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16 दिसंबर 2012 की रात की घटना हम सभी को पूरी तरह से याद है | वो मनहूस रात भारत के गणराज्य की एक काली रात साबित हुई , एक लड़की को चार दरिंदों ने चलती बस मे अपनी हवस का शिकार बनाया और उसके बाद बड़ी ही निर्ममता के साथ उसके साथ ऐसा सलूक किया जिसका वर्णन करने मे भी किसी का हाथ और दिल आज भी कांप जाये | बलात्कार और पिटाई के बाद उस लड़की और उसके पुरुष मित्र को निर्वस्त्र करके उस दिसंबर की ठंडी रात मे दिल्ली की सड़क पर फेंक दिया | उसके बाद भी उन दो पीड़ितों के दर्द कम नहीं हुए 1 घंटे तक वो लड़की जिसकी आंते तक बाहर निकाल दी थी उन कमीनों ने, वो वही सड़क पर पड़ी तड़पती रही और तमाशबीन तमाशा देखते रहे |

इस घटना के बाद हमारे भारत का एक और नाम पड़ा रेप कैपिटल | बहुत विरोध प्रदर्शन हुआ उस बहादुर लड़की के समर्थन मे पूरा देश उतार आया और नए कानून बने, सख्त कानून बने और ये उम्मीद बंधी की शायद अब इन घिनौने अपराधो पर रोक लगेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ | दोषी अदालत गए और अदालत ने उन्हे फांसी की सज़ा सुनाई एक आरोपी राम सिंह ने सज़ा मिलने से पहले ही जेल मे फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली जो एक खुशी की बात है शायद पहली बार किसी की आत्महत्या पर मुझे इतनी खुशी हुई |

वो दरिंदे आज फिर से चर्चा मे हैं कारण है बीबीसी की डाकुमेंटरी जिसे बनाने की इजाजत 2013 मे यूपीए सरकार ने ही दी थी | इस डॉक्युमेंट्री मे एक आरोपी का भी इंटरव्यू किया गया | लेकिन जब वो इंटरव्यू देश ने देखा तो सारा देश हतप्रभ और गुस्से से भर गया | वो दरिंदा उस इंटरव्यू मे बेधड़क और बिना डरे बिना हिचकिचाये या बिना किसी डर के उस कमीने ने सारा दोष उस बहादुर लड़की के ऊपर डाल दिया और बकायदे लड़कियों को कैसे व्यवहार करना चाहिए वो तक बताया | उस निर्लज्ज और नीच इंसान के हिसाब से निर्भया को लड़ना नहीं चाहिए था और उन्हे उनकी मनमानी करने देनी थी | उसका विरोध ही उसकी मौत का कारण बना वो लोग तो बस बलात्कार ही कर रहे थे | उसने ये भी बोला की किसी लड़की को जीन्स स्कर्ट पहन कर 9 बजे बाहर नहीं घूमना चाहिए ऐसी लड़कियां अच्छी नहीं होती तमाम ऐसी बाते बोली की सोचने मे भी सर झुक जाता है |

इन बाटो को सुनकर निर्भया के पिता ने कहा की “शायद उसकी माँ या बहन का जब कोई हाथ पकड़ता है तो वो उसके साथ सो जाती हैं लेकिन हमारे संस्कार ऐसे नहीं हैं | हमारी जान भले चली जाए पर हम लाज नहीं खोते |” जाहिर है ये एक दुखी पिता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है | उस दरिंदे की बात सुनकर उसकी कुंठित मानसिकता का भी परिचय मिलता है और ये डराता भी है की जहां आज हमारे देश मे फांसी की सज़ा को खत्म करने की मांग उठ रही है और वही दूसरी तरफ इस इंसान को तो फांसी की सज़ा का भी भय नहीं है | कितना गलीज़ और नीच है ये |

इस मुद्दे पर आज संसद मे भी हंगामा मचाया गया सोश्ल मीडिया और एलेक्ट्रोनिक मीडिया मे भी जम कर बहस हुई | सरकार और अदालत ने उस डॉक्युमेंट्री और इंटरव्यू को बैन कर उसके प्रसारण पर रोक लगा दी | कल कई समाचार चैनलो ने उस इंटरव्यू को खूब प्रसारित कर टीआरपी बटोरी जो बेचारे थोड़ा पीछे रह गए उनकी टीआरपी इस रोक की वजह से नहीं बढ़ पायी और उन्होने इस इंटरव्यू को प्रसारित करने पर लगी रोक को ग़लत बताया | कई महान लोगो ने इसे विचारो की अभिव्यक्ति पर रोक तक बता दिया | आज जब सरकार को घेरा गया तो सरकार ने 2013 मे दी गयी मंजूरी की चिट्ठी दिखाते हुए पिछली सरकार पर ठीकरा फोड़ पल्ला झाड लिया और डॉक्युमेंट्री पर रोक लगा दी |

कई लोग उस इंटरव्यू को विचारो की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का नाम दिया | उन महान मुर्खाधिपतियों से मई ये सवाल पूछूंगा की जिसे अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है , जिसे जेल मे कैद किया है बलात्कार जैसे घिनौने अपराध मे उसके लिए कैसी विचारो की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता| ऐसे इंसान को तो बार फांसी देनी चाहिए एक बार बलात्कार और हत्या के लिए और एक बार इन विचारो के लिए |

खाली बयानो और मोमबत्तियाँ जलाने से कुछ नहीं होगा अब ऐसे अपराध करने वालो के लिए एक ही अदालत का कानून बनाया जाना चाहिए जिसकी सज़ा पहली और अंतिम हो ताकि इन जैसे नर पिशाचों को इनकी करनी का फल तुरंत मिले | इनके लिए तो समूहिक सज़ा का प्रावधान होना चाहिए जिसमे इन्हे फांसी नहीं बल्कि पुराने समय मे दि जाने वाली दर्दनाक और निर्मम सजाये दी जानी चाहिए | ये हमारी न्यायपालिका का और उस प्रक्रिया का दोष है जिसका पालन करना मजबूरी है | अब अदालत और सरकार को चाहिए की इन दरिंदों को जल्द ही फांसी दी जाये और निर्भया को इंसाफ दिया जाये क्यूकी खाली वैचारिक और राजनीतिक बहस से कुछ नहीं होगा | ये बहसे तो सालो से की जाती रही हैं , ये बहस तो 17 दिसंबर को भी की गयी और 3 मार्च को भी लेकिन अब नहीं | अब करने का समय है ताकि किसी दूसरी लड़की को निर्भया या दामिनी ना बनना पड़े |