womenरामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

आदिम काल से नारी शोषण का शिकार रही है। नारी की नारी सुलभ संवेदनाओं की हर युग में उपेक्षा हुई है। समाज का कोई भी वर्ग रहा हो, वह नारी देह के भूगोल की ही व्याख्या करता रहा है। समाज का कोई भी रिश्ता स्त्री को सुरक्षा–कवच प्रदान नहीं कर पाया है। सुरक्षा का नाजुक घेरा टूटते ही नारी केवल शरीर नज़र आती है और पुरुष उपभोक्ता मात्र। इस दयनीय स्थिति के पीछे कई कारण हैं। साहनी जी इन विभिन्न कारणों को विभिन्न लघुकथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

स्त्री के देह–व्यापार के कारणों में आर्थिक कारण सर्वोपरि है। गरीबी के कारण जीवन की न्यूनतम दैनिक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पाती। इनमें पति या परिवार के पुरुष सदस्यों का निकम्मापन भी शामिल है। अर्थ प्राप्ति का तब एक मात्र साधन नज़र आती है घर की स्त्री–बहिन–पत्नी जो कोई भी हो । दूसरा वर्ग वह है जो पैसे की हवस से पीडि़त है। पैसा ही उसकी आवश्यकता बन गया है। वह पैसा ऊँचे पद के कारण मिले या अन्य किसी व्यापारिक होड़ के कारण प्राप्त हो। ‘धन्धा’ लघुकथा का युवक,पति होकर स्वयं पत्नी के शरीर की सौदेबाजी में शामिल है। उसके लिए पत्नी पैसा पैदा करने वाली मशीन है। ‘कमाई’ का पिता बेटी को देह व्यापार में लगाए हुए है। ‘नौकरी’ की वीणा नौकरी न मिलने पर घर–परिवार का खर्च चलाने के लिए काल गर्ल बनकर शरीर परोसती है। ‘सौदा’ की शब्बो पेट की आग बुझाने के लिए देह–व्यापार करने को विवश है। पवन शर्मा की लघुकथा ‘दुश्मन’ का पिता अपनी दूकान की शराब की बिक्री बढ़ाने के लिए जवान बेटी को दूकान पर बिठाने की योजना बनाता है। ‘सेवा’ लघुकथा का बाप भी बेटी सनपतिया को मजदूरी के लिए भेजता है, जहाँ मजदूरी के साथ–साथ मालिक की शरीर–सेवा भी करनी पड़ती है। बेरोजगार भाई के कारण बहिन को कमाई करनी पड़ती है। रोजी–रोटी’ लघुकथा में विक्रम सोनी ने इस विवशता को मार्मिकता से रेखांकित किया है । ‘संबंध’ की उमा के लिए नौकरी विवशता है। नौकरी की विवशता के लिए बॉस को खुश करना बाध्यता है। इसी बाध्यता के कारण उसे बार–बार गर्भपात कराना पड़ता है। औरत की विवशता को फायदा उठाने में पुरुष सदैव तत्पर है।

दाम्पत्य जीवन की सफलता जहाँ नारी को सुरक्षा प्रदान करती है, असफलता उसे गहरे गर्त में धकेल सकती है। अनमेल विवाह के कारण तनावग्रस्त होकर स्त्री को घर छोड़ना पड़ सकता है। उसके बाद का रास्ता कोठे पर ही जाकर खत्म होता है। बीमारी या दुर्घटना के कारण पति के असमर्थ होने पर पत्नी को यदि आर्थिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है तो उसे घर चलाने के लिए अपना शरीर बेचना पड़ता है। ‘छोटी वेश्या: बड़ी वेश्या’ लघुकथा पति–पत्नी संबंधों की नींव हिला देने वाली लघुकथा है। ‘घर’ लघुकथा ‘पति–पत्नी संबंधों को कड़ी चुनौती देती है । ‘विवाह’ के झाँसे में आकर नसीरन कोठे पर पहुँच जाती है। बालासुन्दरं गिरि ने ‘बीवी का दर्द’ लघुकथा में इस पीड़ा को मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान की है। ‘पति’ लघुकथा में ‘एलिजा’ पति की उपेक्षा के कारण कोठे पर पहुँचती है। अब उसका पति भी ग्राहक बनकर कोठे पर आने लगा है। महेश दर्पण की ‘कोठा संवाद:पाँच’ लघुकथा में भी वैवाहिक जीवन की असफलता देह–व्यापार का कारण बनती है।

शरीर की माँग एक जैव आवश्यकता है। विवाह इसकी पूर्ति का आदर्श एवं संतुलित रूप् है। इस आदर्श के खण्डित होने पर नारी देह केवल देह रह जाती है, जिसकी नितान्त निजी जरूरत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ‘समाज चुपचाप’ में डॉ. कमल चोपड़ा ने इस जैव आवश्यकता का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। चौधरी महेन्द्र सिंह बी.डी.ओ. साहब के कमरे में विधवा बहिन की उपस्थिति को चुपचाप सह लेते हैं। रिश्ते चाहे खून के हों चाहे अन्य प्रकार के शरीर की भूख को जो प्राथमिक मानते हैं; उनके लिए ये बेमानी हैं। ‘रिश्तेदार’ में पुरुष द्वारा पुलिस से बचाने के लिए बहिन का क्षणिक रिश्ता जोड़ना घृणित ही सिद्ध होता है। ‘अनुकम्पा’ का सेठ, ‘उतार लो’ का राजनेता नारी शरीर को दैनिक उपभोग की सामग्री से बढ़कर कुछ नहीं समझते। देह–व्यापार में शरीर की क्या करुण नियति होती है, इसे योगेन्द्र शर्मा ने ‘एक जीवनी’ में बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। जो औरत देह को सब कुछ मान बैठी है ,विवाह उसके लिए चरित्रहीनता है। पंकज जी ने ‘आवारा लड़की’ में इस रुग्ण चिन्तन को तीखेपन से उजागर किया है। ‘जलपरी’ में भी महानगर की सभ्यता में उगे देह के विषवृक्ष का प्रभाव चित्रित किया गया है। ‘बजट’ में भी स्त्री–पुरुष केवल शरीर हैं–पशु–शरीर,इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। यही भोगनाद नारी की दुर्गति का मूल कारण है ; जिसमें पुरुष एक अनिवार्य कारक है। पुरुष अधिकारी की कामुकता के कारण अधीनस्थ कर्मचारी की पत्नी को चरित्रहीन करार दे दिया जाता है। ‘इंसाफ’ (आनन्द बिल्थरे) में चरित्र को पूँजी मानने वाले पति–पत्नी कानून और समाज द्वारा प्रदत्त दण्ड भुगतने को विवश हैं।

विलासिता चाहे पुरुष की हो चाहे स्त्री की, सबसे अधिक घाटे में स्त्री ही रहती है। नुकसान, फर्क, निशाना, कुर्सी का बयान, शुरुआत,परम्परा, कुसंस्कार इसी प्रकार की लघुकथाएँ हैं। इन कथाओं में पुरुष की कामुकता के साथ–साथ किसी हद तक स्त्री को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। लेकिन साथ ही एक गम्भीर प्रश्न भी है–पुरुष ही इसका कारण बनते हैं। पुरुष–समाज अपनी इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। । ‘काम’ की मेम साहब के लिए पुरुष शरीर मात्र है। चाहे वह शरीर पति का हो, चाहे अर्दली का। अवैध संबंध उसके लिए मजबूरी नहीं, बल्कि मन बहलाव है। ‘मुनाफा’ (यशवंत कोठारी), की स्टेनो मेहमानों को एंटरटेन करने के लिए बाध्य है। मेहमान खुश होंगे तो कम्पनी को पाँच लाख का लाभ होगा । कम्पनी के लाभ–हानि पर ही स्टेनो की स्थिति निर्भर है। पैसे की गलाकाट होड़ में लाभ हड़पने का एक माध्यम औरत का शरीर भी बन गया है। गर्म गोश्त परोसने पर अधिकारी निर्णय बदल देंगे। विलासिता की आपूर्ति एक घिनौना व्यापारिक हथकण्डा बन गया है। ‘पोजीशन’ की छात्रा देह समर्पित कर कालिज में प्रथम स्थान प्राप्त करती है। झूठी शान के लिए शरीर का समर्पण मनोरोग नही तो क्या है, ‘समय’ की मिस राघवन मौज मस्ती के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है । तथा कथित भद्रपुरुषों की रातों को रंगीन करना ही उसकी दिनचर्या है। ‘शहर का पति अपनी विलासिता के कारण पत्नी व आया के साथ दोहरा जीवन जी रहा है। वह ओढ़े हुए प्रेम की नाटकीयता से पत्नी को छलने में सक्षम है।

कुछ के लिए कैरियर ही सब कुछ है, नैतिकता कुछ नहीं। ऊँचा पद प्राप्त करने के पीछे है प्रतिष्ठा के साथ–साथ अधिक धन अर्जित करना। ‘सीढ़ी’ के शेखर की पत्नी अपने प्रति के कैरियर की सीढ़ी बनती है। इसी दौड़ में अपना कैरियर बनाने के लिए खुद को इस्तेमाल करती है। ‘प्रमोशन’ का सुधीर अपनी पत्नी प्रभा की देह को सीढ़ी बनाकर प्रमोशन हथिया लेता है। शेखर और सुधीर दोनों ही ऐसे पुरुष हैं जो पतित होकर भी पत्नी से शुचिता की सामन्ती आशा रखते हैं। इंजीनियर मि. सक्सेना की पत्नी ‘शिकंजा’ में मंत्री जी के साथ कूपे में बैठ जाती है। उद्देश्य है पति का प्रमोशन कराना। मि. सक्सेना का यह कथन ‘मेरा सौन्दर्य कामदेव को भी साइन करने के लिए मजबूर कर सकता है’ आज की पतनशीलता का सबसे दु:खद उदाहरण है।

औरत चाहे वेश्या हो चाहे किसीी की पत्नी, उसके सम्पर्क में चाहे पुलिस आए चाहे पुरोहित, उसके शरीर के लिए सभी गिद्ध बन जाते हैं। ‘सारी उमर का तज़ुर्बा’ की वेश्याएँ पुलिस के अत्याचारों से पीडि़त हैं तो चरित्र–समानता’ लघुकथा में पुलिस और पुरोहित समानधर्मा हैं। ‘रपट’ में पुलिस द्वारा पाशविक शोषण दिल को दहला देने वाला है।
सुकेश साहनी की लघुकथा ‘नपुंसक’ पुरुष की रुग्ण सोच पर चोट करती है। क्या शारीरिक मर्दानगी ही पुरुष होने का सबूत है? कमजोर औरत को पुरुष अपने अस्तित्व का अहसास क्या इसी शक्ति से करा सकता है? बहुत सारे प्रश्न इस लघुकथा के साथ उभरते हैं। ‘जवाब’ ‘ताल’ और ‘रोजी’ की औरतों में जो उनका छिपा हुआ रूप सामने आता है, क्या वह सत्य नहीं? माँ और पत्नी का रूप क्यों हेय बन गया है। ‘सलीब’ में यात्रियों का दृष्टिकोण युवती के प्रति क्यों बदल गया? इन सबका कारण है औरत को औरत न समझना। उसकी विषम अवस्था के कारणों की पड़ताल न करना। उसे केवल ‘निष्प्राण शरीर’ मानकर कुंठित मन से विभिन्न रूप प्रदान करना। साहनी जी ने पुस्तक के सम्पादन में बहुत परिश्रम किया है। देह–व्यापार के विभिन्न कारणों एवं परिणामों को इन लघुकथाओं में प्रस्तुत किया है। ये चटखारे लेकर पढ़ने की लघुकथाएँ नहीं हैं, पाठक को चिन्तित करने वाली, उद्वेलित करने वाली एवं जिम्मेदारी का अहसास जगाकर शर्मसार करने वाली लघुकथाएँ हैं। ये रुग्ण समाज के घृणित फोड़े की शल्यक्रिया करने वाली लघुकथाएँ हैं ; जो हमें प्रश्नाकुल करती हैं, बेचैन करती हैं।

पुस्तक का मुखपृष्ठ आकर्षक एवं अर्थ व्यंजक है। छपाई उत्कृष्ट है। अयन प्रकाशन की यह सुन्दर प्रस्तुति निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। प्रबुद्ध पाठकों में इस संकलन का स्वागत होगा।