kinnar

किन्नर अगर इश शब्द को पढ़ा जाये तो मुश्किल से एक या दो सैकेंड लगेंगे और अगर समझने की कोशिश की जाये तो 15 बीस मिनट में कोई जानकार यह आसानी से समझा देगा कि किन्नर कौन होते हैं ? वही किन्नर जिन्हें हम हिजड़ा, या छक्का कह देते हैं। मगर हम शायद ही इस दर्द को जानते जिसे किन्नर अपने सीने में दबाये हुऐ लोगों के सामने हथेली पीटते हुऐ नाचते हैं, उनका मनोरंजन कराते हैं। उनकी हथेलियां ही उनकी आह हैं और उनका ठुमका ही दर्द। दो रोटी के लिये ठुमका लगाते और हथेली पीटते ये लोग किसी दूसरे या तीसरे गृह के नहीं बल्कि हमारे ही समाज का हिस्सा है। शाम को अक्सर ऑफिस से लौटते वक्त गाजियाबाद में सिहानी चुंगी के आस – पास मुझे ये देर रात यह सड़कों पर दिख जाते हैं जहां पर टैक्सी चालक, ट्रक, मैटाडोर, के ड्राईवर और कुछ दूसरे लोग भी जिनसे रात को अपनी हवस मिटाते हैं। कोई पचास रुपये देता है तो की सौ, जैसा ‘माल’ है वैसे पैसे हैं, कोई मौसम हो यह लोग कहीं नहीं जाते यहीं रहते हैं। किसी होटल में हवस मिटाने से बेहतर ड्राईवर लोग समझते हैं कि यहीं कम पैसों में अपना काम चला लिया जाये। एक किन्नर रात भर में चार से पांच सो रुपये तक कमा लेता है जिसमें पुलिस का भी हिस्सा होता है। चुंकी पुलिस चौकी वहां से कुछ ही कदम पर है जहां यह सब हो रहा होता है। यह सब हमारे सभ्य कहलाने वाले समाज की देन है उसी समाज की जिस समाज की लड़की अगर किसी दूसरी बिरादरी के युवक के साथ शादी कर लेती है तो उसकी ऑनर किलिंग हो जाती है। और अगर किसी दूसरे धर्म में कर लेती है तो कुछ संगठन उसे लव जिहाद का नाम दे देते हैं । सर्दी में, गर्मी में, बरसात में रातों को सड़कों पर खड़े होकर सभ्य समाज के लोगों की जिस्मानी प्यास बुझवाते यह किन्नर क्या इंसानी समाज का हिस्सा नहीं है ? शायद नहीं क्योंकि यह धर्म से धुत्तकारे हुऐ लोग हैं, जिनका एक ही धर्म मान लिया गया है नाचना गाना, हथेली पीटना, या आप चाहें तो कोई और नाम भी दे सकते हैं, जैसा हिजड़ा, छक्का, आदी।

मगर सोचिये अगर आपके घर में कोई बच्चा पैदा हुआ है और आपको पता चले कि वह न तो लड़का है न लड़की फिर आप पर क्या गुजरेगी ? क्या गुजरेगी आप पर जब उसकी आवाज आपके और बच्चों के आवाज से अलग होगी ? क्या गुजरेगी जब आपका वह बच्चा दूसरे बच्चों से अलग दिखेगा ? मगर आप यह नहीं कह सकते कि वह तुम्हारा नहीं है क्योंकि वह हिजड़ा है। मगर जिस्म तो उसका भी है, सांस तो वह भी लेता है, खाना तो वह भी खाता है, वोट तो वह भी डालता, कपड़े वह भी पहनता है। फिर वह समाज से अलग कैसे क्या सिर्फ इसलिये कि वह रात को बैडरूम में वह नहीं कर सकता जो दूसरे लोग करते हैं। या इसलिये कि आप एक हिजड़े के पिता हैं ? जिस वक्त धर्म जागरण मंच का ‘घर वापसी’ अभियान चलाया जा रहा था उस वक्त मेरे जेहन में आया था कि इन लोगों की भी अगर घर वापसी हो जाये तो कितना अच्छा रहे। मगर ऐसा नहीं हो पाया, क्योंकि घर वासपी वालों को इंसान चाहिये थे, मुसमलान और ईसाई चाहिये, किन्नर नहीं। किन्नर की घर वापसी कराने से उनको शायद शर्म आयेगी। खैर रातों को सड़कों पर जिस्म बेचकर अपना काम चलाते इन किन्नरों को देखकर कई सवाल दिमाग में आते हैं। सबसे पहला तो यही है कि जिस्म किन्नर का बिकता है, दर्द किन्नर नुमा किसी इंसान को होता है, और हिस्सेदारी पुलिस की क्यों होती है ? ऐसे मौकों पर, ऐसे मुद्दों पर समाज के नेता कहां चले जाते हैं ? धार्मिक नेता कहां चले जाते हैं ? और हम जो खुद को सभ्य होने का दंभ भरते हैं हम कहां चले जाते हैं ? जो जिस्म बेच रहा है वह किन्नर समाज का है और जो उस जिस्म खरीद रहा है वह सभ्य समाज का, कैसी अजीब परिभाषाऐं हमने गढ़ी हैं। थोड़ी देर के लिये आप भी क्या करोगे सोचोगे लाईक करोगे, कमेंट करोगे, और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लोगे, ठीक उसी तरह जिस तरह मैं हर रोज इस तमाशे को देखते हुऐ आता हूं और फिर अगले दिन की प्लानिंग में लग जाता हूं।