gandhi

“तुम्हे एक जन्तर् देता हूँ | जब भी तुम्हे संदेह हो या तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे ,तो यह कसौटी आजमाओ : जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो .उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो की जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो ,वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा ? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ? ….तब तुम देखोगे की तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त होता जा रहा है |”-एम् के गाँधी

महात्मा गांधीजी के यह विचार सबके लिए गांधीजी की ताबीज के नाम से जाने जाते हैं !! लेकिन असल में ये देश के हर एक आदमी का भविष्य तय करने वाले राजनितिक नेताओं के लिए ताबीज है जिससे की वे अपनी पार्टी को जनविरोधी एवं अहंकारी होने से बचा सके | अपनी नीतियों का निर्धारण सिर्फ और सिर्फ उस समाज के उस गरीब और कमजोर अंतिम आदमी को , उसकी निराश शक्ल को ,उसके भूखे पेट को मध्ये नजर रखकर तय करने में किसी भी दुविधा जनक स्थिति से बच सके | क्यूँ की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सभी नेताओं से लेकर और उनका किसी न किसी तरह से समर्थन करने वाली जनता के लिए आजादी पाने का मकसद सिर्फ यही था ! और यही वजह थी की इस लड़ाई की शुरुआत से लेकर निर्णायक अंत तक पहुँचने से पहले तक जनता के बीच किसी भी मजहब या मजहबी नेता की आजादी के लक्ष्य के आगे न कोई अहमियत थी न प्रभाव | क्यूँ की उन्हें गुलामी की खाई में धकलने में इसी मजहब और मजहबी शासकों की खुदगर्ज तानाशाही जिम्मेदार थी ये जनता बखूबी जानती थी !

लेकिन जैसे ही आजादी के साथ साथ बंटवारे में विभाजित हुई यही जनता और इस जनता के रहनुमा बने नेता, पाकिस्तान में दुबारा इसी गुलामी की खाई की देहलीज पर पहुंचे | भारत की जनता और कुछ नेताओं के मन में भी पाकिस्तान की तरह दुबारा इसी गुलामी की खाई की देहलीज पर भारत को एक हिन्दुराष्ट्र बना कर रखने या न रखने की दुविधा थी ही | तब यही वह गांधीजी का ताबीज था जो दोनों देशों के नेता और जनता को अपने अपने देश में रहकर अपनी अपनी आजादी के बाद की मंजिल को दिखा रहा था ! फिर से मजहब और उसकी वजह से आती गुलामी की खाई से बचाए रखने के लिए ये वह मन्त्र थे जो वास्तव में उस ताबीज की तरह थे जो लोग चौबीसों घंटे सुरक्षा के लिए पहने रखने में विश्वास करते हैं !

गांधीजी के सफ़र के साउथ अफ्रीका के एक छोटे से आन्दोलन के आरंभ को देखें तो गांधीजी के लिए मात्र देश की आजादी कभी भी अंतिम लक्ष्य नहीं था | और इसीलिए अंग्रेजों का जाना उनके लिए अखंड भारत की जनता को गुलामी से मुक्त कराने का एक पड़ाव भर था | और इसीलिए अंग्रेजो के जाने के बाद भले ही कंधे से कन्धा लगाकर लड़ने वाली यही जनता दो देशों के सीमा रेखाओं में बाँट दी गई हो लेकिन गुलामी से मुक्ति के बाद के मंजिल की और दोनों की भी शुरुआत अभी होनी थी ये सत्य था | और इस मंजिल की और बढ़ने में दोनों देशों की सामान असमान गति के साथ जनता के लिए फिर एक बार वही गुलामी पसंद मजहब सबसे बड़ा रोड़ा बननेवाला था | जो हर कदम पर देश की जनता का हित और देश की मजहबी पहचान इन दोनों में से किसको ज्यादा अहमियत दे यह दुविधा सदा बनाये रखने वाला था यह आजादी के बाद आनेवाले भविष्य का संकेत जहाँ केवल और केवल आजादी को ही अपना अंतिम लक्ष्य मान बैठे लोग देख समझ ही नहीं पा रहे थे वहीँ आजादी के कहीं बाद का स्वराज्य का लक्ष्य पाने को निकले गांधीजी बिलकुल स्पष्टता से देख और समझ पा रहे थे !

इसीलिए , पुन: अपने इतिहास की वही गलती दोहराने को उकसाती दुविधा से तुरंत मुक्ति पा कर सदियों की गुलामी से आजादी के बाद की मंजिल की और बिना और समय गँवाए आगे बढ़ने का मन्त्र गांधीजी ने इस ताबीज नुमा विचारों से दिया था ! जिसमे एक गरीब ,कमजोर और समाज के अंतिम तबके के आदमी का हित किस भी देश-धर्म के हित से ,सीमा से सर्वोपरि होने का निर्णायक सन्देश है ! और ये कोई नयी बात नहीं बल्कि वही ‘ वसुधैव कुटुम्बकम” इन दो शब्दों का प्रायोगिक रूप है !

लेकिन जैसा की हम देख ही पा रहे हैं पाकिस्तान ने अपने जन्म से ही खुद को फिर से मजहब की गिरफ्त में देकर पाकिस्तानी जनता को आजादी की लड़ाई में उनका बराबर का त्याग और योगदान होने के बावजूद आजादी के उन्ही फायदों से आजतक वंचित रखा है जिन्हें भारत की जनता और धर्म निरपेक्ष नेता पिछले छ दशकों से दश की तरक्की के लिए बखूबी इस्तमाल कर रहे है ! और आज इसकी कमान कुछ मजहब परस्तों के हाथों में जाती प्रतीत होने के बावजूद भी प्रत्यक्ष सरकार के अबतक धर्मनिरपेक्ष निति पर ही टिके होने से इस रफ़्तार में कोई कमी नहीं आई है और आगे भी इसी निति पर चले तो ये रफ्तार बनी रहेगी या इससे भी दुगनी होगी इस क्रमश: साफ़ नजर आते भविष्य का प्रमाणपत्र न सिर्फ बराक ओबामा के जाते जाते दिए गए नसीहत नुमा शुभेच्छाओं से मिलता है बल्कि भारत में बढ़ते निवेश के पीछे भी भारत जैसे विभिन्न वेश विचार की जमीं पर उद्योगों को आश्चर्यजनक जमीनीसुरक्षा प्रदान करती यह धर्म निरपेक्ष निति ही होने का सबुत है !

अब इससे हम भले ही खुश हो लें ! मौका दर मौका पाकिस्तान को निचा भी दिखा लें , लेकिन जैसे की पहले ही जिस बात का गांधीजी को डर था वही वो रहा है आजादी के फल पर अपना अपना समान अधिकार रखने वाली दोनों देशो की जनता में से एक देश की जनता कुछ नेताओं की गलतियों से इस अधिकार से वंचित रहने पर आज भी मजबूर है | और साथ साथ एक साथ जन्मे दो देश आजदी के बाद की असल मंजिल पाने की रफ़्तार में असमान हो गए ! तो अब इस अंतर को पाटने के लिए हरसंभव प्रयास में फिर से एकबार चीन और कभी अमेरिका की जाने अनजाने गुलामी करना पाकिस्तान नाम के देश को भले ही कुछ संतुलन स्थापित करने में मदद करे लेकिन पाकिस्तानी जनता को फिर एक बार अपने आजादी के फल से वंचित रहने पर ही मजबूर कर रहा है ये तो दिखती बात है ! और ऊपर से जिस मजहब की खातिर देश की स्थापना हुई वही मजहब अपने खाते में दुनिया का एक और देश बढ़ जाने के बावजूद उस निर्णय के अंशत: भी सही न होने का स्पष्ट संकेत दे रहा है !

लेकिन ‘अब पछतावे क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत’ की तर्ज पर कभी भारत को भी पछताना न पड़े इसीलिए देश के सिर्फ और सिर्फ अंतिम इंसान के हित को मध्ये नजर रखते हुवे कदम उठाने से भटकाने वाले हरेक तत्वों से बचाती यह गान्धिमंत्र की ताबीज आज भी प्रासंगिक है यह बार बार सिद्ध होता आया है ,और आगे भी होता रहेगा !