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by- नुज़हत नाज़नीन खान

इस विषय पर लिखने से पहले हमने ये देखा है कि ’ आतंकवाद’ जैसे शब्दों की परिभाषा ही आज तक लोग निश्चित नही कर पाये ! उदाहरणार्थ कांगो नाइजेरिया ,म्यांमार ,थाइलैंड ,फ़िलिपिन , फ़िलिस्तीन या हमारे ही देश भारत में अगर तीन चार दिन के अन्दर में ही हज़ारों मुस्लिमों या उनकी औरतों का सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाये या गर्भवती महिलाओं का पेट फ़ाडकर नवजात शिशु के साथ उसे ज़िंदा जला दिया जाये तो वह आतंकवाद नही ! लेकिन अगर कोइ भी गुमनाम व्यक्ति या गिरोह चाहे वह भले ही मुस्लिम न हो मगर किसी भी गैरमुस्लिम के साथ किसी भी कुंठित घटना को अंजाम देता है तो उसको फ़ौरन मुस्लिम आतंकवाद का नाम दे दिया जाता है ! जबकि ऐसी ही घटनाओं को अनजाम देने वाले , धार्मिक स्थलों पर बम फ़ोडने वाले हमारे ही देश में देशभक्त कहे जाते हैं ! फ़िलिस्तीनी अपने देश की आज़ादी के लिये लडते हैं तो आतंकवादी कहे जाते हैं ! जेल से रहाइ पाने के लिये अंगरेज़ों से अपनी वफ़ादारी और देश के प्रति गद्दारी के लिये माफ़ी पर माफ़ी मांगने वाला ’वीर ’ और कोइ मुखबिरी करने वाला ’क्रान्तिकारी ’और जानें क्या क्या कहलाता है ! आसाम में एक ही साथ ७८ मासूम आदिवासियों व उन्के असहाय बच्चों की निरपराध हत्या होती है तो उसे आतंकवाद नही उग्रवाद कहा जाता है ! यहां भी आतंक वाद की परिभाषा बदल दी गयी ! किंतु इसका अर्थ ये हरगिज़ नही कि कोइ पुर्णरूपेण एक ही स्वरूप की क्रित्य को जब जैसा चाहे परिभाषित करे और सभी लोग मानते चले जांय ! ऐसा किसी के भी कहने से कभी भी नही होगा ! ये याद रखनी चाहिये !

पिछले दिनों बीजेपी के नेता साक्षी जिसके आगे महाराज भी लिखा जाता है ! साक्षी का अर्थ वैसे तो हिन्दी में गवाह के होता है जिसने अपनी आखों से किसी घटना को होते हुये देखा हो पर इन्होने अपने नाम को भी स्वयं झूटा करते हुये बहुत वह कुछ भी मदरसों और उस में की पढाइ के बारे में बोला था जो सपने में भी कभी देखा नही था ! और न ही वह कभी उसके गवाह थे ! जब टीवी चैनल वालों ने उनसे कडे शब्दों में इसके बारे में पूछा तो आंय बांय सांय होगये ! हां एक झूट असाक्छ्य रूप से ज़रूर जड दिये कि मदरसों में २६ जनवरी या १५ अगस्त को ध्वजारोहण नही होता और अपने इसी झूट के कारण देश को इस्लामी करण करने के षणयंत्र का मुद्दा भी उन्हों ने सवयं ही निर्माण भी कर लिया ! जबकि उनको पता भी नही मदरसे मात्रिभूमि के लिये जान की आहुति देने से लेकर सभी धरमों के सम्मान , शान्ति , आपसी भाइ चारा और मेल व मिलाप की शिक्षा के साथ ये भी बताते हैं कि तुम तब तक एक सच्चा मुसलमान नही बन सकते जब तक तुम्हारा पडोसी तुमसे खुश न रहे चाहे वह किसी भी धरम का अनुयायी क्यों न हो ! रही बात मदरसों में ध्वजारोहण की तो ये भी साक्षी जी का असाक्छ्य ही है ! हर मदरसे में २६ जनवरी या १५ अगस्त को ध्वजारोहण नियमित रूप से होता है ! सवयं जाकर देखो तो पता चले फिर बोलो ! इन बातों के बाद मुझे भी कुछ पूछना है उन सभी लोगों से जो मदरसों पर तो झूटा इल्ज़ाम लगाते हैं किन्तु सवयं की संस्थाओं और सवयं के गरेबान को नही देखते ! क्या कोइ बताये गा ? RSS के नागपुर मुख्य या प्रधान कार्यालय पर आज तक कभी तिरंगा ध्वज फहराया गया ? जवाब है नही कभी नही ! तो ऐसा क्यों है ? क्या वो देश के सम्मान और गौरव से भी उंचा है ? जो देश की शान ध्वज को अपने कार्यालय पर फहराना तक् गवारा न करे व संस्था देश भक्त कैसे हो गयी ? इतिहास साक्षी है (यहां तथा कथित साक्छी की बात नही ) कि १९४८ में उसी नागपुर में तिरंगे को पैरों से रौंदा गया था ! क्या इस पर कोइ कुछ बोलेगा !
हमारी सुरक्छा के लिये हमारी थल , वायू और जल सेना के होते हुये भी यदि किसी संस्था के द्वारा अपने सुरक्छा के नाम पर केवल हिंदुओं के लिये मार काट की ट्रेनिग दी जाती है तो वह देशभक्त कैसे होगयी और अगर ये देशभक्ति है तो फिर दूसरे समुदाय के लोगों को भी ऐसा करने की अनुमति आप दे रहे हैं कि नही ? जवाब होगा ! नही ! यदि नही तो किस नैतिक मुल्य और संवधानिक अधिकार के तहत आप ऐसा करते हुये स्वयं और अपनी संस्था को देश भक्त कह सकते हैं ! किन्तु ऐसे लोगों से ऐसे सवाल का कोइ औचित्य ही कहां जिनके लिये नैतिकता बहुत दूर की बात हो !

क्या बात है ! कुल जनसंख्या के ८० % जिनकी जनसंख्या हो सरकारी तंत्र में जो ९०% हो ,धन धान्य और सभी प्रकार से समरिद्ध हों उनको अपनी सुरक्छा के नाम पर बंदूक चलाने से लेकर सभी प्रकार की संहारिक ट्रेनिंग हो और जो कमज़ोर ,कुचले १३ या ३% हों जगह् जगह प्रताडित किये जारहे हों उनको ऐसे ट्रेनिग की कोइ आव श्यक्ता नही !….. जगह जगह सुरक्छा के नाम पर ये ट्रेनिंग क्या अर्थ व उद्देश्य रखती है ? विगत दिनों में इस से क्या काम लिया गया है ? हम ही नही पूरा संसार जान चुका है ! किसी की ओर से इस ट्रेनिंग को देशभक्ति ,धर्म और नैतिकमुल्यों की उच्च व शिखर श्रेणी की सनद देने से यथार्थ बदल नही जाता !

आखिर में ऐसे लोग किसी और बात में साक्षी हों कि नही , अपने झूट का साक्षी ज़रूर हैं ! वैसे हमें ये आशा भी है कि ये लोग अपनी ऐसी विशेषता सदा बनाये रखें गे ! ये उनके लिये बडी बात नही ! जय भारत !