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जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ भाजपा ने सरकार में साझा होने का जो फैसला किया वह उसके लिये शुरू में ही फजीहत का कारण साबित होने लगा है लेकिन यह प्रयोग होना जरूर चाहिये था। भले ही इसमें कितना भी जोखिम नजर आ रहा हो। दरअसल पीडीपी और भाजपा की संयुक्त सरकार का प्रयोग दोधारी है। अगर यह प्रयोग कामयाब रहता है तो जटिल हो चुके कश्मीर मुद्दे की गुत्थी सुलझने की राह निकल सकती है। दूसरी ओर इस मौके को अगर पाकिस्तान और कश्मीरी अवाम में खुद को हीरो के रूप में कैश कराने के बतौर मुफ्ती मुहम्मद सईद देखेंगे तब उनकी सरकार भाजपा और देश दोनों के लिये ही गले की हड्डी का कारण बन सकती है।

भाजपा के कट्टरपंथियों का एजेण्डा इस देश की व्यवहारिक वास्तविकताओं से पूरी तरह अलग रहा है और इन कट्टरपंथियों के सबसे बड़े नायक प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीनों पहले तक नरेन्द्र मोदी थे। भाजपाई कट्टरपंथियों को गलतफहमी यह है कि उनके मुद्दों पर ध्रुवीकरण की वजह से भाजपा को लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व सफलता मिली थी जबकि नरेन्द्र मोदी जानते हैं कि उनकी सफलता मार्केटिंग के फार्मूलों के आधार पर बनायी गयी रणनीति का नतीजा रही है। मार्केटिंग की दुनिया में कामयाबी के लिये व्यक्तित्वों को प्रतीक बनाने की परंपरा है। मार्केटिंग के लोग कंपनियों के उत्पादों को ब्रांड एम्बेसडरों के सहारे बाजार में तेजी से खपाते हैं। इसके लिये उन्हें अपने माडल को मिलेनियम स्टार बनाना पड़ता है। राजनीति में भी जब यह फार्मूले लागू होते हैं तो उनकी तर्ज बदलती नहीं है। मोदी को बाजार ने महानायक बनाया। जिस तरह से तथाकथित मिलेनियम स्टार इसके बाद अपने व्यक्तित्व को और ज्यादा करिश्माई बनाने की नई नई फितरतें हर रोज दिखाते रहते हैं। उसी तरह से मोदी भी अब अपनी शख्सियत को ग्लैमराइज कराने का नुस्खा हर पल तलाशते रहते हैं। इस कवायद में रोज नये रिकार्ड बनाने की बात अपने आप जुड़ी है। आजादी के बाद से आज तक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान के बावजूद जम्मू कश्मीर में भाजपा को सत्ता की दहलीज तक पहुंचने का मौका नहीं मिला था। इस बार जब यह मौका आया तो मोदी किसी कीमत पर इतिहास में दर्ज होने के एक और अवसर को गंवाना नहीं चाहते थे। कश्मीर को लेकर अनुच्छेद 370 को हटाने सहित भाजपा के कड़े एजेन्डे को मोदी ने निजी कैरियर की खातिर तरल कर दिया और अन्ततोगत्वा समझौते की सूरत बन गयी।

मार्के की बात यह है कि इस गठबंधन के सैद्धांतिक औचित्य को लेकर भाजपा के सेनापति भले ही दलीलें गढऩे में अपने को असमर्थ पा रहे थे लेकिन शपथ ग्रहण के समय मुफ्ती मुहम्मद सईद ने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को इस रूप में याद किया कि वे कहते थे कि जब अन्र्तविरोध हो तब असंभव को संभव बनाने की कला ही राजनीति है। मुफ्ती का उक्त कुटेशन का जिक्र करने का कोई ज्यादा मतलब नहीं है लेकिन इसका मतलब बहुत है कि उन्होंने वीपी सिंह का उल्लेख प्रसंगवश नहीं किया बल्कि यह एक राजनीतिक लाइन को याद दिलाने के लिये किया गया था क्योंकि वह राजनीतिक लाइन इस देश की वास्तविकताओं पर आधारित है। वीपी सिंह ने दो बातें कहीं एक तो यह कि भारतीय समाज जातियों का संघ है और दूसरा यह कि भारतीय राज्य अपने संघीय गठन में स्वाभाविक राष्ट्र न होकर संयुक्त राज्य की प्रकृति का है। इस प्रकृति की नजाकत में अनुच्छेद 370 की विद्यमानता का महत्व अपने आप में सिद्ध है। कई और राज्यों के साथ भारत संघ के सम्बन्धों में जटिलतायें हैं। द्रविड़ परिवार की भाषाओं वाले राज्य राष्ट्र भाषा के मामले में हिन्दी को थोपने के अभी तक चरम विरोधी बने हुए हैं। तमिलनाडु में श्रीलंका के साथ सम्बन्धों की बात पर लोग देश की वैदेशिक नीति की जरूरतों को न देखकर भावनात्मक मुद्दे पर हठधर्मिता की हद तक आग्रह दिखाते हैं। इन विरोधाभासों के बीच भी यह देश आजादी के 68 वर्षों में विखण्डन के कगार पर पहुंचने के बजाय ऐसे समायोजन को विकसित करने में सफल रहा है जिसमें विरोधाभास बरकरार हैं लेकिन भारत का संयुक्त राज्य उन सबके बीच अपना निर्वाह करते हुए मजबूत भी हो रहा है। ठीक उसी तरीके से जैसे कि देश में शुरूआती दौर में जातिविहीन समाज के निर्माण के आदर्शवादी आन्दोलन चले। जिनकी अगुवाई डा.लोहिया जैसे तपस्वी नेताओं ने की। बाबा साहब डा.अम्बेडकर ने भी प्रयास किया कि कम से कम अनुसूचित जातियां अलग-अलग जातिगत पहचानों में बंटी रहने के बजाय एक संज्ञा की माला में गुथ जायें। लेकिन इन आन्दोलनों की धारा के दूरवर्ती पड़ावों पर आज हालत यह है कि जातिगत पहचान का आग्रह इनकी वजह से और ज्यादा जोर पकड़ रहा है। यह दुर्घटना नहीं भारतीय समाज के गठन के इतिहास की स्वाभाविक निष्पत्ति है। जिसके मर्म को वीपी सिंह बहुत अच्छी तरह से समझ पाये थे।

मुफ्ती मुहम्मद सईद वीपी सिंह के इसलिये कृतज्ञ हैं कि भारतीय समाज के यथार्थ के अनुरूप उन्होंने गृह मंत्रालय जैसे संवेदनशील मंत्रालय में मुसलमानों के अघोषित निषेध को तोड़कर उन्हें गृह मंत्री बनाने का प्रयोग किया था। इस कदम से यह साबित हुआ था कि मुसलमान देश में बराबरी के नागरिक हैं। जिसकी वजह से देश की किसी भी जिम्मेदारी के मामले में उनके साथ भेदभाव करने का हक किसी को नहीं है। गृहमंत्री के रूप में मुफ्ती मुहम्मद सईद ने कुल मिलाकर देश की आन्तरिक सुरक्षा का दायित्व बेहतर ढंग से संभाला लेकिन उनकी पुत्री के अपहरण के मामले में मुसलमानों को संदिग्ध के रूप में देखने के पूर्वाग्रह ने जिस तरह से जोर पकड़ा उसके इजहार की वजह से मुफ्ती मुहम्मद सईद और वीपी सिंह दोनों को धर्म संकट की स्थितियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद ही मुफ्ती मुहम्मद सईद की राजनैतिक दिशा में बदलाव आया लेकिन आज भाजपा के द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया जाना इस बात का संकेत है कि आखिरकार देश की स्थितियों के बारे में अपने ढंग से सोचने वाली इस पार्टी को आजमाइश के मौके पर यह मानना पड़ा कि यहां की स्थितियों में निर्वाह के लिये जिस तरह के समीकरण स्वीकार करने पड़ते हैं वे उसकी सोच से पूरी तरह अलग हैं।

मुफ्ती मुहम्मद सईद के इस बयान की चर्चा वर्तमान में सुर्खियों में है कि जम्मू कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव के लिये वे पाकिस्तान और हुर्रियत के आभारी हैं। उनका यह बयान मुझे भी बहुत बुरा लगा लेकिन यह एक सच्चाई है। नरेन्द्र मोदी ने जम्मू क्षेत्र में जिस तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण किया उससे मतदान प्रतिशत ने सारे रिकार्ड तोड़ दिये। इसके बाद भाजपा की संभावित सरकार को रोकने के लिये पाकिस्तान व उसके द्वारा समर्थित अलगाववादी संगठनों को चुनाव विफल करने की रणनीति बदलकर कश्मीर घाटी में भी पीडीपी के पक्ष में जबर्दस्त मतदान की रणनीति बनानी पड़ी। मोदी ने विधानसभा चुनाव के परिणाम तत्काल आने के बाद राज्य में भारी मतदान का श्रेय स्वयं लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर यह क्यों हुआ इसकी पोल खोलने के लिये मुफ्ती ने उक्त बयान दे दिया जिससे भाजपा को मुंह छिपाते नहीं बन रहा है।

इसी बीच शपथ ग्रहण के अगले ही दिन पीडीपी के आधा दर्जन से ज्यादा विधायकों ने अफजल गुरु के शव के अवशेष कश्मीर में लाने की मांग उछाल दी है। इससे पूरे देश में भारी शोरशराबा हो रहा है लेकिन अब पीडीपी और मुफ्ती मुहम्मद सईद अति कर रहे हैं। उनसे शुरू में संयम बरतते हुए राज्य को बेहतर गवर्नेंस देकर लोगों की तकलीफेें दूर करने की अपेक्षा की गयी थी लेकिन लगता है कि वे रास्ता भटक गये हैं। मुफ्ती के इरादों से लगता है कि वे पाकिस्तान के पूरी तरह मोहरा बनकर काम करने पर आमादा हैं। इससे इतिहास में हीरो के रूप में दर्ज होने की बजाय खलनायक के रूप में उनका स्थान बन जाने की आशंकायें बहुत हैं। मुफ्ती और उनकी पार्टी के लोगों की हरकतें यह अंदेशा पैदा कर रही हैं कि कहीं उनकी सरकार कुछ ही दिनों की मेहमान साबित होकर न रह जाये। फिर भी कुछ दिनों अभी देखना चाहिये कि उनमें सद्बुद्धि आती है या नहीं। भाजपा और पीडीपी के गठबंधन की सरकार को लेकर अगर विरोधी दल राजनीति करने से बाज आयें तो यह देश के लिये ज्यादा बेहतर साबित होगा। भाजपा ने किसी भी नीयत से पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया हो लेकिन सैद्धांतिक तौर पर यह दाव आजमाना कतई गलत नहीं है। भाजपा को नीचा दिखाने के लिये कई और मुद्दे हैं लेकिन अगर कश्मीर को उसकी कमजोर नब्ज के तौर पर छेडऩे का काम ज्यादा किया गया तो देश को होने वाले किसी भी नुकसान के लिये प्रतिपक्ष को भी भागीदार माना जायेगा।