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खबर है कि तमिलनाडु में संघ परिवार के भगवा संगठन ‘हिन्दू मक्कल काची’ ने 18 दलित ईसाईयों की हिन्दूधर्म में घर-वापसी कराई है. ये सभी लोग गरीब घरों से हैं और दिहाड़ी मजदूर हैं. इधर विश्व हिन्दू परिषद् के नेता प्रवीण तोगड़िया ने भी पश्चिम बंगाल के बीरभूमि में पचास लाख गरीब आदिवासियों की घर वापसी कराने का एलान किया है. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में भी भगवा पलटन ने कुछ गरीब दलित मजदूरों की घर वापसी कराई थी, जिनमे आगरा में तो उनका झूठ भी पकड़ा गया था. सवाल यह है कि ये सारी घर वापसी गरीब दलितों की ही क्यों कराई जा रही है? दलितों का ही ईसाई या मुसलमान बनना उनकी आँखों में क्यों खरक रहा है? एक बड़ी संख्या में सवर्ण हिन्दू भी ईसाई और मुसलमान बने थे, जिनमें बहुत से आज भाजपा में ही राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, उनकी घर वापसी क्यों नहीं कराई जा रही है? सवाल यह भी है कि जब नौ महीने पूर्व केंद्र में भाजपा की सरकार नहीं थी, तब ये घर वापसी के कार्यक्रम क्यों नहीं चलाये जा रहे थे? मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही ये कार्यक्रम क्यों शुरू किये गये?

दरअसल संघ परिवार कायरों का परिवार है, जो आसान शिकार ढूंढ़ता है. यथार्थ से टकराने का साहस उसमें नहीं है. उसे पता है कि भारत में जब ईसाईयों की ही कोई राजनीतिक शक्ति नहीं है, तो दलित ईसाईयों की क्या हैसियत है, जो उसका मुकाबला करेंगे? इसलिए वे कुछ कमजोर और गरीब दलित ईसाईयों की घर वापसी करा कर सिर्फ ईसाईयों को उत्तेजित करने का काम कर रहे हैं. भारत के ईसाई विरोध करने की स्थिति में है नहीं, क्योंकि वे राजनीतिक रूप से संगठित नहीं हैं. उनकी इतनी संख्या भी नहीं है कि वे अपनी राजनीतिक शक्ति बना लें. दलितों के वाल्मीकि समुदाय में आरएसएस का एक संगठन ‘वाल्मीकि धर्म समाज’ और ‘आदि धर्म समाज’ नाम से पहले से ही सक्रिय है, जो वाल्मीकियों को बौद्ध और ईसाई बनने से रोकता है. अगर कोई वाल्मीकि ईसाई बन जाता है, तो उन्हें वे अनुष्ठान करके पुनः वाल्मीकि बना लेते हैं. ऐसे ही एक अनुष्ठान के बाद रामपुर के एक पादरी ने बहुत ही सटीक टिप्पणी की थी कि ‘सूअरों के आगे मोती डालने से कोई फायदा नहीं.’ यह बाइबिल की बहुत अच्छी सूक्ति है. गंदगी के आदी सूअर भला मोतियों का क्या करेंगे? यहाँ कहने का मतलब यह है कि जिन दलितों का धर्मांतरण अध्ययन-मनन के साथ अंतर्मन से नहीं हुआ है, वे ही घर वापसी के आडम्बर में फंसते हैं. आज भी ऐसे बहुत से वाल्मीकि हैं, जो चर्च भी जाते हैं और मंदिर भी जाते हैं, वे होली-दीवाली भी मनाते हैं और क्रिसमस भी मनाते हैं. ऐसे लोग अगर घर वापसी करते हैं, तो वह इसलिए कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि वे तो अपने घर में ही थे, घर उन्होंने छोड़ा ही कहाँ था? संघ परिवार के संगठन दलित बौद्धों की घर वापसी नहीं करा सकते, क्योंकि उन्होंने अध्ययन-मनन के साथ अंतर्मन से बौद्ध धर्म ग्रहण किया है और दूसरी बात यह कि संघ परिवार बौद्धधर्म को हिन्दूधर्म के अंतर्गत ही मानता है. दलित मुसलमानों की घर वापसी भी भगवा पलटन के लिए आसान नहीं है, क्योंकि मुसलमान राजनीतिक रूप से ताकतवर हैं. वे आक्रामक हिंदुत्व का सामना करना जानते हैं. उदाहरण के लिए मीनाक्षीपुरम में सत्तर के दशक में लगभग 8 सौ दलितों ने इस्लाम अपनाया था. वे हिन्दुओं के अपमान से आजिज आकर सम्मान के लिए मुसलमान बने थे. हिन्दू संगठनों ने इस धर्मांतरण में दलितों को धन देने का आरोप लगाया था. पर, वे उनकी घर वापसी कराने में कभी सफल नहीं हो सके. बस, बेचारे ईसाई रह जाते हैं, जो कमजोर हैं और उनका सामना करने में असमर्थ हैं.

भारत के ईसाई मिशनरी दलितों का ईसाईकरण करने के लिए बदनाम हैं. पर यह सच नहीं है. इसका जायजा लेना जरूरी है. 1937 में जब वृन्दावन में ईसाई मिशन के भवन में उग्रवादी हिन्दुओं ने आग लगा दी थी, तब डा. आंबेडकर ने उस पर टिप्पणी करते हुए कहा था—“भारत के ईसाईयों के प्रति मेरी गहरी रूचि है, क्योंकि उनमें से अधिसंख्य अछूत जातियों से हैं. मैं उन्हें शक्तिशाली देखना चाहता हूँ, क्योंकि मैं भविष्य में उनके लिए भारी खतरा देख रहा हूँ. उन्हें उग्रवादी हिंदुत्व का सामना करना है, जो भारतीय राष्ट्रवाद का छद्म रूप धारण कर रहा है. यह उग्रवादी हिंदुत्व ईसाईयों के साथ कैसा व्यवहार करेगा, इसका अनुमान अभी हाल की वृन्दावन की घटना से लगाया जा सकता है, जहाँ उग्र हिन्दुओं की भीड़ ने ईसाई मिशन के भवन को जला दिया था. यदि यह भावी घटनाओं का संकेत है, तो ईसाईयों को इसका मुकाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए.” लेकिन ईसाईयों ने इस चेतावनी को गम्भीरता से नहीं लिया. उन्होंने इस चेतावनी को ही नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि उन्होंने दलितों से दूरी बनाकर भी रखी. इस सम्बन्ध में डा. आंबेडकर का लेख ‘Christianising the Untouchables’ पढ़ने योग्य है. उन्होंने लिखा है कि ईसाईयत ने सहज रूप से निम्न वर्गों को प्रभावित किया था और उन्हीं के बीच सर्वप्रथम उसका प्रचार हुआ था. इसी वजह से शायद उसे भिखरियों का धर्म भी कहा गया था.

किन्तु भारत में ईसाईयों ने अपने मिशन की शुरुआत में ही इस क्रम को उलट दिया. उन्होंने दलितों की बजाय ब्राह्मणों तथा हिन्दुओं के उच्च वर्गों में धर्मांतरण कराने में रूचि ली. वे यह समझते थे कि इससे आम जनता में धर्मांतरण का उनका काम आसान हो जायेगा. उन्होंने भारत में इतने सारे स्कूल, कालेज और अस्पताल इसलिए खोले, क्योंकि वे ब्राह्मण वर्ग से सम्पर्क करना चाहते थे. लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली, जबकि उनके स्कूल-कालेजों और अस्पतालों का पूरा लाभ ब्राह्मणों और उच्च वर्गों ने ही उठाया. गरीबी के कारण निम्न वर्गों के लोग इन संस्थाओं का लाभ उठा ही नहीं सकते थे. फर्राटे की अंग्रेजी बोलने वाले आज के अधिसंख्य हिन्दू नेता और ऑफिसर्स इन्हीं ईसाईयों के कालेजों से पढ़े हुए हैं. पर शायद ही इनमें से कोई ईसाई धर्म की ओर आकृष्ट हुआ हो. ईसाई मिशनरी यह नहीं समझ पाए कि समानता की बातें असमानता से पीड़ित जनता को प्रभावित करती हैं, न कि उन उच्च हिन्दुओं को, जिनका लक्ष्य ही असमानता पर आधारित वर्णव्यवस्था को बनाए रखना है. अगर उन्होंने इस सच्चाई को समझा होता तो आज न केवल वे संख्या में ताकतवर होते, बल्कि आक्रामक हिंदुत्व का मुकाबला कर सकने की स्थिति में भी होते. डा. आंबेडकर ने इसी लेख में लिखा है कि ‘आज भारत में जितने ईसाईयों को हम देख रहे हैं, उसका कारण यह है कि कुछ ईसाई मिशनरियों ने उच्च हिन्दुओं को प्रभावित करने के अपने प्रयासों की निरर्थकता को भांप लिया था. यदि उन्होंने इस भूल को भांप न लिया होता और निम्न वर्गों के दिलों को प्रभावित करने का प्रयास न किया होता, तो आज भारत में एक भी ईसाई नहीं मिलता.’