NITISH-KATRA

नीतीश कटारा की हत्या अंतर्जातीय प्रेम संबंधों का परिणाम थी। नीतीश कटारा ब्राह्मण था और उसकी प्रेमिका भारती दबंग राजनेता डीपी यादव की बेटी यानी यादव जाति की है। आनर किलिंग के मामले पहले उच्च जाति की लड़की द्वारा निम्न जाति के लड़के से पे्रम प्रसंग की स्थिति में सामने आते थे। अगर किसी सवर्ण की लड़की ने दलित लड़के से प्रेम विवाह कर लिया तो लड़की का परिवार सामाजिक स्तर पर पतित हो जाता था। उसके लिए अपनी हैसियत और सम्मान बचाने का एक ही तरीका था कि वह अपनी लड़की और उसके पति दोनों की हत्या कर दे। बहुत बार तो ऐसा हुआ कि लड़की को संतान हो गई। इसके बावजूद सवर्ण पिता और भाइयों ने अपने दामाद को नहीं बख्शा। ऐसी वारदात के बाद कानून भले ही लड़की के परिजनों को अपराधी माने लेकिन अपनी बिरादरी में यह पराक्रम उसके महिमा मंडित होने का कारण बन जाता था। ऐसा नहीं है कि आज यह स्थिति बहुत बदल गई हो। कमोवेश आज भी यह स्थिति बरकरार है।
इस मामले में माना यह जाता था कि जाति व्यवस्था के दुर्ग की रक्षा के लिए सवर्ण जातियां ही क्रूरता की हद तक संवेदनशील हैं। उनका प्रभुत्व कमजोर पडऩे पर अंतर्जातीय विवाह के किसी भी सूत्रपात के कठोर दमन की स्थिति काफी हद तक समाप्त हो जाएगी। जाति व्यवस्था के पिरामिड में सर्वोच्च शिखर पर बैठे ब्राह्म्ïाण युवक से लड़की के प्रेम करने पर लड़की के परिजन अपने भावी दामाद को मौत के घाट उतार दें। यह स्थिति तो कुछ दशक पहले तक अकल्पनीय थी। रूढि़वादिता के बोलबाले के समय ऐसे मामले में हद से हद यह होता था कि लड़की के परिजन अपनी ही लड़की को सजा दे डालें ताकि वे ब्राह्म्ïाण समाज के कोप से बच सकेें। नीतीश कटारा की हत्या ने सीधा गणित लगाने वाले समाज शास्त्रियों को चकराने के लिए मजबूर कर दिया है क्योंकि कहां तो यह था कि राजसूय यज्ञ में अपमानित होने की कोशिश के बाद हस्तिनापुर साम्राज्य में बदलाव की प्रक्रिया में धुरी की भूमिका गंवाने का खतरा देख भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन और अपनी भगिनी सुभद्रा के प्रेम विवाह की भूमिका रच डाली ताकि वे राजवंश के सीधे रिश्तेदार बनकर अपेक्षित कुलीनता के लिए अर्ह हो सकेें और कहां कटारा हत्याकांड की वारदात का विपर्यास।
सामवादियों ने बाबा साहब अंबेडकर और डा. राममनोहर लोहिया को जाति के मुद्दे को प्रगतिवाद से जोडऩे के लिए प्रवंचना का शिकार साबित करने की चेष्टा की क्योंकि सामवादियों का मत रहा है कि जातियां समाज के सुपरफिशियल स्ट्रक्चर हैं। वर्ग चेतना के विकास के बाद जातिगत अस्मिताएं स्वत: तिरोहित हो जाएंगी। दुर्भाग्य यह है कि भारत में वामपंथी दलों की अगुवाई उन नेताओं के पास रही जो कभी जाति के मामले में खुद को ही डी क्लास नहीं कर पाए। नतीजतन दूरदृष्टि का अभाव उनकी कमजोरी बन गया। नीतीश कटारा और उसके कातिल विकास व ïिवशाल यादव की सामाजिक पृष्ठभूमि ऐसी थी जहां जातिगत पहचान गौण हो जाती है और वर्गीय धरातल अधिक महत्वपूर्ण होता है इसलिए कम से कम भारती यादव के परिवार को तो इस जोड़े के संबंध पर खास एतराज होना ही नहीं चाहिए था लेकिन नीतीश की हत्या की वारदात ने साबित कर दिया कि जातिगत चेतना की जड़ें भारतीय समाज में कितनी गहरी हैं जिन्हें वर्ग चेतना के उभरने के बावजूद हिलाना मुश्किल है।
अमेरिका के एक यहूदी लेखक ने कुछ वर्ष पहले एक किताब लिखी थी जिसकी चर्चा स्व. मनोहर श्याम जोशी ने आउटलुक के अपने स्तंभ में की थी। इस पुस्तक में उक्त लेखक ने अमेरिका को चेताया था कि वह पिछड़े समाज वाले देशों में अपेक्षित बदलाव के होमवर्क को अंजाम दिए बिना डेमोक्रेशी थोपने से बाज आए क्योंकि इससे तमाम तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। कम से कम भारत के संदर्भ में उसका यह आंकलन काफी सटीक बैठता है। जाति व्यवस्था की जड़ता यहां एक ऐसा अभिशाप है जो देश के वैश्विक महाशक्ति के दर्जे में पहुंच जाने के बावजूद सामाजिक आधुनिकीकरण में बाधक साबित हो रहा है। यहां के लोकतंत्र में इस वर्ण व्यवस्था की वजह से नागरिक चेतना का अंकुरण और विस्तार संभव नहीं हो पा रहा जबकि इसके बिना सुदृढ़ आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
जाति व्यवस्था को गांधी जी ने श्रम विभाजन माना था। अपने आरंभिक समय में इसकी उत्पत्ति श्रम विभाजन के ही प्रयोजन से हुई थी। उपनिषदों की कहानियां पढऩे से मालूम होता है कि एक ही पिता की अलग-अलग संतानों में एक ब्राह्म्ïाण एक क्षत्रिय और एक वैश्य हो सकता था। जाति व्यवस्था जैसे ही जन्मजात हुई अंतर्जातीय विवाह पर निषेध के लिए कड़े प्रावधान किए जाने लगे। डा. अंबेडकर ने संधि की कथा शीर्षक से अपने लेख में लिखा है कि जाति व्यवस्था से बाहर विवाह करने पर किस तरह से संबंधित दंपति की संतानों की वर्णगत हैसियत गिर जाती थी। यहां तक कि अनुलोम विवाह की स्थिति में भी उनको पद दलित होने की सजा भोगनी पड़ती थी। अनुलोम विवाह यानी जहां लड़का उच्च जाति का हो और लड़की उससे निम्न जाति की। प्रतिलोम विवाह का दुस्साहस तो सर्वाधिक प्रताडऩाओं के योग्य ठहराया गया। अगर पिता ब्राह्म्ïाण हुआ और माता सूद्र तो मनु स्मृति में उसकी संतान को चांडाल श्रेणी में डालने की व्यवस्था है जिसकी स्थिति कितनी नारकीय रही इस बात से सभी परिचित हैं। जाति के अंदर ही विवाह की बाध्यता जाति व्यवस्था के शाश्वत होने की हद तक दीर्घकालीन बन जाने का मुख्य आधार साबित हुई।
लेकिन डा. अंबेडकर और डा. लोहिया जैसे महाविद्वान भी जाति विहीन समाज के निर्माण के लिए रणनीतियां तय करने में चूक कर गए। उन्होंने यह माना था कि जातिवाद के नाते जिन्हें गौरव मिलता है उन्हीं का निहित स्वार्थ इस व्यवस्था को बनाए रखने में है। वंचितों की भौतिक स्थिति को अगर इतना सक्षम बना दिया जाए कि सवर्ण उनके साथ भेदभाव करने की हालत में न रह जाएं तो जाति व्यवस्था का तिलिस्म खुद ही दरक जाएगा पर हालत यह है कि सशक्तिकरण के बाद वंचित जातियां जातिगत मान-सम्मान के लिए सवर्णों से ज्यादा कट्टरता दिखा रही हैं। मुलायम सिंह यादव ने सत्ता मिलने के बाद अपने प्रेरणास्रोत डा. लोहिया की शिक्षा के विरुद्ध पिछड़ी जातियों से कहा कि वे अपने नाम के साथ जाति का उल्लेखन करने से परहेज करने की बजाय गर्व के साथ अपनी जाति को नाम के साथ जोड़ें। मायावती ने भी सारी दलित जातियों को बौद्ध संज्ञा में समाहित करने के बाबा साहब के निर्देश को भुलाकर जातिगत भाईचारा समितियों के माध्यम से भारतीय समाज के सघन कबीलाईकरण का नया दौर शुरू कर दिया।
भारतीय समाज कहे कुछ भी लेकिन मानसिक दासता की वजह से आज उसके लिए श्रेष्ठता और सभ्रांतता का मानक अमेरिकन प्रतिमान है। दूसरी ओर विरोधाभास यह है कि वह अमेरिका से आज की दुनिया में देश की उत्तरजीविता के लिए नागरिक समाज के गठन के महत्व का सबक नहीं पढऩा चाहता। अमेरिका में पंद्रहवीं शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी तक मूल बाशिंदों का संहार करके स्पेनी, ब्रिटिश, डच आदि यूरोपियन वासियों के बसने का दौर चला जिसके कारण बाद में इन सबने परंपरागत अस्मिता से परे जाकर नई चेतना के मंच की तलाश की। आज हालत यह है कि बाबी जिंदल कहते हैं कि वे भारतीय मूल के अमेरिकन नहीं सिर्फ अमेरिकन हैं। अतीत की बाधक अस्मिताओं का मोह छोड़कर विश्व नागरिकता के इस कालखंड में नई समवेत चेतना का निर्माण युग धर्म बन चुका है। बदलाव के सच्चे संवाहकों यानी प्रगतिशील प्रवृत्ति के धनी सामाजिक अग्रदूतों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वे इस दिशा में सफलता के लिए कारगर कार्ययोजना कैसे बनाएं।अंतर्जातीय प्रेम संबंधों का परिणाम थी। नीतीश कटारा ब्राह्मण था और उसकी प्रेमिका भारती दबंग राजनेता डीपी यादव की बेटी यानी यादव जाति की है। आनर किलिंग के मामले पहले उच्च जाति की लड़की द्वारा निम्न जाति के लड़के से पे्रम प्रसंग की स्थिति में सामने आते थे। अगर किसी सवर्ण की लड़की ने दलित लड़के से प्रेम विवाह कर लिया तो लड़की का परिवार सामाजिक स्तर पर पतित हो जाता था। उसके लिए अपनी हैसियत और सम्मान बचाने का एक ही तरीका था कि वह अपनी लड़की और उसके पति दोनों की हत्या कर दे। बहुत बार तो ऐसा हुआ कि लड़की को संतान हो गई। इसके बावजूद सवर्ण पिता और भाइयों ने अपने दामाद को नहीं बख्शा। ऐसी वारदात के बाद कानून भले ही लड़की के परिजनों को अपराधी माने लेकिन अपनी बिरादरी में यह पराक्रम उसके महिमा मंडित होने का कारण बन जाता था। ऐसा नहीं है कि आज यह स्थिति बहुत बदल गई हो। कमोवेश आज भी यह स्थिति बरकरार है।

इस मामले में माना यह जाता था कि जाति व्यवस्था के दुर्ग की रक्षा के लिए सवर्ण जातियां ही क्रूरता की हद तक संवेदनशील हैं। उनका प्रभुत्व कमजोर पडऩे पर अंतर्जातीय विवाह के किसी भी सूत्रपात के कठोर दमन की स्थिति काफी हद तक समाप्त हो जाएगी। जाति व्यवस्था के पिरामिड में सर्वोच्च शिखर पर बैठे ब्राह्म्ïाण युवक से लड़की के प्रेम करने पर लड़की के परिजन अपने भावी दामाद को मौत के घाट उतार दें। यह स्थिति तो कुछ दशक पहले तक अकल्पनीय थी। रूढि़वादिता के बोलबाले के समय ऐसे मामले में हद से हद यह होता था कि लड़की के परिजन अपनी ही लड़की को सजा दे डालें ताकि वे ब्राह्म्ïाण समाज के कोप से बच सकेें। नीतीश कटारा की हत्या ने सीधा गणित लगाने वाले समाज शास्त्रियों को चकराने के लिए मजबूर कर दिया है क्योंकि कहां तो यह था कि राजसूय यज्ञ में अपमानित होने की कोशिश के बाद हस्तिनापुर साम्राज्य में बदलाव की प्रक्रिया में धुरी की भूमिका गंवाने का खतरा देख भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन और अपनी भगिनी सुभद्रा के प्रेम विवाह की भूमिका रच डाली ताकि वे राजवंश के सीधे रिश्तेदार बनकर अपेक्षित कुलीनता के लिए अर्ह हो सकेें और कहां कटारा हत्याकांड की वारदात का विपर्यास।

सामवादियों ने बाबा साहब अंबेडकर और डा. राममनोहर लोहिया को जाति के मुद्दे को प्रगतिवाद से जोडऩे के लिए प्रवंचना का शिकार साबित करने की चेष्टा की क्योंकि सामवादियों का मत रहा है कि जातियां समाज के सुपरफिशियल स्ट्रक्चर हैं। वर्ग चेतना के विकास के बाद जातिगत अस्मिताएं स्वत: तिरोहित हो जाएंगी। दुर्भाग्य यह है कि भारत में वामपंथी दलों की अगुवाई उन नेताओं के पास रही जो कभी जाति के मामले में खुद को ही डी क्लास नहीं कर पाए। नतीजतन दूरदृष्टि का अभाव उनकी कमजोरी बन गया। नीतीश कटारा और उसके कातिल विकास व ïिवशाल यादव की सामाजिक पृष्ठभूमि ऐसी थी जहां जातिगत पहचान गौण हो जाती है और वर्गीय धरातल अधिक महत्वपूर्ण होता है इसलिए कम से कम भारती यादव के परिवार को तो इस जोड़े के संबंध पर खास एतराज होना ही नहीं चाहिए था लेकिन नीतीश की हत्या की वारदात ने साबित कर दिया कि जातिगत चेतना की जड़ें भारतीय समाज में कितनी गहरी हैं जिन्हें वर्ग चेतना के उभरने के बावजूद हिलाना मुश्किल है।

अमेरिका के एक यहूदी लेखक ने कुछ वर्ष पहले एक किताब लिखी थी जिसकी चर्चा स्व. मनोहर श्याम जोशी ने आउटलुक के अपने स्तंभ में की थी। इस पुस्तक में उक्त लेखक ने अमेरिका को चेताया था कि वह पिछड़े समाज वाले देशों में अपेक्षित बदलाव के होमवर्क को अंजाम दिए बिना डेमोक्रेशी थोपने से बाज आए क्योंकि इससे तमाम तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। कम से कम भारत के संदर्भ में उसका यह आंकलन काफी सटीक बैठता है। जाति व्यवस्था की जड़ता यहां एक ऐसा अभिशाप है जो देश के वैश्विक महाशक्ति के दर्जे में पहुंच जाने के बावजूद सामाजिक आधुनिकीकरण में बाधक साबित हो रहा है। यहां के लोकतंत्र में इस वर्ण व्यवस्था की वजह से नागरिक चेतना का अंकुरण और विस्तार संभव नहीं हो पा रहा जबकि इसके बिना सुदृढ़ आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।

जाति व्यवस्था को गांधी जी ने श्रम विभाजन माना था। अपने आरंभिक समय में इसकी उत्पत्ति श्रम विभाजन के ही प्रयोजन से हुई थी। उपनिषदों की कहानियां पढऩे से मालूम होता है कि एक ही पिता की अलग-अलग संतानों में एक ब्राह्म्ïाण एक क्षत्रिय और एक वैश्य हो सकता था। जाति व्यवस्था जैसे ही जन्मजात हुई अंतर्जातीय विवाह पर निषेध के लिए कड़े प्रावधान किए जाने लगे। डा. अंबेडकर ने संधि की कथा शीर्षक से अपने लेख में लिखा है कि जाति व्यवस्था से बाहर विवाह करने पर किस तरह से संबंधित दंपति की संतानों की वर्णगत हैसियत गिर जाती थी। यहां तक कि अनुलोम विवाह की स्थिति में भी उनको पद दलित होने की सजा भोगनी पड़ती थी। अनुलोम विवाह यानी जहां लड़का उच्च जाति का हो और लड़की उससे निम्न जाति की। प्रतिलोम विवाह का दुस्साहस तो सर्वाधिक प्रताडऩाओं के योग्य ठहराया गया। अगर पिता ब्राह्म्ïाण हुआ और माता सूद्र तो मनु स्मृति में उसकी संतान को चांडाल श्रेणी में डालने की व्यवस्था है जिसकी स्थिति कितनी नारकीय रही इस बात से सभी परिचित हैं। जाति के अंदर ही विवाह की बाध्यता जाति व्यवस्था के शाश्वत होने की हद तक दीर्घकालीन बन जाने का मुख्य आधार साबित हुई।

लेकिन डा. अंबेडकर और डा. लोहिया जैसे महाविद्वान भी जाति विहीन समाज के निर्माण के लिए रणनीतियां तय करने में चूक कर गए। उन्होंने यह माना था कि जातिवाद के नाते जिन्हें गौरव मिलता है उन्हीं का निहित स्वार्थ इस व्यवस्था को बनाए रखने में है। वंचितों की भौतिक स्थिति को अगर इतना सक्षम बना दिया जाए कि सवर्ण उनके साथ भेदभाव करने की हालत में न रह जाएं तो जाति व्यवस्था का तिलिस्म खुद ही दरक जाएगा पर हालत यह है कि सशक्तिकरण के बाद वंचित जातियां जातिगत मान-सम्मान के लिए सवर्णों से ज्यादा कट्टरता दिखा रही हैं। मुलायम सिंह यादव ने सत्ता मिलने के बाद अपने प्रेरणास्रोत डा. लोहिया की शिक्षा के विरुद्ध पिछड़ी जातियों से कहा कि वे अपने नाम के साथ जाति का उल्लेखन करने से परहेज करने की बजाय गर्व के साथ अपनी जाति को नाम के साथ जोड़ें। मायावती ने भी सारी दलित जातियों को बौद्ध संज्ञा में समाहित करने के बाबा साहब के निर्देश को भुलाकर जातिगत भाईचारा समितियों के माध्यम से भारतीय समाज के सघन कबीलाईकरण का नया दौर शुरू कर दिया।

भारतीय समाज कहे कुछ भी लेकिन मानसिक दासता की वजह से आज उसके लिए श्रेष्ठता और सभ्रांतता का मानक अमेरिकन प्रतिमान है। दूसरी ओर विरोधाभास यह है कि वह अमेरिका से आज की दुनिया में देश की उत्तरजीविता के लिए नागरिक समाज के गठन के महत्व का सबक नहीं पढऩा चाहता। अमेरिका में पंद्रहवीं शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी तक मूल बाशिंदों का संहार करके स्पेनी, ब्रिटिश, डच आदि यूरोपियन वासियों के बसने का दौर चला जिसके कारण बाद में इन सबने परंपरागत अस्मिता से परे जाकर नई चेतना के मंच की तलाश की। आज हालत यह है कि बाबी जिंदल कहते हैं कि वे भारतीय मूल के अमेरिकन नहीं सिर्फ अमेरिकन हैं। अतीत की बाधक अस्मिताओं का मोह छोड़कर विश्व नागरिकता के इस कालखंड में नई समवेत चेतना का निर्माण युग धर्म बन चुका है। बदलाव के सच्चे संवाहकों यानी प्रगतिशील प्रवृत्ति के धनी सामाजिक अग्रदूतों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वे इस दिशा में सफलता के लिए कारगर कार्ययोजना कैसे बनाएं।