करार दी जाती रही है और पृथ्वी के निर्माण पहले रविवार को सुबह नौ बजे साबित की जाती रही है। चर्च बाइबिल रो से सूरज पृथ्वी के चारों ओर घूमना और पृथ्वी कामरकज़ ब्रह्मांड होना साबित करतारहाहे। मुस्लिम उलेमा भी एक समय तक ऐसे ही सिद्धांतों प्रचार करते रहे हैं, सही तो यह है कि बुद्धि दुश्मनी में सभी धार्मिक विद्वानों एक जितने चरमपंथी हैं।

हूद भाई लिखते हैं कि सम्मेलन में एक साहब ने यह प्रस्ताव किया कि ऊर्जा कि समस्या को हल करने के लिए “जिन्न” से बिजली पैदा करनी चाहिए क्योंकि वह आग से बने होते हैं. परवेज हूद भाई पुस्तक “मुसलमान और विज्ञान” (3) में पाकिस्तान में होने वाली एक यादगार सम्मेलन “इस्लामी विज्ञान सम्मेलन” की चर्चा करते हैं। 1983 में होने वाले सम्मेलन में कुरान पर अनुसंधान ज़रीिेकाईनात गति पता किया गया जो प्रकाश की गति के बराबर निकली .होद भाई लिखते हैं कि सम्मेलन में एक साहब ने यह प्रस्ताव किया कि ऊर्जा कि समस्या को हल करने के लिए “जिन्न” से बिजली पैदा करनी चाहिए क्योंकि वह आग से बने होते हैं, उसी तरह मण्डली प्रार्थना के इनाम का अनुमान लगाने का तरीका भी बताया गया। बाजार में विविध किताबें मौजूद हैं जिनमें हिंदू ाज़म और विज्ञान, इस्लाम और विज्ञान, बाइबिल और विज्ञान आदि विषय बनाया गया है, लेकिन अफसोस से कहना पड़ता है कि यह किताबें वैज्ञानिकों के बजाय धार्मिक लोगों की लिखी हुई हैं और ठोस अनुसंधान के बिना लिखी गई हैं। विज्ञान के सिद्धांतों के साथ गैर शनासाई के कारण इन किताबों को वैज्ञानिक नहीं धर्म वैज्ञानिक पुस्तकों कहना चाहिए जिनकी कोई ज्ञान ोकित नहीं है। अधिक चिंताजनक बात पाकिस्तान में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में विज्ञान शिक्षण के लिए धर्म का इस्तेमाल है।

धर्म और विज्ञान के संबंध और मवाज़ने से पहले यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि विज्ञान का कोई धर्म नहीं होता, यह सिर्फ तथ्यों की खोज और जागरूकता का ज्ञान हे.साइनस केवल यह बताती है कि कोई भी प्रक्रिया, कैसे हुआ। उसका काम किसी भी विचारधारा या विश्वास के आधार पर अनुसंधान और न ही यह किसी वस्तु के होने का उद्देश्य स्पष्ट करती है। ऐसे अस्तित्व सवालों का जवाब विज्ञान के दायरे में नहीं आता यह दर्शन और धर्म का मैदान है, उदाहरण के लिए विज्ञान यह बता सकते है कि ब्रह्मांड कैसे बनी, इंसान कैसे अस्तित्व में आया, लेकिन ब्रह्मांड का उद्देश्य क्या है और मनुष्य क्यों बनाया गया, या नैतिकता पर क्यों अमल किया जाए आदि विज्ञान का विषय नहीं हैं। इन सवालों के जवाब के लिए हमें धर्म और दर्शन की ओर देखना होगा। विज्ञान धर्म की आंख से पढ़ने की कोशिश उद्देश्य तथ्यों पता नहीं बल्कि धार्मिक विश्वासों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक व्याख्या ढूंढना है। धर्म को विज्ञान की मदद से साबित करने से दिल्ली तसल्ली तो मिल जाती है लेकिन ज्ञान विकास नहीं होती।

विज्ञान और धर्म के संबंध में पुस्तकें लिखने वाले धार्मिक विद्वानों धर्म को विज्ञान पर स्वागत और बेहतर विचार करते हैं हालांकि आज तक ऐसा नहीं हुआ कि किसी धार्मिक पुस्तक कोई वैज्ञानिक भविष्यवाणी की हो और विज्ञान ने इस पर अमल करके नए शोध की हो, इसके विपरीत वैज्ञानिकों अनुसंधान धार्मिक लोग अपने विश्वासों के सबूत के लिए पेश करते आए हैं। उसकी जीवित उदाहरण है कि उन्नीसवीं सदी तक मुसलमान यह मानते रहे कि पृथ्वी निवासी है और सूर्य उसके आसपास घूमती है जब तक आधुनिक खगोल विज्ञान ने टालमी की अवधारणा ब्रह्मांड को अस्वीकार कर दिया (यह अनुसंधान टालमी ने ग्रीस में की थी और इस शोध को सारी दुनिया दो हु हजार साल तक मानती रही)। अतीत के विद्वानों के विपरीत आज हारून याहया जैसे लोग सूरे यस छंद के माध्यम से यह साबित कर रहे हैं कि सब कुछ अपने कक्षा में घूम रही है, यानी 1300 साल तक मुसलमानों ने अपना कुरान ही विचार से नहीं पढ़ा।

धार्मिक पुस्तकों के साथ मामला यह भी है कि उनकी एक व्याख्या पर कभी सहमत नहीं हो सका, अब किस शब्द का क्या अर्थ लिया जाए और मतलब किस पेराए में समझा जाए यह एक बहुत मुश्किल काम है, इसलिए अक्सर लोग वैज्ञानिक तथ्यों साबित करने के लिए मपददमफाहीम से कस्टम का अर्थ प्रयोग कर लेते हैं जिससे उनका उद्देश्य पूरा हो जाए।इस प्रक्रिया में एक बुराई यह भी है कि वैज्ञानिक जांच तो रोज होती हैं और नित नए विचार सामने आते रहते हैं जो प्राचीन वैज्ञानिक अवधारणाओं का अबताल करते हैं। आज किसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण कुरान साबित करने वाले बाद में इस सिद्धांत गलत साबित होने पर खुद को किसी जवाबदेही का मसतोजब विचार नहीं है। धार्मिक पुस्तकों के साथ मामला यह भी है कि उनकी एक व्याख्या पर कभी सहमत नहीं हो सका, अब किस शब्द का क्या अर्थ लिया जाए और मतलब किस पेराए में समझा जाए यह एक बहुत मुश्किल काम है, इसलिए अक्सर लोग वैज्ञानिक तथ्यों साबित करने के लिए मपददमफाहीम से कस्टम का अर्थ प्रयोग कर लेते हैं जिससे उनका उद्देश्य पूरा हो जाए।

एक महत्वपूर्ण बात जो धार्मिक पुस्तकें विशेषकर कुरान के बारे में समझ लेनी चाहिए कि यह अपने मूल अर्थ और उद्देश्य विज्ञान की किताब नहीं है और इसीलिए अक्सर शारहीन उसका नैतिक और सामाजिक अर्थ ही लिया है। जावेद अहमद गामदी के विचार में भी कुरान विज्ञान पढ़ाने के लिए चला नहीं था बल्कि मानव नैतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए उतारा गया था .ताहम कई धार्मिक विद्वानों कुरान विज्ञान निकालने में सक्षम हैं। कुछ लोगों के विचार में अब्बासी दौर के मुस्लिम वैज्ञानिकों की सफलता भी कुरान ही बदौलत बताते है है लेकिन महान मुस्लिम वैज्ञानिकों के हालात जीवन ऐसी कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इतिहास हमें यह बताती है कि विज्ञान कभी भी मुसलमानों की शैक्षिक गतिविधियों की धुरी नहीं रही। मुसलमानों के शैक्षिक गतिविधियां दर्शन तक सीमित थीं और जो कुछ नाम हम गर्व से पेश करते हैं उन्हें कभी भी जनता में लोकप्रियता नहीं मिली .ज़यादा तर मुस्लिम वैज्ञानिकों को जीवन में या बाद में काफिर करार दिया गया, कई निर्वासन का सामना करना पड़ा और उनकी किताबें जलाई गईं। इमाम गज़ाली की ्षाफ़्तह ाल्फ़लासफह इन अग्रणी वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की सोच और शिक्षाओं नास्तिकता करार देती है क्योंकि वैज्ञानिकों की जांच कुरान नहीं थीं बल्कि यूनानी दर्शन और तर्कसंगत तर्क के कृतज्ञ थे। इन मुस्लिम वैज्ञानिकों में से कुछ शाही दरबार से भी जुड़े रहे लेकिन आम मुसलमान इन जांच से उदासीन ही रहे। इब्ने रशद के माध्यम योग्य पश्चिम यूनानी दर्शन मुस्लिम शोध से परिचित हुए और उन्होंने मुस्लिम वैज्ञानिकों के काम से लाभ उठाया लेकिन हमने अपनी गलतियों का पहचान नहीं किया और एक झूठे एहसास तफ़ाख़र पीड़ित हो गए कि सारा ज्ञान हमारे ही पास था और है।

इतिहास और बाकी क़ौमों से हमें यही सबक मिलता है कि धर्म और विज्ञान को अपने दायरे में अपने सिद्धांतों के अनुसार काम करना होगा और इन दोनों के बीच कोई पुल स्थापित करने की कोशिश उपयोगी नहीं है क्योंकि यह पुल न तो धर्म की कोई सेवा करता है और न ही विज्ञान .मज़हब विज्ञान के माध्यम से साबित करने और विज्ञान को धार्मिक विश्वासों की मदद से जाँच से हमारे अंदर वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी पनप नहीं पाएगा और अज्ञानता का यह दौर लंबा होता जाएगा