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हम देखते है के विशव में ५१ से अधिक मुस्लिम देश है मगर किसी भी मुल्क में लोकतंत्र नहीं है कही बादशाहत , फौजी , डिक्टेटर शिप और कही कमज़ोर जम्हूरियत है जिस के कारण सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक पृष्ठभूमि में बहुत पिछड़े हुए है .। पहली बात यह है कि इस्लाम में राज्य सरकार, संवैधानिक ढांचे की कोई स्पष्ट रूप मौजूद नहीं है। राज्य के खदोखाल किया होंगे, शासक कैसे चुनें जाइए गए , या कैसे सत्ता हस्तांतरण होगी .. इस्लाम के राजनीतिक और राज्य व्यवस्था के बारे में उतनी ही उलझनें और विरोधाभासों हैं, जितने इस्लाम के नाम पर किसी और मुद्दे पर। इसी नबी की मृत्यु के तुरंत बाद.खिलाफत (उत्तराधिकार) पर जबर्दस्त मतभेद पैदा होगे … जिसमें बड़े-बड़े सहाबा किराम एक दूसरे के सामने तलवारें लेकर खड़े हो गए और वही से खिलाफत के लिए लड़ाई औरसत्ता के लिए एक अन्नत हैं लड़ाई का सिलसिला चल पड़ा जो आगे चल कर खिलाफत पारिवारिक हो गया और खिलाफत जो के लोकतंत्र के अनुसार था बादशाहत में तब्दील हो गया .

इस्लाम दो आधार पर जीवित हे.तलख तथ्यों को छिपानेखुशनुमा बनाकर पेश करने में। इसलिए जब भी किसी छोटे या बड़े मसले पर अमल करने का समय आता है, तो मतभेद, विरोधाभास और लड़ाई मार कुटाई का तूफान खड़ा हो जाता है। यह आज की बात नहीं। ठीक आप (स।) की मृत्यु से यह सिलसिला जारी है। इस्लाम के राज्य और राजनीतिक व्यवस्था के बारे में तरह तरह की बातें की जाती हैं। जो चीज़ मौजूद नहींउसे दुनिया के लिए ‘आदर्श’ कहकर पुकारा जाता है। इस्लाम के चारों मुख्य खल्फ़ा किराम अलग ढंग से निर्वाचित हुए। और एक ऐसी लड़ाई शुरू हुआ, जिस पर 1400 साल बीतने के बाद भी इस्लामी दुनिया दो बड़े भागों में विभाजित है। ईरानविलायत यानि इमाम प्रणाली पर चल रहा है, और सऊदी अरब परिवार बादशाहत पर।हद तो ये है के आज के दौर में भी दो खलीफा दावेदार है और हर रोज सैकड़ो लोगकी हत्या कर रहे है .

इस्लामी राजनीतिक प्रणाली को कभी कभी लोकतंत्र का भी नाम दे दिया जाता है।कहा जाता है इसमें मजलिस शूरा होती है। जाहिर है, यह लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है. क्यों के मजलिस शूरा में भी आम आदमी नहीं होता बल्कि उस में भी सिर्फ बादशाह के खंडन के ही लोग सदस्य होते है . खलीफा हमेशा स्वतंत्र आज के अर्थ में डिक्टेटर ही होता था .. वही संविधान, कानून, न्याय का स्रोत। इस्लाम की शुरुवात एक आदिवासी या यु कहिये के कबीला माहौल में हुई थी। इसलिए बैअत और वीरता एक कबीलाई अवधारणा ही है। जो पहले से इस्लाम से चला आ रहा था। इसमें कुछ भी नया नहीं था। इस्लाम की चौदह सौ साल के राजनीतिक इतिहास में कभी भी किसी अरब और गैर अरब खिलाफत या राज्य में बादशाह के मौत के बाद सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्ण किसी प्रणाली और नियमों के अनुसार नहीं हुआ। यहां तक ​​कि अपने ही भाइयों, बेटों और पिता की हत्या कर सत्ता कब्जा करने का रिवाज था। कहने को तो आप इस्लाम के राजनीतिक अवधारणा प्रणाली पर सैकड़ों मोटी मोटी किताबें मिल जाएंगी। लेकिन सब काल्पनिक पलाव के सिवा कुछ नहीं। आप इस में से कोई ठोस सामग्री नहीं मिलेगा। या जो कम से कम मुसलमानों के हर वर्ग को स्वीकार हो।

लोकतंत्र की कल्पना आधुनिक औद्योगिक समाज और विकसित सभ्यता की देन है। मुस्लिम देशों और समाज चूंकि सामान्यतया गैर औद्योगिक, गैर विकसित हैं। यह ज्ञान, शिक्षा, उद्योग, व्यापार में कमजोर हैं। और उनके हां अभी भी ज्यादातर आदिवासी और सामंती समाज और उनके मूल्यों संचालित हैं। इसलिए आधुनिक मुस्लिम ज़हन इस्लाम के ‘आदर्श अवधारणा राज्य को कभी आदिवासी कभी जागीरदार, और कभी आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में देखता है। मुसलमान अतीत को वापस लाना चाहते हैं। एक तो पहले कभी वापस नहीं आ सकता, दूसरे उस अतीत की ‘स्पष्ट और पारदर्शी’ आकार भी कोई मौजूद नहीं है। इसलिए मुस्लिम समाज कभी सही, कभी बाएँ, कभी आगे कभी पीछे भटकते रहते हैं।

अगर हम इतिहास देखे तो पता चलता है के अधिक तर मुस्लिम और इस्लामी देशो में शुरुवात से ही सत्ता की लड़ाई रही है और इस के लिए लाखो लोगो का क़त्ल किया गया है और लोगो का खून पानी की तरह बहाया गया है . अभी आप देखिये साउदी अतब के बादशाह की मौत को एक महीने अधिक छुपाया गया क्यों के उन के भईयोि और बेटो में गद्दी की लड़ाई शुरू हो गयी थी , समस्या सुलझने के बाद उन के मौत का एलान किया गया लगभग इसी तरह की लड़ाई हर मुस्लिम देशो में होती है जब सत्ता हस्तांतरण करना होता है ये अलग बात है के आज के आधुनिक माहौल में उस तरह की लड़ाई नहीं होती जो आज से सौ साल पहले होती है . मुस्लिम देशो में जिस तरह की सामाजिक संरचना और क़बायली सिस्टम है जिसे देख कर नहीं लगता के कभी भी इस्लामी देश में लोकतंयत्र या प्रजातंत्र आ पाये गा. अभी भी इस्लामी देशो को आज के आधुनिक और वकिकसित देशो के साथ मिल के चलने में समय लगे गा.