जीवन में साहित्य का महत्व : प्रेमचंद

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munshi-premchand

सिकंदर हयात

अपने एक लेख में प्रेमचंद बताते हे की जीवन में साहित्य का क्या महत्व हे ? क्या स्थान हे क्यों हे ? आज की भागती दौड़ती जिंदगी में इंसान किसी चीज़ से सबसे ज़्यादा दूर हो रहा हे तो साहित्य भी हे इसके दुष्परिणाम भी साफ़ तौर पर देखे जा सकते हे लोगो की अच्छा कहने सुनने की एक दुसरे को समझने की रोचक बातचीत की क्षमता कम हो रही हे कारण साफ़ हे की दिमाग और मन दोनों की ही खुराक पढ़ना और साहित्य होता ही हे टी वी इंटरनेट और दुसरे माध्यम जीवन में साहित्य का स्थान बिलकुल नहीं ले सकते हे प्रेमचंद बड़े ही सुन्दर शब्दों में बताते हे की जीवन में साहित्य का क्या महत्व हे ?

”साहित्य का आधार जीवन हे इसी नीव पर साहित्य की दीवार कड़ी होती हे उसकी अटारिया मीनार और गुम्बंद बनते हे लेकिन बुनियाद मिटटी के नीचे दबी पड़ी हे उसे देखने का भी जी नहीं चाहेगा जीवन परमात्मा की सर्ष्टि हे इसलिए अंनत हे , अगम्य हे साहित्य मनुष्य की सर्ष्टि हे इसलिए सुबोध हे सुगम और मर्यादा से परिमित हे जीवन परमात्मा को अपने कामो का जवाबदेह हे या नहीं , हमें मालूम नहीं लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह हे इसके लिए कानून हे जिससे वह इधर उधर नहीं हो सकता हे ”

”जीवन का उद्देश्य ही आनंद हे मनुष्य जीवन पर्यन्त आनंद की खोज में लगा रहता हे किसी को वह रत्न द्र्वय धन से मिलता हे किसी को भरे पुरे परिवार से किसी को लम्बा चौड़े भवन से , किसी को ऐश्वर्य से , लेकिन साहित्य का आनंद इस आनंद से ऊँचा हे , इससे पवित्र हे , उसका आधार सुन्दर और सत्य हे वास्तव में सच्चा आनंद सुन्दर और सत्य से मिलता हे उसी आनंद को दर्शाना वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देशय हे , ऐश्वर्य आनंद में ग्लानि छिपी होती हे . उससे अरुचि हो सकती हे पश्चाताप की भावना भी हो सकती हे पर सुन्दर से जो आनंद प्राप्त होता हे वह अखंड अमर हे .” ” जीवन क्या हे – ? जीवन केवल जिन खाना सोना और मर जाना नहीं हे . यह तो पशुओ का जीवन हे मानव जीवन में भी यही सब प्रवृत्तियाँ होती हे क्योकि वह भी तो पशु हे पर उसके उपरांत कुछ और भी होता हे उसमे कुछ ऐसी मनोवृत्तियां होती हे जो प्रकर्ति के साथ हमारे मेल में बाधक होती हे जो इस मेल में सहायक बन जाती हे जिन प्रवृत्तियाँमें प्रकर्ति के साथ हमारा सामंजस्य बढ़ता हे वह वांछनीय होती हे जिनमे सामंजस्य में बाधा उत्पन्न होती हे , वे दूषित हे . अहंकार क्रोध या देष हमारे मन की बाधक प्रवृत्तियाँ हे . यदि हम इन्हे बेरोकटोक चलने दे तो निसंदेह वो हमें नाश और पतन की और ले जायेगी इसलिए हमें उनकी लगाम रोकनी पड़ती हे उन पर सायं रखना पड़ता हे . जिससे वे अपनी सीमा से बाहर न जा सके हम उन पर जितना कठोर संयम रख सकते हे उतना ही मंगलमय हमारा जीवन हो जाता हे ”

” साहित्य ही मनोविकारों के रहस्यों को खोलकर सद्वृत्तियो को जगाता हे साहित्य मस्तिष्क की वस्तु बल्कि ह्रदय की वस्तु हे जहा ज्ञान और उपदेश असफल हो जाते हे वह साहित्य बाज़ी मार ले जाता हे साहित्य वह जादू की लकड़ी हे जो पशुओ में ईट पत्थरों में में पेड़ पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देता हे ”

”जीवन मे साहितय की उपयोगिता के विष्य मे कभी कभी संदेह किया जाता हे कहा जाता हे की जो स्वभाव से अच्छे हे वो अच्छे ही रहेंगे चाहे कुछ भी पढ़े जो बुरे हे वो बुरे ही रहेंगे चाहे कुछ भी पढ़े . इस कथन मे सत्‍य की मात्रा बहुत कम हे इसे सत्य मान लेना मानव चरित्र को बदल देना होगा मनुष्य सवभाव से देवतुल्य हे जमाने के छल प्रपंच या परीईस्थितियो से वशीभूत होकर वह अपना देवत्य खो बेठता हे . साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्टित करने की चेष्टा करता हे उपदेशो से नहीं,नसीहतो से नहीं भावो से मन को स्पंदित करके , मन के कोमल तारो पर चोट लगाकर प्रकर्ति से सामंजस्य उत्पन्न करके . हमारी सभ्यता साहित्य पर ही आधारित हे . हम जो कुछ हे साहित्य के ही बनाय हे विश्व की आत्मा के अंतर्गत राष्ट्र या देश की आत्मा एक होती हे इसी आतमा की प्रतिध्‍वनि हे ‘ साहित्य ‘ ”

”भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत्सर्ग हे किसी राष्ट्र की सबसे मूलयवान संपत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हे व्यास और वाल्मीकि ने जिन आदर्शो की सर्ष्टि की वो आज भी भारत का सर ऊँचा किये हुए हे राम अगर वाल्मीकि के सांचे में न ढलते तो राम न रहते .यह सत्य हे की हम सब ऐसे चरित्रों का निर्माण नहीं कर सकते पर धन्वन्तरि के एक होने पर भी इस संसार में वैद्दो की आवशयकता हे और रहेगी ” कलम हाथ में लेते ही हमारे सर पर भारी जिम्मेदारी आ जाती हे . साधारणतः युवावस्था में हमारी पहली निगाह विध्वंस की और ही जाती हे हम यथार्थ वाद के परवाह में बहने लगते हे बुराइयो के नग्न चित्र खीचने में कला की कसौटी समझने लगते हे यह सताय हे की कोई मकान गिराकर ही उसकी जगह कोई नया मकान बनाया जाता हे पुराने ढकोसलों और बंधनो को तोड़ने की जरुरत हे पर इसे साहित्य नहीं कह सकते हे साहित्य तो वही हे साहित्य की मर्यादा का पालन करे ”

”हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते हे शायद हम समझते हे की मज़ेदार चटपटी और ओज़पूर्ण भाषा में लिखना ही साहित्य हे भाषा भी साहित्य का अंग हे पर स्थायी साहित्य विध्वंस नहीं करता हे निर्माण करता हे वह मानव चरित्र की कालिमा ही नहीं दिखलाता हे उसकी उज्वलताय दिखाता हे माकन गिराने वाला इंजिनियर नहीं कहलाता इंजिनियर तो निर्माण ही करता हे हममे से जो युवक साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते उन्हें बहुत ही महान सायं की आवशयकता होगी क्योकि वह अपने को एक महान पद के लिए तैयार कर रहे हे साहित्यकार को आदर्शवादी होना ही चाहिए अमर साहित्य के निर्माता विलासी परवर्ती के मनुष्य नहीं थे कबीर भी तपस्वी ही थे ” हमारा साहित्य अगर आह उन्नति नहीं करता हे तो इसका कारन यही हे की हमने साहित्य रचना के लिए कोई तैयारी नहीं की – दो चार नुस्खे याद करके हाकिम बन बैठे साहित्य का उत्थान राष्ट्र का उत्थान हे और हमारी ईश्वर से यही याचना हे की हममें सच्चे साहित्य सेवी उत्पन्न हो सच्चे तपस्वी सच्चे आत्मज्ञानी .”

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44 thoughts on “जीवन में साहित्य का महत्व : प्रेमचंद

  1. सिकंदर हयात

    अचानक से नज़र पढ़ी तो देखा की प्रेमचंद के इन विचार को सात सौ व्यू मिल गए हे बहुत ख़ुशी हुई पाठको का बहुत बहुत शुक्रिया आम तौर पर नेट पर गैर साम्प्रदयिक या गैर विवादित लेखो को बहुत ही कम क्लिक मिलते हे इसलिए सात सौ ही सही अच्छा लगा आगे और अच्छे साहित्यिक लेख पेश करने की कोशिश रहेगी मसला यह हे की लाइब्रेरी में जिस किताब को हाथ लगाओ उसी पर ”कॉपीराइट की धमकी ” लिखी होती हे साहित्य विचार की तरफ लोगो को आकर्षित कर भी तो कैसे ? और अगर हम लोगो को साहित्य विचार और पढ़ने की दुनिया में ना ले गए तो इसके बहुत ही बुरे नतीजे निकलेंगे आगे आप देखेंगे इंसान इतना सेल्फिश और उपभोगवादी हो जाएगा की पहले दुसरो का फिर अपना जीवन हराम कर देगा ऐसा वेस्ट में हो भी चूका हे लेकिन वहा फिर भी इतनी तबाही नहीं हुई क्योकि वहा आबादी कम हे और संसधान अधिक हे जबकि यहाँ आबादी बहुत ही ज़्यादा हे और संसधान कम हे

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  2. सिकंदर हयात

    रविंदर कालिया जी नहीं रहे उनका श्रद्धांजलि बहुत ही सफल और सार्थक जीवन जिया हे इन कालिया मिया बीवी ने इसलिए इनके संस्मरण इस कदर बेहतरीन हे की पूछो मत ग़ालिब छूटी शराब कामरेड मोनालिसा कितने शहरो में कितनी बार आदि बहुत ही ज़बरदस्त खासकर अश्क जी वाले तो बहुत ही मज़ेदार थे जब भी लाजपत नगर खरीदारी के लिए जाता था सोचता था इनसे मिलु ? लेकिन फिर गले पड़ना सही नहीं समझाइनकी किताबे संस्मरण इस कदर बेहतरीन थे की मुझे वो तारीख भी याद थी जब पहली बार रवि सर ममता जी से मिले थे 27 जून 1964 इसके पचास साल पुरे होने पर मेने ममता जी को बधाई का मेसेज भी किया था

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    1. सिकंदर हयात

      विभोर अग्रवालसफर में हमसफ़र – रवींद्र कालिया और ममता कालिया’ का लोकार्पण
      दिल्ली। रवि को अपनी यादों का पिटारा जान से प्यारा था। होता भी क्यों न! कितने तो शहरों में तंबू लगाए और उखाड़े, कितने लोगों की सोहबत मिली, एक से एक नायाब और नापाम तजुर्बे हुए। पर दाद देनी पड़ेगी उनकी सादगी की कि कभी जीवन-जगत के ऊपर से विश्वास नहीं टूटा। बीहड़ से बीहड़ वक्त और व्यक्तित्व में उन्हें रोशनी की एक किरण दिखी। सुप्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने विश्व पुस्तक मेले में साहित्य भण्डार द्वारा आयोजित पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में अपने दिवंगत पति रवींद्र कालिया को याद करते हुए कहा कि रवि के लेखन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उसमें तेवर है पर तल्खी नहीं, तरंग है पर तिलमिलाहट नहीं।इस अवसर पर साहित्य भण्डार द्वारा सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘सफर में हमसफ़र – रवींद्र कालिया और ममता कालिया’ का लोकार्पण हुआ। आयोजन में युवा आलोचक राजीव कुमार ने रवींद्र कालिया के साथ हुई अंतिम भेंट का संस्मरण सुनाया। उन्होंने कहा कि कालिया जी बड़े लेखक और बड़े संपादक होने के साथ बहुत बड़े मनुष्य भी थे। आयोजन में वरिष्ठ कथाकार हरियश राय ने ममता कालिया और रवींद्र कालिया के संस्मरण लेखन को हिन्दी साहित्य के संसार में अविस्मरणीय सृजन बताया। उहोने कहा कि ग़ालिब छुटी शराब की तरह पाठक ‘सफर में हमसफ़र’ को भी खूब पसन्द करेंगे। आयोजन में बनास जन के संपादक पल्लव, युवा कवि प्रांजल धर, फिल्म विशेषज्ञ मिहिर पंड्या, युवा आलोचक गणपत तेली सहित बड़ी संख्या में लेखक, विद्यार्थी तथा पाठक उपस्थित थे। साहित्य भंडार के प्रबंध निदेशक विभोर अग्रवाल ने अपने प्रकाशन संस्थान से कालिया परिवार के आत्मीय संबंधों का उल्लेख करते हुए अंत में सभी का आभार व्यक्त किया।
      विभोर अग्रवाल

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  3. सिकंदर हयात

    हालांकि ये भी सच हे की इतनी बेहतरीन सार्थक मनमर्ज़ी की ( धर्मयुग की नौकरी छोड़ना आदि ) और चिंतामुक्त मस्त जीवन कालिया जी दम्पति इसलिए जी पाये की जो भी हो मगर विभिन्न सरकारी नौकरियों की छत्रछाया कम या ज़्यादा जो भो हो मगर इनके साथ ये छाया थी इसी कारण इनका जीवन इतना बढ़िया रहा हम भी छुटभय्या लेखक हे घर में चार चार लोगो की सेलरी लाख के आस पास हे गाव में डेढ़ दो करोड़ की जमीन भी हे मगर फिर भी दिल्ली महानगरीय जीवन में इस कदर तनाव दबाव अनिश्चिन्ताय आशंकाय रहती हे की बुरा हाल हे इससे लेखन बुरी तरह प्रभावित होता हे जो सरकारी नौकरी वालो को आज भी और पहले तो बहुत ही ज़्यादा आराम था यही कारण हे की भारत में जो गैर अमीर और आम लोग कामयाब होते हे उनमे से आप देखे की 90 % सरकारी नौकरी के बैकग्राउंड वाले होते हे सरकारी नौकरी आपको चिंतामुक्त होकर कम से कम रोटी कपडा और मकान की गारंटी देती हे जिससे आप आशंकाओ से मुक्त होकर जोखिम लेकर अपनी रचनात्मकता दिखा पाते हे

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  4. सिकंदर हयात

    मेरा मानना हे की भारत में वैसे तो खेर अधिकतर अमीर या वंशवादी लोग ही कामयाब होते हे इनसे बाहर जो आम आदमी कामयाब होते हे उन्हें ये तीन सुविधाए होना अनिवार्य हे वार्ना कामयाबी नामुमकिन हे जिन्हे हम आम आदमी की कामयाबी कहते हे वो भी इन केटेगरी से बाहर के हो ही नहीं सकते हे यानी या तो उनके सर पर किसी की भी किसी भी मगर सरकारी नौकरी की छत्रछाया हो कम हो या ज़्यादा हो मगर हो उसके बाद ये की वो छोटी फेमली के हो यानि इकलौते हो या घर के इकलौते लड़के या लड़की तो हो ही ताकि सारे संसधान उन पर लग सके तीसरा की गाव या शहर में ठीक ठाक जमीन प्लाट मकान दूकान हो ही ताकि कामयाबी के लिए जोखिम लेने में आप खुदा न खास्ता पूरी तरह लूट जाए खाली हो जाए तो छत दाल रोटी की गारंटी तो हो ही ये गारंटी न हो तो आपको दुश्चिंताय बुरी तरह थका देंगी इनसे बाहर आपको भारत में कोई भी कामयाब आदमी नहीं मिलेगा शायद एक भी नहीं जैसे देखे रविश जी हे सबसे बड़े नाम हे वो बीवी बच्चो वाले तो हे मगर शायद कोई और परिवार उनका नहीं हे क्योकि कभी जिक्र नहीं करते हे नतीजा वो रिश्तो के दबाव से बचे रहे होंगे जिससे बची ऊर्जा वो काम पर लगा कर वो कामयाब हुए होंगे

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    1. सिकंदर हयात

      आई ए एस टॉपर टीना के पिता बी एस एन एल में जनरल मेने जर हे अब देखिये की अधिकतर आई ए एस टॉपर के बैकग्राउंड चेक करो तो सब अच्छी सरकारी नौकरी वाले ही मिलेंगे सरकारी नौकरी माँ की बाप की या दोनों की इसी तरह के होंगे सरकारी नौकरी ना केवल आपको पूरी सुरक्षा देती हे बल्कि सबसे बड़ी बात इन के माँ बाप के पास बेहद टाइम भी होता हे जिसमे ये अपने बच्चों को पूरा समय मार्ग दर्शन और सुविधाए देते हे जिससे इनका आधा रास्ता क्लियर हो जता हे तो ये भारत में अधिकांश कामयाबियों का राज़ आप देख सकते हे अब इसमें पेंच ये हे की ये लोग कामयाब तो हो जाते हे मगर एक सिक्योरिटी सर्कल में रहने कम्फर्ट ज़ोन में ही रहने किसी छत्रछाया में आगे बढ़ने के कारण इन लोगो में दमखम विकसित नहीं होता हे और ये लोग भारत जैसे बेहद मुश्किल देश में कही भी बुराई या समस्याओं से लम्बे समय तक झुझ नहीं पाते हे जैसा मेरा कज़िन हे अलीगढ का टॉपर हे बढ़िया सरकारी नौकरी हे उसने भी अपने ऊंच सरकारी नौकरी वाले कज़िन के अंडर में कामयाबी हासिल की नतीजा कामयाब हे महा महा विध्वान हे मगर किसी मुद्दे पर स्टेण्ड लेना का दमखम बिलकुल नहीं हे

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  5. सिकंदर हयात

    हमारे महान नेता मोदी जी के पास उपरोक्त में से कोई सुविधा नहीं थी न जायदाद न कोई सरकारी नौकरी बड़ी फेमली जो उनकी शादी के बाद और बड़ी हुई लेकिन मोदी जी को कामयाबी हासिल करनी ही थी सो वो घर छोड़ कर चले गए और एक छोटी ” फेमली ” का हिस्सा बने जहा वो थे और उनके गुरु थे इनामदार साहब जो संघ के बड़े नेता थे तब मोदी जी ने तरक्की की सीढ़िया चढ़ी इसी तरह कलाम साहब को भी कामयाब होना था उनके पास भी भी कोई भी सुविधा नहीं थी नतीजा कामयाब होने के लिए उन्होंने शादी ही नहीं की वो खुद कहते थे की अगर में शादी करता तो कामयाब नहीं हो सकता था इन बातो से आप भारत के बेहद जटिल हालात समझ सकते हे

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    1. सिकंदर हयात

      किसी ने मेरी इस बात पर आपत्ति की हे की कलाम साहब ने कामयाब होने के लिए शादी नहीं की जबकि यहाँ कलाम साहब की ”कामयाबी ” से मेरा आशय था उनका भारत रत्न और भारत का सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति और एक लीजेंड जैसा बनने से था फ़र्ज़ कीजिये कलम साहब शादी कर लेते और परिवार के दबाव में आकर विदेश चले जाते या देश में ही रक्षा क्षेत्र को छोड़कर कोई और ऊँची नौकरी कर लेते तो कौन जाने वो करोड़पति होते अरबपति होते क्या होते वो भी कामयाबी होती मगर फिर वो भारत रत्न राष्ट्रपति आदि बनने की कामयाबी नहीं हासिल कर पाते यही बात उन्होंने खुद शादी न करने के संदर्भ में कही थी मेरा आशय शादी करने या न करने से नहीं था बल्कि भारत में आम आदमी के बेहद कठिन हालात बताने से था

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    2. सिकंदर हयात

      देश में हालात इतने नाउमीदी के हे की दीपक शर्मा ( पुराने आज तक वाले ) जैसा समझदार आदमी तक मोदी जी में उमीद देख रहा हे लिखते हे दीपक शर्मा ”आयकर विभाग की इन्वेस्टीगेशन विंग के मुताबिक मायावती के भाई आनंद कुमार अप्रत्यक्ष तौर पर 100 से ज्यादा निजी कंपनियों से जुड़े हुए हैं. आनंद की माली हैसियत 5000 करोड़ रूपए से ज्यादा आंकी जाती है. मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक इस वक़्त यूपी के सबसे रसूखदार रियल एस्टेट डेवलपर में एक हैं. लालू यादव के परिवार की चल अचल सम्पतियों की थाह तो आजतक सीबीआई भी नाप नही सकी है. और राबर्ट वाड्रा, सुखबीर बादल , कार्तिक चिदंबरम और सुप्रिया सुले की बात न करें तो बेहतर है.अब ज़रा एक नज़र मोदी के सगे भाई बहन पर भी.16 साल से लगातार सत्ता में रहकर भी मोदी ने अपनी बहन बसंती बेन की सिफारिश नही की जिसके चलते आज भी वो विसनगर के एक स्कूल में मामूली टीचर है. . मोदी के सबसे बड़े भाई सोमभाई आजकल वाडनगर के एक आश्रम के छोटे से कमरे में रहते हैं. सोमाभाई से छोटे अमृतभाई ने अहमदाबाद की स्टार्च मिल कम्पनी में वर्कर के काम से रिटायरमेंट लेकर शहर के राणिप इलाके में पनाह ली है. उनसे छोटे, प्रह्लाद मोदी राशन की दुकान चलाते हैं और राशन दुकानदारों के संघ से जुड़े हैं. सबसे छोटे भाई पंकज गुजरात सूचना विभाग में क्लास 2 अफसर हैं और क्योंकि इनकी माली हालत थोड़ी बेहतर है इसलिए माँ इनके पास रहती है.मित्रों अब सवाल ये है कि प्रधानमंत्री ने जब अपने सगे भाई-बहन-माँ- बीवी को खरबों की सरकारी तिजोरी से एक ढेला नही दिया ..तो फिर वो अपना कलेजा थोड़ा और मज़बूत कर लें तो देश में चोरी-चंदे की राजनीति बदल सकते हैं.. मोदी को देश की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठकर अब बीजेपी के सबसे बड़े दानवीर उद्योगपतियों को खुद से अलग करना होगा. अगर वो सार्वजनिक मंच पर खुद को इन उद्योगपतियों से जुदा करते हैं तो जनता स्वयं चुनावी चन्दे के लिए अपनी झोली खोली देगी. जो काम आम आदमी पार्टी करने चली थी लेकिन नही कर पायी वो मोदी कर सकते हैं. ‘ देीपक शर्मा

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      1. सिकंदर हयात

        जैसे की हमने ऊपर कमेंट में बताया हे की मोदी जी कामयाब ही इसलिए हुए की वो एक बड़े और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार को छोड़ कर खिसक लिए थे और कहते हे की फिर परिवार से उनका दोबारा सलाम दुआ का रिश्ता शायद उनके सी एम् बनने के बाद ही हुआ था ऐसे में दीपक जी जैसे समझदार आदमी मोदी जी को अपने परिवार के लिए कुछ ना करने का सर्टिफिकेट दे —– ? क्या ये कोई महानता वाली बात हे————? फिर पहले की भी बात करे तो फ़र्ज़ करे की मोदी जी एक अमीर परिवार से होते उनकी शादी भी अमीर परिवार में होती तब भी वो घर छोड़ कर निकल जाते तब तो उसे त्याग कहा जाता लेकिन उन्होंने जिस हालात में घर परिवार छोड़ा था उसे पलायन या पीठ दिखाना ही कहा जा सकता हे कन्फर्म नहीं हु मगर सुनते हे की इससे उनके पिता उनसे और इनामदार साहब से खासे नाराज़ भी रहे—– ? तो सवाल ही नहीं उठता की मोदी जी कोई महानता दिखाए महानता के लिए जो इतिहास जो संघर्ष जो तरबियत जो अनुभव चाहिए होते हे वो मोदी जी के पास नहीं हे और ये सब रातो रात टपक भी नहीं सकते हे एक प्रोसेस होता हे इस सबका

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    1. सिकंदर हयात

      अच्छा होता ये हे की भारत में 90 % से भी अधिक कामयाब लोग बिना किसी संघर्ष के कामयाब होते हे तो वो फिर अपने झूठे संघर्ष के किस्से सुनाते हे इसी को राजकुमार संतोषी ने अपनी फिल्म हल्लाबोल में दिखया हे जब अजय पत्रकार से कहते हे की आम आदमी को हमारे संघर्ष के किस्से बहुत अच्छे लगते हे जैसे अमिताभ के संघर्ष के किस्से खूब फैलाय जाते हे ( मेरा ख्याल हे की संतोषी का भी इशारा अमिताभ की तरफ हि था ) अब समझ नहीं आता की राजय सभा सदस्य के आप बेटे हो गुलमोहर पार्क दिल्ली जैसी पॉश जगह से आप मुंबई आये हो महमूद जैसे स्टार के यहाँ आप रहते हो शशि कपूर जैसे बड़े नाम आपको छोटे रोल से रोकते हे आपको चोट लगती हे तो देश की पि एम इंदिरा जी आपकी चिंता करती हे फिर भी आप कहते हो की आपने बड़ा संघर्ष किया ये केसा संघर्ष हे भाई ? हद तो तब हो गयी जब सलमान तक अपने संघर्ष बता रहे थे जबकि चौबीस साल से पहले ही उनकी फिल्म भी बनकर आ गयी थी वो सुपर स्टार भी बन गए थे मगर जैसे की परम्परा हे भारत की तो सलमान तक बताते हे की उन्होंने कई साल संघर्ष किया हद हे

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    2. सिकंदर हयात

      सुनीता राजवार ने नवाज़ुद्दीन सिद्द्की के बारे में सही कहा हे की नवाज़ सिम्पेथी का कोई मौका नहीं छोड़ते हे सही हे सेम यही मोदी जी भी करते हे की हमने बड़ा संघर्ष किया बड़ा बड़ा बहुत बड़ा संघर्ष किया जबकि नहीं किया क्योकि भारत में हालात इतने ख़राब हे की सही मायनो में जो नीचे से आये हो जिन्होंने सही मायनो में संघर्ष किया हो वो उभर ही नहीं पाते हे यहा हर फिल्ड में बिना संघर्ष वाले ही बड़े बनते हे इसलिए तो भारत कायरो का देश हे अब पांच साल पहले भी नवाज़ के बारे में मोहल्ला लाइव अविनाश अनारकली आरा वाली वाले की साइट पर आया था की नवाज़ बड़े नीचे के बेकग्राउंड से आये हे में मुज्जफरनगर का हु मेने तब भी वहा लिखा था की ऐसा हो ही नहीं सकता हे नवाज़ बहुत दूर के परिचित हे मेरे लोगो ने बताया की वो गरीब तो छोड़ो बल्कि अच्छे खासे जमींदार परिवार से आते हे हां इतना जरूर हे की शहरीकरण से पहले जमीन से या खेती बाड़ी से ही बहुत ज़्यादा कमाई नहीं थी लेकिन फिर भी एक सेकड़ो बीघे के जमींदार परिवार के पास अच्छी खासी सुरक्षा तो होगी ही फिर भी नवाज़ जैसा की सुनीता ने बताया http://www.amarujala.com/photo-gallery/entertainment/bollywood/an-ordinary-life-of-extraordinary-lies-alleges-theatre-artist-sunita-rajwar-on-nawazuddin-siddiqui?pageId=5

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      1. सिकंदर हयात

        Nitin Thakur
        58 mins ·
        नब्बे का दशक शुरू हुआ था। अनिल कपूर अब्दुल रहमान खान नाम के नए लड़के को ड्राइवर का रोल देना चाहते थे। एक फिल्म में रोल उसे सिर्फ इसलिए मिला क्योंकि आमिर खान ने फिल्म छोड़ दी और फिल्म की हिरोइन जूही जावला को भरोसा दिया गया कि नया लड़का दिखता आमिर जैसा ही है। सोचिए कि उसके इंडस्ट्री में आने से पहले आमिर और सलमान जैसे बड़े नामों का सिक्का चल रहा था। कहां तो आमिर और सलमान का बचपन.. और कहां अब्दुल रहमान खान जिसके पिता को दिल्ली में चाय का खोखा और छोले-भठूरे की दुकान चलानी पड़ रही थी। पिता का देहांत हुआ तो उसे मुबई जाना पड़ा, वो भी उस लड़की को छोड़ जिसे वो बेपनाह मुहब्बत करता था। मां का सपना था कि बेटा फिल्मों में नाम करे। शुरू में अनचाहे मन से उसने काम शुरू भी किया लेकिन बाद में यही काम उसका जुनून बन गया। आज उसे हम शाहरुख के नाम से जानते हैं। शाहरुख बाकी एक्टर्स के मुकाबले जमीन से ज़्यादा जुड़े लगते हैं। वजह यही हो सकती है कि उन्होंने कामयाबी की राह में वही संघर्ष किया है जो हर उस इंसान को करना पड़ता है जिसे विरासत में कुछ नहीं मिलता। ये आदमी बसों और ट्रेनों में घूमा है। किराये के घरों में रहा है। अपनी बचपन की मुहब्बत से लड़-झगड़कर शादी करता है। कई बार बहुत गुस्सा आया तो ज़ाहिर कर दिया लेकिन अहसास होने के बाद माफी भी मांग ली। ना जाने कितनी ही बार अपने डर को सबके सामने साझा किया और ना जाने कितनी बार अपनी मनचाही फिल्में करके मुंह की खाना मंजूर किया। उसने अपने मनपसंद घर को खरीदने के लिए मसाला फिल्में भी कर लीं। वो फिल्म इंडस्ट्री में तब आया जब पिरामिड पर कई लोग बैठे थे। उसने धीरे से अपनी जगह बना ली। मैंने देखा कि उसे हिंदू दक्षिणपंथियों ने गद्दार बताया तो कठमुल्लों ने मुसलमान मानने से इनकार भी किया। हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी में गज़ब की साफ ज़ुबान। ह्मयूमर में कोई और खान उसके पास भी नहीं फटक सकता। खुद का मज़ाक बनाने में अव्वल। 12 साल से स्लिप डिस्क के दर्द के बावजूद रोज़ ज्यादा मेहनत। शिष्टाचार और समय का पाबंद जिसके गवाह मेरे ही कई जानकार लोग हैं। शाहरुख बहुत कुछ अपने जैसे लगते हैं.. बहुत कुछ उन जैसा होने का मन चाहता है। जन्मदिन मुबारक शाहरुख। अभी तो 52 के हुए हो… उम्र ही क्या हुई है भला..Nitin Thakur
        58 mins · नितिन की बात जायज़ हे मगर शाहरुख़ खान कोई ऐसे आम आदमी भी नहीं थे घर के इकलौते बेटे थे उनकी माँ को केन्द्रीय मंत्री शाहनवाज़ आज़ाद हिन्द फौज वाले ने गोद लिया था वो मजिस्ट्रेट थी कहते हे की उन्होंने कनरल कपूर पर फौजी में शारुख को लेने का दबाव या सिफारिश भी की थी कोई समस्या होने पर वो अपनी माँ का नाम लेकर बच जाते थे वो खुद खुद को ”मेल सिंड्रेला ” कहते थे शाहरुख़ की कामयाबी बेमिसाल हे मगर वो कोई आम आदमी नहीं थे

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  6. zakir hussain

    मैने एक बात नोट करी है कि जो व्यक्ति साहित्य या कला की अन्य किसी भी विधा जैसे संगीत, नृत्य आदि से जुड़ा रहता है, वो धार्मिक कट्टरपंथ का शिकार कभी नही हो पाता. तमाम कट्टरपंथी संगठन चाहे वो हिंदुओं के हो या मुस्लिमो के उनका कला-जगत मे योगदान ना के बराबर है. साहित्य की दुनिया मे भी वो सिर्फ़ दक्षिणपंथी लेखो तक ही सीमित है.

    इसलिए कला जगत के प्रति आकर्षण और उसका विकास, तमाम तर्को से भी बड़ा धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ हथियार है.

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  7. सिकंदर हयात

    बिलकुल कारण ये हे की मनुष्य जीवन आनद की खोज हे अब होता ये हे की काटरपन्तियो के नेता तो दुनिया में आंनद मार ही रहे होते हे ( एक बड़े मुस्लिम आद्यत्मिक नेता के बारे में सुना हे की उनकी औरते सिर्फ दुबई में शॉपिंग करती हे ) और बाकी छुटभय्ये तो हिन्दू काटरपन्ति जीवन में आंनद लेना चाहता हे तो मुस्लिम काटरपन्ति मरने के बाद आंनद की चाहत रखता हे अब जो लोग विभिन्न कलाओ से संस्कर्ति खेल साहित्य आर्ट कल्चर से जुड़े होते हे उन्हें उसी में बहुत आंनद मिल रहा होता हे जैसे कितने शहरो में कितनी बार किताब में ममता कालिया जी ने जो सन साठ के आस पास में इंदौर में महसूस किया था ” क्या दिन थे वो न सर्दियों में ठंड लगती थी न धुप सताती थी न बारिश चुभती थी कभी नियम से दूध नहीं पिया कभी विटामिन की गोलिया नहीं खायी बस जीने के नशे में चूर थे ” सेम यही हाल मुज्जफरनगर में 90 के दशक में हमारा भी था

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  8. सिकंदर हयात

    वैसे कालिया जी काफी लम्बे चल गए लगभग 77 साल जबकि वो बहुत ही भयंकर बहुत ही ज़्यादा भयंकर सिगरेटिए और दारूबाज था उन्ही के शब्दों में ” घर में एक बूँद दारु ना थी ” कुदरत का करिश्मा हे की की कुछ लोग इस कदर सवास्थय के नियमो का उलघन करते हुए भी लम्बे चल जाते हे हालांकि कालिया जी का निधन उसी वजह से हुआ जिस वजह से उनके कई दारूबाज दोस्त दुनिया से गए थे लिवर सिरोसिस जहा तक हमारा सवाल हे लेखक होते हुए भी अल्लाह भला करे हम तो सिगरेट शराब पान तम्बाकू गुटका आदि सभी चीज़ो से दूर ही रहे हे इसका बहुत बड़ा नुक्सान ये होता हे की आप चिन्ताओ का भुला कर जमकर लेखन नहीं कर पाते हे व्यसनों से दूर रहने और जीरो ” इस्प्रिचुअल ” नीड और गतिविधयों का व्यक्ति होने के कारण हमारे लिए स्ट्रेस मैनेजमेंट बड़ा कठिन होता हे

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    1. zakir hussain

      अरे सिकंदर साहब, अभी तक तो आप अविवाहित है, तब भी इतना तनाव, शादी के बाद क्या होगा? मज़ाक कर रहा हूँ.

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    2. सिकंदर हयात

      ”सिगरेटिए और दारूबाज था ”’ माफ़ी चाहूंगा की यहाँ थे की जगह था शब्द आ गया हे माफ़ी एक बात की हिंदी के अधिकतर लेखको का जीवन संघर्षशील होता ही हे और जिन्होंने जीवन में संघर्ष किया हो सव्भाविक हे की उनका झुकाव दक्षिणपंथ में साम्प्रदायिकता में नहीं होता हे यहाँ उनका दिल नहीं लगता हे ऐसे में हिंदी के बड़े लेखको में से शैलेश मटियानी ही ऐसे बताय जाते हे जिनका बाद में हल्का झुकाव दक्षिणपंथ में दिखा था इस विषय में ममता कालिया जी अपनी संस्मरणों की बेहतरीन किताब वाणी प्रकाशन से ”कल परसो के बरसो ” में लिखती हे ”अपने बाद के लेखो ने उन्होंने दक्षिणपंथी होने का आभास दिया . में समझती हु वे हिंदी के एकमात्र ऐसे लेखक थे जिन्होंने दक्षिणपंथी होकर भी सत्ता से लाभ नहीं उठाया ” ये ममता कालिया जी ने बड़ी करारी बात कही हे मटियानी जी तो खेर भले आदमी थे बाद में कहते हे की कुछ विक्षिप्त सी हालात में उन्होंने दुनिया छोड़ी ( इत्तफ़ाक़ से जिस अस्पताल के जिस कमरे में वो रहे थे उसी कमरे में बीमार नहीं मगर तीमारदार के रूप में भी रहा था ) खेर इससे आप उपमहादीप में साम्प्रदायिकता का ये चरित्र समझ सकते हे साम्प्रदायिकता मतलब किसी न किसी का चोखा फायदा

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  9. सिकंदर हयात

    जाकिर भाई ये हाल ” शादियों ” के बाद ही हे दिल्ली हो या कोई भी बड़ा शहर कोई भी ऐसा परिवार जिसके पास क़ाबलियत चाहे जितनी हो ( मेरे घर में भी मुझे छोड़ कर सभी बेहद काबिल रहे ) मगर अगर उनके पास बाप दादाओ की छोड़ी जायदाद हो या करप्शन या शोषण का पैसा नहीं हे तो उसका जीवन बेहद असुरक्षित रहते हे इस असुरक्षा का तनाव मुझे बेहद थका देता हु ऊपर से न कोई गम भुलाने का ” साधन ” हे न मेरी कोई स्प्रिचुअल या रिलिजियस गतिविधि हे जिससे बढ़िया कोई स्ट्रेस बस्टर नहीं होता हे हमें उसका भी सहारा नहीं क्योकि कठमुल्लशाही से जंग के लिए हमें लॉजिक की दुनिया में रहना पड़ता हे तनाव बहुत ज़्यादा हे पहले से ही बड़ा परिवार हर शादी के साथ और बड़ा होता जा रहा हे इतने लोगो के लिए मन में जगह रखनी होती हे चिन्ताय ही चिन्ताय किसी की बिमारी लोन मुकदमेबाजी शादी से पहले चिंता शादियों के खर्चे फिर शादी के बाद दस गुने खर्चे मंदी का खतरा पिछले मंदी 2009 में सभी की जॉब छूट गयी थी और मुझे दो जायदाद कोड़ियो के दाम बेचनी पड़ी थी अब केवल जमीन बची हे कही फिर मंदी या उंच नीच हो गयी तो मुझे वो भी बेचनी पड़ेगी ये सोच कर दिल की धड़कने बढ़ जाती हे ऊपर से लेखन का तनाव इन शैतानी ताकतों से बिना किसी ढाल के लड़ना वो भी इतने बड़े परिवार के दबाव के साथ ? इसके आलावा भी आम जीवन में कठमुल्लवादी और काटरपंथी ताकते रोज कोई न कोई ” घाव ” या मुश्किल ही देती रहती जिंदगी में कोई ऐसा शख्स नहीं जो मेरे लिए ताकत कहा जा सके हर आदमी एक बोझ या सरदर्दी ही हे मेरे लिए तो ये सब बाते मुझे बेहद तनाव में डाल देती हे हलाकि इसका ये मतलब नहीं हे की हम ” सरेंडर ” कर देंगे नहीं घास खा कर भी हम जिन्दा रहेंगे और कठमुल्लावादी और शोषणकारी ताकतों से जितनी हो सके जंग जारी ही रखेंगे

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    1. सिकंदर हयात

      यहाँ ये साफ़ कर दू की ये सारा का सारा तनाव इसलिए हि हे की हम ” सरेंडर ” नहीं करते हे आज सरेंडर कर दे तो फिर कोई दिक्कत नहीं फिर तो मज़े ही मज़े हे ये सारे तनाव उसी जंग के लिए हे जो हमने अपने सर पर ले ली हे आज जंग बंद कर ले नार्मल हो जाए नार्मल जिंदगी जिए कलम को तोड़ दे ? सैय्यद में हु ही आज कहु तो कोई ना कोई गैर सैय्यद करोड़पति बस दामाद बनने के एवज़ में आराम की जिंदगी दे भी सकता हे लेकिन कुछ भी हो जाए हम सरेंडर पर राज़ी ना होंगे जिंदगी चाहे जितनी झंड हो जाए झंडा नहीं झुकाएँगे

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  10. सिकंदर हयात

    नागर जी से ये उमीद नहीं थी आखिर रविश कुमार पर बेहूदा व्यंगय जो अब हटा लिया हे आखिर पब्लिश कैसा हो गया क्या साइट पर कोई संघी बज़रंगी भेदिया बैठा हुआ इतना नीच व्यंगय आखिर आया कैसे ? व्यंगय में कोई हर्ज़ नहीं मगर व्यंगय में एक % तो लॉजिक हो रविश जैसे बढ़िया पत्रकार का अपमान नागर जी की नाक के निचे आखिर हुआ कैसे ?

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  11. सिकंदर हयात

    मशहूर कथाकार इंतज़ार हुसैन का इंतकाल भारत-पकिस्तान की सरहदों के आर-पार फैले उर्दू साहित्येतिहास के एक अध्याय की समाप्ति जैसा है. कल 2 फरवरी को 92 साल की उम्र में लाहौर के एक अस्पताल में उनका निधन हुआ. बस्ती, आगे समंदर है और नया घर के रूप में भारत-पाक बंटवारे पर एक अविस्मरणीय उपन्यास-त्रयी लिखने वाले इंतज़ार हुसैन ने कुल पांच उपन्यास और सात कहानी-संग्रहों के अलावा सफ़रनामे, निबंध और अखबारों के स्तम्भ के रूप में प्रचुर लेखन किया.
    वे 1947 में भारत से उखड़ कर पकिस्तान गए थे और बहुलता तथा सहिष्णुता के मूल्यों से बनी साझा जीवन-शैली वाला अतीत उनकी रचनाओं में बार-बार एक गहरी कसक के साथ उभरता रहा. उनके निधन के साथ हमने समकालीन उर्दू लेखन की सबसे बड़ी हस्ती को ही नहीं, भारत और पाकिस्तान के अवाम की एकता के एक समर्थ पैरोकार को भी खो दिया है. जनवादी लेखक संघ मर्हूम इंतज़ार हुसैन के प्रति अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.
    मुरली मनोहर प्रसाद सिंह
    (महासचिव)
    संजीव कुमार
    (उप-महासचिव)

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  12. सिकंदर हयात

    हिंदी साइट्स का वो भी अफ़ज़ल भाई की बेहतरीन कोशिश खबर की खबर जैसी साइट्स का ये सबसे बड़ा फायदा हे की जहा सोशल मिडिया पर सब कुछ बहुत जल्दी पुराना हो जाता हे उसमे गहराई भी नहीं होती हे और अगर हो भी तो पुराना तलाशना भी आसान नहीं हे इस समय हालांकि खासकर हिंदी वाले सोशल मिडिया फेसबुक पर पर बुरी तरह से पिले हुए हे और अपनी अपनी टी आर पि देख कर बुरी तरह से आत्मुग्द हुए जा रहे हे लेकिन बात ये भी हे की वहां ये भी रहता हे की हर आदमी अपना भी लिंक देता जाता हे इसलिए बहुत से मुर्ख और साम्प्रदायिक लेखक जिसे अपनी टी आर पि समझ रहे होते हे वो असल में एक तो घिसे पिटे एकतरफा विचारो की ही सदाबहार टी आर पि होती हे दूसरा हर आदमी असल में अपना प्रचार भी अपना लिंक भी पेश कर रहा होता हे जबकि हिंदी साइट्स पर शुद्ध विचार विमर्श हो रहा होता हे कोई प्रोपेगेंडा नहीं इसलिए आप देखे की जब प्रेमचन्द के ये विचार आये थे तब मुश्किल से सौ क्लिक थे अब बीस गुना अधिक हो चुके हे क्योकि यहाँ पुराना पढ़ना भी बहुत सरल हे . इसलिए मुझे ऐसा लगता हे की आने वाले समय में लोग सोशल मिडिया की भयंकर एकतरफा प्रोपेगेंडेबाज़ी प्रचार से बोर होकर शुद्ध विचार विमर्श के लिए हिंदी साइट्स की तरफ आएंगे ही

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  13. सिकंदर हयात

    एक बार फिर पाठको से अपील हे की कुछ ही अच्छे लेखको को चुन ले जिनकी पहचान होउन्हें ही पढे और बाकी लोगो को ना पढ़े इस गंद से लोगो को बचना बहुत जरुरी हे इन कटटरपन्तियो कठमुल्लाओ को फंडिंग मिल रही हे उसी से ये गंद फेल रहे हे इनका बायकाट ही इनका इलाज़ हे पढ़िए ये रिपोर्ट https://sabrangindia.in/article/bjp-it-cell-ka-farziwada-hindi

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  14. सिकंदर हयात

    सोशल मिडिया के बुडबको को हर समय कोई छोटी मोटी टिपण्णी लिख कर जल्दी जल्दी लाइक बटोरने की खफ्त सवार रहती हे इनकी ये सनक ”हिस्टीरिया ” में बदल गयी हे अब ये रविश ही थे जिन्होंने दादरी जाकर अख़लाक़ की बेहद ग़ुस्से में रिपोर्टिंग की थी उसके बाद ही घटना पूरी दुनिया में छा गयी थी इससे भी पटना के” स्टालिनग्राद ” को जितने में बेहद मदद मिली थी अब इन्ही रविश कुमार पर ज़ाहिद साहब को जाने क्या पेट दर्द हुआ की पूछने लगे अब बिजनोर क्यों नहीं गए मानो रविश कुमार कोई सेकुलर सुपर मेन हो जो उड़ कर हर जगह पहोंच जाएगा खेर इतफ़ाक़ से रविश ने इसी विषय पर बेहतरीन लेख लिखा हे ‘http://naisadak.org/mere-paas-ek-naukar-ki-kameez-hai/

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    1. सिकंदर हयात

      Amitaabh Srivastava : सोशल मीडिया नाम के बेकाबू भस्मासुर को फलने फूलने का आशीर्वाद देने वाले तमाम देवता अब घुटनों में सर दिए चिंता में डूबे हुए हैं. कहाँ जाएँ इससे बच के. मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाने में सबको बड़ा आनंद आ रहा था और समर्थकों को उकसा उकसा कर ऊल-जलूल किस्म का हंसी ठट्ठा खूब चला, अब भी चल रहा है. लेकिन अब पृथ्वीराज चौहान के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले हिन्दू ह्रदय सम्राट (स्वर्गीय अशोक सिंघल साहब का बयान याद करें) नरेंद्र मोदी जी को भी लोग कायर और डरपोक कह रहे हैं.लोगों को लग रहा है कि मोदी भी बस लव लेटर वाली पालिसी को गिफ्ट देकर आगे बढ़ा रहे हैं. काहे नहीं एक के बदले सौ सर ला रहे हैं फटाफट. डीजीएमओ साहब ने एकदम ग़दर वाले सनी देओल की तरह बयान दिया कि जगह और वक्त अपने हिसाब से चुन कर कार्रवाई होगी -चुन चुन कर. फिर भी लोग संतुष्ट नहीं है, उन्हें तो ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में सिर चाहिए, खेलने के लिए सिर चाहिए, गणित सीखने, पहाड़े पढ़ने के लिए सिर चाहिए, गंगा का रुख लाहौर तक मोड़ना है, पाकिस्तान को परमाणु बम से उड़ाना है, बलूचिस्तान को हिंदुस्तान में मिलाना है. और ये सब फटाफट चाहिए बिलकुल फ्लिपकार्ट और अमेज़न के सामान की होम डिलीवरी की तरह. नहीं करोगे या ऐसा करने के बारे में नहीं कहोगे तो गाली खाने के लिए तैयार रहो.ये जो ऑन डिमांड सप्लाई वाली परंपरा शुरू हुई है राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रो में, बिलकुल फरमाइशी फ़िल्मी गानो के विविध भारती वाले प्रोग्राम की तरह और जिसका चौबीसों घंटे मीडिया के ज़रिये प्रसारण होता रहता है, इसके चलते किसी भी सरकार, विचार, व्यक्ति और समूह के सामने तुरंत प्रिय और अप्रिय होने का संकट खड़ा हो गया है. ये दबाव लोगों के लिए, संस्थाओं और समाज के लिए प्राणघातक है. बचना है तो इससे बचिए.Amitaabh Srivastava

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  15. सिकंदर हयात

    ” मकान गिराने वाला इंजिनियर नहीं कहलाता इंजिनियर तो निर्माण ही करता हे ” प्रेमचन्द की सेम यही लाइन बहुत ही सीनियर और बहुत ही बढ़िया फिल्म समाजशास्त्र लेखक जय प्रकाश चोकसे ( जिनमे सिर्फ एक कमी हे की सलमान सलीम खान फेमली उनकी नाक का बाल हे उनका हर ”खून” माफ़ हे ) ने भी प्रयोग की . कहा की अनुराग कश्यप एन्ड पार्टी यानि बहुत से नए फिल्मकार लोगो के बारे उन्होंने बड़ा सटीक कहा की की अपने काम से ये पुरानी मान्यताओ परम्पराओ के महल के महल गिरा सकते हे उस काम में ये माहिर हे ठीक . लेकिन उसके बाद चोकसे ने सही कहा की उस गिरे हुए महल के मलबे पर एक झोपडी भी बना ना इसके बस का रोग नहीं हे यानी प्रेमचन्द ने आज से सौ साल पहले ही क्या खूब बता दिया था की ” मकान गिराने से ही कोई इंजिनियर नहीं बन जाता हे ”

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  16. सिकंदर हयात

    नेहरू जी किशोर इंदिरा गांधी को जेल से पत्र लिख कर पढ़ाया करते ये सिलसिला शायद 1930 से 1933 तक चला था जब ये पत्रो का सिलसिला खत्म हुआ तब एक तरफ भारी आर्थिक मंदी दी थी तो दूसरी तरफ सारी दुनिया में फासिज़्म का उभार हो रहा था उदारवादी ताकते हताश निराश दिख रही थी ठीक वैसे ही मिलते जुलते हालात इस समय हम भारत में देख रहे हे एक तरफ मंदी हे बेरोजगारी आर्थिक दिक्कते हे तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के आने के बाद से ही पुरे उपमहादीप में दक्षिणपंथी ताकतों के हौसले उफान पर हे उदारवादी ताकते और लोग हताश निराश और उदास हे कोंग्रेस से कोई उमीद नहीं हे वाम दल सिमट रहे हे बाकी जो अच्छी उदारवादी ताकते हे भी उनकी लीडरशिप भी बूढी हो रही हे नए और ऊर्जावान लोग नहीं दिख रहे हे कम उम्र और निराश लोगो के दक्षिणपंथ और कट्टरपंथ प्रचार में बह जाने का बढ़ा खतरा सामने हे ऐसे हालात में वैचारिक लोगो का हौसला बनाये रखने को पढ़ते हे की इस आखिरी पत्र में नेहरू जी क्या लिखते हे ” 8 अगस्त 1933 ———————————— दुनिया की गेर इंसाफिया रंज और हैवानियत कभी कभी हमें सताते हे और हमारा मन खराब कर देते हे और हमें बाहर निकालने का रास्ता दिखाई नहीं देता . मैथ्यू अर्नाल्ड की तरह हम महसूस करते हे की इस संसार में कोई आसरा नहीं हे और हमारे लिएसिवा इसके कोई चारा नहीं हे की आपसमे सचाई का बर्ताव करे ———— मगर फिर भी अगर हम ऐसा उदासी भरा रुख अपना ले तो कहना होगा की हमने जिंदगी या इतिहास से सही सबक नहीं सीखा हे क्योकि इतिहास हमें विकास की और तरक्की की और मनुष्य के लिए आगे बढ़ सकने की बाते सिखाता हे जिंदगी भरपूर और रंग बिरंगी हे हालांकि उसमे बहुत दलदल और डाबर और कीचड की जगह हे पर दुसरी तरफ इसमें महासागर पहाड़ और बर्फ की नदिया और अधभुत तारो भरी राते ( खासकर जेल में ) हे और परिवार की और दोस्तों की मोहब्बत हे और एक ही मकसद की खातिर काम करने वालो का साथ हे और संगीत हे और पुस्तके और विचारो का साम्राज्य हे ——————————

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  17. सिकंदर हयात

    दुनिया की सुन्दर चीज़ों की तारीफ करना और विचार और ख्याली दुनिया में रहना आसान हे . पर इस तरह दुसरो के रंजो गम से कतराने की कोशिश करना और इस बात की फ़िक्र ना करना की दुसरो पर क्या बीतती हे , न तो हौसले की निशानी हे न आपसी हमदर्दी की . विचार के तभी कोई मानी हो सकते हे जब उसका नतीजा कर्म हो . हमारे दोस्त रोम्यां रोलां ने कहा हे ” कर्म ही विचार का अंजाम हे जो विचार कर्म की तरफ न देखे वह सब का सब नाकाम और धोखेबाज़ी हे इसलिए अगर हम विचार के दास हे तो हमें कर्म का भी दास होना चाहिए लोग बाग़ कर्म से इसलिए कतराते हे की अंजामो से डरते हे क्योकि कर्म का मतलब हे जोखिम और खतरा .लेकिन डर दूर से ही भयंकर दिखाई देता हे नजदीक से देखा जाए तो इतना बुरा नहीं होता और बहुत बार तो डर ऐसा सुहावना साथी बन जाताहै , जो जिंदगी की लज़्ज़त और ख़ुशी को बढ़ाता हे जिंदगी का मामूली दौर कभी कभी नीरस हो जाता हे , क्योकि हम यह सोच लेते हे की दुनिया की बाते अपने आप होती रहती हे , और उनमे मज़ा नहीं लेते लेकिन अगर हमें जिंदगी की इन्ही मामूली चीज़ों के बिना कुछ दिन रहना पड़े , तो हम उनकी कितनी कदर करने लगते हे बहुत से लोग ऊँचे ऊँचे पहाड़ो पर चढ़ते हे , और चढ़ाई के आनन्द के लिए और मुश्किल पर करने व् खतरा उठाने से हासिल होने वाली ख़ुशी के लिए , जिंदगी व् तन बदन को जोखिम में डालते हे . और उनके चारो तरफ जो खतरा मंडराता रहता हे उसकी वजह से उनकी ज्ञानेन्द्रियां पैनी हो जाती हे और आधार लटकी हुई जिंदगी का मज़ा गहरा हो जाता हे हम सबके सामने पसंद करने के लिए दो रास्ते हे या तो हम उन निचली घाटियों में पड़े रहे जो दम घोटने वाले धुंधो और कोहरे से ढंकी रहती हे पर जो कुछ हद तक हमारे तन की हिफाज़त करती हे या हम जोखिम उठाकर और अपने साथियो को खतरे में डाल कर ऊँचे ऊँचे पहाड़ो पर चढ़े , ताकि ऊपर की साफ़ हवा में सांस ले सके , दूर दूर के नज़रो का आनन्द उठा सके और उगते हुए सूर्य का स्वागत कर सके ——————————–प्यारी बेटी मेरा काम पूरा हो गया और यह आखिरी पत्र अब पूरा होता हे आखिरी पत्र ? नहीं कभी नहीं में तो तुम्हे न जाने कितने पत्र और लिखूंगा पर यह सिलसिला खत्म होता हे .

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  18. सिकंदर हयात

    Sikander Hayat•3558•Member •1 day ago
    अमीरो का और अमीर बनने की होड़ में लगे लोगो का रहन सहन अजीब हो रहा हे बहुत अजीब . मुसलमान हे तो अधिकतम रिलिजियस हुए जा रहे हे हिन्दू हे तो बाबाओ के चरणों में लोट लगा रहे हे अजीब से ढंग से रहते हे मेरे आस पास तीन फ्लैटों में करोड़ो की तोड़ फोड़ हो चुकी हे ( सजाना संवारना ) घर को पता नहीं क्या बनाना चाहते हे ? इनके घरो में कोई आता जाता नहीं दिखता हे ( सोशल सर्किल नहीं ) तोंद निकल रही हे कोई खेल नहीं खेलते कोई किताब नहीं पढ़ते किसी से इनका आत्मीय रिश्ता नहीं होता हे बस पैसा पीटने की धुन में लगे रहते हे और असली होश इनके तब उड़ते हे जब बच्चे थोड़े बड़े हो जाते हे फिर इनके घरो और गहरा सन्नाटा हो जाता हेSikander Hayat•3558•Member •2 days ago
    बुजुर्गो का ही नहीं सभी का अकेला हो जाना तय हे क्योकि सबको कामयाबी चाहिए हे उसके लिए लाज़मी हे की की आप अपने जीवन में कम से कम जन परिजन प्रियजन रखे ताकि आपको उन पर ध्यान देकर अपना समय और दिमाग बर्बाद ना करना पड़े और कामयाबी पर आपका फुल फोकस रहे इसी फंडे को अपनाकर लोग कामयाब भी हो रहे हे शाहरुख़ ने अपनी इकलौती बहन की शादी नहीं की उन्हें पता होगा की जो भी उनकी डिप्रेशन की शिकार बहन से शादी करेगा वो उनकी दौलत पर नज़र जरूर गड़ायेंगे अमिताभ जया ने अमर सिंह को लात मार दी सचिन ने बचपन के दोस्त काम्बली को उबारने की कोई कोशिश नहीं की और हज़ारो उद्धरण हे लोग अब इसी रास्ते पर चल रहे हे और खूब कामयाब भी हो रहे हे मगर जब कामयाब हो जाते हे तो क्या देखते हे की -उस कामयाबी को बाटने वाला और उनकी कामयाबी की ख़ुशी को दुगना करने वाला कोई नहीं होता हे यही से खरबो रुपयो के के जाकिर नायक रविशंकर झांसाराम डालने गुर फलाने गुरुओ के बाजार की नीव भी पड़ती हे

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  19. सिकंदर हयात

    Dilip C Mandal added 3 new photos.18 October at 18:02 · MP व्यापम में जब 50 से ज़्यादा शहीद हो गए तो इस मामले को खोलने वाले आशीष चतुर्वेदी को सुरक्षा दे दी गई।सबसे अच्छी बात है कि सिपाही रहमदिल हुआ तो बीच बीच में साइकिल पर आशीष को बिठा भी लेता है। ज़्यादातर समय आशीष ही चलाते हैं। सुरक्षा के लिए एक डंडा साथ होता है।बीजेपी असम के पूर्व अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य के भांजे और बीजेपी से गुवाहाटी का लोकसभा चुनाव लड़ चुके मनोरंजन गोस्वामी के पुत्र अरणब गोस्वामी को सुरक्षा बलों के 20 जवान सुरक्षा देंगे।Dilip C Mandal
    18 October at 13:23 · इतिहास के पन्ने बोलते हैं।डायर से जिरह करने वाले चिमनलाल सीतलवाड़ के पुत्र और तीस्ता के दादा एम सी सीतलवाड़ आज़ाद भारत के पहले अटॉर्नी जनरल बने। भारत के पहले लॉ कमीशन के वे चेयरमैन थेमोदी और अमितशाह की नाक में दम करने वाली तीस्ता के परिवार का असाधारण अतीत रहा है।सरकार उन्हें रेस्टोरेंट के बिल चुकाने के घोटाले में घेरना चाहती है।

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  20. सिकंदर हयात

    भारत ही नहीं विश्व स्तर पर देखा गया हे की जिस तरह का साहित्य होता हे उसी तरह का समाज निर्मित होता हे आज के समय में भारत जैसे विशाल देश में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण बहुत जरुरी हे आज भी हमारा समाज धर्मान्धता में डूबा हुआ हे इलेक्ट्रॉनिक मिडिया ने इस धर्मान्धता को खत्म करके वैज्ञानिक समाज बनाने के बजाय अंधविश्वासों को ही बढ़वा दिया हे ———- अब लोग किताब नहीं पढ़ते हे ——— साहित्य का काम पढ़ा जाना या न पढ़ा जान चिंता का विषय हे ——– लोगो की रुचिया बदल रही हे पूरा देश और समाज एक खतरनाक दौर से गुजर रहा हे इसके चलते किताबो का कहतव दिन प्रतिदिन घाट रहा हे दर्शनीय चीज़े महत्वपूर्ण होती जा रही हे मरहूम प्रोफेसर और दलित चिंतक तुलसीराम

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  21. सिकंदर हयात

    मंगलेश डबराल इस समय विस्थापन की इस्थिति यह हे की मनुष्य अपने ही घर में विस्थापित हो रहा हे ———– बड़े लोग बढ़ा धन सफलता बाजार और मीडिया जिस तरह से मनुष्य को अकेला बना रहे हे और विस्थापित कर रहे हे यह एक बहुत बड़ी घटना हे आज की पत्रकारिता हस्ती केंद्रित पत्रकारिता होती जा रही हे ——————- ऐसे में लेखक और साहित्यकार के लिए क्या बच जाता हे वह पैसे या सफलता का रास्ता नहीं अपना सकता हे क्योकि उसकी जो विधा हे उसमे धनसम्पत्ति या बिग मनी नहीं हे यह बहुत ही साधनविहीन लोगो की विधा हे ————- पैसा इतना महत्वपूर्ण हो गया हे की जीवन के अन्य पहलु नदारद हो गए हे ———– जितना में देख सकता हु उतना लिखने का प्रयास करता हु हालांकि समाज की स्वेन्दनात्मक पर्किर्या को हमें और गहराई से पकड़ना चाहिए

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  22. सिकंदर हयात

    ” ‘विचारो का फल बाबा पेड़ लगाय , पोता पाए -प्रेमचन्द ” प्रेमचन्द की पत्नी शिवरानी देवी प्रेमचन्द पर लिखे संस्मरण में एक रेल यात्रा में प्रेमचन्द की बात बताती हे – ड्योडी दर्जे में – सं 1929 की बात हे में प्रयाग से लौट रही थी मेरे साथ बन्नू था आप थे ( प्रेमचन्द ) हम तीनो इंटर क्लास से आ रहे थे चैत का महीना था अष्टमी थी . गाडी में बेहद भीड़ थी . जब बहुत से देहाती मुसाफिर हमारे डब्बे में घुस आये तो आप बोले ‘ यह ड्योढ़ा दर्ज हे किराया ज़्यादा लगेगा ‘ देहाती लोग बोले क्या करे बाबु जी दो रोज से पड़े हे आप बोले ‘तुम लोग कहा से आ रहे हो कहा जाओगे – ? ‘ . हम लोग शीतला जी के दर्शन करने गए थे देहातियों ने कहा आप बोले शीतला जी के दर्शन से तुम्हे क्या मिला – ? सच बताओ – तुम लोगो का कितना खर्चा हुआ – ? एक एक आदमी के कम से कम पंद्रह रूपये ( आज के शायद दस पंद्रह हज़ार ) देहातियों ने कहा . आप बोले ‘ इसका ये मतलब हुआ की तुम लोगो ने चार चार महीने के खाने का गल्ला बेच दिया . इससे अच्छा होता की देवी की पूजा तुम घर पर ही कर लेते देवीजी सब जगह रहती हे वहां भी तुम पूजा कर सकते थे . देवी देवता तभी खुश होते हे जब तुम आराम से रहो ‘ क्या करे मनोती माने थे अगर देवी जी के यहाँ ना जाते तो नाराज़ न होती – ? देहातियों ने कहा . गाडी बेहद भरी थी . साँस लेना कठिन था गर्मी भी पड़ने लगी थी अगला स्टेशन जब आया तो में बोली ‘ इनसे कह दीजिये उतर जाए ,इन उपदेशो का पालन इनसे नहीं होगा आप बोले – तो बिना समझाए तो भी काम नहीं चलने का में बोली फिर से समझ लेना मेरा तो दम घुट जा रहा हे आप बोले इन्ही के लिए तो जेल जाती हो लड़ाई लड़ती हो और इन्ही को हटा रही हो , मुझे तो इन गरीबो पर दया आती हे बेचारे धर्म के पीछे भूखे मर रहे हे . में बोली जो बेवकूफी करेगा वो भूख ना मरेगा तो और क्या होगा –? आप बोले तो क्या करे , सदियो से अंधविश्वास के पीछे पड़े हे . में बोली जो खुद ही मारने को तैयार हे उन्हें कोई जिन्दा रख सकता हे – ? इनके ऊपर ज़बरन कानून लगा दिया जाए तो इनमे समझ आ सकती हे तभी आप बोले – धीरे धीरे समझ लेंगे यधपि अभी काफी देर हे कोई काम जबरन किया जाएगा तो मारने मारने को तैयार हो जाएंगे . में बोली तो गाडी में बैठे बैठे नहीं सीख पाएंगे आप बोले आखिर तब तक समझाया जाए में बोली आप इन्ही के लिए तो पोथा का पोथा लिख रहे हे ‘ ये उपन्यास लेकर थोड़े ही पढ़ते हे . हां उन उपन्यासों के फिल्म तैयार कर गाँव गाँव मुफ्त दिखलाये जाते तो लोग देखते आप बोले में बोली पहले आप लिख डालिये फिर फिल्म तैयार करवाइयेगा . हम में ये बाते हो ही रही थी की तब तक रेलवे पुलिस का आदमी आया उन सबो को धमकी देने लगा और कहने लगा ड्योढ़ा हे और किराया लाओ उस पुलिसमेन की हरकत देख कर आप को बड़ा क्रोध आया और बोले -तुम लोग आदमी हो या पशु . ”पशु क्यों हु तीसरे दर्जे का किराया दिया और ड्योढ़े में आकर बैठे हे ” तीसरे में जगह थी जो उसमे बैठते – ? किराया तो तुमने ले लिया इ ये भी तो देखते की उसमे जगह हे या नहीं – ? आदमियो को पशु बना रखा हे तुम लोगो ने में इनके पीछे लड़ूंगा यह राहज़नी हे की किराया ले ले और गाडी में किसी को भी जगह नहीं . चलो दो इनको तीसरे दर्जे में जगह और उन आदमियो से कहा – चलो में तुम्हारे साथ चलता हु और उन आदमियो को लिए हुए पुलिसमेन के साथ आप उतर पड़े पुलिसमेन ने किसी तरह उन आदमियो को एक एक करके भरा . जब आप लौटकर आये तो मझसे बोले देखा इन आदमियो को ? में बोली आप क्यों लड़ने लगे आप बोले में क्या कोई भी इस तरह की हरकत नहीं देख सकता और इस तरह के अत्याचार देख कुछ न बोले तो में कहूंगा की उसके अंदर गर्मी नहीं हे में बोली कोंग्रेस के आदमी जो नेता कहे जाते हे , वे ए , बी में मौज़ से रहते हे . यह पता भी नहीं रखते की सी क्लास वालो को क्या आराम -तकलीफ हे , आप बोले अगर यहाँ के सभी आदमी जिम्मेदार ही होते तो इस तरह का मुल्क ना होता . हमारी इसी कमी से सरकार राज्य कर रही हे . मुट्ठी भर अँगरेज़ पेटिस करोड़ लोगो पर राज्य करे इसके माने क्या हे हम में चरित्र बल , आत्म बल कुछ भी नहीं हे उसी तावान हम भोग रहे हे उर रो रहे हे . में बोली रयह एक दिन में थोड़े ही संभलेगा . आप बोले तो क्या सब लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे , तब भी तो अच्छा ना होगा . में बोली होगा जब होगा . वे बोले ये आज़ादी का पौधा इमली के दरख्त ( पेड़ ) की तरह हे बाबा लगता हे तो पोता फल खाता हे ”

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  23. सिकंदर हयात

    शैलेश मटियानी एक लेखक का नाम है!” – ताराचंद्र त्रिपाठी
    विधाता. जब किसी को भरपूर प्रतिभा देता है तो उसके साथ ऐसी विसंगतियाँ भी जोड़ देता है कि उसके लिए जीना दूभर हो जाता है. इस विसंगति के चक्रव्यूह से वही निकल पाते हैं जिनमें संघर्ष करने की अपार क्षमता होती है. इसी को चाल्र्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन या योग्यतम की उत्तरजीविता की प्रकृतिक प्रक्रिया कहा है.
    शैलेश मटियानी का जीवन भी इसका एक जीता­जागता नमूना है. वे आजादी से सोलह साल पहले एक पिछड़ेे पर्वतीय गाँव के बेहद गरीब परिवार में जन्मे और बारह वर्ष की अवस्था में अनाथ हो गये. दो जून रोटी के लिए न केवल अपने चाचा की मांस की दूकान में काम करना पड़ा, अपितु कलम संभालते ही अपने गरीब और पिछड़ेे परिवेश से उठने के प्रयास में एक बोचड़ की दूकान में काम करने वाला छोकरा इलाचन्द जोशी और सुमित्रानन्दन पन्त से टक्कर लेना चाहता है. जैसे व्यंग बाण भी सहे.
    उनको तपा­तपा कर सोना बनाने की प्रक्रिया में काल भी जैसे क्रूरता की हदें पार कर गया. अपने पापी पेट की भूख को शान्त करने के लिए होटल में जूठे बरतन माँजने से लेकर अनेक छोटे­मोटे काम करने पडे. दिल्ली, मुजफ्फर नगर, फिर कुछ दिन अल्मोड़ा, और अन्ततः इलाहाबाद आ गये. इतनी भटकन और अभावों से उनके जीवन पथ को कंटकाकीर्ण बनाने के बाद भी जैसे काल संतुष्ट नहीं हुआ, और उनके मासूम छोटे पुत्र की हत्या के प्रहार ने उन्हें बुरी तरह तोड दिया. मौत भी ऐसी दी कि क्रूर से क्रूर व्यक्ति को रोना आ जाय.
    इतने कठिन जीवन संघर्ष के बीच उन्होंने न केवल हिन्दी साहित्य को दर्जनों अमर कृतियों की सौगात दी अपितु अपने अंचल के जीवन को भी अपनी रचनाओं में जीवन्त रूप से उभारा. सच पूछें तो कुमाऊँ की पृष्ठभूमि, उसके सुख दुख, अभावों और संघर्ष के बीच भी जनजीवन के मुस्कुराने के पल दो पल खोजने के प्रयासों को भी उनके अलावा पर्वतीय अंचल का कोई अन्य कथाकार उतनी शिद्दत के साथ नहीं उभर पाया है.
    उन्होंने अनेक उपन्यास लिखे, दर्जनों कहनियाँ लिखीं, ’पितुआ पोस्टमैन’ के सामान्य धरातल से उठ कर वे ’प्रेतमुक्ति’ के जाति, वर्ग, सामाजिक विडंबनाओं से मुक्त मानवत्व की महान ऊँचाइयों पर पहुँचे. जब कि उनका सहारा लेकर उठे, और लक्ष्मी के वरद्पुत्र बने तथाकथित रचनाकार समाज में सामन्ती युग के प्रेतों को जगाने में लगे हुए हैं.
    शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. हल्द्वानी में उनके आवास को जाने वाले मार्ग का नामकरण ’शैलेश मटियानी मार्ग, का शिला पट्ट लगाकर, जैसे उन पर एहसान कर दिया. उस शिला पट्ट की हालत यह है कि, उस पर परत­दर­परत कितने व्यावसायिक विज्ञापन चिपकते जा रहे हैं इस पर ध्यान देने की किसी को फुर्सत नहीं है.
    उनका आवास जीर्ण­शीर्ण हो चुका है, टपकते घर के बीच उनका परिवार जैसे­तैसे दिन काट रहा है, अपने पिता की थात को फिर से लोगों के सामने लाने के लिए उनके ज्येष्ठ पुत्र राकेश, रात­दिन अकेले लगे हुए हैं. सत्ता और पद के मद में आकंठ निमग्न, जुगाड़­धर्मी अन्धी व्यवस्था में ही नहीं अपने आप को रचनाधर्मी कहने वाले हम लोगों में भी मौखिक सहानुभूति के अलावा उनकी स्मृति को सुरक्षित करने और नयी पीढी को अभावों से लोहा लेते हुए अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने की प्रेरणा देने के लिए कोई विचार नहीं है.
    कितने कृतघ्न हैं हम लोग! यह इस देश में नहीं पता चलता, विदेशों में जाने पर पता चलता है. मुझे 2011 तथा 2013 में छः मास लन्दन में बिताने का अवसर मिला. अपनी यायावरी की आदत से लाचार मैंने लन्दन का कोना­कोना छान मारा. वैभव और उपलब्धियों से भरे इस महानगर में सबसे ध्यानाकर्षक बात लगी ’अपने कृती पुरखों के याद को बनाये रखने की प्रवृत्ति. अकेले लन्दन में कीट्स, सेमुअल जोन्सन, चाल्र्स डिकिंस, चाल्र्स डार्विन, जैसे उनसठ रचनाधर्मियों के आवासों को उनके कृतित्व का संग्रहालय बना दिया गया है. इस श्रद्धापर्व में उनके अपने लोग ही शामिल नहीं है. नाजी जर्मनी के उत्पीड़न से बचने के लिए लन्दन में शरण लेने वाले फ्रायड जैसे अनेक विदेशी मूल के कृती भी विद्यमान हैं. यही नहीं आज के रसेल स्क्वायर के जिस आवास में चाल्र्स डिकिन्स आठ वर्ष रहे और अपने कृतित्व को उभारा, आज पाँच सितारा होटल में रूपान्तरित होने पर भी, उसके मालिक अपनी दीवार पर यह लिखना नहीं भूले कि इस आवास में चाल्र्स डिकिंस आठ वर्ष रहे थे. ब्रिटिश पुस्तकालय के प्रांगण में आइजेक न्यूटन आज भी अपना परकार (कंपास) लेकर अन्वेषण में लगे हुए हैं. बैंक आफ इंग्लैंड वाले मार्ग पर 1808 मे जेलों में सुधार करने के लिए संघर्ष करने वाली महिला ऐलिजाबेथ के आवास पर, जो आज एक विशाल भवन में रूपान्तरित हो चुका है, उनके नाम और कृतित्व को सूचित करने वाली पट्टिका लगी हुई है. किसी भी सड़क पर चले जाइये, आपको अपने पूर्वजों के कृतित्व के प्रति आभार व्यक्त करने वाली पट्टिकाएँ मिल जायेंगी. और हमने अपने लोक जीवन को साहित्य के शिखर पर उत्कीर्ण करने वाले कथाकार के नाम पर एक मार्ग पट्टिका लगाई भी तो उसे अंट­शंट विज्ञापनों के तले पाताल में दफना दिया.
    दो सौ साल जिनकी गुलामी में रहे, जिनकी भाषा, वेश­भूषा, बाहरी ताम­झाम को, अपनी परंपराओं को दुत्कारते हुए हमने अंगीकार किया, उनके आन्तरिक गुणों और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता बोध को हम ग्रहण नहीं कर सके. आज भी हम वहीं पर हैं. पंजाब से आये लोगों की कर्मठता को अंगीकार करने के स्थान पर हम उनके नव धनिक वर्ग के तमाशों और तड़क­भड़क के सामने अपनी हजारों वर्ष के अन्तराल में विकसित सरल और प्राकृ्तिक रूप से अनुकूलित परंपराओं को ठुकराते जा रहे हैं.
    तब और भी दुख होता है कि जहाँ प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर उनके ही जनपद का व्यक्ति आसीन है, उनके पुत्र को अपने कृती पिता की स्मृति को धूमिल होने और अपने बीमार घर को धराशायी होने से बचाने के लिए दर­दर भटकना पड रहा है.
    — ताराचंद्र त्रिपाठी

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  24. सिकंदर हयात

    Jagadishwar Chaturvedi
    18 hrs ·
    अलगाव के खि‍लाफ मशाल हैं मुक्‍ति‍बोध
    इंटरनेट युग में संपर्क और संबंध पेट नहीं भरते,मोबाइल की बातों से संतुष्‍टि‍ नहीं मि‍लती,आज हमें सभी कि‍स्‍म के अत्‍याधुनि‍क तकनीकी और संचार साधन चैन से जीने का भरोसा नहीं देते, बार बार अलगाव का एहसास परेशान करता है ,चि‍न्ता होने लगती है कि‍ आखि‍रकार हम कि‍स दुनि‍या में जी रहे हैं। इस अलगाव से मुक्‍ति‍ कैसे पाएं और इसका सामाजि‍क स्रोत कहां है ? इस समस्‍या के समाधान के बारे में मुक्‍ति‍बोध मशाल हैं। अकेलेपन की रामबाण दवा हैं।
    मुक्‍ति‍बोध ने लि‍खा अकेलेपन की अवस्‍था में ” मन अपने को भूनकर खाता है।’ यह वाक्‍य बेहद मारक है। हम गंभीरता से सोचें कि‍ इससे कैसे बचें। ऐसी अवस्‍था में हम अपने लि‍ए मार्गदर्शक खोजते रहते हैं,अपने जीवन के चि‍त्र और अपने जीवन की समस्‍याओं के समाधान नेट से लेकर साहि‍त्‍य तक खोजते रहते हैं लेकि‍न हमें अपनी समस्‍याओं के समाधान नहीं मि‍लते। थककर हम चूर हो जाते हैं और सो जाते हैं। अलगाव को दूर करने के लि‍ए नेट,मोबाइल और फोन पर घंटों बातें करते रहते हैं। इसके बावजूद बेचैनी दूर नहीं होती,जीवन में रस-संचार नहीं होता। इसका प्रधान कारण है हमारी बातचीत,संपर्क और संवाद से मानवीय सहानुभूति‍ का लोप।
    मानवीय सहानुभूति‍ के कारण ही हम एक-दूसरे के करीब आते हैं। हम चाहे जि‍तना दूर रहें कि‍तना ही कम बातें करें मन भरा रहता है क्‍योंकि‍ हमारे मानवीय सहानुभूति‍ से भरे संबंध हैं। लेकि‍न आज के दौर में मुश्‍कि‍ल यह है हमारे पास संचार की तकनीक है लेकि‍न मानवीय सहानुभूति‍ नहीं है। तकनीक से संपर्क रहता है ,दूरि‍यॉं कम नहीं होतीं। बल्‍कि‍ तकनीक दूरि‍यॉं बढ़ा देती है। दूरि‍यों को कम करने के लि‍ए हमें अपने व्‍यवहार में प्रेम और मानवीय सहानुभूति‍ का समावेश करना होगा। प्रेम और मानवीय सहानुभूति‍ के कारण ही जि‍न्‍दगी के प्रति‍ आस्‍था,वि‍श्‍वास और प्रेम बढ़ता है।
    मुक्‍ति‍बोध की नजर में इसका प्रधान कारण है ‘ आजकल आदमी में दि‍लचस्‍पी कम होती जा रही है।’ अलगाव में मनुष्‍य दोहरी तकलीफ झेलता है वह ‘स्‍व’ और ‘पर’ दोनों को दण्‍ड देता है। मुक्‍ति‍बोध के अनुसार जि‍न्‍दगी जीने अर्थ है ‘बि‍जली-भरी तड़पदार जि‍न्‍दगी’ जीना। ‘ ऐसी जि‍न्‍दगी जि‍समें अछोर,भूरे,तपते , मैदानों का सुनहलापन हो, जि‍समें सुलगती कल्‍पना छूती हुई भावना को पूरा करती है, जि‍समें सीने का पसीना हो, और मेहनत के बाद की आनन्‍दपूर्ण थकन का सन्‍तोष हो। बड़ी और बहुत बड़ी जि‍न्‍दगी जीना (इमेन्‍स लि‍विंग) तभी हो सकता है,जब हम मानव की केन्‍द्रीय प्रक्रि‍याओं के अवि‍भाज्‍य और अनि‍वार्य अंग बनकर जि‍एं। तभी जि‍न्‍दगी की बि‍जली सीने में समाएगी।’
    मुक्‍ति‍बोध के अनुसार सार्थक जीवन की अभि‍लाषा रखना एक बात है और उसके अनुसार जीवन जीना दूसरी बात है। यह भी लि‍खा हर आदमी अपनी प्राइवेट जि‍न्‍दगी जी रहा है । या यों कहि‍ए कि‍ व्‍यावसायि‍क और पारि‍वारि‍क जीवन का जो चक्‍कर है उसे पूरा करके सि‍र्फ़ नि‍जी जि‍न्‍दगी जीना चाहता है। मैं भी वैसा ही कर रहा हूँ । मैं उनसे कि‍सी भी हालत में बेहतर नही हूँ । लेकि‍न क्‍या इससे पार्थक्‍य की अभावात्‍मक सत्‍ता मि‍टेगी ? क्‍या इससे मन भरेगा,जी भरेगा ? यह बि‍लकुल सही ख्‍याल है कि‍ सच्‍चा जीना तो वह है जि‍समें प्रत्‍येक क्षण आलोकपूर्ण और वि‍द्युन्‍मय रहे,जि‍समें मनुष्‍य की ऊष्‍मा को बोध प्राप्‍त हो। कि‍न्‍तु यह तभी संभव है जब हम अपने वि‍शि‍ष्‍टों और सुवि‍शि‍ष्‍टों को कि‍सी व्‍यापक से सम्‍बद्ध करें,वि‍शि‍ष्‍ट को व्‍याप्‍ति‍ प्रदान करना, केवल बौद्धि‍क कार्य नहीं है,वह मूर्त, वास्‍तवि‍क ,जीवन -जगत् संबंधी कार्य है। तभी उस वि‍शि‍ष्‍ट को एक अग्‍नि‍मय वेग और आवेग प्राप्‍त होगा , जब वह कि‍सी दि‍शा की ओर धावि‍त होगा।यह दि‍शा वि‍शि‍ष्‍ट को व्‍यापक से सम्‍बद्ध कि‍ए बि‍ना उपस्‍थि‍त नहीं हो सकती।Jagadishwar Chaturvedi
    18 hrs ·

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  25. सिकंदर हयात

    वायर से साभार – अपूर्वानंद ON 08/10/2017 • 2 COMMENTS
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    PrintMoreपुण्यतिथि विशेष: प्रेमचंद लिखते हैं, ‘राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी.’
    Premchandलेखक प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – मृत्यु: 08 अक्टूबर 1936)
    ‘जर्मनी में नाज़ी दल की अद्भुत विजय के बाद यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में जर्मनी फ़ासिस्ट हो जाएगा और वहां नाजी-शासन कम से कम पांच वर्ष तक सुदृढ़ रहेगा? यदि एक बार नाज़ी शासन को जमकर काम करने का मौका मिला तो वह जर्मनी के प्रजातंत्रीय जीवन को, उसकी प्रजातंत्रीय कामना को अपनी सेना और शक्ति के बल पर इस तरह चूस लेगा कि 25 वर्ष तक जर्मनी में नाज़ी दल का कोई विरोधी नहीं रह जाएगा.’
    प्रेमचंद ने 1933 में जर्मनी में हुए चुनावों में नाज़ी दल की विजय के बाद ‘जर्मनी का भविष्य’ शीर्षक के संक्षिप्त टिप्पणी में यह आशंका व्यक्त की थी.
    इस अंश में ध्यान देने लायक अंश वह है जिसमें वे जर्मनी की ‘प्रजातंत्रीय कामना’ को चूस लिए जाने को लेकर चिंतित हैं. प्रजातंत्रीय कामना लुप्त हो सकती है और वह एक ख़ास तरह की राजनीतिक शक्ति के प्रबल होने की स्थिति में ख़तरे में पड़ जाती है, यह वे कह रहे हैं.
    लेकिन यह जो जीत हुई है, वह यूं ही नहीं: ‘जर्मनी में नाज़ी दल की नाजायज़ सेना का तीव्र दमन और सभी विरोधी शक्तियों को चुनाव के पूर्व ही कुचल डालना ही नाज़ी विजय का कारण है. यह कहां का न्याय था कि वर्गवादियों को जेल भेजकर, विरोधियों को पिटवाकर, मुसोलिनी की तरह विरोधी पत्रों को बंद कराकर चुनाव कराया जाए और उसकी विजय को राष्ट्र मत की विजय बताया जावे.’
    प्रेमचंद की इस टिप्पणी को ज़रूरी नहीं आज के दौर पर घटाकर देखा जाए. लेकिन इस टिप्पणी में नाज़ी दल की विजय के पहले विपक्ष के जोर-जबर्दस्ती सफाए पर प्रेमचंद का ध्यान जाता है.
    वे जर्मनी के विपक्षी दलों की लानत मलामत नहीं करते कि वे क्यों अपनी रक्षा नहीं कर रहे, यह साफ़ तौर पर कहते हैं कि जुर्म हिटलर का है जो गैरजनतांत्रिक तरीके से विपक्ष का ख़ात्मा कर रहा है.
    विपक्ष का ख़त्म होना चिंता का विषय होना चाहिए और उसके लिए उसे ही ज़िम्मेदार मानने की जगह जो उसे ख़त्म कर रहा है, उस पर सवाल उठाना चाहिए, इसे लेकर प्रेमचंद को संदेह नहीं है. नाजी दल की एक निजी सेना है जो दूसरे जर्मन दलों के पास नहीं.
    प्रेमचंद की तीखी निगाह उनके अपने वक्त की दुनिया में जो कुछ भी घटित हो रहा था, उसके आरपार देखती है. उनका अपना पक्ष स्पष्ट है. जर्मनी में जो रहा है उसके लिए वे यूरोपीय सभ्यता को ज़िम्मेदार मानते हैं.
    जर्मनी में नाजी दल के एकाधिपत्य के पीछे यहूदियों का दमन भी है. इस दमन के लिए पहले से आधार मौजूद है: ‘यूरोपीय संस्कृति की तारीफें सुनते-सुनते हमारे कान पक गए. उनको अपनी सभ्यता पर गर्व है. हम एशियावाले तो मूर्ख हैं, बर्बर हैं, असभ्य हैं, लेकिन जब हम उन सभी देशों की पशुता देखते हैं तो जी में आता है यह उपाधियां सूद के साथ क्यों न उन्हें लौटा दी जाएं.’
    प्रेमचंद यूरोप में यहूदी विरोधी घृणा के बारे में चर्चा करते हैं: ‘यहूदी मालदार हैं और आजकल धन ही राष्ट्रों की नीति का संचालन करता है, माना! रूस में कम्युनिज़्म को फैलाने में यहूदियों का हाथ था, यह भी माना. यहूदियों ने ईसाइयों से पुरानी अदावतों का बदला लेने और ईसाई सभ्यता को विध्वंस करने का बीड़ा उठा लिया है. यह भी हम मान लेते हैं, लेकिन इसके क्या मानी कि एक राष्ट्र का सबसे बड़ा अंग यहूदियों को मिटा देने पर ही तुल जाए. जर्मनी में नाजी दल ने आते ही आते यहूदियों पर हमला बोल दिया है. मारपीट, खून-खच्चर भी होना शुरू हो गया है और यहूदियों को जर्मनी से भागने भी नहीं दिया जाता… वह अपने प्राणों की रक्षा नहीं कर सकते. यहूदियों ने वहां सकूनत अख़्तियार कर ली है. कई पीढ़ियों से वहां रहते आए हैं. जर्मनी की जो कुछ उन्नति है उसमें उन्होंने कुछ कम भाग नहीं लिया है, लेकिन अब जर्मनी में उनके लिए स्थान नहीं है.’प्रेमचंद की इस टिप्पणी को फिर आज के वक़्त की रोशनी में पढ़ने की ज़रूरत नहीं लेकिन वे उस समय भी अपने देश की स्थिति की तुलना, जर्मनी में जो कुछ हो रहा था, उससे करते हैं: ‘इधर कुछ दिनों से हिंदू मुसलमान के एक दल में वैमनस्य हो गया है, उसके लिए वही लोग ज़िम्मेदार हैं, जिन्होंने पश्चिम से प्रकाश पाया है और अपरोक्ष रूप से यहां भी वही पश्चिमीय सभ्यता अपना करिश्मा दिखा रही है.’
    इसी पश्चिमी सभ्यता का एक आविष्कार राष्ट्रीयता है. टैगोर की राष्ट्रवाद की आलोचना से प्रायः सब परिचित हैं. भगत सिंह ने राष्ट्रवादी संकीर्णता की जो आलोचना की, वह कम प्रचारित है. उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है.
    प्रेमचंद ‘राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता’ शीर्षक निबंध में लिखते हैं, ‘राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी. नतीजा दोनों का एक है. सांप्रदायिकता अपने घेरे के अंदर शांति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे ज़रा भी मानसिक कलेश न होता था. राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अंदर रामराज्य का आयोजन करती है.’
    प्रेमचंद राष्ट्रीयता की जगह अंतर्राष्ट्रीयतावाद को तरजीह देते हैं. यह गांधी, नेहरू और भगत सिंह के विचारों से मिलता-जुलता ख्याल है. जिस समय प्रेमचंद लेख रहे हैं, देश के भीतर राष्ट्रीयता का प्रश्न हिंदू-मुस्लिम दायरे में बंटा हुआ है. प्रेमचंद इसमें किसी के साथ रियायत नहीं करते लेकिन देखिए, ख़िलाफ़त के मसले पर भी वे क्या कहते हैं.
    वे ख़िलाफ़त के मसले को ‘महात्मा गांधी की व्यापक दृष्टि’ से न देख पाने की हिंदुओं की कमज़ोरी पर अफ़सोस जाहिर करते हैं, ‘सच्चाई यह है कि हिंदुओं ने कभी ख़िलाफ़त का महत्व नहीं समझा और न समझने की कोशिश की, बल्कि उसको संदेह की नज़र से देखते रहे.’
    वे और सख़्त अल्फाज़ का इस्तेमाल करते हैं, ‘हिंदू कौम कभी अपनी राजनीतिक उदारता के लिए मशहूर नहीं रही और इस मौके पर तो उसने जितनी संकीर्णता का परिचय दिया है, उससे मजबूरन इस नतीजे पर पहुंचना पड़ता है कि इस कौम का राजनीतिक दीवाला हो गया वरना कोई वजह न थी कि सारी हिंदू कौम सामूहिक रूप से कुछ थोड़े से उन्मादग्रस्त तथाकथित देशभक्तों की प्रेरणा से इस तरह पागल हो जाती.’
    प्रेमचंद उस समय हिंदू संगठन निर्माण और शुद्धि आंदोलनों की आलोचना करते हैं और कहते हैं निराशा इस बात से है कि इसके ख़िलाफ़ उदार नेता भी नहीं बोल रहे.वे पूछते हैं, ‘आज कौन-कौन हिंदू है जो हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जी-जान से काम कर रहा हो, जो उसे हिन्दुस्तान की सबसे महत्वपूर्ण समस्या समझता हो. कौम का यह दर्द, यह टीस, यह तड़प आज हिंदुओं में कहीं दिखाई नहीं देती. दस-पांच हज़ार मकानों को शुद्ध करके लोग फूले नहीं समाते, मानो अपने लक्ष्य पर पहुंच गए. अब स्वराज्य हासिल हो गया!’प्रेमचंद के इस लिखे को सिर्फ उन्हीं के वक्त पर टिप्पणी मानें, ‘गोकशी के मामले में हिंदुओं ने शुरू से अब तक एक अन्यायपूर्ण ढंग अख़्तियार किया है. हमको अधिकार है कि जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को मानने वाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें, खामखाह दूसरों से सर टकराना है, गाय सारी दुनिया में खाई जाती है, इसके लिए क्या आप सारी दुनिया को गर्दन मार देने के क़ाबिल समझेंगे? …अगर हिंदुओं को अभी यह जानना बाकी है कि इंसान से कहीं ज़्यादा पवित्र प्राणी है, चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा, तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी.’प्रेमचंद यह सब कुछ आज से तकरीबन नब्बे साल पहले लिख रहे थे. क्या उस ककहरे पर काम अब शुरू किया जाए? अपूर्वानंद
    (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं.) वायर से साभार

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  26. सिकंदर हयात

    लेखकों के लिए पत्रकारों के लिए विचारको के लिए आने वाला टाइम या तो बहुत अच्छा हे या बहुत बुरा होगा ———- ? Naved Shikoh is with Deepak Sharma and 46 others.
    4 November at 16:40 ·
    अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं
    RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में अखबारों को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा!
    यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं। जुमलेबाजी की जादूगरी से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने का हुनर रखने वाले कलमकारों की मांग बढ़ गयी है। प्रत्याशियों को प्रचारित करते हुए कलमकारों का हुनर मुफ्त के प्लेटफार्म सोशल मीडिया पर मुखरित होगा। पत्रकार खबर इन्टरव्यू/फर्जी सर्वै/फीचर का हुनर दिखायेगा। कवि-शायर तुकबंदी के जादू से पैसा कमा सकेगा। लेकिन पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन मृत्यु शय्या पर पड़े इनके रोजगार की संजीवनी साबित होगा।
    देशभर के ज्यादातर अखबारों के बंद हो जाने के पूरे आसार है। बेरोजगारी के खतरों के बीच पत्रकार सोशल मीडिया पर पेड न्यूज में अपनी रोजी-रोटी तलाशने लगा है।
    इन्टरनेट का जदीद दौर पुराने दौर में भी लिए जा रहा हैं। जहां कलमकार का दर्जा किसी अखबार के मालिक से ऊंचा होता था। लेकिन आज लाइजनिंग.. सियासत और मीडिया संचालकों के मोहताज होते जा रहे थे कलमकार। वक्त ने करवट ले ली है। इन्टरनेट (सोशल मीडिया /वेबसाइट) के जरिए कलमकार अब किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा।
    जिसमें लिखने की कला है वो बेरोजगारी की इस आंधी में भी भूखा नही रहेगा। एक हाथ से लिखेगा और दूसरे हाथ से पैसा लेगा।

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  27. सिकंदर हयात

    Ravish Kumar
    7 hrs ·
    ख़ुद की लाश अपने कंधे पे उठाये हैं
    ऐ शहर के बाशिंदों हम गाँव से आये हैं।
    आप अदम गोंडवी हैं। कल के लिए पत्रिका 2012 से रखी है कि कभी फुर्सत से पढ़ेंगे। पाँच साल गुज़र गए। आज एक किताब के गुम हो जाने के आतंक में जब तलाश पर निकला तो पत्रिका फिर से सामने थी। हमने अदम गोंडवी को बहुत देर से जाना। ज़िंदगी के शुरू के पचीस साल बग़ैर जाने निकल गए। दो चार का ही नाम सुना था।बाकी बहुत कम को गहराई से जाना। देर से जानने का एक सुख होता है। जब सब जान चुके होते हैं, स्थिर हो चुके होते हैं, उनके बीच आप पहली बार जानने के बाद जीवन के उत्साह में नाचते हुए लगते हैं। कोई ताली नहीं बजाता मगर आप जानकर उससे भी ज़्यादा ख़ुश होते हैं। जानना कभी आख़िरी बार नहीं होता। पहली बार ही होता है। अदम गोंडवी पर एक अच्छे संकलन के लिए ‘ कल के लिए’ का आभार।
    जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे
    कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे
    ये वन्दे मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठ कर
    मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगना दाम कर देंगे
    सदन में घूस देकर बच गयी कुर्सी तो देखोगे
    वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
    एक और अर्ज़ किया है-
    आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
    अपने शाहे-वक्त का यूँ मरतबा आला रहे
    देखने को दे उन्हें अल्लाह कंप्यूटर की आँख
    सोचने को कोई बाबा बाल्टीवाला रहे।
    एक जनसेवक को दुनिया में ‘अदम’ क्या चाहिए
    चार छह चमचे रहें, माइक रहे, माला रहे।
    नोट: चंचल भू जी की तरह बाग़ी कवि गिरफ़्तार नहीं किए जा सकते हैं क्योंकि अदम गोंडवी इस दुनिया में नहीं हैं। एक आख़िरी….
    जब सियासत हो गयी है पूँजीपतियों की रखैल
    आम जनता को बग़ावत का खुला अधिकार है।——————————————Ravish Kumar
    10 hrs ·
    मैं quora पर नहीं हूँ
    प्रोपेगैंडा के कई रूप होते हैं। एक रूप होता कि वो आपके ख़िलाफ़ तरह तरह के गंध फैलाता है। एक रूप यह होता है कि वह आपका ही रूप धर लेता है और वो सब कहने लगता है जो आपको किसी के एंटी होने के खाँचे में फिट कर सके। एक तरफ आपको एंटी बनाकर गाली देगा, दूसरी तरफ आपके नाम से ऐसा कुछ लिखेगा बोलेगा कि लोगों को लगेगा कि ये वाक़ई एंटी है।
    मैं quora. com पर नहीं हूँ। कई लोगों ने पूछा तो जवाब दे रहा हूँ। बहुत साल पहले वहाँ खाता खोला था मगर हिन्दी के नहीं होने से छोड़ दिया। अब मुझे याद भी नहीं है। पासवर्ड न खाता। लगता है किसी ने मेरे नाम से वहाँ भी खाता खोल लिया है और कुछ का कुछ लिखा जा रहा है । शुक्रिया उन सभी का जिन्होंने पूछ लिया वरना कई लोगों ने फ़ॉलो भी कर लिया है। क्या वहाँ भी फेक प्रोफ़ाइल की शिकायत की कोई व्यवस्था है? इत्ती अंग्रेज़ी आती तो यहीं नहीं लिखता ताकि सभी तक पहुँच जाता।
    अजीब दौर है। हम जो नहीं है वो भी कोई हमें बना रहा है। प्रोपेगैंडा वालों से अनुरोध है कि उनके दिल-ओ दिमाग़ पर मेरा डर छाया हुआ है, उससे आज़ाद हो जाएँ। रिलैक्स रहें।Ravish Kumar
    Yesterday at 12:39 ·
    सोशल मीडिया पर चौकीदारी मुश्किल है। इतने में तो डॉन को भी पकड़ लाएँ और ग्यारह मुल्कों की पुलिस छुट्टी पर चली जाए। मेरा कोई पुराना पेज डिलिट नहीं हुआ जिसके लिए इनकी साइट पर क्लिक करने की ज़रूरत है। ख़ूब हंसिए इस पर। क्या किसी को बुरा कहना। लाइक के लिए लइकन सन का का करता है बुझाता ही नहीं है। लइकियों सन का भी उहे हाल है।——————————————–Shambhunath Shukla
    8 hrs ·
    दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण का जायजा लेने के लिए आज सुबह साढ़े आठ बजे मैं घर से निकला. पैदल कोई डेढ़ किमी चलकर विक्रम टेम्पो पकड़ा और आनंद विहार तक गया. वहाँ धुंध, धूल और गाड़ियों के धुएँ के कारण ऐसा लग रहा था मानों नथुनों में कोई किनकिनाती हुई चीज घुस गयी हो. फिर वापस लौटा और उतनी ही दूर का विक्रम टेम्पो पकड़ कर पैदल घर आया. यह समय चूँकि पीक आवर होता है. इसलिए टेम्पो में निर्धारित सात के बजाय पूरे 11 सवारियां ठुंसी थीं और ड्राईवर अलग. लड़कियाँ, महिलाएं और युवक तथा प्रौढ़ भी. सड़क पर निजी वाहनों की इतनी रेलमपेल थी कि गाड़ियाँ दौड़ नहीं सकिल रही थीं. धुआँ और धूल छोडती प्राइवेट माफियाओं की बसें, खनन माफियाओं के मिट्टी से लदे ट्रैक्टर भी चल रहे थे. साइकिल मार्ग पर कारें खड़ी थीं. और पैदल के लिए तो तिल भर जगह नहीं. आनंद विहार रोड पर एक मर्सडीज का मालिक आडी के मालिक से लड़ते हुए कह रहा था किअबे तू पौवे जैसी अपनी कार लेकर मेरी स्काच नुमा गाड़ी को सटा रहा है. इससे जाम लग गया और इसी बीच एक लोकल माफिया का हाफबॉडी ट्रक आया और ढेर सारा धुआँ उगल दिया. सबने उसे ग्रहण किया. लोकल पुलिस का बन्दा नाक पर थूथन जैसी कोई चीज़ लगाए खड़ा था. पेड़ों पर मोटी-मोटी धूल की परत जमा थी. टेम्पो से उतरकर जैसे ही जैन मन्दिर वाली सड़क पर आया वहां सड़क के एक तरफ प्राइवेट मकानों में निर्माण कार्य चल रहा था तो दूसरी तरफ सरकारी. सड़क के दोनों तरफ धूल थी, पास की झुग्गियों में बसे लोग सुबह वहीँ मल विसर्जन करते हैं वहाँ पर मलय पवन नहीं गंदगी और बदबूदार हवा बह रही थी. पास की साहिबाबाद की फैक्ट्रियां धुआँ उड़ेल रही थीं और एसिड की वर्षा भी कर रही थीं.
    अब ऐसे माहौल में राजनेताओं की मटरगश्ती देखिए! दिल्ली के सीएम श्री अरविन्द केजरीवाल फरमाते हैं कि पंजाब के किसान पराली जलाते हैं, यह उसका धुंआ है, इससे हमारी दिल्ली प्रदूषित हो रही है. पंजाब के मुख्यमंत्री श्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जवाब देते हैं कि केजरीवाल अजीब इंसान है, उसे समझ ही नहीं है फिर भी टांग अड़ाए जा रहा है. उधर हमारे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बेखबर हैं क्योंकि उनकी गायों को प्रदूषण से परेशानी नहीं है और चूँकि गाय के नाम पर ही वे सरकार में आए इसलिए प्रदूषण के लिए वे भला क्या करें! खैर, अपुन को भी प्रदूषण से कोई परेशानी नहीं है. अपुन तो यूँ भी कानपुर के हैं जहां के लोग प्रदूषण रहित वातावरण में बेचैन होने लगते हैं. लेकिन मुझे लगा कि अगर ऐसा ही माहौल रहा तो या तो दस साल बाद हर तीसरा आदमी कैंसर पीड़ित होगा और हर दूसरा व्यक्ति ब्रोंकाइटिस से बेहाल खांस रहा होगा. टीबी का दौर फिर लौट आएगा और पीढ़ियाँ कोढ़ी होंगी. मेरे साथ ही मेरा मधुमेह तो विदा ले लेगा लेकिन दूसरी ऐसी बीमारियाँ पनपने लगेंगी कि इतिहास अपने को दोहराएगा. एसिड की वर्षा से महाप्रलय आएगी और शायद फिर से सृष्टि की शुरुआत हो. आदमी पहले बंदर की शक्ल में आए और हजारों-लाखों वर्ष बाद वह इंसान बने और फिर उसी तरह निपट जाए.
    अभी भी समय है कि आदमी चेत जाए. अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो. इन लोभी और दम्भी नेताओं के भरोसे न रहे. तब शायद यह प्रदूषण ख़त्म हो. आबादी पर नियंत्रण और शहरीकरण पर कंट्रोल तथा उपभोक्तावाद को खत्म करना ही इसका निदान है.
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  28. सिकंदर हयात

    ममता कालिया जी की किताब ”कितनो शहरो में कितनी बार ” कमाल की किताब हे भारत में पुराने समय में ठीक ठाक लगभग लगभग ठीक” सीमा पर उच्च मध्यमवर्गीय ” या सुरक्षित सरकारी नौकरी वालो ने कमाल का एक एक गर्माहट भरा जीवन जिया था कालिया दम्पति के सनसमरणो से इसका खूब पता चलता हे Priya Darshan is with Mamta Kalia.
    2 November at 09:55 ·
    आज वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया का जन्मदिन है। वे उन कुछ लेखकों में रही हैं जिनको सबसे पहले मैं पढ़ना चाहता हूं। उनकी किस्सागोई, उनकी भाषिक चपलता, उनका ‘विट’, उनकी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि सब मेरे लिए विलक्षण हैं। मैं यह बात बहुत सावधानी से कह रहा हूं और हिंदी के उन बहुत सारे लेखकों को याद करते हुए भी कह रहा हूं जो हमारे लिए समादरणीय रहे हैं। बहुत सारे दूसरे बहुत सारी दूसरी वजहों से- निश्चय ही लेखकीय या वैचारिक- महत्वपूर्ण होंगे, लेकिन मेरी प्रिय लेखिका ममता कालिया ही हैं।
    इधर सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता भी हमारा सौभाग्य रही है। यहां एक बुजुर्ग की तरह वे सब पर अपनी सदाशयता और स्नेह लुटाती रही हैं। मगर उनका लेखक रूप तो धाकड़ है- अपने बेहतरीन हिस्सों में वे अपने किसी भी समकालीन से आगे हैं। उनको जन्मदिन की बधाई और कृतज्ञ प्रणाम।
    (उनकी कोई तस्वीर मेरे पास नहीं थी। उनकी किताब के कवर से स्मिता ने ली और क्रॅाप करके दी। इसलिए कुछ धुंधली है।

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    1. सिकंदर हयात

      Vineet Kumar added 2 new photos.
      12 hrs ·
      जीवन के सिरे को शब्दों में बांधती रचनाकार को बहुत बधाई :
      ममता कालिया को व्यास सम्मान दिए जाने की खबर पर बार-बार बस एक ही सिरे से सोच रहा हूं- ढंग के लोगों को पुरस्कार मिलते हैं तो इसके प्रति हमारा सम्मान कितना बढ़ जाता है. ऐसे लोगों को सम्मान देकर संस्थाएं उनका नहीं, अपना कद बढाती है, प्रतिष्ठा बरकरार रख पाती है.
      बीए के दिनों में मैंने पहली बार उनका उपन्यास ” बेघर” पढा था. उपन्यास मैं सिंगलसीटिंग यानी एक बार में पढकर खत्म करने का अभ्यस्त रहा हूं. खाना-पीना, पानी-पेशाब सब रोककर. रात के डेढ बजे ये उपन्यास खत्म हुआ. लगा किसी ने मुझे बेघर कर दिया है. मैं बैठे-बैठे एक स्त्री चरित्र में बदल गया था और उसी तरह की क्राइसिस महसूस कर रहा था. उस रात मुझसे कुछ भी खाया न गया.
      एमए में दोबारा से बढा. साहित्य को लेकर कुछ-कुछ मैच्योर हो चला था लेकिन तब भी तासीर वैसी ही थी. एकदम से बेदखल हो जानेवाली अनुभूति.
      ममता कालिया जैसी रचनाकार ने हम हिन्दी पाठकों को तर्क और रचना के आस्वाद के बीच से ले जाते हुए जीवन के प्रति एक गाढी समझ पैदा करने में मदद की है. ये समझ परीक्षा में भले कभी काम न आयी लेकिन जीने के स्तर पर अब भी आती है.
      जीवन के सिरे से अपनी बात लिखनेवाली हमारी बेहद प्रिय लेखिका को बहुत बधाई और आभार. बहुत कम ऐसा होता है कि किसी पुरस्कृत रचनाकार को इस तरह बधाई देने का मन करे. आज बधाई देते हुए लग रहा है- हम एक पाठक का बुनियादी काम कर रहे हैं.Vineet Kumar
      13 hrs ·
      हमारे-आपके हिंसक होने के कई स्तर होते हैं जिन्हें हम सुविधा के लिए गुस्सा, अपसेट, एन्जायटी का नाम दे देते हैं. लेकिन
      गौर कीजिए तो हम कई स्तरों पर सांकेतिक हिंसा में शामिल होते हैं. बच्चों को डांटते हुए, मेड को डपटते हुए, अपनी पार्टनर पर चिल्लाते हुए, अपने कलीग पर फब्तियां कसते हुए…
      इस तरह हमने देखते-देखते एक ऐसा हिंसक परिवेश बनाया है जिसमे अहिंसा, सौम्यता, सहजता और सौन्दर्य के प्रति यकीं ही नहीं रह जाता. जो इन्हें अपनाता है, बेवकूफ, कमजोर, आउटडेटेड करार दे दिया जाता है.
      मैं कई ऐसे घरों में गया हूं जहां सजावट के नाम पर भी आक्रामकता है, सुविधा के नाम पर भी आक्रामकता है, सम्पन्न दिखने की कोशिश में भी आक्रामकता है. जो है वो ऐसा लगता है, अपनी सुविधा के लिए नहीं, किसी और पर दबाव बनाने के लिए है. यही सारी चीजें एक वक्त के बाद उस रूप में झलकती है जिन्हें हम पारिभाषिक रूप में हिंसा मान लेते हैं. गौर कीजिए तो बिना परिभाषा की हिंसा कम खतरनाक स्थिति पैदा नहीं कर रही..

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  29. सिकंदर हयात

    Vijender Masijeevi
    25 November at 16:44 ·
    इधर साहित्य की दुनिया मे शहर दर शहर होने वाले लिट् फेस्ट्स को लेकर बेचैनी है। ये बेचैनी अधिकतर मीडिया, फ़िल्म, पॉपुलर लिट्रेचर के लोगों की उपस्थिति की वजह से है। मुझे लगता है लिटफेस्ट के डायनामिक्स को जो वो है वही समझकर ही विश्लेषण किया जाना चाहिए। नाम कुछ भी दे दीजिए किन्तु ये कोई साहित्य गोष्ठी नहीं हैं, ये साहित्य, मनोरंजन, मीडिया के इर्द गिर्द बुने गए कंटेंट क्रिएशन इवेंट्स हैं। ये अनिवार्यतः व्यावसायिक कोण से आयोजित उत्पादन ईकाई हैं जहां उत्पन्न कंटेंट मीडिया कंजम्प्शन के लिए है।
    ‘महान साहित्यकारों’ को इनसे चिढ़ना नहीं चाहिए ये उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं… महान साहित्यकार परस्पर मैं महान-तू महान का खेल जारी रख सकते हैं।
    वैसे एक सवाल फिर भी बनता है, साहित्य की दुनिया से उपेक्षा अगर हो रही है तो किसकी? क्या रचनाकारों की? नहीं उल्टे अधिक पुस्तक मेलों, लिटफेस्ट स्टॉलों के चलते उन्हें तो लाभ ही है, ज्यादा पाठक मिल पा रहे हैं। दिक्कत आलोचक उसमें भी हमारी दुनिया वाले यानी प्राध्यापक श्रेणी के लोगों को है जबकि सच यह है कि अब तक भी साहित्य वाली दुनिया में जमे बैठे आलोचक वृन्द (सम्पादक या मास्टर, अधिकतर मास्टर) बस भर्ती के, और अनाधिकार ही थे। इन्हें कलपने दिया जा सकता है- वेतन आयोग मिल जाएगा इनका काम चल जाएगा।
    ये लिटफेस्ट जिस पैमाने पर (सोशल) मीडिया कंटेंट पैदा करने में समर्थ हैं, उसके चलते इनका दायरा अभी और फैलेगा… ब्लॉग का विरोध करने वाले आज कहां हैं, याद कीजिए।Vijender Masijeevi

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  30. सिकंदर हयात

    Vineet Kumar
    18 hrs ·
    हे लेखक ! आप प्लीज लेखक होने के साथ-साथ एक सहज इंसान भी बने रहिए, चलते-फिरते पीआर मत हो जाइए. यकीन मानिए, ये प्रकाशक आपको दो-चार लिट फेस्ट में भेजने, हो-हो करने-करवाने के अलावा आपको कुछ नहीं देगा.
    आप महीनों-महीनों हाय-हैलो तक नहीं करते फिर अचानक से इनबॉक्स में अवतरित होते हैं. आपकी किताब आ रही होती है, आपको कवर पेज शेयर करवाना होता है, अपडेट करवाने होते हैं. मुझे शेयर करने में कोई परहेज नहीं लेकिन ऐसा करने से पहले मैं एक बार जरूर लास्ट सीन पर नजर डालता हूं. पता चलता है, जब आपकी पहली किताब आयी थी, लेख छपे थे. हमारी बातचीत में छपने और मुबारकबाद के अलावा कोई दूसरा शब्द ही नहीं है.
    क्या दो लेखक के बीच संवाद का सिरा अग्रिम पुस्तक से शुरू होकर मुबारकबाद पर जाकर खत्म हो जानी चाहिए ? मौका मिले तो पढिएगा हिन्दी के पुराने लेखकों के बीच के संवाद, लिखी चिठ्ठियां. उनमे रोजमर्रे का जीवन है, रोग-बीमारी,दुख-सुख है..लेखक होने से पहले हाड-मांस का आदमी मौजूद है. दो-चार हिट्स के चक्कर में अपनी सहजता दांव पर मत लगा दो प्लीज.
    आप कहेंगे तब तो मैं आपके साथ आपकी किताब आने की खुशी में जनसभा करने लग जाउंगा. लेकिन इसमे हमारे आदमी होने के सबूत कहां तक बचे होंगे, सोचिएगा न..Vineet Kumar
    4 December at 14:34 ·
    आपको जिससे शराफत सीखनी चाहिए उससे..
    हम रायता फैलाने के इतने अभ्यस्त हो चले हैं कि इतना भी नहीं पता करते कि किन-किन चीजों से रायता नहीं बनाए जा सकते. पिछले दिनों पत्रकार निधि राजदान की ओर से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से सवाल किया जाना और जबाव नहीं दिए जाने का मामला इसका उदाहरण है.
    जिस कार्यक्रम में निधि राजदान ने बराक ओबामा से सवाल किया वो घोषित रूप से, पूर्व निर्धारित युवाओं से बातचीत का कार्यक्रम था, पत्रकारों का नहीं. ऐसे में उन्होंने निधि राजदान के बतौर पत्रकार परिचय दिए जाने पर जबाव देने से मना कर दिया और यही तर्क दिया तो इसमें गलत क्या है ?
    हां निधि को ये जरूर सोचना चाहिए कि हर जगह आप स्पेस घेरने की कोशिश ठीक नहीं. आपको कार्यक्रम की प्रकृति की समझ होनी चाहिए. लेकिन आपने गौर किया इस न को कितनी स्वाभाविकता के साथ लिया, एम्बेरेस होते हुए भी सहज होने की कोशिश करती रहीं.
    अब देख रहा हूं निधि राजदान के लिए एक से एक फूहड बयान, अपमानित करने के अंदाज में शीर्षक से पोस्ट ठेले जा रहे हैं. भाई आपके ओबामा का स्टैंड सही लगा तो उनकी तरह न करने की तमीज तो सीखने की कोशिश करें. जिस ह्यूमर और अपनेपन के साथ उन्होंने मनी किया, वहीं उन्हें बेहतरीन शख्स बनाता है. उनकी शराफत तो आप सीखोगे नहीं लेकिन एक महिला एंकर और उस पर एनडीटीवी तो लग गए टुच्चागिरी दिखाने. हिट्स के लिए कितना गिरोगे भई आपलोग ?

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