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ओबामा के जाते ही जैसा की अपेक्षित था एक खबर आई के ‘किरण ने की ओबामा के विजिट को भुनाने की कोशिश !’ और टी वि पर किसी डिबेट में इसमें हर्ज ही क्या है ऐसे ‘सकारात्मक’ सुर भी सुनने को मिले ! लेकिन किरण बेदी का ये कहना की ‘ओबामा को भारत में लाने के लिए पीएम मोदी ने काफी मेहनत की है। वे ऐसे ही नहीं आए हैं इससे पूरा देश को फायदा होगा।’ अब अमेरिका के किसी नेता ने कभी ये कहा हो की हम कभी भारत नहीं आयेंगे ऐसा तो कभी सुनने में नहीं आया !! और बिना बुलावे के भी कोई अमरीकी नेता पाकिस्तान न गया हो ऐसा भी कभी देखने में नहीं आया ! तो जिन अमरीकी नेताओं का कही आने जाने का मापदंड इतना आम हो उन्हें भारत लाकर ऐसी क्या मेहरबानी मोदीजी ने देश पर कर दी ये तो किरणजी ही बता सकती है ! लेकिन हाँ बी जे पी पर जरुर कोई मेहरबानी हुई है ऐसा किरण जी का कॉन्फिडेंस बता रहा है !
तो आइये देखते हैं इस कॉन्फिडेंस कहिये या आरोप; में कितना दम है ! …..

क्या किरण बेदी जी इस बात पर सीना फुला रही हैं की देखो जिन्हें कभी खुद अमेरिका जाने पर पाबंदी थी उन्ही के कहने पर ओबामा न सिर्फ भारत आये बल्कि उन्हें अपनी व्यक्तिगत दोस्ती का भी तोहफा दे गए ! एक भारतीय होने के नाते तो ये हम सभी के लिए गर्व की बात होती अगर ओबामा मोदीजी के उस प्रतिबन्ध पर भी कुछ कहते ! लेकिन उस अपमान को तो मोदीजी ऐसे पचा गए की जैसे कुछ हुवा ही न हो ?

अरे भाई, अपने लिए न सही लेकिन अपने देशवासियों के लिए ही सही’ जब ओबामा से दोस्ती हुई ही थी और उनके आने से लेकर जाने तक उठते बैठते खाते पीते हर वक्त उनसे ये भूल कर की आप किसी देश के सिर्फ फैशन आइकॉन नहीं बल्कि पी एम् हैं,और ऐसी मुलाकातों के लिए देश के कुछ प्रोटोकोल हैं, सब ,सब को भुलाकर जब व्यक्तिगत बाते कर ही रहे थे तो ये भी ओबामाजी से पूछकर देश को बता देते की आखिर कभी उनके साथ अमेरिका ने ऐसा क्यूँ किया था ? वो कितना सही या गलत था ? और अगर गलत था तो क्या कोई मुआफिनामा ओबामा अपने साथ लाये थे ? और अगर सही था तो उसके लिए अमेरिका ने मोदीजी की क्या जवाबदेही तय की ?

चलो एक पल के लिए मान लिया की ओबामा और मोदी ने अपनी दोस्ती के बीच में अपने अपने देशों को नहीं आने दिया होगा फिर भी मोदीजी आज आप गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं इस देश के प्रधान मंत्री हैं इसे न तो ओबामा भूले होंगे और न खुद आप ! और आप नहीं भूले इसकी गवाही खुद आपका आपके नाम से सजा सूट दे रहा था !! जब आप मित्रता के बाद भी अपने ओहदे को नहीं भूले तो फिर आपको उस ओहदे तक पहुंचाने वाला देश कैसे भूलेगा की अमेरिका हमारे देश के प्रतिष्ठित लोगों के आत्मसन्मान को ठेस पहुंचाने का दोषी है और अमेरिका के राष्ट्रपति होने के नाते ओबामा की ओर से कोई सफाई मिलना देशवासियों का हक़ है | जिसकी दोस्ती की आड़ में अनदेखी कतईं स्वीकार्य नहीं हो सकती |

तो अगर कोई कहता है की अबामा की विजिट को कोई भुना रहा है तो पहली बात तो भैया हमें नहीं लगता की कोई भुना रहा है ! क्यूँ की ऐसे मौके को भुनाना तब कहा जाता जब कोई इसका इस्तमाल सबसे पहले अपने ऊपर लगे लांछन को दूर करने के लिए करता ! और न सिर्फ अपने देश की बल्कि ओबामा के देश की भी क्लीन चीट हासिल करता ! आखिर क्यूँ मोदीजी की इतनी भूरी भूरी तारीफ़ करने वाले, उन्हें नए नए विशेषणों से नवाजने वाले ओबामा ने एक शब्द से भी अपने प्रिय मित्र पर लगे लांछन को मिटाना जरुरी नहीं समझा ? अपने तीन दिन के वास्तव्य में मोदीजी को एक बार भी इनोसेंट बोल देते तो निश्चित ही ये उनकी विजिट को उपलब्धि मानने वालों के लिए ये वर्ल्ड के सुप्रीम कोर्ट से मिली क्लीन चीट साबित होती ! लेकिन ओबामा ने मोदीजी के लिए सबकुछ कहा लेकिन इनोसेंट क्यूँ नहीं कहा इसका राज तो उनके अंतिम जनसंबोधन में दिए भाषण में छिपा है | जिसे बड़ी सुविधाजनक ढंग से अनदेखा करने की कोशिश में किरण बेदी द्वारा ओबामा विजिट का हर्षवायु का गुब्बारा कुछ इस तरह छोड़ा गया की सब मात्र ओबामा के भारत आ जाने के हर्ष में इसे इतनी बड़ी उपलब्धि माने की उसके आगे ओबामा ने क्या कहा क्या नहीं इसका कोई महत्त्व ही न रह जाए !

ऐसा चाहने वाले शायद इसी भुलावे में हैं की लोग केवल ओबामा को मोदीजी भारत ले ही आये इस ख़ुशी के आगे ओबामा ने क्या कहा सब भूल जायेंगे और ओबामा को भारत लाने के एवज में किरण बेदिजी को वोट दे देंगे और इस तरह वे ओबामा की विजिट को भुना लेंगे तो मैं कहूँगा ऐसा सोचने वाले और आरोप लगाने वाले दोनों गलत हैं ! दोनों भी देश और दुनिया को अंधे बहरे समझकर चल रहे हैं !

एक तो ओबामा ने वो नहीं कहा जो कहना चाहिए था | दुसरे जाते जाते वो वह सब कह कर चले गए जो बी जे पी के हिसाब से नहीं कहना चाहिए था | क्यूँ की उन्होंने धर्म को लेकर जो कहा वो चुनाव में किरण बेदी और उनकी पार्टी के लिए दिल्ली तो क्या देश के किसी भी चुनाव में किसी काम का नहीं ! इसीलिए ऐसे तो ओबामा को मोदी द्वारा पटाये जाने के पल पल को , एक एक वार्तालाप को बड़े शान से परोसने वालों की थाली से ओबामा के दिए धर्मनिरपेक्षता के पकवान गायब हैं !

न ओबामा ने गांधी को अपना आदर्श माना इसका कोई डंका पीट रहा है और न उन्होंने हर धर्म को गांधीजी के ही मार्ग के अनुसार एक ही वृक्ष की शाखाएं और एक ही बागीचे के रंगबिरंगे फुल कहा इस से किसी का सीना फुल रहा है ! क्यूँ की ये तो सरासर इनकी मूल और छुपी हुई धर्माधारित राष्ट्र की विचारधारा के ही खिलाफ है !

ओबामा यहीं पर रुकते तो भी इनके लिए कोई दिक्कत नहीं होती क्यूँ की गांधी को तो ये ऐसे भी अपनाए हुवे है | लेकिन अगर कोई गोडसे को भी छोड़ने को कह रहा हो तो ? ? अब दो दो कस्ती पे सवार होकर तो नहीं चला जा सकता न ? लेकिन ओबामा जाते जाते कुछ ऐसा ही इशारा कर गए की गोडसे जैसी विचारधारा रखोगे तो और भी बटोगे ! अब ये तो आर एस एस की राजनैतिक फ्रंट रही बी जे पी के लिए कही से भी भुनाने लायक बात नहीं है !

फिर कैसे कोई कह सकता है की बी जे पी ओबामा विजीट को भुना रही है ? हाँ अगर बी जी पी में हैं दम तो अपनी मूल विचारधारा को तिलांजलि देकर भुना के दिखाए !