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बराक !! जी बराक ! मैं भी दुनिया के एक सर्वशक्तिमान देश के एक शीर्ष नेता को बिना कोई जी वी लगाए बराक कह रहा हूँ ! नहीं ! नहीं !! ये कोई बदतमीजी नहीं बल्कि दोस्ती की वजह से मिली छुट है | और दोस्ती के वजह से ऐसी छुट हमारे देश के प्रधान मंत्री को बिना किसी के दिये मिल सकती है तो उन्हें प्रधान मंत्री बनाने वाले हम भारतीयों को क्यूँ नहीं ! भाई बराक को बराक कहने में हम मात्र एक भारतीय नागरिक होने के नाते किसी प्रोटोकोल की बलि तो नहीं दे रहे | और न ही किसी पार्टी के लिए बहुमत का जुगाड़ कर रहे हैं जो हमारी दोस्ती पर शक किया जाय ! दोस्ती में तो ऐसे भी किसी प्रोटोकोल की जगह नहीं होती ! और दोस्त कोई भी किसी का भी हो सकता है उसमे छोटे बड़े ,उंच नीच की कोई जगह नहीं होती | तो यह तो अच्छी बात है न की इस देश का हर चाय बेचने वाला और अमेरिका में बकरी का दूध बेचने वाला भी अब बराक को, नरेंद्र मोदीजी को अपना दोस्त मानने लगे !

आपको पता होगा की इस देश में दोस्ती की मिसाल के लिए कृष्ण और सुदामा की कहानी को आदर्श माना जाता है ! लेकिन बराक और मोदीजी ! जी भाई ,मैं बराक को तो बराक ही कहूँगा क्यूँ की वैसा अधिकार दोस्ती के एक उसूल ‘जो मेरा वो तेरा है जो तेरा वो मेरा ‘ के चलते मोदी के दोस्त मेरे दोस्त हुवे ! लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही न है की मोदी भी मेरे दोस्त हुवे ? ऐसा तो उन्होंने कभी कहा नहीं ! उनके लिए तो मैं कल भी एक वोटर था और आज भी वोटर ही हूँ !! और आज तक भला किसी ने किसी वोटर को दोस्त माना है ? ऐसा रिस्क तो भूलकर भी कोई नहीं लेगा ! क्यूँ की जो सिर्फ वोटर होता है और जो नेता सत्ता में होता है वो एक दुसरे को अपना दोस्त बना ही नहीं सकता ! जरा अपने नए दो

फिर अब आप पूछोगे की मोदी आपके दोस्त नहीं तो जो मोदीजी के दोस्त हैं वो आपके दोस्त कैसे हो गए ? रुकिए भाईसाहब , हमने कब इनकार किया की हम मोदीजी को दोस्त नहीं मानते लेकिन खुद मोदीजी बार बार कह रहे हैं की मुझे तो अभी छ:, सात, आठ महीने ही हुवे हैं …..आगे आप जानते हैं ! ज्यादा कुछ कहोगे तो जब साठ वर्षों में वो आपके दोस्त नहीं बने तो मात्र छ: ,सात, आठ महीनो में हम आपके दोस्त कैसे बन जायेंगे ? हमें पहले इस देश की मरम्मत करने के लिए कुछ और ‘कड़े” फैसले लेने दीजिये ! और बीच बीच में फुर्सत मिली तो हमारे चुनावी वादों के लिए इतना सोचने दीजिये की कल आप ही हमें दुबारा वोट दे सकें फिर दोस्ती वोस्ती के बारे में सोचेंगे ! आखिर दोस्ती करना भी कोई खेल नहीं है और निभाना इतना आसान नहीं !

दोस्ती में दोस्त तो हमें वोट क्या कुछ भी न दें तो भी हमारा दोस्त रहता है क्यूँ की दोस्ती में स्वार्थ की कोई जगह नहीं होती ! इसकी मिसाल आज दुनिया को हम दिखा ही रहे हैं ! की दिल्ली ने वाशिंगटन से निस्वार्थ दोस्ती की है ! और शायद ..शायद वाशिंगटन ने भी ! और यह दोस्ती अब तक इतनी ही परवान चढ़ पाई है की इसमें दोस्ती करने वाले व्यक्तिगत बराक और नरेंद्र के साथ साथ दिल्ली और वाशिंगटन ही दोस्त बन पाए हैं ! इसे आगे भारत और अमेरिका की दोस्ती में बदलने तक परवान चढ़ने में अभी समय देना तो लाजमी है भाई !

इसीलिए सुदामा की पत्नी की भाँती अभी इस दोस्ती से भारत को क्या मिला ये सवाल खड़ा करना बेमानी होगी ! हमें इन दोनों में से किसी न किसी के “घर वापसी ” तक का इन्तजार तो करना ही होगा ! जैसे मन में हजारो शंकाए लिए सुदामा ने “घर वापसी” की थी और उनके घर पहुँचते ही उन्हें कृष्ण जैसा दोस्त होने का क्या मतलब होता है वह समझ में आया था ! और जिसने इस दोस्ती की कहानी को अमर बना दिया था !
और कहते हैं की इतिहास अपने आप को दोहराता है ! और मोदीजी के लिए तो ऐसे ही बहोत सी दंतकथाएं सदियों पहले लिखी जाने का पता चल रहा है ! तो हो सकता है की ये उसी का आगाज हो !

लेकिन कृष्ण और सुदामा के दोस्ती को आदर्श मानने वाले अभी तक यह तय नहीं कर पायें है की इनमे कृष्ण कौन है और सुदामा कौन ! अब भले ही बराक दूसरी बार यहाँ आये हो लेकिन किसी को उन्हें सुदामा कहने हिम्मत नहीं हो सकती और मोदीजी को सुदामा हम मान ही नहीं सकते ! तो फिर अगर दोनों ही कृष्ण हुवे तो कृष्ण तो सिर्फ एक ही हो सकता है ! फिर ये कैसे तय हो की इनमे कृष्ण कौन और सुदामा कौन ?