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” मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि जो मुसलमान सार्वजनिक तौर पर अपने धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं, उनके खिलाफ यूरोप में भेदभाव किया जाता है.”’ ???

आज दुनिया भर में प्रख्यात यूनिवर्सिटी विस्वविद्यालय किस तरह चलाया जाये वो मुस्लिमो के पास से यूरोप ने सिखा ।

दुनिया भर के ग्रेजुएट के लिए रेजुएशंन के लिए देने में आता काला लंबा कोट और उसपे फुमते वाली काली टोपी जो आज भी दुनिया भर की यूनिवर्सिटी में दी जाती है जो एजुकेसन का सिम्बोल बन गया है। ये ड्रेस अरबस्तान की काइरो की अल अज़हर युनिवर्सिटी से दुनियां ने 1000 साल पहले लिया है।

इस्लाम ने “इल्म” की सर’परस्ती की उसको तलाश किया और उसको सुरक्षा दी..इकरा बिसमे रब्बेका …. !! और आज !!!!!!!!!!!!!!!

दसवीँ-ई. मे “कोरडोबा-(उन्दिलिस)” यूरोप का सबसे विकसित और सभ्य शहर था l दुनिया जानती है कि उस दौर मे सिर्फ “स्पेन” मे ऐसी ‘लाइब्रेरियाँ’ थीँ जहाँ से पढने के लिए किताबेँ पूरे यूरोप को सप्लाई होती थी l जब “ब्रिटेन” का बादशाह “”अलफ्रेड”” बावर्ची-खाने के गुण सीखने मे मगन रहता था तो सिर्फ “स्पेन” के शाही-लाइब्रेरी मे “चार-लाख” किताबेँ मौजूद थीँ जो समूचे यूरोप की किताबोँ से भी ज्यादा थीँ l

ये सब कुछ इसलिए मुमकिन हुआ क्योकि “इस्लामी-दुनिया” ने यूरोप और चीन से भी सैकडोँ साल पहले “कागज” बनाने का हुनर सीख लिया था l

बहुत सी विशेषताऐँ जिस पर आज यूरोप घमंड करता है वो यूरोप को “इस्लामिक-इम्पायर” स्पेन से मिली हैँ l

हाँ दोस्तों यह प्रिँस-चार्लस (ब्रिटेन) का 1993 मे लिखे गये एक लेख के हवाले से यह बात आपको बता रहा हूँ …..

काबा सरीफ की तरफ मुंह करके नमाज़ के लिए दुनियां को पहला होका यन्त्र नाम ”कुतुबनुमा” मुसलमानो ने बनाया।

दुनियां का पहला नक्सा सबसे पहले मुसलमानो ने बनाया।

तारों को दूर से देखने वाली दूरबीन दुनिया ने सबसे पहले मुसलमानो के पास ही देखे ।

अल बरुनी ने दुनियां गोल है और वो सूरज के आसपास घुमती है सबसे पहले उनहोंने दुनियां को बताया।

अब आप पीछे यूरोप आगे !!! मगर परेशान न होइए एक लेख आप पढ़िये और मनन कीजिये ????

ओरियाना फलासी ने अपनी पुस्तक ‘तर्क की शक्ति’ में घोषणा की है कि ‘यूरोप इस्लाम का एक प्रान्त और उपनिवेश बनता जा रहा है ’. ?? चौंक गए न !! ॥ प्रसिद्ध इतालवी लेखक अपनी जगह पूरी तरह ठीक हैं. यूरोप की प्राचीन मजबूत ईसाई पकड़ तेजी से ढीली पड़कर इस्लाम के लिये मार्ग प्रशस्त कर रही है…..

***विश्व को हिला देने वाली इस घटना के लिये प्रमुख रूप से दो तत्व उत्तरदायी हैं-***

जी जी यही सच्चाई है की ईसाइयत का खोखलापन – अपनी परम्परा और मूल्यों के साथ सम्बन्ध क्षीण करता हुआ यूरोप उत्तर ईसाई समाज बनता जा रहा है. पिछली दो पीढ़ियों में आस्थावान और धर्मपालक ईसाइयों की संख्या इतनी कम हुई है कि पर्यवेक्षकों ने इसे नया अन्ध महाद्वीप कहना आरम्भ कर दिया है. विश्लेषकों का पहले ही अनुमान है कि मस्जिदों में उपासना करने वालों की संख्या प्रत्येक सप्ताह चर्च आफ इंगलैण्ड से अधिक होती है….

अब इसका विश्लेषण देखिये “”उत्साहहीन जन्मदर – स्वदेशी यूरोपवासी नष्ट हो रहे हैं . किसी जनसंख्या को कायम रखने के लिये आवश्यक है कि महिलाओं का सन्तान धारण करने का औसत 2.1 हो परन्तु पूरे यूरोपीय संघ में दर एक तिहाई 1.5 प्रति महिला है और अब तो वह भी गिर रही है . एक अध्ययन के अनुसार यदि जनसंख्या का यही रूझान कायम रहे और आप्रवास पर रोक लगा दी जाये तो 2075 तक आज की 375 मिलियन की जनसंख्या घटकर 275 मिलियन हो जायेगी. यहाँ तक कि अपने कारोबार के लिये यूरोप को प्रतिवर्ष 1.6 करोड़ आप्रवासियों की आवश्यकता है. इसी प्रकार वर्तमान कर्मचारी और सेवानिवृत्त लोगों के औसत को कायम रखने के लिये आश्चर्यजनक 13.5 करोड़ आप्रवासियों की प्रतिवर्ष आवश्यकता है.

इसी रिक्त स्थान में इस्लाम और मुसलमान को प्रवेश मिल रहा है. जहाँ ईसाइयत अपनी गति खो रही है वहीं इस्लाम सशक्त, दृढ़ और महत्वाकांक्षी के साथ साथ ईमानदार है. जहाँ यूरोपवासी बड़ी आयु मे भी कम बच्चे पैदा करते हैं वहीं मुसलमान युवावस्था में ही बड़ी मात्रा में सन्तानों को जन्म देते हैं.। यूरोपियन संघ का 5% या लगभग 2 करोड़ से अधिक लोग मुसलमान हैं. यदि यही रूझान जारी रहा तो 2020 तक यह संख्या 10% पहुँच जायेगी.। ऐसे मे अमेरिका , यूरोप संघ चिंघाड़ न मारें तो क्या करें ?? अब देखिये जहां 85% आम जनता मनुस्मिरीति के कोढ़ से मर रही है वहाँ भी मुसलमान मुसलमान की डकार ले रहे हैं 10 ,20 पैदा करो !!!!!!!!

लेख मे लेखक का ड़र साफ झलक रहा है जैसा कि दिखाई पड़ रहा है कि गैर मुसलमान नयी इस्लामी व्यवस्था की ओर प्रवृत्त हुये तो यह महाद्वीप मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र बन जायेगा. जब ऐसा होगा तो भव्य चर्च पुरानी सभ्यता के अवशेष बनकर रह जायंगे जब तक कि सउदी शैली का प्रशासन उसे मस्जिद में न परिवर्तित कर दे या तालिबान जैसा प्रशासन उसे उड़ा न दे. इटली, फ्रांसीसी, अंग्रेज और अन्य महान राष्ट्रीय संस्कृतियों का पतन होगा और उनका स्थान उत्तरी अफ्रीका , तुर्की, उपमहाद्वीप और अन्य तत्वों के विलयन से बनी पराराष्ट्रीय इस्लामी पहचान ले लेगी……

दोस्तों यह कोई भविष्यवाणी नई नहीं है. 1968 में ब्रिटिश राजनेता इनोक पावेल ने अपने प्रसिद्ध भाषण ”रक्त की नदियों” में चेतावनी दी थी कि अत्यधिक आप्रवास की अनुमति देकर ब्रिटेन अपनी ही चिता जला रहा है( उन शब्दों ने एक उदीयमान भविष्य को समय से पहले अवरूद्ध कर दिया). 1973 में फ्रंसीसी लेखक जीन रासपेल ने ”कैम्प ऑफ द सेन्ट्स” नामक उपन्यास में चित्रित किया कि यूरोप भारतीय उपमहाद्वीप से अनियन्त्रित विशाल आप्रवास में गिर रहा है.। एक क्षेत्र की प्रमुख सभ्यता का शान्तिपूर्वक दूसरी सभ्यता में परिवर्तित हो जाने की यह प्रक्रिया मानव इतिहास में अभूतपूर्व और ऐसी आवाजों की अवहेलना को आसान करती है.।
अब लेखक महोदय का मशवरा भी पढ़िये की ”यूरोप में परिवर्तन अपेक्षित है जो ईसाई धर्म का पुनरूद्धार करे, सन्तानों की वृद्धि दर बढ़ाये, आप्रवासियों का सांस्कृतिक आत्मसातीकरण करे. सैद्धान्तिक रूप में ऐसी घटनायें घटित हो सकती हैं परन्तु वे व्यावहारिक आकार कैसे ग्रहण करेंगी इसकी कल्पना करना कठिन है.।

अनेक कारणों से लोगों ने रेखांकित नहीं किया है कि जन्म दर में गिरावट का सबसे बड़ा कारण आधुनिकता है (महिलाओं की शिक्षा, आवश्यकतानुसार गर्भपात, वयस्कों की आत्मकेन्द्रित सोच के कारण बच्चे न पैदा करने की इच्छा) . इसके साथ ही मुस्लिम विश्व को आधुनिक बनाने से यूरोप की रूख करने का आकर्षण कम होगा.। ईसाई होने के कारण लैटिन अमेरिका को यूरोप को ऐतिहासिक पहचान बनाये रखने की थोड़ी बहुत अनुमति देनी चाहिये. हिन्दू और चीनी सास्कृतिक विविधता को बढ़ायेंगे और इस्लाम के प्रभुत्व को कम करेंगे.।

यह सोच भी यूरोप मे अब पनप रही है ??

प्रन्तु वर्तमान रूझान से लगता है कि इस्लामीकरण होगा क्योंकि ऐसा लगता है कि बच्चे रखना यूरोपवासियों के लिये काफी थकाऊ होगा. इसी प्रकार अवैध आप्रवास को रोकना तथा आप्रवास के स्रोतों की विविधता बढ़ाना भी कठिन होगा. इसके बजाय वे अप्रसन्नतापूर्वक सभ्यता के विस्मरण में जीना पसन्द करेंगे.।
यूरोप ने सम्पन्नता और शान्ति के मामले में ऊँचाइयाँ प्राप्त करते हुये अपने कायम रखने की अभूतपूर्व योग्यता का परिचय जो दिया है. एक भूजनांकिकी विशेषज्ञ वोल्फगांग लुज ने माना है ‘ विश्व इतिहास में नकारात्मक गति का ऐसा अनुभव इतने बड़े पैमाने पर कभी नहीं हुआ है’….

ऐसा अवश्यंभावी लगता है कि अत्यन्त मेधावी सफल समाज यूरोप ऐसा पहला समाज होगा जो इन विशेषताओं के साथ ही सांस्कृतिक आत्मविश्वास के अभाव के चलते पतन के खतरे का सामना करेगा. विडम्बना है कि जीने का सबसे इच्छित स्थान का विकास आत्महत्या का कारण बनता जा रहा है. यह मानव व्यंग्य चलता रहेगा.इसी लिए दोस्तों आरएसएस का नाम आप लोग इन्हें सुझा दें !!! वानर रीछ सब तो हैं यहाँ पर !!!!!!!!!!!!