madrasa

आपने किसी स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय में देखा कि उसमें यह शर्त हो कि यह केवल एक विशेष समुदाय या फ़िरक़ा या पंथ के बच्चे ही पढ़ सकते हैं? और उसके शिक्षकों का संबंध किसी विशेष समुदाय से होना चाहिए? नहीं ऐसा कहीं नहीं होता। ..मगर होता है तो हमारे सांप्रदायिक मदरसों में.जिन में केवल एक विशेष समुदाय के छात्रों ही प्रवेश कर सकते हैं। और शिक्षकों का संबंध भी उनके समुदाय से होना चाहिए।किसी देवबंदी मदरसे में कोई बरेलवी या अहले हदीस या शिया नहीं पढ़ सकता ना ही किसे दूसरे समुदाय का कोई व्यक्ति चाहे कितना ही सक्षम क्यों ना हो शिक्षक बन सकता है।यही हाल बरेलवी अहले हदीस शिया आदि का है।और पुरे विशव के मदरसो का यही हाल है के जहा सिर्फ अपने ग्रुप या फिरके के ही लोग पद सकते है .

अगर यह शैक्षिक संस्थान होते तो केवल अपने समुदाय के लिए विशेष ना होते.या वास्तव सांप्रदायिक अड्डे हैं जिनका उद्देश्य धर्म की सेवा नहीं बलके अपने समुदाय का प्रचार। जो कि राष्ट्र को संप्रदायों में विभाजित करने के लिए बना रहे हैं .इन मदरसो का मुख्य धय ये होता है के मुस्लिम समाज को पंथ या फिरके में बाँट कर अपना उल्लू सीधा करना होता है .

इस्लाम में सांप्रदायिकता हराम हे.मगर मगर मुसलमानो ने इसे अपना लिया है क़ुरआन ने फिरकाबंदी या पंथ बनाने से मन किया है पैगम्बर रसूल ने भी मुसलमानो से कहा है के फिरका बंदी से बचो इस क़ुरआन ने फिरकाबंदी या पंथ बनाने से मन किया है पैगम्बर रसूल ने भी मुसलमानो से कहा है के फिरका बंदी से बचो इसक़ुरआन ने फिरकाबंदी या पंथ बनाने से मन किया है पैगम्बर रसूल ने भी मुसलमानो से कहा है के फिरका बंदी से बचो इस तरह फिरका बनाना हराम है ..मगर हमारे मौलवी और धर्म गुरुओ ने कुरआन और रसूल की शिक्षा की परवाह न करते हुए फिरका बनाया बल्कि मदरसे स्थापित किये और मस्जिदों पर भी लिख दिया कि यह अमुक समुदाय की मस्जिद इस हठधर्मी बेशर्मी और बेहियाई के बावजूद आप समझते हैं कि अल्लाह तुम्हें खुश होगा? हरगिज़ नहीं यह अल्लाह र के धर्म के साथमजाक यह अल्लाह से विद्रोह है और अल्लाह से टक्कर लेने वालों को ना दुनिया में सम्मान मिलता है ना भविष्य में कामयाबी .

हमारे रसूल मुहम्मद सल अलैहि वसल्लम के नाम के साथ अगर किसी समुदाय का नाम लगाया जाए तो कैसा लगेगा? उदाहरण के लिए आपके नाम के साथ सुनी शिया देवबंदी बरेलवी लिख दिया जाए तो?कोई भी उसे पसंद नहीं करे गा.खदा भी हमारा नाम मुस्लिम पसंद कया.बलकह विश्वास का मूल नाम यही था.मोसी िीीतिय अ मानने वाले मुस्लिम ही कहवाते थे.मगर बाद में उन्होंने अपना नाम ईसाई और यहूदी रख लिया।यह कितने शर्म की बात है कि इस्लाम का नाम इस्तेमाल करने वाले अपने समुदाय पर गर्व करते हैं। ऐसे लोगों को शर्म आनी चाहए. ऐसे सभी मौलवियो उलेमा का विरोध करे जो साम्प्रदायिकता या फिरका को बढ़ावा देता है .एसे सभी मौलवी हित परस्त घटिया हैं जो अपने आप को समुदाय से संबंधित हैं।एक सच्चे मुस्लिम कर्तव्य है कि इस्लाम को बदनाम करने वाले समुदायों का बहिष्कार

भारत में कुछ हिन्दू संगठनो का ये इल्जाम लगाना के मदरसो में आतंकवाद की शिक्षा दी जाती है या मदरसा आतंकवाद को बढ़ावा देता है उस समय उन के मुंह पे तमंचा लगा जब भारत की इंटेलिजेंस बेउरो ने केंद्र सरकार भाजपा को रेपर्ट सौंपी के भारत के मदरसे में सिर्फ इस्लामी शिक्षा दी जाती है यहाँ आतंकवाद की शिक्षा नहीं दी जाती है . हा लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत ने माना है के पाकिस्तान में कुछ मदरसे है जो आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और उन का कहना है के पेशावर स्कूल हमले में कुछ मदरसो का हाथ है .पाकिस्तान ने एक कमिटी बनाने की घोषणा की है जो ऐसे मदरसो की चिन्हित करे गी जहा आतंकवाद की शिक्षा दी जा रही है .सरकार मदरसो को सरकारी तहवेल में लेने की बात कर रही है. सही बात ये है भी के भारत के मदरसे में इस्लाम की शिक्षा दी जाती है और कुछ नहीं . हा मगर इस्लामी मदरसो में जो पंथ और फिरका बंदी की शिक्षा दी जाती है वे गलत है और इस्लाम के लिए खतरे की बात है . देखा गया है के बहुत जगह मुसलामन एक दूसरे में आपस ही में फिरका के नाम पे लड़ाई कर लेते है और जिस कारन आपसी फसाद फ़ैल जाता है .

प्रतियागिता के इस दौर में यदि मुसलमानों को समाज के अन्य लोगों के साथ अपनी प्रगति करनी है तो उन्हें मदरसा की तालीम के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी की तालीम भी ग्रहण करना जरूरी है। मदरसा में भी अरबी, फारसी, उर्दू की तालीम के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षणों जैसे कंप्यूटर प्रशिक्षण, इंजीनियिरंग, मेडिकल, सीए, वकालत, आदि जैसे अन्य प्रकार के प्रोफेशनल शिक्षा की तालीम लेना भी जरूरी है। सिर्फ दीनी तालीम के भरोसे रहना आज के दौर में वेबकूफी है। साथ है ये भी किया जाना चाहिए के भारत में जितने भी मदरसे है और किसी भी फिरके के उन का सिलेबस एक हो और हर मदरसे में एक दूसरे फिरके की सोच रखने वाले शिक्षक हो ताके इस तरह साम्प्रदायिकता ख़त्म की जा सके और जो मुसलमानो में आपस में फिरका की लड़ाई ही उसे ख़त्म की जा सके और इस्लाम धर्म को एक अच्छे धर्म के तौर पे विशव के सामने पेश किया जा सके .