prayer

by — सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

ऐसा लगता है कि हम धार्मिक आतंकवाद के साये में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। और पेशावर में बच्चों के नरसंहार के बाद पेरिस में पत्रकारों की हत्या की घटना सामने आई है। 9 / 11 के तेरह सालों के बाद भी इस दुनिया को और अधिक समस्याओं, मतभेद और अधिक खतरनाक स्थिति का सामना है। ऐसी स्थिति में जबकि दुनिया उग्रवादीयों और आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई पर ध्यान केंद्रित कर रही है उनकी सैद्धांतिक परंपराओं के जोखिम को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।

जिहादीयों ने हिंसा का एक मुकम्मल खाका तैयार कर लिया है जो कि नफरत और जुल्म व सितम पर आधारित है और जिस में यह क़ाबलियत है कि वह बड़ी संख्या में सीधे साधे मुसलमानों को अपनी तरफ आकर्षित कर ले और रहम और मेहरबानी जैसी इंसानी खुबीयों को उन के अंदर से खत्म कर दें। लेकिन जब भी किसी जमात को किसी आत्मघाती हमलावर की जरुरत पड़ती है तो मुस्लिम समाज में अत्यंत क्रूर और आत्मघाती हमलावरों एक फौज उन्हें मिल जाती है। जाहिर है कि यह इस्लाम पसंद विचार की शक्ति है जो इस्लाम के इन शिक्षाओं और असूल से पूरी तरह अलग है जो सदियों से मुसलमान अपनाते चले आ रहे हैं।

सुफि शिक्षा और शांतिपूर्ण मुसलमानों को हमेशा इस बात पर गर्व रहा है कि वह एक वैश्विक और सहिष्णु धर्म के अनुयायी हैं जो पिछले सभी धर्मों को फैलाने के लिए आया है। मुसलमानों का हमेशा यह ईमान रहा है कि उन का दीन तमाम इंसानियात के लिए एक उपहार है।

इस लिए, जब पिछले सदी के पहले सऊदी वहाबी सरकार के गठन के साथ इस्लाम की एक अलगाववादी, असहिष्णु की व्यख्या शुरु हुई तो मुस्लमानों ने उसे रद्द कर दिया। लेकिन तेल के गैर मामूली दौलत और शीत युध्द की वजह से इस विचार धारा को फैलने में मदद मिली। 9/11 के बाद भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस अमल पर कोई बाधा नहीं डाली। बल्कि इस ने आतंकवाद को बढाने कि लिए नए रास्ते खोल दिए।

हालांकि, उच्च गति के साथ बढ़ते कट्टरपंथ के बावजूद बहुत से मुसलमान अभी भी उदारवादी हैं और सूफी परंपराओं का मजबूती के साथ पालन कर रहे हैं और जो इस्लाम को निजात का एक ऐसा आध्यात्मिक पथ और एक एख़लाकी मैयार समझते हैं जिस पर अमल करना चाहिए। वह नवाचार, विविधता, लैंगिक समानता और लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को बीच का उम्मत क़रार दिया है जिसका अर्थ संतुलित और नरम समाज है। इस्लामी इतिहास में कट्टरपंथी मुसलमानों के बीच हमेशा मौजूद रहे हैं। लेकिन आखिरकार शांतिपूर्ण बहुमत ने हमेशा उन्हें हराया है। उम्मीद है कि हम भी शक्तिशाली पेट्रो डॉलर इस्लाम और उसकी शाखा यानी जिहादियत को हरा देंगे।

लेकिन यह कहना आसान है और करना बहुत मुश्किल। एक कठिन काम उदारवादी मुसलमानों के जिम्मे है। सूफ़ीयाए किराम उदारवादी और सूफी इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने के लिए जो तरीका इस्तेमाल किया करते थे वह तरीका आज इंटरनेट के युग में उपयोगी नहीं हो सकता। सूफ़ीयाए किराम इस्लाम की केवल सकारात्मक शिक्षा पर जोर देते थे और बाकी सब की अनदेखी करते थे। लेकिन अब मामलों को महज अनदेखी करने का जमाना चला गया।

उदारवादी मुसलमानों को नई रणनीति के बारे में सोचना होगा। मेरा यह मानना है कि उदारवादी मुसलमानों को कट्टरपंथी विचारधारा के सभी गुमराहियों को उजागर करते हुए उसका बहिष्कारकरना और इस्लाम की नैतिक शिक्षाओं पर जोर देना चाहिए।

मुस्लमानों के दिमागों पर हावी होने के लिए जिहादीयत की बहुत बड़ी कामयाबी अन्य लोगों के निम्नलिखित बुनियादी अक़ीदे में निहित है।

क) कई सदियों से विद्वान मुसलमानों के बीच एक अटल अक़ीदे को बढ़ावा दे रहे हैं कि कुरान लगभग खुदा की ही तरह एक गैर जीव किताब है।

यह एक खतरनाक बात है। अगर कुरान एक प्राणी है, जो निश्चित रूप से है, जो ऐसी आयात का एक संग्रह है जो समय-समय पर जरूरत के अनुसार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मार्गदर्शन के लिए नाज़िल की जाती रही हैं, तो इन आयात के संदर्भ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और जिन आयात को समझने के लिए संदर्भ की आवश्यकता नहीं उन्हें सार्वभौमिक दर्जा प्राप्त है।

लेकिन अगर गैर प्राणी के रूप में सभी मदरसों में इसकी शिक्षा दी जाती है तो उसकी हर एक आयत अनन्त होगी और संदर्भ के बिना ही उसकी पैरवी की जाएगी। और बुनियादी, और संदर्भ वाली आम हेदायती आयात के बीच का अंतर होगा जिसकी वजह से चरमपंथ सिद्धांत संदर्भ वाली आयतों का आम और बुनियादी आयतों की जगह और आम और बुनियादी खुलासे संदर्भ वाली वजूबी आयतों की जगह ग़लत इस्तेमाल बड़ी आसानी के साथ करेंगे।

यही कारण है कि कुरान मजीद के गैर प्राणी होने की शिक्षा देने वाले हमारे सभी मदरसें ऐसे कट्टरपंथी उलेमा पैदा कर रहे हैं जिन्हें अपना दिमाग लगाने की कोई उचित कारण नज़र नहीं आती। इसलिए अगर वे पाते हैं कि कुरान ने कहीं भी या किसी भी संदर्भ में कहा है कि “काफिरों को मारो” तो वह उठ खड़े होकर काफिरों को मारना शुरू कर सकते हैं, और वह यह भूल जाएंगे कि यह आयत एक विशेष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में नाज़िल की गई थी और केवल उसी समय के लिए विशिष्ट थी। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि सभी जेहादी विचारधारा वाले ज़ुल्म व हत्या के औचित्य में सीधे-साधे मुस्लिम युवाओं को नसीहत करते समय एक बड़ी संख्या कुरान की इन आयतों का हवाला देते हैं जिसमें युद्ध का आदेश दिया गया है। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मारने के जोखिम भरे आत्मघाती हमलों को अंजाम देने के लिए तैयार उनके पास हत्यारों की एक फौज उपलब्ध है जिनका यह मानना है कि वे ऐसा करके जल्दी स्वर्ग में प्रवेश हो जाएंगे।

ख) हदीसों या नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तथाकथित बातों को बड़ी अहमियत दी जाती है। जिहादी किताबों में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संभवतः एक बड़ी संख्या में मनगढ़ंत हदीसों का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाता है। जिन हदीसों का संपादन व विन्यास पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रहलत के 300 साल के बाद किया गया था उनसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रामाणिक बातें प्रतिनिधित्व नहीं हो सकती, हालांकि संभव है कि कुछ हदीसें ऐसी भी हैं जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रामाणिक बातों को दर्शाती हो।

अब अगर गैर इरादतन नुकसान के नाम पर नागरिकों की जमकर हत्या के औचित्य में एक बड़ी संख्या में बज़ाहिर मनगढ़ंत हदीसों का हवाला पेश किया जा रहा है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है (उदाहरण के लिए, बुखारी जिल्द 4 / किताब 52 हदीस 256 या 019/4321) हालांकि ऐसी भी कई हदीसें हैं जिनमें किसी भी स्थिति में इस तरह की हत्या से मना किया है। दरअसल दूसरी ऐसी हदीसें भी हैं जैसे (बुखारी, 021/010 (मुता), जिनमें न केवल महिलाओं या बच्चों या बुजुर्ग लोगों की हत्या को मना किया गया है, बल्कि उनमें “फलदार पेड़ों को काटने, आबाद जगह को उजाड़ने, भोजन के लिए भेंड़ या ऊंट का वध करने, मधुमक्खियों को जलाने और उन्हें बिखेरने “की सख्त मनाही है।

जब खुदा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के अंतिम दिनों में हमारे धर्म को मुकम्मल कर दिया (कुरान 5:3) तो फिर सदियों बाद हदीस जैसे किसी नए सहीफे की संपादन करने का हमें क्या अधिकार है?

ग) सभी मसलक के उलेमा शरीयत को अल्लाह के हुक्म का दर्जा देते। वास्तव में यह पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वेसाल के एक सदी से अधिक के बाद विभिन्न विद्वानों द्वारा संकलित नियमों की एक इंसानी संरचना है जिम में हमेशा परिवर्तन होता रहता है। उनके आदेश के परमात्मा की वाणी होने की कोई संभावना नहीं है।

इस्लाम की समस्या स्पष्ट रूप से गहरे है। यह सब इस्लाम की बुनियादी समस्याएं हैं। लेकिन धर्म के रक्षक या विद्वान लगातार उन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं।

अब यह बड़ा समाज क्या करता है? मेरे विचार से पहले खुद इस दुनिया को मुस्लिम समुदाय के भीतर पैदा होने वाली समस्याओं और घटनाओं से सूचित करने की आवश्यकता है। हमें बुनियाद परस्ती की सतह मालूम करने के लिए विश्वसनीय सर्वेक्षण करने, जुमा के खुत्बा और विभिन्न मदरसों की पाठ्यपुस्तकों की निगरानी करने और रोजमर्रा की जिंदगी में पैदा होने वाले मुख्य सवालों का विद्वानों को समाधान करने की जरूरत है। अगर उलेमा वास्तव में इस्लाम को आतंकवाद का प्रतीक बनने से बचाना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम आम समझ प्रस्तावों को पारित करने की आवश्यकता है जो कि इस्लाम के अनुसार भी हैं:

1- कुरआन एक मख़लुक़ है खुद खुदा की तरह इलाही नहीं है,

2- कुरआन मजीद में मखसुस संदर्भ वाली और खास तौर पर जंग का हुक्म देने वाली आयात अब मुस्लमान के लिए क़ाबिल अमल नहीं हैं,

3- हदीस कुरआन के बराबर कोई इस्लामी सहीफा नहीं है।

4- शरीयत को अल्लाह के हुक्म में शुमार नहीं किया जा सकता।

हमारे उलेमा और राजनेताओं ने अब तक इस दिशा में जो क़दम बढ़ाया है वह काफी नहीं हैं। उन्हें इस बात की उम्मिद है या शायद यह दुआ कर रहे हैं कि यह समस्या समाप्त हो जाए। लेकिन बुनयाद परस्ति गहरा रही है और कठोर होती जा रही है। यह बड़ी संख्या में लोगों को अपनी तरफ आकर्षित भी कर रही है।

अगर मुस्लिम फुक़हा इस्लाम को एक उदारवादी धर्म, नैतिक गुणवत्ता और निजात के एक आध्यात्मिक मार्ग के रूप में जीवित रखना चाहते हैं तो स्पष्ट रूप से उन्हें सतही बयान से ऊपर उठकर समझदारी की दिशा में कदम बढ़ाना होगा ताकि अतिवादी लोग इस्लामी शास्त्रों को आतंकवाद का परिपत्र न बना सकें।

अगर उलेमा शांति वार्ता के लिए सहमत नहीं हों, तो इस बड़े मुस्लिम समाज को इन कुछ उदारवादी और प्रगतिशील मुसलमानों को प्रोत्साहित और उनका समर्थन करना चाहिए जो अपने इस अद्वितीय कार्य को अंजाम देने के लिए सहर्ष कोई भी कष्ट सहन करने को तैयार हैं। उलेमा को अनदेखी करते हुए इस तबक़े का संपर्क सीधे समुदाय से होना चाहिए जो बुद्धिमानी और समझ और फ़्रासत का अभियान चला सकें।

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