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सेवानिवृत्ति के बाद लंदन में रह रहे मैल्कम डार्लिंग नामक भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक पूर्व अधिकारी ने 31 जनवरी, 1948 को अपनी डायरी में लिखा, ‘गांधी की कल हत्या कर दी गई। कहना मुश्किल है कि अब आगे क्या होगा, लेकिन यह ठीक ऐसा ही है, जैसे किसी जहाज ने अपनी पेंदी खो दी हो। अब बिखराव अनिवार्य लगता है। अब उन चार करोड़ मुसलमानों का क्या होगा, जो भारत में बचे हैं, क्योंकि उन्होंने अपना संरक्षक खो दिया है? मुझे लगता है कि जल्दी ही या कुछ समय के बाद कहीं हमें फिर से वापस न जाना पड़े।’

डार्लिंग अत्यंत प्रबुद्ध व्यक्ति थे। जब वह पंजाब में नियुक्त थे, तो उनकी गिनती उन अधिकारियों में होती थी, जो न सिर्फ संवेदनशील था, बल्कि भारतीय आकांक्षाओं का समर्थक भी था। लेकिन विभाजन की भयावहता ने उन्हें अपनी राय पर फिर से गौर करने को बाध्य किया। गांधी की हत्या के बाद, उप-महाद्वीप की अनियंत्रित स्थिति देखते हुए वह भी अंग्रेजों के फिर से वापस लौटने का कयास लगा रहे थे।

डार्लिंग की इस आशंका को व्यापक रूप से साझा किया गया। अन्य पश्चिमी विश्लेषकों का मानना था कि भारत फिर से 18वीं सदी के उसी ढर्रे पर लौट जाएगा, जब इसके तमाम क्षेत्र दर्जनों छोटे और बड़े जमीदारियों में बंटे थे। वे कयास लगा रहे थे कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच किसी भी कीमत पर खून बहेगा ही, क्योंकि उनका विख्यात शांतिदूत अब इस दुनिया में नहीं था।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि गांधी की शहादत का एक तत्काल परिणाम उनके दो मुख्य सहयोगी, जवाहरलाल नेहरू और वल्लभ भाई पटेल के बीच एक संभावित नुक्सानदेह मतभेद को भरने के रूप में दिखा। नेहरू नव स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री थे (तब वह विदेश मंत्री का दायित्व भी निभा रहे थे) और पटेल उप प्रधानमंत्री होने के साथ ही गृह मंत्री और रियासतों के मंत्री भी थे।

गांधी की हत्या के कुछ हफ्ते पहले से नेहरू और पटेल के बीच तीखी असहमतियों की श्रृंखला-सी चल रही थी। दोनों अपने-अपने पदों से इस्तीफे की सोच रहे थे; दोनों एक-दूसरे के साथ काम करने को बिल्कुल तैयार नहीं थे। 30 जनवरी को प्रार्थना में जाने से पहले गांधी की पटेल से लंबी बातचीत हुई थी, और प्रार्थना के बाद वह नेहरू से इसी मुद्दे पर चर्चा करने वाले थे।

गांधी की हत्या ने उन दोनों को अपने मतभेद खत्म करने को बाध्य किया। नेहरू ने पटेल को लिखा, ‘बापू की मौत के बाद सब कुछ बदल गया है, और अब हमें अलग और बहुत ही मुश्किल दुनिया का सामना करना होगा। पुराने मतभेदों को भूलना ज्यादा महत्वपूर्ण है और मुझे लग रहा है कि इस घड़ी में यह हम सबके लिए अत्यंत जरूरी है कि हम सभी जितना संभव हो, उतनी घनिष्ठता और सहयोग के साथ काम करें।’ जवाब में पटेल लिखते हैं, ‘मैं दिल से, और पूरी तरह से उन भावनाओं के साथ हूं, जो आपने इन भावपू्र्ण शब्दों में व्यक्त की है। हाल की घटनाओं ने मुझे ठेस पहुंचाई थी, और मैंने बापू को भी लिखा था कि वह मुझे इस जिम्मेदारी से मुक्त करें। मगर उनकी मौत ने सब कुछ बदल दिया है, और जो संकट हम सबके ऊपर आया है, वह न सिर्फ हमें यह सोचने को बाध्य करता है कि आखिर किस तरह एक साथ रहकर हमने इतनी उपलब्धियां हासिल की हैं, बल्कि शोक में डूबे देश के हितों के लिए आगे भी संयुक्त प्रयासों की जरूरत बताता है।’

इस बीच दोनों, पटेल और नेहरू जनाक्रोश को शांत करने के लिए ऑल इंडिया रेडियो गए। पटेल ने लोगों से अपील की कि वे प्रतिशोध की नहीं सोचे, बस उस ‘प्यार और अहिंसा को याद रखें, जिसे महात्मा जी ने स्थापित किया है। हमने इन संदेशों को तब आत्मसात नहीं किया, जब वह जीवित थे; कम से कम उनकी मौत के बाद तो हम उनके कदमों पर चलें।’ नेहरू ने अपने संदेश में कहा, ‘भारतीयों को एक साथ रहना चाहिए और सांप्रदायिकता रूपी उस भयानक जहर से मुकाबला करना चाहिए, जिसने हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की हत्या कर दी।’

भूलना नहीं चाहिए कि इस संदेश का व्यापक प्रभाव पड़ा। दंगे और खून-खराबे से इतर, गांधी की मौत ने हिंसा खत्म करने का काम किया। हिंदू अत्यधिक भयभीत थे कि उनकी ही कौम के एक व्यक्ति ने एक महानतम हिंदू की हत्या कर दी। मुसलमानों पर हमले रुक गए, अपने अल्पसंख्यकों के प्रति पाकिस्तान जैसा बर्बर व्यवहार करने की कुत्सित इच्छा का दमन कर दिया गया। इसके करीब एक दशक से भी ज्यादा का वक्त बीतने के बाद ही भारत किसी हिंदू-मुसलिम भयानक दंगे का गवाह बना।

सांप्रदायिक भावनाओं के पस्त होने के कारण ही नेहरू, पटेल और उनके सहयोगी देश के लिए एक लोकतांत्रिक संविधान बनाने, रियासतों को एक साथ जोड़ने और स्वतंत्र विदेश तथा आर्थिक नीतियों की नींव रखने पर अपना ध्यान केंद्रित कर सके। यह कतई संभव नहीं हो पाता, अगर नेहरू और पटेल की राहें अलग होतीं या हिंदू-मुसलमान दंगे अनवरत जारी रहते। इस तरह गांधी की शहादत ने, गंभीर मतभेद में उलझे दो व्यक्तियों को आपस में मिलने के साथ ही झगड़े में उलझे दो समुदायों को एक साथ लाकर भारत की एकता सुनिश्चित की।

यही सपना खुद महात्मा ने भी देखा था। सितंबर, 1924 में सांप्रदायिक सद्भाव को लेकर गांधी ने दिल्ली में तीन हफ्ते के उपवास की शुरुआत की थी। उपवास शुरू करने से पहले उन्होंने कहा, ‘स्वभावतः मैं जानता हूं कि हिंदुत्व के लिए क्या जरूरी है। मगर मुसलमानों की मानसिकता समझने के लिए हमें जरूर मेहनत करनी चाहिए। मैं उनके जितना समीप जाऊंगा, उम्मीद है कि मेरा कृत्य मुसलमान और उनकी बेहतरी के ज्यादा करीब होगा। मैं इन दोनों समुदायों के बीच बेहतर जोड़ बनने का प्रयास कर रहा हूं। यह अगर मेरे खून से भी संभव है, तो मुझे ऐतराज नहीं।’

वह विचार नया नहीं था। 29 जनवरी, 1909 को गांधी ने अपने भतीजे मगनलाल को लिखा, दक्षिण अफ्रीका में अपने देशवासियों के हाथों मेरी मौत हो सकती है। अगर ऐसा होता है, तो तुम्हें खुश होना चाहिए। इससे हिंदू और मुसलमान एकजुट हो जाएंगे। एकता के दुश्मन इसे तोड़ने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। इस महान प्रयास के लिए किसी न किसी को अपना बलिदान देना होगा। अगर यह मेरे बलिदान से संभव होता है, तो मैं हमेशा आभारी रहूंगा।

39 वर्ष बाद गांधी की भविष्यवाणी सच साबित हुई। वर्ष 1946 और 1947 के बीच उनके दुश्मन हिंदुओं और मुसलमानों के ध्रुवीकरण के लगातार प्रयास कर रहे थे। जनवरी, 1948 के पहले हफ्ते में ऐसी कोशिशों को पहली बार तब धक्का लगा जब गांधी ने पांच दिन का उपवास रखा, जिससे दिल्ली में सांप्रदायिक शांति कायम हो सकी। और दूसरी बार तब जब गांधी ने पूरे देश में सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने के लिए अपना जीवन आहूत कर दिया।

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