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फ्रांस की मजाकिया पत्रिका शार्ली एब्दे ने आंतकवादी हमले के बाद अपनी प्रतियों की संख्या 60 हजार से बढ़ाकर 30 लाख प्रकाशित कर दीं। फिर भी सारी प्रतियां हाथोंहाथ बिक गयीं। शार्ली एब्दे के इस अंक के मुख्य पृष्ठ पर हजरत मुहम्मद साहब का कार्टून बना था जो हाथ में तख्ती लिये हुए थे जिस पर लिखा था मैं शार्ली हूं। उनकी आंखों में आंसू झलकाते हुए दिखाये गये थे। तख्ती में यह भी लिखा था कि मैं सभी को माफ करता हूं जबकि शार्ली एब्दे के पत्रकारों और कार्टूनिस्टों की सामूहिक हत्या पैगम्बर साहब के कार्टून को छापकर कथित तौर पर इस्लामी मान्यताओं की तौहीन करने की ही वजह से की गई थी।

फ्रांस की राज्य क्रांति स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित आधुनिक उदार लोकतंत्र की जनक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये फ्रांसीसी समुदाय में बलिदान होने की हद तक प्रतिबद्धता स्वाभाविक है। दूसरी ओर इस्लामी चरमपंथी हैं जो अपने नवी की घोषणाओं को अंतिम सत्य मानने में विश्वास रखते हैं और उस आस्था से उन्हें डिगाने वालों के खिलाफ जेहाद छेडऩा अपना फर्ज समझते हैं। यह अपनी अपनी तरह की परस्पर विरोधी दो प्रतिबद्धताओं का टकराव है या कुछ और। बहरहाल पाकिस्तान के पेशावर में आर्मी स्कूल में मासूम बच्चों की सामूहिक हत्या के कृत्य की निंदा को लेकर विश्व जनमत में हुई जबर्दस्त प्रतिक्रिया और इसके बाद शार्ली एब्दे के पत्रकारों की हत्या के विरोध में पेरिस में निकाले गये शांति मार्च में 44 राष्ट्राध्यक्षों व उनके प्रतिनिधियों के साथ 10 लाख लोगों की भीड़ उमडऩा यह जेहाद के पागलपन पर ऐसी नैतिक चोट की तरह रहा जिसने इस्लामी उग्रवाद और कट्टरवाद को बैकफुट पर ला दिया लेकिन इस बीच घटनाचक्र कुछ इस तरह घूमा है कि उक्त पूरे प्रसंग में विपर्यास हावी होने लगा है।

प्रतिबद्धता चाहे किसी भी विचार के प्रति हो तभी दृढ़ होती है जब उसके निर्वाह के लिये जान देने और जान लेने का जज्बा हो। शर्त यह भी है कि प्रतिबद्ध व्यक्ति के किसी व्यक्तिगत स्वार्थ की सीधी पूर्ति उस विचार में निहित न हो। देखा जाये वो प्रतिबद्धता मानवीय समाज के लिये आवश्यक तत्व है। यह गुण नैतिक और चारित्रिक उत्थान के लिये उत्प्रेरक है जिससे परमार्थ की भावना का विकास होता है जो मानवीय गुणों का सर्वोत्तम तत्व है। इस तरह यह कहा जाये कि सच्ची प्रतिबद्धतायें भिन्न-भिन्न स्वरूपों में होते हुए भी आखिर में एक तत्व से उपजी साबित होती हैं। फिर दो प्रतिबद्ध समुदायों में खूनी जंग की गुंजाइश कहां रह जाती है। फ्रांस में एक दूसरे के अस्तित्व की कीमत पर बढ़त पाने की जद्दोजहद में जुटी प्रतिबद्धताओं के बीच जंग इसी कारण एक गुत्थी है जिसे सुलझाने के लिये बहुत माथापच्ची की जरूरत है।

प्रतिबद्धता के विकास के लिये शर्त है कि वह जिस विचारधारा के लिये समर्पित है उसका औचित्य साबित करने को विवेक को संतुष्ट करने वाले अकाट्य तर्कों से वह समर्थित हो। इस्लाम के संदर्भ में देखें तो जब धर्म के मानवीयकरण से निहित स्वार्थों के लिये उसे तोड़े मरोड़े जाने की पराकाष्ठा हो गयी थी, मूर्ति पूजा जिसमें व्यक्ति पूजा स्वत: निहित है को प्रतिबंधित करने का ख्याल पैगम्बर साहब के दिमाग में आया। तथागत बुद्ध भी नहीं चाहते थे कि लोग उनके आष्टांगिक मार्ग को उनके प्रति श्रद्धा निविदित करके एक कोने में रखने की छूट पा लें। इस कोशिश की वजह से उन्होंने भी अपनी प्रतिमाओं के निर्माण पर रोक घोषित कर रखी थी लेकिन उन्होंने यह व्यवस्था नहीं की थी कि जो इस रोक को नहीं मानेगा वह संघ के बाहर हो जायेगा, धम्म से बहिष्कृत हो जायेगा। इसी कारण उनके बाद उनकी जितनी मूर्तियां बनी संसार में किसी भी अवतारी पुरुष की उतनी मूर्तियां स्थापित नहीं की गयीं। जिन आडम्बरों और कर्मकांडों से मुक्त करने के लिये धम्म का प्रवर्तन हुआ था वह बुतपरस्ती की वजह से उन्हीं में गर्क हो गया इसलिये इस्लाम जब बौद्ध धर्म के प्रभाव क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ तो मूर्ति पूजा निषेध के पैगम्बर के आदेश का पालन कराने के लिये उसने चरम पर मूर्ति पूजक हो चुके बौद्धों के प्रति निर्मम और क्रूर तेवर अख्तियार कर लिये। मान्यता यह है कि बुतपरस्ती नाम बुद्धपरस्ती का ही अपभ्रंश है।

इस मामले में इस्लामी जेहाद को कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि एक माक्र्सवादी राज्य में व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को तब तक मान्य नहीं किया जा सकता जब तक कि पूरी दुनिया वर्गविहीन न हो जाये। यह यूटोपिया साकार होने की प्रतीक्षा तक माक्र्सवादी शासन में सर्वहारा की तानाशाही को झेलना अनिवार्य नियति है। कुछ इसी तर्ज पर इस्लाम जब तक सारी दुनिया दारुल हरब में न बदल जाए तब तक उसके सिद्धांतों की उलटी गिनती शुरू होने की आशंका के चलते अपनी किसी मान्यता में ढील बर्दाश्त नहीं कर सकता।

बहरहाल सारे यूरोप में इस समय इस्लामीकरण के खतरे से निपटने के लिये आंदोलन हो रहे हैं। जर्मनी का पेगिडा आंदोलन इसी नाते काफी जोर पकड़ रहा है। फ्रांस में भी शानेवेलवेक का एक उपन्यास सबमिशन के नाम से सामने आया है। जिसमें 2022 तक फ्रांस में इस्लामी शासन कायम हो जाने की कल्पना है। उपन्यास भले ही काल्पनिक हो लेकिन उसमें फ्रांसीसियों की अचेतन आशंकाओं की अभिव्यक्ति है। फ्रांस में पूरे यूरोप में सबसे अधिक पचास लाख मुसलमान हैं। वहां बढ़ती बेरोजगारी ने अप्रवासन और उससे जुड़े मुस्लिमों की आबादी बढऩे के तथ्य के चलते फ्रांस के परंपरागत समाज को विचलित कर रखा है। मोहम्मद साहब को चित्रित करने के मामले में इस्लामी वर्जना को बार-बार तोडऩे का शार्ली एब्दे का दुस्साहस क्या इसी से प्रेरित है। यह संयोग नहीं हो सकता कि शार्ली एब्दे पर आतंकवादी हमले के बाद जर्मनी के हम्बर्ग मार्निंग पोस्ट अखबार में मुहम्मद साहब के तीन कार्टून प्रकाशित किये गये। ईरानी शासकों ने शार्ली एब्दे पर हुए हमले की निंदा की थी लेकिन अब उसने पत्रिका के ताजा अंक में फिर पैगम्बर साहब का कार्टून छापे जाने की भी निंदा की है। साफ जाहिर है कि यूरोपीय समाज का सम्बन्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मुसलमानों को चिढ़ाना है और उनका चिढऩा जता रहा है कि यूरोपीय समाज का यह तीर सही निशाने पर लग रहा है।

अगर कोई धार्मिक व्यवस्था बुनियादी मानवीय मूल्यों के विरुद्ध हो तो अभिव्यक्ति के खतरे उठाये जाने चाहिये लेकिन केवल अपने शगल के लिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेना विवेक सम्मत नहीं है। फिर चाहे हिन्दू देवी-देवताओं को शराब की बोतलों और जूतों पर चित्रित का मामला हो या मुहम्मद साहब का कार्टून बनाना। खासतौर से महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाने के कारण जेहादी आतंकवादियों के खिलाफ जो माहौल तैयार हो रहा है उसमें मुसलमानों को चिढ़ाने वाले शगल को अपनाना घातक साबित हो सकता है। आखिर पैगम्बर के चित्रण की वर्जना को तोडऩे से हासिल क्या है। हालत यह हो गई है कि शार्ली एब्दे के नए अंक में मुहम्मद साहब का कार्टून फिर से आने के बाद जेहादियों को नए सिरे से समर्थन प्राप्त होने लगा है। पाकिस्तान की संसद में उसके विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित हुआ। करांची में फ्रांस के वाणिज्यिक दूतावास के पास उग्र और हिंसक प्रदर्शन हुए। कई अन्य मुस्लिम राष्ट्रों में भी शार्ली एब्दे के आतंकवादियों के हाथों मारे गए पत्रकारों के प्रति संवेदनाएं धुंधली हुई हैं और शार्ली एब्दे की हिमाकत की कटु भत्र्सना की गई है। इस मामले में पोप का बयान भी काबिले गौर है जिसमें उन्होंने जहां शार्ली एब्दे के पत्रकारों की हत्या की निंदा की वहीं वे उसके द्वारा आस्थावान समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाले कृत्य को कोसने से भी नहीं चूके और उन्होंने साफ कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निर्बाध नहीं है। बहरहाल इस्लामिक मान्यताओं को बेवजह चुनौती देने की क्रांतिकारिता जारी रही तो इस्लामिक दुनिया में पागल जेहाद के खिलाफ बन रहा माहौल और विवेकशील इस्लाम के उभरने की प्रक्रिया को गहरा धक्का पहुंच सकता है।