zakir-naik

by — ताबिश सिद्दीकी

सऊदी सरकार ने जाकिर नायक को इस्लाम के प्रति अभूतपूर्व योगदान के लिए सऊदी अरब के एक सबसे बड़े प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया.साउदी सरकार ने उन्हे इस्लाम की सेवा के लिये 2015 का किंग फैसल अवॉर्ड से नवाज़ा है .मालूम हो के इस से पहले ए अवॉर्ड इस्लाम के मशहूर उलेमा मौलाना अबुल हसन नदवी को 1980 मे दिया गया था. जिसमे उनको दो सौ ग्राम सोने का मैडल और करीब एक करोड़ पचीस लाख कैश दिया गया है.. सऊदी जाकिर नायक को सम्मानित करती है.. यूरोप मलाला को नोबेल देता है.. यूरोप हिम्मत, हौसले और इंसानियत के लिए आगे आये क़दम को सम्मानित करता है और सऊदी किसको ये सम्मान दे रहा है इस इक्कीसवीं सदी में, वो भी किस कार्य के लिए.. ये दुनिया देख रही है.

लोग अक्सर मुझ से कहते हैं की सऊदी वाले यहाँ के लोगों को मुसलमान नहीं समझते.. मगर वो ये नहीं जानते की वो क्यूँ यहाँ के लोगों को मुसलमान नहीं मानते हैं.. यहाँ जो मुसलमानों की मान्यताओं पर सूफी और हिन्दू प्रभाव है इसके कारण वो हम लोगों को मुसलमानों की श्रेणी में नहीं गिनते हैं.. जाकिर नायक जैसे मुसलमान बन जाओ अभी.. वो पलकों पर बिठाएंगे हमको और आपको भी

जो धर्म और जाति से ऊपर उठकर चला.. बिना किसी भेदभाव के पूरी ईमानदारी से अपने देश के लिए निष्ठावान रहा.. ऐसे अब्दुल कलाम को भारत ने देश का राष्ट्रपति बनाया.. मुसलमानों की दुश्मन कहे जाने वाली पार्टी और लोगों ने उनका खुल के सपोर्ट किया और आज भी करते हैं..

अब्दुल कलाम जैसे मुसलमान इस्लाम का बेडा गर्क कर रहे हैं क्या जो सऊदी सरकार को नहीं दिखता? अब्दुल कलाम को दिया कभी कुछ? ये लोग किस तरह की मानसिकता को समर्थन देते हैं ये हमारे और आपके विचार करने वाली बात है..

आपको कैसा मुसलमान बनना है.. दोनों उदाहरण भी आपके सामने है.. दो सौ ग्राम सोना और कुछ रुपये चाहिए या देश और दुनिया भर के लोगों की आँख का तारा बनना है आपको?

ब्लोगर (अविजीत रॉय) की हत्या—–

बाग्लादेश के उस ब्लोगर (अविजीत रॉय) की हत्या देखिये और वहां के बहुसंख्यक वर्ग की प्रतिक्रिया देखिये.. पाकिस्तान में भी यही हालात रहे हैं.. यहाँ भारत में मैं बहुसंख्यकों के साथ रहा जीवन भर.. अपनी बातें खुल के रखी और उनकी सुनी.. और उन्होंने भी अपनी एक एक धार्मिक बुराईयों की जम के हंसी उडाई और मैं भी उनके साथ उनकी हंसी में शामिल हुवा.. हमारा कभी कोई विवाद धर्म को लेकर नहीं हुवा

जहाँ गाय माता हो.. पेड़ पौधे पूजे जाएँ.. नदियाँ और पक्षी सम्मानित हों.. वहां ऐसी दरिंदगी के हालत अभी तक सिर्फ इसलिए नहीं बन पाए क्यूंकि इस संस्कृति के मूल में इस तरह की मान्यताएं है.. बहुत लोगों को मैं अतिवादी या सनातन के मूल से कुछ अधिक आशा की उम्मीद रखने वाला लगूं मगर मेरी मनोविज्ञान की अब तक की समझ यही कहती है..

भारत के मुसलमान पूरी दुनिया के मुसलमानों से अलग हैं और वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि कहीं न कहीं यहाँ के संस्कृति की छाप हमारे अवचेतन मन में घर कर ही जाती है.. ISIS के साथ रहने वाला जिहादी जो रोज़ लोगों के गले काटता है वो ब्रिटेन से है.. और भारत से जो गया था ISIS में भरती होने.. वहां की दरिंदगी देख भाग खड़ा हुवा.. हम किन लोगों के बीच पलते बढ़ते हैं ये हमारे आने वाले जीवन और पीढ़ियों पर बहुत असर डालता है

पाकिस्तान को जिन अल्पसंख्यकों को अपने बीच रखना चाहिए था वो रख नहीं पाए.. अहिंसा का पाठ सिखाने वाले वहां अब न के बराबर बचे हैं.. बांग्लादेश में भी यही हालात हो गए हैं अब..

कोई तो हमारे आस पास होना ही चाहिए जो हमे ये याद दिलाता रहे की जिन जानवरों को मार कर आप खा रहे हैं वो पाप है.. कोई तो हो जो ये बताता रहे कि कण कण में भगवान है.. भले आप उसे माने या न माने मगर आपके आस पास ऐसे लोगों के होने से आपके अवचेतन में कहीं न कहीं अहिंसा का समावेश हो ही जाता है

मेरा बेटा मुझे स्कूल से आके बताता है कि “पापा, पेड़ पौधों में भी जान होती है और उन्हें भी हमारे जैसा ही दर्द होता है.. ये मेरी टीचर ने बताया.. इसलिए हमे पेड़ नहीं काटने चाहिए और जानवर तो हमारे जैसे ही होते हैं उनको बहुत दर्द होता है इसलिए मेरे दोस्त बोलते हैं की मटन और चिकन जंक फ़ूड है.. हमे नहीं खाना चाहिए”

जिन बच्चों के लिए मटन और चिकन जंक फ़ूड होगा वो ऐसे किसी इंसान का गला काटेंगे कभी?