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पाकिस्तान के जन्मदाता कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने तुर्की में खिलाफत खत्म किये जाने के खिलाफ आन्दोलन को कांग्रेस की ओर से समर्थन और सक्रिय सहयोग घोषित करने के फैसले पर अपनी आपत्ति जताते हुए महात्मा गांधी से कहा था मि.गांधी राजनीति के साथ धर्म का घालमेल ठीक नहीं है। कांग्रेस को खिलाफत बहाली आन्दोलन के पचड़े में मत डालो वरना इसके दूरगामी नतीजे खतरनाक होंगे। जिन्ना पाकिस्तान के गठन के बाद पहली बार नमाज पढऩे के लिये मस्जिद गये तो उन्हें सब कुछ अटपटा लगा। उन्हें नमाज के लिये बैठने और सिजदा करने का सलीका तक मालूम नहीं था जिससे वे अपने आप में सिकुड़े से जा रहे थे। इतिहास की विडम्बना देखिये वही जिन्ना धर्म के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में नये राष्ट्र के निर्माण के पहली बार सूत्रधार बने।

पाकिस्तान विरोधाभासों की जमीन पर खड़ा एक विचित्र देश है। इस्लाम के मुताबिक पाक यानि (जगह की) पवित्रता में मक्का अतुलनीय है। किसी और स्थान को पवित्रता में विशिष्ट करार देने की चेष्टा मक्का का दर्जा गिराने का कुफ्र होगा। यह जानते हुए भी आदर्श इस्लामिक राष्ट्र बनाने की सौगन्ध के साथ जिन्दगी भर कमोवेश नास्तिक रहे जिन्ना ने हिन्दुस्तान से अलग कर बनायी गयी अपनी हुकूमत को पाकिस्तान का नाम दिया। मजहबी कानून के हिसाब से जिन्ना और पाकिस्तान के निर्माण में भूमिका अदा करने वाले सारे लोग उक्त नामकरण के कारण इस्लाम के गुनहगार हैं। इसी गुनाह की सजा है कि कश्मीर में उकसावे के जरिये भारत की अखण्डता को खण्ड-खण्ड करने की प्रक्रिया शुरू कर देने का पाकिस्तान का शेखचिल्ली ख्वाब न तो आज तक पूरा हो पाया है और न निकट भविष्य में पूरा होने के आसार हैं लेकिन पाकिस्तान आज से लगभग 44 वर्ष पहले ही बांग्लादेश के नाम से टूट चुका है और अभी भी अवशेष पाकिस्तान अपनी अखण्डता को लेकर निश्चिंत नहीं रह सकता।

ऐसे में पाकिस्तान को इस्लामी चेहरा मानकर इस्लाम की सूरत और सीरत की व्याख्या करने का कोई औचित्य नहीं है। दरअसल पाकिस्तान का आचरण अपनी मूल काया से छिटकी अभिशप्त आत्मा जैसा है। यह शैतान आत्मा इस्लाम का मुखौटा चढ़ाकर भ्रम पैदा कर रही है जो कि शैतान की फितरत के अनुरूप है। शैतान ने तो फरिश्ते का आभास कराकर हजरत इब्राहीम तक का ईमान डिगाने की कोशिश की थी लेकिन जिसका दीन पक्का हो उस पर न तो किसी शैतान का जोर चला है न चल सकता है।

पाकिस्तान की विध्वंसकारी शैतानी रूह का इस्तेमाल अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने मंसूबे पूरे करने के लिये किया। पाकिस्तान की मदद से गुमराह मौलवियों द्वारा वहां कायम किये गये मदरसों के तालिबानों ने अफगानिस्तान में मुस्लिम आबादी के बड़े पैमाने पर सफाये की पटकथा लिख डाली। यह इस्लाम की सेवा करने का कौन सा नमूना कहा जाये। अगर अपने को जेहादी घोषित करने वाला कोई शख्स पाकिस्तान की परिभाषा में पवित्र लड़ाका है और ओसामा बिन लादेन को वहां की हुकूमत इसी रूप में प्रच्छन्न तौर पर तस्लीम भी करती रही तो उसे लादेन के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिये था। लादेन को अपने यहां पनाह देने के बहाने बुलाकर अमेरिकी फौज से जिबह कराने की साजिश रचकर पाकिस्तान ने यह साबित किया कि उसका कोई ईमान नहीं है। लादेन के मारे जाने की कहानी किसी भी रूप में प्रचारित की जाती हो लेकिन यह सब कुछ पाकिस्तान की जानकारी में और उसकी मदद से हुआ। यह बात छुपी नहीं रह सकती। पाकिस्तान के पास दीन ईमान से लगातार दगाबाजी करने के अपनी करतूतों से जुड़े सवालों का शायद ही कोई जवाब हो।

पाकिस्तान के बोये विष बीजों के फलितार्थ के रूप में पेशावर में आर्मी स्कूल के मासूमों के सामूहिक कत्लेआम का मंजर सामने आया जिसकी निंदा सारी दुनिया ने की ताकि संकट की घड़ी में पाकिस्तान को संबल मिल सके लेकिन पाकिस्तान ने फिर भी अपनी फितरत नहीं बदली। अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी ने इस्लामाबाद के अपने ताजा दौरे में आतंकवाद के समूल नाश की पाकिस्तानी प्रतिबद्धता में हेराफेरी को भांपकर साफ कहा कि कुछ आतंकवादियों को अपनी सामरिक संपत्ति मानकर भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के खिलाफ इस्तेमाल करने का उसका तरीका गलत है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अपने आतंकवाद विरोधी अभियान में भारत में कई आतंकवादी वारदातों को अंजाम देने वाले लश्कर ए तैयबा के खिलाफ भी कार्रवाई करनी पड़ेगी जबकि पाकिस्तान हाफिज मुहम्मद सईद जैसे लश्कर सरगनाओं को सिर माथे बैठाये हुए है। इसमें वह पेशावर के सबक के बाद भी तब्दीली नहीं करेगा इसका अहसास जान कैरी के सामने ही पाकिस्तानी विदेश मंत्री सरताज अजीज ने अपने धूर्ततापूर्ण बयान से करा दिया कि भारत जब तक कश्मीर के मामले को एजेण्डे में शामिल नहीं करेगा तब तक पाकिस्तान भारत से कोई बातचीत करने को तैयार नहीं होगा। साफ है कि कश्मीर में आतंकवाद के सहारे परवान चढ़ाये जा रहे अलगाववाद को स्वतंत्रता संग्राम के रूप में महिमामंडित करने की हरकत छोडऩे को पाकिस्तान तैयार नहीं है।

आज पूरी दुनिया में इस्लाम की उदार व्याख्या करने वाले दानिशमंद आतंकवाद के खिलाफ वैचारिक लोहा लेने के लिये आगे आ रहे हैं। फ्रांस में एक पत्रिका के पत्रकारों की जेहादी आतंकवादियों द्वारा सामूहिक हत्या की निंदा करने में मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्षों का आगे रहना यह जताता है कि इस्लाम के शुभचिंतक अब अंधे आतंकवाद से मजहब को दूर साबित करने के लिये कितने सचेष्ट हो रहे हैं। होना तो यह चाहिये कि पाकिस्तान भी इस मोड़ पर यह सोचे कि राजनीतिक मकसद हासिल करने के लिये खून खराबे के तरीके को वह जेहाद अथवा जंग ए आजादी की लड़ाई कहकर महिमा मंडित करने से बाज आये लेकिन अगर वह ऐसा नहीं करता तो तय है कि वह विश्व रंगमंच पर जल्द ही अलग-थलग पड़ जायेगा।

पश्चिम में भी निष्पक्ष बुद्धिजीवियों में इस बात का मलाल है कि अमेरिका ने जानबूझकर इस्लाम की उदारवादी परंपरा के आगे बढऩे में रुकावट डाली। अमेरिका ने इस्लामिक दुनिया में उन लोगों की सरपरस्ती की जो अमल में दीन के बुनियादी उसूलों के पूरी तरह खिलाफ नजर आते हैं। अरब देशों में वंशानुगत शाह हुकूमत को इस्लामिक मान्यताओं के हिसाब से कुबूल नहीं किया जा सकता। इसी कारण तो पैगम्बर साहब के नवासे होने के बावजूद उनके पर्दा करने के बाद हजरत अली की ताजपोशी खलीफा के बतौर कुबूल नहीं की गयी थी। हजरत अली बाद में खलीफा घोषित हो पाये थे। अमेरिका की वंशानुगत शाह परंपरा से गहरी दोस्ती है। सऊदी अरब के शासक अपने बेटे बेटियों के रिश्ते एक खास कुल में करने की ही परंपरा बनाये हुए हैं। यह भी इस्लाम के खिलाफ है। मोहम्मद साहब ने कुलीनता के दायरे को तोडऩे और सही अर्थों में भाईचारे की नजीर स्थापित करने के लिये ही अस्पृश्य घोषित हब्शी जाति के एक युवक से की थी क्योंकि दीन के मामले में वे उनके तमाम अनुयायियों से बहुत आगे थे। इस्लाम में पसीने की कमाई से पेट भरने पर जोर दिया गया है क्योंकि आदमी को खुद्दार और ईमान के पाबंद किरदार में ढालने के लिये यह सबसे जरूरी है। उन्होंने ब्याज की कमाई को हराम घोषित किया था जिसके निहितार्थ स्पष्ट हैं। पेट्रो डालर उस समय अस्तित्व में आ चुका होता तो शायद इसे भी वे हराम करार देकर जाते। पेट्रो डालर की दौलत से गुनाहों से भरी अय्याशियों में गर्क सऊदी अरब के रईसजादों की करनी देखकर लगता है कि मोहम्मद साहब का नजरिया कितना दूरंदेशी था।

अमेरिका द्वारा पनपाये गये छद्म इस्लाम की श्रंखला की ही एक कड़ी पाकिस्तान है। उसके नामकरण में ही काफिराना जुर्रत जुड़ी हुई है। पर जवाबी युद्ध शैतानी विचारधारा को मिटाने में कारगर नहीं हो सकता। पुलिस और सेना की भूमिका दुनिया में बहुत सीमित है। जैसा कि प्रगतिशील मुस्लिम पत्रकार, साहित्यकार व अन्य बुद्धिजीवी कर रहे हैं छद्म इस्लाम की काट के लिये सच्चे मानवीय इस्लामिक चेहरे को सामने लाने की जरूरत है यानि एक बार फिर इस्लामी दुनिया में सूफी आन्दोलन जैसे रचनात्मक वैचारिक आन्दोलन की लहर लायी जानी चाहिये।