religion

मुझे कभी कभी आश्चर्य होता है कि इंसान इतना विकास पा जाने के बावजूद कुछ प्रारंभिक स्तर के मामलों में अब तक विवश्ता और लाचार है। हम एक डॉलर खर्च करने से पहले दस बार सोचते हैं कि इसे ठीक जगह खर्च कर रहे हैं कि नहीं, लेकिन जब धर्म की बारी आती है तो हम बलासोचे समझे अपना दिल, मन, शरीर, धन, संतान यहां तक कि पूरी सोसायटी गिरवी रख देते हैं और पूर्ण एहसास नहीं करते कि इस प्रक्रिया से हम अपने आप पर और अपनी पीढ़ियों पर कितना अत्याचार कर रहे हैं …

अब यही देख लें कि हम जीवन में हर चीज का मज़ाक उड़ाते हैं, जहां जब जो कुछ ाबनार्मल दिखे तो उस पर हंस लेते हैं लेकिन जैसे ही धर्म और इससे संबंधित मामलों सामने आते हैं हमारी हंसी रुक जाती है, दांत अंदर चले जाते और होंठ सिल जाते हैं, ऐसा क्यों?

धर्म को व्यंग्य, कॉमिक्स, लतीफ़ों, कार्टून और आलोचनात्मक बातचीत से क्यों दूर रखा जाता है? धर्मों पर मजाक क्यों नहीं किया जा सकता? धर्मों पे मजाक पर प्रतिबंध किसने लगाई है? यह धर्मों के शक्तिशाली तानाशाह होने की दलील है या कमजोर होने की? धर्मों को किसने यह शक्ति दी कि उसे परवान चढ़ाने वाले, उसकी सेवा करने वाले ही उसकी किसी बेदलील पहलू पर हंस नहीं सकते? हंसी इलाज का ग़म है तो धर्म पर हंसी क्यों मना है?

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि धर्म इंसान का निजी मामला है उस पर हंसी उसकी गोपनीयता को आहत करना है …. मैं उनसे पूछता हूँ कि जब कोई बच्चा, बूढ़े या जवान आपके सामने फिसल कर गिर जाता है तो आप तुरंत हंसी क्यों छूट जाती है? यह भी तो फिसलने वाले व्यक्तिगत मामला था, उससे भी तो वह आहत होता है?

व्यंग्य और हास्य पैदा ही वहां होता है जहां बोनगी दलीलों का प्रयोग हो रहा है, गलत परंपरा परवान चढ़ रही हों या बेवकूफी का प्रदर्शन किया जा रहा हो। व्यंग्य और हास्य मानव और प्रणाली त्रुटियों के सुधार के लिए ऐसा फकाहीह शैली विकल्प होता है कि आप जल्दी हंसी भी आती है और अपने मन इस अनुकूलन द्वारा भी जाता है …. ऐसे में धर्मों को मजाक से दूर रखना क्या यह कहने की कोशिश है कि धर्मों और धार्मिक गुरू पूरा कर रहे हैं, उनसे गलती हो सकती या उनकी गलती की ओर इशारा करना अपराध है?

धर्मों के खिलाफ हंसना बोलना क्यों कर अपराध है? … इस धर्म की क्या अहमियत है जो लोगों को पूजा के लिए अपने महलों नुमा पूजा स्थलों मेंबुलाता है मगर अपने बन्दे को इतना भी अकाल नहीं देता के वह दूसरों के चप्पल, जूते चोरी न करें? … इसका मतलब यह है कि धर्म इंसान की पहली जरूरत नहीं … अब अगर एक कॉमिक्स लेखक इस ओर इशारा करे और लोग इस विषय पर लिखा पढ़ कर हँसी और सोचें तो इस में क्या गलत है .

क्या हजारों, सैकड़ों साल पहले उतारी या लिखी गई धार्मिक धर्मग्रंथों का हर, हर अक्षर आज भी सच हो सकता है? … अगर मैं इन धार्मिक पुस्तकों को समझ कर पढ़ूँ और जगह- जगह मुझे विरोधभास मिले और बतौर हास्य लेखक उसकी निशान दही अपने लेख में हूँ तो मेरी गर्दन उड़ाना ही सही न्याय है? …. अगर यह न्याय है तो रचनात्मक आलोचना के सही होने का कानून कहाँ चला गया?

हम समझते हैं कि वरिष्ठ और वर्तमान धार्मिक कोई गलती नही कर सकते. ? क्या वह इंसान नहीं? … मनुष्य गलती का पुतला नहीं? .. किया सैकड़ों साल पहले उनके कहे गए कथन आज अप्रचलित घोषित नहीं पा सकते? … क्या ही प्रामाणिक धार्मिक पुस्तकों में दर्ज घटनाओं के हवालों से उनके चरित्र पर एक सच्चा लेख लिखना “अपमान” है? ….

अगर आप इतने संवेदनशील हैं कि अपने धर्म और धार्मिक राजाओं आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते तो यह आपकी व्यक्तिगत कमजोरी है … बोलने वाले (हास्य) लिखने वाले तो अपना अधिकार राय इस्तेमाल करते रहेंगे .. अब आप अपने आप को न बदलें तो खुद ही दीवार से लग जाएंगे। आप एक बोसीदह, कमजोर नगयतर पर खड़े … आपकी अला जंग खाए, दीमक त्रस्त हिचकी है … तर्क शक्ति से रद्द करने का दौर बीत चुका स्वीकार कर कि दुनिया आगे निकल चुकी, धर्म पीछे रह गए।

क्या धर्मों कॉमिक्स की शक्ति से डरते हैं? … क्या उन्हें यह डर पैदा कि मुस्कुराते व्यंग भरी वाक्यांश या लकैरों से मनुष्यों पर थोनपी उनकी हजारों साल का आतंक खत्म हो जाएगी? …. अगर ऐसा है तो धर्म को समझ लेना चाहिए कि उनके दिन गिने जा चुके हैं … मनुष्य का सिर अपने आगे झुकाने और बना कर दिए उनकी मेहनत की कमाई डरावना देकर छीन लेने का समय अब खत्म होने को है … धर्म की दीवारों पर मज़ा और क़हक़हे चोट पड़नी शुरू हो गई है …. अब अपनी बोसीदह दीवारों को बचा सकता हो तो बचा लिया …. हम तो तुम्हारी दीवारों पर हास्य वाक्य लिखते रहेंगे … अब तुम रोवे गे और हम हँसी गे …

अनुवाद — अफज़ल खान