delhi

चलो भाई हो गया ? वोट डल गए ना ?? अब तो कुछ नहीं हो सकता ?? या अभी भी कोई गुंजाइश बची है ?? नहीं नहीं !! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहने वाली इस देश की जनता तो क्या खुद नेता भी इस सवाल के जवाब में हाँ नहीं कहेंगे ! क्यूँ की एक बार इ वि एम् सील होने के बाद भी अपने लिए गुंजाइश खोजने के कुछ इक्का दुक्का उदाहरण होने के बावजूद कोई भी पार्टी इस विकल्प को आजमाना या उस भरोसे पर रहना कभी पसंद नहीं करेगी !

तो अब चुनाव का नतीजा चाहे जो हो लेकिन चुनाव से पहले एक दुसरे के समर्थकों को पानी में देखने वाले पाठक गण भी इस बात पर सहमत होंगे की अब ऐसा कुछ नहीं हो सकता जो चुनावी नतीजो पर असर डाले | तो चलो, अब हम सभी बजाय इसके की हारने वालों को ताने दें और जीतने वालों को इतराने का मौका दें , जरा अपने अपने गिरेबान में झांके ! न… न….. न ! इसके लिए नहीं की अपने अपने नेताओं को जिताने में कहाँ कमी रह गई | और न इसके लिए की कौन से हुकुम के इक्के ने मात दे दी ! बल्कि इसके लिए की हमसे लोकतंत्र के इस पर्व में अपना योगदान देने में कहाँ कमी रह गई !

चुनाव होने तक हम भले ही किसी के समर्थक या विरोधी रहे हों लेकिन वास्तव में हम लोकतंत्र के ही इमानदार समर्थक साबित होते हैं ये कभी न भूलें | और चुनाव के नतीजों को स्वीकारने में कहीं भी अपनी जीत अथवा हार को लोकतंत्र पे इतना हावी न होने दें जिससे की अपने देश में भी और पूरी दुनिया में भी संजीवनी साबित होती लोकतन्त्रीय प्रणाली पर ही संदेह का कलंक लगने लगे ! इसलिए चुनाव के बाद आत्ममंथन या चिंतन शिविर आदि करना सिर्फ हारने वाली पार्टी का जन्मसिद्ध अधिकार मान लेने की जगह हारने जीतने वाले नेताओ से लेकर हम मतदाता या समर्थक विरोधकों को भी अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए !

ऐसा भी नहीं की हम झांकते नहीं ! झांकते है उलटे और अधिक खुलेपन से झांकते हुवे जीत के लिए विरोधियों को बधाई भी देतें है ! और जीतने वाले नेता विरोधियों को परास्त करने वाली नीतियों को केवल चुनावी जुमले होने की इमानदार स्वीकारोक्ति भी बड़े; बड़े मन से देने से देतें है ! ” ये अच्छी बात है ! ” एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरुर अच्छी बात है लेकिन इससे जनता के लोकतंत्र के प्रति आस्था का कहीं मजाक तो नहीं बन रहा ? इसका होश रखे बिना इस अच्छाई के कोई मायने नहीं रह जायेंगे | ये बात अब चतावनी की हद तक पहुँच चुकी है ये सभी पार्टियों को समझना ही होगा ! दिल्ली के चुनावों में बी जे पी जैसी राष्ट्र स्तर पर स्थापित सत्तासीन पार्टी को भी अपनी जीत संरक्षित देखने के लिए एडी चोटी का जोर लगाते हुवे देखना और एक बार बड़े उम्मीद से चुन दिए गए आप पार्टी को भी दुबारा अपनी जमीं को खोजने में अपने कई उसूल दांव पर लगाते देखना ये इसी चेतावनी का वास्तविक रूप है !

अब इस दिल्ली के चुनाव में कोंग्रेस सहित सभी पार्टियों के नेताओं ने भले ही अपने ही जीत की निर्णायक भविष्यवाणी कर दी हो लेकिन वास्तव में सभी सर्वे के नतीजों को एक तरफ रख दें तो भी हम सभी जानते हैं की क्या होगा ! ………. ? जवाब -बहुमत ! , बहुमत न होने पर गठबंधन !! या फिर पून: चुनाव !! जैसे की हाल ही में हुवा भी ! दिल्ली आज इसके तीसरे और अंतिम चरण से गुजर चुकी है !! इसीलिए अब जैसा की स्वाभाविक है की इस दुबारा लादे गए चुनाव के नतीजे अब फिर से पहली पायदान पे आ जाएँ ! जो है बहुमत | लेकिन अगर फिर एक बार गठबंधन की नौबत आई तो हम सभी जानते हैं की ऐसी सूरत में नेतागण फिर चाहे वे किसी भी पार्टी के हो; क्या क्या विरोधाभासी आश्चर्यजनक विकल्प खोजेंगे ! और यह भी स्पष्ट है की तब की चुनावोपरांत दंगल में मतदाता को सिर्फ मूक दर्शक की भूमिका में रहना अनिर्वार्य होता है !

तो चुनाव के नतीजों के उपरान्त नेताओं का आत्ममुग्ध होना या आत्ममंथन करना और मतदाताओं के लिए मूकदर्शक बने रहने की आनिर्वार्यता के बिच एक पडाव आता है जिसपर कभी किसी का ध्यान नहीं गया वह है चुनाव और नतीजों के बिच का यह समय !! जी ! यही वही समय है जहाँ जैसे की इस लेख के शुरू में ही कहा गया है की चुनावी घमासान के बाद की लोकतान्त्रिक पवित्रता का एहसास होता है ! यही वह समय होता है जहाँ कोई भी दर्जनों सर्वे के नतीजों के बावजूद अपने जीत की घोषणा का दम नहीं भरता और न कोई खुद को हारा हुवा मानता है ! लेकिन इस समय में एकदूसरे पर चलती तलवारों की धार खुद चलाने वाले ही कम करते नजर आने लगते हैं ! नुक्कड़ चौराहों पर एक दूसरे के जासूस बने दोस्त अपने अपने पार्टी के प्यादों की भूमिका से बाहर आकर खुलकर कहने लगते है की ये जीतेगा वो जीतेगा ! लेकिन फिर भी उसे कोई पक्षद्रोही नहीं कहता !!

तो सारे कथाकथन का तात्पर्य यही की राजनीति के कीचड़ में चुनाव से पहले या नतीजों के बाद में चाहे जितनी गन्दगी हो लेकिन इसमें कमल खिलने का यही वह संक्षिप्त सा समय होता है जिसमे नतीजों के जाहिर होने से पहले ही सभी पार्टी के नेता अपने अपने चुनावी हथकंडो और सियासी जुमलों का इकबालिया बयान देकर न सिर्फ जनता को किसी भुलावे में रहने से बचाएं बल्कि आपसी राजनैतिक विरोध को भी रंजिश में बदलने से रोक | और अपनी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के अनुसार किसके साथ गठबंधन होना संभव-असंभव है ये खुले मन से जाहिर कर दें तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को अगले चुनावों तक अपनी अपनी भूमिका को निभाने की स्वस्थ जमीं मिलेगी ! और अगले चुनावों में दोनों के पास जनहित और जन- अहित के इतने आरोप-प्रत्यारोप होंगे की उसमे व्यतिगत आरोपों के लिए कोई जगह ही न बचेगी !

यकीं करें मित्रों ये ख्याल कोई दिवास्वप्न नहीं ! बस वास्तविकता को वास्तविकता की ही आँखों से देखकर लोकतंत्र में अपनी अपनी स्थिति को भुनाने का कारगर नुस्खा है !

सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों लोकतंत्र की वह सच्चाई है जिससे भागना किसी भी अच्छे से अच्छे पार्टी के ,नेता के बस का नहीं ! ये हम न सिर्फ दिल्ली में बल्कि दुनिया में भी जब देख ही रहे हैं तो येन केन प्रकारेण किसी भी तरह इस अस्थाई सत्ता को हथियाने या उसमे बने रहने की होड़ में पड़ने की जगह क्यूँ न हम हमें मिली भूमिका का इमानदारी से निर्वाह कर हमारे लोकतंत्र को मात्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र के दर्जे से ऊपर उठाकर सुचिता की राजनीति की भी मिसाल बनाएं ?