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मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण कानून आज मोदी सरकार की गले की हड्डी बन गया है | इस वक़्त राजनीति के केंद्र मे यही कानून है , जहा एक तरफ मोदी सरकार अपने विकास का अजेंडा लेकर खड़ी है वही दूसरी तरफ पूरा विपक्ष इस कानून के खिलाफ लामबंद है और इस कानून को किसानो के खिलाफ बता रहे हैं | इस कानून के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हज़ारे भी देश भर के किसानो के साथ दिल्ली मे प्रदर्शन कर रहे हैं | चारो तरफ से मोदी सरकार इस बिल पर घिर चुकी है |

पिछली यूपीए सरकार ने 2013 मे एक नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था इससे पूर्व देश मे 1984 मे बने भूमि अधिग्रहण कानून के हिसाब से भूमि अधिग्रहण होता था जो काफी किसान विरोधी या कहे आधुनिक समय के लिए पूरी तरह से बेकार था | यूपीए सरकार ने इस महत्वपूर्ण कानून को बनाने के लिए 2013 का समय चुना क्यूकी 2014 मे आम चुनाव थे और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 1 जनवरी 2014 से प्रभावी हो गया | इस बिल का कांग्रेस को तो कोई खास फाइदा नहीं हुआ लेकिन ये बिल काफी हद तक किसानो के हित मे था | इसी भूमि अधिग्रहण बिल 2013 को बदलने के लिए मोदी सरकार ने 24 फरवरी 2015 को संसद मे बिल पेश किया | सरकार ने इससे पहले दिसंबर 2014 मे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लागू किया था |ये नया बिल भूमि अधिग्रहण 2013 से काफी भिन्न है | जहा 2013 का बिल किसानो के हित मे था वही 2015 का बिल किसान विरोधी भले न हो लेकिन पूंजीपतियों और उद्यमियो के हित मे जरूर है |

पुराने कानून और नए कानून के बीच क्या भिन्नता है मै यह समझाने का प्रयास करता हूँ

· यूपीए शासन मे बनाए गए कानून के हिसाब से अगर अधिग्रहित भूमि पर 5 साल तक कोई काम नहीं होता तो वो भूमि वापस किसानो को देने का प्रावधान है परंतु इस नए बिल मे इस प्रावधान को खतम कर दिया गया यानि की जो जमीन सरकार ने अपने कब्जे मे ले ली वो हमेशा सरकार की रहेगी|

· इस नए कानून मे सरकार ने खेती और सिंचाई योग्य ज़मीन को भी अधिग्रहित करने योग्य बताया है वही पुराने कानून मे खेती योग्य ज़मीन को आधुग्रहित नहीं किया जा सकता |

· नए बिल के मुताबिक सरकार बिना किसान की अनुमति के भूमि को कब्जे मे ले सकती है , अगर किसान उसके बदले मिलने वाले मुआवज़े को नहीं लेता तो वो मुआवजा सरकारी खजाने मे जमा हो जायेगा और किसान को उसकी खुद की ज़मीन से बेदखल कर दिया जाएगा |

· पुराने बिल मे किसी ज़मीन के अधिग्रहण के लिए 80% किसानो की मंजूरी ज़रूरी है लेकिन नए बिल मे इस सीमा को ख़त्म कर दिया गया है |

· यूपीए बिल मे अगर किसान चाहे तो अधिग्रहण के खिलाफ कोर्ट मे जा सकता है वही मोदी सरकार के बिल मे मे यह प्रावधान नहीं है |

· यूपीए बिल मे किसान किसी अधिकारी के नियम तोड़ने की शिकायत कर सकता था लेकिन इस नए बिल मे ये भी ख़त्म कर दिया गया है |

इन मुद्दो को देखते हुये ये साफ ज़ाहिर हो रहा है की इस नए बिल मे किसानो को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया है | सरकार किसानो पर एक तरह से अपनी ताकत का बेज़ा इस्तेमाल कर रही है | यूपीए बिल मे शामिल किए गए जिन प्रस्तावो को मोदी सरकार ने ख़त्म कर दिया है वो किसानो की हित रक्षा के लिए बेहद ज़रूरी हैं | इन प्रस्तावो को ख़त्म कर सरकार ने पूंजीपतियों और उद्यमियो को किसानो के शोषण का पूरा हथियार थमा दिया है|

खेती योग्य ज़मीन को अधिग्रहित कर लेने का नियम किसान के खेती करने के अधिकार को छीन सकता है क्यूकी खेती ही किसान का मुख्य व्यवसाय है और अधिकार भी | इसे छीन कर सरकार किसानो के साथ अत्याचार कर रही है और साथ ही खेती योग्य ज़मीन के अधिग्रहण कर के सरकार उस खेती योग्य ज़मीन को भी कम कर रही है | जिससे आगे खाद्यान संकट भी उत्पन्न हो सकता है जो आने वाले समय मे काफी मुश्किल खड़ी कर देगा क्यूकी हमारी जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है|

बिना किसान की मंजूरी के ज़मीन को अधिग्रहित करना बिलकुल ग़लत है क्यूकी अगर किसान अपनी ज़मीन नहीं बेचना चाहता तो उसके साथ ज़बरदस्ती करना उसकी मानसिक दशा को प्राभवित कर सकता है | इस देश मे किसानो की क्या स्थिति है इससे हम सभी वाकिफ हैं | किसान के साथ ज़बरदस्ती उसे आत्महत्या करने पर भी मजबूर कर सकती है और वैसे भी देश मे साल भर मे होने वाली आत्म्ह्त्याओ मे 11.5% आत्महतयाए किसानो द्वारा की जाती है | 1995 से 2014 के बीच 3 लाख किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो गए | ये हालत तब है जब हम भारत को एक कृषि प्रधान देश बोलते हैं और इस देश की आधी आबादी खेती करती है |

किसान को भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अदालत जाने से रोकने का मतलब है की आप उसके न्याय के अधिकार को ख़त्म कर रहे हैं क्यूकी जिस तरह कार्यपालिका न्याय पालिका के कुछ फैसलो बदलने की क्षमता रखती है उसी तरह से न्याय पालिका भी कार्य पालिका के कानूनों को सुधारने के लिए आवश्यक है और भारत के संविधान मे उन सभी को न्याय प्राप्त करने का अधिकार है जिसे ये लगता हो की उसके साथ अन्याय हो रहा है | किसान को अदालत जाने से रोकना उसके मूल मनवाधिकारों और संवैधानिक अधिकारो का हनन है |

किसी दोषी अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने से रोकने का अर्थ है की आप उसे भ्रष्टाचार करने को खुली छूट दे रहे है और अगर कोई किसान किसी अधिकारी की शिकायत करने के लिए उसके विभाग से अनुमति माँगेगा तो इसकी पूरी संभावना है की उसे मंजूरी ना मिले और ये सरकार के उस दावे और वादे को ग़लत सिद्ध कर देगा जिसमे वो भरष्टाचार को ख़त्म करने की बात करती है |

प्रधानमंत्री को यह ध्यान देना होगा की विकास की वजह से देश के किसानो पर अत्याचार ना हो क्यूकी किसान ही इस देश के पालक हैं | इस देश के लिए देवता हैं | सारे उद्योग और कारखानो की जड़ किसान हैं | भारत एक कृषि प्राधान देश है और इस देश मे अगर किसानो को ही अपने हितो की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा तो वो हमारे लिए शर्म की बात होगी |आज भारत जिस मुकाम पर है वह तक पहुचाने मे किसानो बहुत योगदान है | किसान 121 करोड़ की आबादी वाले इस देश का पेट भरते है , किसान इस देश के लिए देव तुल्य हैं | उनका सम्मान तथा उनकी रक्षा हमारा और हमारी सरकार का कर्तव्य है | हम आशा करते हैं की सरकार जल्द ही इस नए कानून मे संशोधन कर के इसे और किसान हितैषी बनाएगी और उसे बनाना ही होगा क्यूकी ये हमारी आने वाली नसलों के हित मे भी होगा और किसानो के विकास मे सहायक भी |